HANUMAN BHAKTI

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  • Hanuman Drawings भक्तो द्वारा जो की बहूत ही सुन्दर है
  • हमने हनुमान जी की महिंमा तोह देखि ही है। बजरंगबली के भक्तो को पता है की उनकी महिमा अपरम्पार है। तोह आज हम उन्ही के भक्तो द्वारा कुछ 18 अमेजिंग Hanuman Drawings शेयर कर रहे है जो आपके मन को लुभा देंगे। इन सभी चित्रों में बजरंगबली की भक्ति और महिमा दिखती है। मानो जैसे की स्वयं बजरंगबली आपके सामे खड़े हो।

    यदि आप कोई idea धुंध रहे है Hanuman ji ki easy drawings के लिये तोह यहाँ अनेक चित्रों का कलेक्शन है जो आपको बोहोत मदद करेगा।

    तोह आइये बिना और किसी विडम्बना के इन खूबसूरत चित्रों का आनंद लिया जाये। हमे आशा है आप सबको को Hanuman Ji Drawings पसंद आएंगे। अगर आप इन सब आर्टिसिट्स को Instagram पे फॉलो करेंगे तोह उन्हें बोहोत आछा लगेगा और वे इसी प्रकार आप सब से ऐसे हे और चित्र share किया करेंगे।

    Modern Hanuman Drawings

    1. the_artistic_virtuosi – सबसे शानदार Hanuman Drawings

    पहले नंबर पे है यह sketch जो हनुमान जी को उनका गदा लिये दर्शाता है। इस sketch को बोहोत ही बारीख़ी से सभी छोटी मोती डिटेल्स को देखकर बनाया गया है। बजरगबलि जी ने इस drawing में अपने हाथो को गदा पे रखे होये पहरा देते नज़र आ रहे है। उनका वस्त्र हवा से लहरा रहा है और उनका मुख गुस्से से दुश्मन को दहाड़ रहा है।

    इस पोस्ट को अभी तक 51 likes प्राप्त को चुके है। आर्टिस्ट ने इस पोस्ट को हनुमान जी की चालीसा से लिये हुवे लाइन्स से सम्बोधित किया है जो की इस प्रकार है – सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहे को डरना।

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    सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना -Kamlesh Pandey #hanumansketch #bajrangbali #lordsketch #detaileddrawing #hanumandrawing #bajrangbalidrawing #pawanputrahanuman

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    2. art_has_life – सबसे अनोखी Hanuman Drawing

    आज की इस लिस्ट की सबसे अनोखी चित्र या इसे modern Hanuman drawing कहे। हमारी नज़र में यह कला बोहोत ही अद्भुद है। यह Hanuman Sketch दर्शाता है की यह महाशय कितने talented है। इनकी हनुमानजी के प्रति भक्ति इनकी इस कला से साक्षात् झलकती है।

    अगर कोई इस level की कला रखता है तोह वह बहुत ही आगे जायेगा। लोगो ने भी इस स्केच को खूब प्यार दिया है। instagram पे 900 से भी अधिक लाइक्स के साथ यह पोस्ट सराहा गया है।

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    Lord Hanuman #bajrangbali 🌸🌸 New illustration on paper 📄 . Follow @art_has_life for more ❤ #firozhassanart #firozhassan #illustrationsketch #illustration #bajrangbali #hanuman #gada #hanumanji #sketch #pencil #sketch #pensketch #pencildrawing #drawing #art #artoftheday #artist #artistsoninstagram #arts #drawings #drawthisinyourstyle #hanumandrawing #bajrangbalihanuman #illustrationartists #artista #artwork

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    3. mikanotes

    पवन पुत्र बजरंगबलि एक बलशाली देवता है। यह सब जानते है की हनुमान जी की ताकत की कोई तुलना नहीं है। उन्होंने ने भगवन श्री राम के भाई लछमन की जान बचाने के लिये पूरा संजीवनी पहांड उखाड़ के ला दिया था।

    इस artist द्वारा यह चित्र हनुमान जी का बलशाली अवतार को दर्शाता है। इस चित्रकार ने बहुत ही गहराई से बजरंगबली को muscular बनाया है। यह modern Hanuman drawing बजरंगबली को एक अनोखा superhero लुक देती है। जो की हिन्दू धर्म के रामायण में भगवन हनुमान की महिमा को दर्शाता है जो की आज कल के superhero से कम नहीं है।

    https://www.instagram.com/p/BpB5woGHmSC/

    4. pil.arte

    यदि आप सोचते है की प्रभु बजरंगबली जी की भक्ति केवल भारत में की जाती है तोह निचे दी हुई sketch आपकी यह सोच बदल देगी।

    जी है यह हनुमान जी का चित्र एक Spanish artist द्वारा उभरी गयी है जो की बजरंगबली को एकाग्रता में meditation या ध्यान करते हुए दर्शा रही है।

    यह एकदम सही उदहारण है Modern Hanuman Drawing का जो की बजरंगबली का muscular रूप दिखता है और उनको ध्यान करते हुए लोगो में जागरूकता फैलता है की meditation और spirituality आज के कलयुग में कितना महत्वपूर्ण है।

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    Monito guerrero meditador en carbonilla 110x110cm #charcoaldrawing #charcoalart #charcoaldrawings #charcoalartist #carboncillo #carbonilla #hanuman #hanumanji #hanumanjayanti #yogui #yoguini #instashivatribe #yogalife #yogalifestyle #yogaflow #meditationart #meditacionactiva

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    5. t_he.artistic.pranav

    अगर आप Anime में रूचि रखते है तोह आपको यह ड्राइंग बहुत ही पसंद आएगी। Anime जो के एक Japanese तरीका है animation या films को बनाने का और उसकी फैन फोल्लोविंग भी दुनिया भर में बहुत मसहूर है।

    हनुमान जी का यह modern Anime लुक चित्रकार का एक original art और perspective दर्शाता है जो की एकदम अनोखा है। इस चित्र में ऐसा लग रहा है मानो बजरंगबली किसी दुश्मन पे नज़र गड़ाये बैठे हो और उस पे प्रहार करने की विधि अपने दिमाग में बना रहे हो।

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    H A N U M A N🔥 . . . . . . . . . . . . . . #hanuman #humanjayanti #jaishreeram #penart #drawing #sketch #maruti #hanumansketch #hanumandrawing

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    Angry Hanuman Drawings

    6. neginarender6862

    Narender Negi द्वारा यह angry Hanuman Drawing बोहोत हे अद्भुद और अनोखी है। इस चित्र में हनुमान जी का क्रोध दिख रहा है। मानो दुश्मनो पे जैसे केहर ढाने वाले हो। इस sketch में बजरंगबली का केवल आधा ही मुख दिखाया गया है और आधा मुख परछाई में दिखाया गया है। यह स्टाइल एक अलग ही उजाल लता है इस drawing में।

    अगर कोई Hanuman drawing easy है शुरुवात करने के लिये तोह आप इस sketch से शुरुवात कर सकते है। इस चित्र में आप outline बना के फिर उसमे काली स्याही या पेंसिल से रंग भर सकते है।

    यह angry Hanuman drawing आपके बचो को बहुत पसंद आएगी और वो इसे आसानी से practice भी कर सकते है।

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    Jai Shri Ram Jai Bajrang Bali Art by :- @neginarender6862 #hanumanchalisa #hanuman #hanumantattoo #hanumanstatus #hanumanasana #hanumanji🙏 #sketch #artistsoninstagram #artist #sketchlove #sketchartist #hanumansketch #hanumansketches #sketchoftheday #sketchbookdrawing #drawing #hanumandrawing #jngecartists #jngecian #jngec

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    7. arunparochi – सबसे Detailed Hanuman Drawings

    यह जो ड्राइंग है वो एक अलग हे श्रेणी की है। इसका कोई तोड़ नहीं। यह Lord Hanuman drawing दर्शाता है की बजरंगबली के भक्त कितने टैलेंटेड है और उनकी भक्ति हनुमान जी के प्रति कितनी शक्तिशाली है जो उन्हें ऐसी कला दिखाना की ताकत देती है।

    अरुण परोचि द्वारी बनायीं यह sketch बोहोत हे अद्भुद है। इस artist ने बोहोत हे detailed वे में इस चित्र को बनाया है। अप्प देख सकते है की केवल pencil का उपयोग कर के इन महाशय ने बजरंगबली के मुख को अलग अलग shades दिये है जो की बोहोत की मुश्किल है दर्शाना।

    इस Hanuman Ji drawing के माथे का तिलक, उनकी आंखें, eyebrows और अन्य characteristics सब उत्तम लेवल की कारीगरी है। आप खुद हे इनके पोस्ट के likes से देख सकते है की लोगो ने इनकी इस Bajrangbali ki drawing को कितना सहारा है।

    https://www.instagram.com/p/CAT7ogZh0dq/

    8. jangra_royalart

    बजरंगबली जितनी ही नम्रता से अपने भवान श्री राम से पेश आते है उतनी ही क्रोधता से वो अपने दुश्मनो को भयभीत करते है। इस angry Hanuman drawing में आपको बजरंगबली का क्रोधित रूप दिखेगा, मानो जैसे वो अपने दुश्मनो को चुनौती दे रहे हो।

    इस चित्र में हनुमान जी को उनके खुले बालो के साथ गदा धारण किये हुवे दिखाया गया है। एक बेहतरीन चीज़ जो इस चित्र को अनोखा बनती है वो है लहराते हुवे बजरंगबली का बाल और वस्त्र जिसे बोहोत हे सरलता से एकदम perfect दिखाया गया है।

    https://www.instagram.com/p/CCVLL7KjhGb

    9. subhashthaliva – सबसे Accurate Hanuman Drawing

    वाह! यह Hanuman Ji drawing आपको आश्चर्यचकित कर देगी। इस चित्र में बजरंगबली का वानर रूप दर्शाया गया है। यह sketch एकदम रीयलिस्टिक हो सकता है क्यूंकि scientific discoveries से मन जाता है की रामायण कुछ 7000 साल पहले हुई थी और उस समय देखा जाये तोह कुछ प्रजातियां ऐसी भी थी जो अभी evolve हो रही थी।

    हनुमान जी को इस शानदार चित्र में इसी इंसान और वानर रूप के बीच का विक्सित रूप दिखाया है जो की हमारे हिसाब से एकदम accurate है और शयद सबसे अच्छी drawing है जो बजरंगबली के रूप और आकर को एकदम सही ढंग से दर्शाती है।

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    10. v.v.s.arjun_yadav

    इस प्रकार के चित्र जो angry Hanuman drawings की श्रेणी में आते है आपको अनेक दिखेंगे। क्यूंकि हनुमान जी को उनके दुश्मनो पे केहर ढाने के लिये जाना जाता है।

    यहाँ पे चित्र में चिकतरकर ने एक modern Hanuman दीकहाया है जिसके आठ पैक एब्स भी है। इस प्रकार के drawings आज कल के नोजवानो में बहुत ही प्रसिद्ध है। यह चित्र भी बजरंगबली को एक superhero श्रेणी में दिखता है जो की बजरंगबली के रामायण वाले पात्र को एकदम जच ती है।

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    Hello friends! I have just completed drawing my favourite character Hanuman from Ramayana. #hanuman#hanumandrawing#ramayana#drawing#colourdrawing

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    Panchmukhi Hanuman Drawing

    11. huesbyashwathy

    Panchmukhi Hanuman Ji के बारे में आप सब तोह जानते ही होंगे और इस बजरंगबली भक्त ने बड़ी ही गहराई से यह Hanuman drawing image with colour बनायीं है।

    पांचमुखी हनुमान का नाम उनके पांच अवतारों से पड़ा है, नामक – वराह, गरुड़, अंजनेया, नरसिम्हा और हयग्रीव। हनुमान जी के इस अवतार का वर्णण रामायण की कथा में भी किया गया है। इस पे अधिक जानकारी के लिये आप हमारा निचे दिया हुवा पोस्ट पढ़ सकते है।

    यह भी पढ़े : Panchmukhi Hanuman Ji

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    🙏 քǟռƈɦǟʍʊӄɦɨ ɦǟռʊʍǟռ 🙏 . . . #art #god #hanumanji #hanumandrawing #hanumanpainting #artistsoninstagram #goddrawing #drawings #artlove #artwork #artworks #soulart #energydrawing #meditativeart #meditativedrawing #panchamukhihanuman #watercolorpainting #watercolorart #watercolor #watercolours #watercolor_daily #watercolor_painting #referencedrawing #hindugods #indiangods

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    Hanuman Drawings With Colour

    12. Chandreshbagada.art

    हम सब ने रामानंद सागर जी की रामायण तोह देखि ही है। अगर कोई पात्र जो हनुमान जी के role को एकदम सही तरीके से दर्शा सकता था तोह वे दारा सिंह ही हो सकते थे। असली हनुमान भक्त इस पात्र में और किसी कीसोच भी नहीं सकते।

    दारा सिंह ने हनुमान जी का पात्र मानो ऐसा निभाया हो जैसे की उनका इस जीवन में आने का यही कर्तव्य हो। इसी शिदत से यही Hanuman drawing with colour बनायीं गयी है जैसे साक्षात् दारा सिंह हो। कलाकार चंद्रेश बगड़ा ने बहुत ही easily इस चित्र को paper पे उतारा है। लोगो ने इस picture को बोहोत सराहा है। आप निचे देख सकते है की इस पोस्ट को 11000 से भी ज्यादा likes है।

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    Very Satisfying to see this beautiful drawing of Darasingh aka Hanuman!😍 . Sankat Mochan Jai Hanuman🙏 . Artist: @chandreshbagada.art . @vindusingh #hanumanji #lordhanuman #ramayanonddnational #DaraSingh #VinduSingh #jaihanuman #bajrangbali #pawanputra #indiangods #spiritual #hanumandrawing #artisticpainting #godpainitng #sanatandharma #isckontemple #shriram #jayshreeram #lordhanumanji #hanumantemple #indiantemple #godspainting #hindugods #shreeram #indianculture #shiva #jaybajrangbali #hanumanchalisa #temples #sagarworld

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    13. art_ist2.0 – सबसे शानदार Colourful Hanuman Drawings

    इस अनोखे Hanuman Ji के image में चित्रकार ने बहुत ही उम्दा ढंग से बजरंगबली को भगवा colour के shades में रंगा है। यह ड्राइंग बहुत ही उम्दा है और दर्शाती है की कलाकार ने इस portrait को बहुत ही गहराई से सोच समझ कर बनाया है।

    यहाँ पर हनुमान जी को एक जहाज ध्यान को एकत्रित करते दिखाया हुआ है। ऐसा लग रहा है मानो हनुमान जी किसी सोच में डूबे हो।

    जिस प्रकार इन महाशय ने इस चित्र को इतनी गहराई से दर्शाया है वे खूब सारे सराहना के हकदार है। जिस प्रकार इन्होने ने इतनी निर्दोषिता से इस चित्र को कागज़ पे उतरा है इसकी कोई तुलना नहीं है।

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    #hanuman#hanumandrawing #hanumandrawings #hanumandrawingart #hanumandrawig #drawingsketch #drawing_pencile #drawdrawdraw #drawingtime #drawings #drawings #drawingbook #drawingartist #drawingartist #drawingskills #drawing🎨 #draw #draweveryday #drawing✏ #draw🎨 #drawingsketch #artdrawing #blackchartpaper#drawing_expression #drawingsketchbooks

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    14. thinking_muscle

    कोरोना महामारी के दौरान हर जगह लॉक डाउन था और दूरदर्शन पे इसी द्वौरान लोगो में आस्था जगाये रखने के लिये रामायण का फिरसे प्रसारण हुवा। इसे लोगो ने खूब सहारा और बचो ने भी खूब आनंद लिया। कहतें है ना, रामानंद सागर वाले रामायण जिसको ३० बरस से भी ऊपर हो गये है आज तक कोई नहीं बना पाया है।

    इसी re-telecast से प्रेरित होकर, इन कलाकार ने यह Hanuman Painting बनायीं है। यह पेंटिंग बजरंगबली को एक बोहोत हे सरल और हसमुख अवतार में दिखती है जिसे लोगो ने बहुत काम ही देखा है। इन आर्टिस्ट ने केवल पेन और watercolors का इस्तेमाल करके हनुमान जी का बहुत ही सुन्दर द्रिशय उभरा है।

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    I have been watching Ramayan series on Doordarshan and I am really enjoying it. Most of us are reliving our old memories. It feels so good to try this art and draw Shri Hanumanji on his special day!! Happy Hanuman Jayanti to all!! Materials used – watercolor, pen and sketchpad. During this lockdown please stay at home and stay safe. #lockdown2020 #quarantinediaries #quarantinesketch #shrihanuman #hanumanji #hanumandrawing #ramayan #watercolour #penart #hanumanjayanti #sketchdaily #dailydrawing #indiangods

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    Bal Hanuman Drawing With Colour

    15. umesh_handargall

    निचे दी हुयी Bal Hanuman drawing with colour दर्शाती है की imagination की कोई सीमा नहीं है। अगर आप सच्चे मन से किसी चीज़ की भक्ति करते है तोह आप अपनी चिकतरकला को बहुत ही बेहतरीन बना सकते है।

    इन महाशय द्वारा ये चित्र दर्शाता है मानो बाल हनुमान जी को कृष्णा भगवन की ऊर्जा प्रपात हो। हनुमान जी को कृष्ण भगवन के रंग में बहुत हे सुंदरता से इन कलाकार ने ढला है जैसे की हनुमान भगवन ने कृष्णा का रूप धारण कर लिया हो।

    यह चित्र बहुत ही अनोखी है और इसके लिये में मानता हो की आपको अपने दिमाग में शांति और एकाग्रता की बहुत आवश्यकता है जो की meditation और अपने कार्य को पसंद करने से ही बन सकती है।

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    #artoftheday #procreate #ipaddrawing #hanumandrawing #logo #anjaneyaswamy @ramprasadmh

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    BONUS: Hanuman Drawings Easy To Draw

    16. _apartofart

    यदि आप Hanuman Ji Ki easy drawings ढूंढ रहे है तोह यह आपके लिये सब्सके अछा विकल्प है। आप निचे दी हुई पेंटिंग से प्रेरणा लेकर ऐसा ही कुछ बना सकते है। इन artist ने बहुत हे सरल ढंग से बजरंगबली को दर्शाया है।

    यह Hanuman Sketch एकदम सरल है जो की बजरंगबली के स्वाभाव को भी दर्शाता है। इन चित्रकार ने हनुमान जी को उनका सुरवंशी तिलक, माथे पे मुकुट और फूलो का हार पहने हुये दर्शाया है। हो सकता है हमे देखने में यह सरल लगे, परन्तु इसके पीछे का talent और परिश्रम केवल वो चित्रकार ही जान सकता है जिसने इसे बनाया है।

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    नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा।🙏🏻 . . . . #apartofart #hanumanji #hanumandrawing #blackwork #linework #linedrawing #ink #penandink #drawing #blackworknow #blackillustration #inkwork #artoftheday #art #instagood #instaartist #instaartwork #tgicfeature #designs #pinterestinspired #peace #blessed🙏 #indianartshare

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    17. art_mystery___

    इस Bajrangbali sketch में हमे सबसे मनपसंद चीज़ चित्रकार ने pencil का जिस प्रकार उपयोग किया है वो लगी। इस व्यक्ति ने बहुत ही गहराई से हनुमान जी के वस्त्रो और शरीरी पे केवल pencil के इस्तमाल से बोहोत हे सुन्दर shades दिये है जो की इनके टैलेंट को दर्शाता है।

    आप अगर ध्यान से देखे तोह हनुमान जी के वस्त्र और गदा पे केवल ब्लैक पेंसिल के उपयोग से कितनी बारीख़ी से detailing की गयी है। यह drawing भी Hanuman Ji को muscular form में दर्शाती है और एक modern look देती है।

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    🙏Hanuman ji 🙏 : : #hanuman #ramayana #jaishriram #hanumandrawing #hanumansketch #shading #drawing #draw #pencilshadings #pencilart #art #mahabharat #shadingdrawing

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    18. amazing_finearts – सबसे शानदार Portrait Of Hanuman Drawings

    यह चित्र भी एक बहुत ही उम्दा बजरंगबली का sketch है। अगर आप गौर से देखे तो चित्रकार ने बहुत ही गहराई से इस चित्र में हर चीज़ की fine detailing की है।

    हनुमान जी के शीर्ष का मुकुट, उनके बाल और मूतियो की माला बहुत ही सुन्दर ढंग से कागज़ पे उतारी गयी है। बजरंगबली के आँखों में वो तेज़ भी झलक रहा है मानो स्वयम भगवान् हनुमान हमे देख रहे हो।

    https://www.instagram.com/p/B_ZyyJBDZR5

    मित्रों हमे आशा है आपको यह article जिसमे Hanuman Ji Ki अनेक drawings हमने compile करके आपके पास लाया है, आपको पसंद आया होगा। हमने कोशिश की की बेहतरीन से बेहतरीन Hanuman Ji Modern एवं colour images drawings आपको प्रस्तुत करे।

    अगर आप को यह आर्टिकल पसंद आया हो तोह इन्हे अपने दोस्तों और परिवार में ज़रूर शेयर करें। आपके अगर कोई सुज़ाऊ है तो हमे निचे comments section में ज़रूर बताये।

    नोट: इस पेज पे featured सभी Hanuman Drawings का क्रेडिट सभी ओरिजिनल ओनर्स को जाता है जिन्होंने इसे बनाया है। इसमें hanumanchalisainhindi.com का कोई योगदान नहीं है। आप इन कलाकारों को Instagram और YouTube पे ज़रूर support करें।

    जय श्री राम। जय बजरंगबली। 

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  • Maruti Stotra Marathi Lyrics PDF – हिंदी एवं मराठी भावार्थ सहित
  • 17 वीं शताब्दी के महान संत समर्थ रामदास स्वामी ने Maruti Stotra की रचना की। यहाँ, समर्थ रामदास स्वामी मारुति (हनुमान) का वर्णन करते हैं और मारुति स्तोत्रम के विभिन्न छंदों में उनकी प्रशंसा करते हैं। पहले 13 छंदों में मारुति का वर्णन है, और बाद के 4 चरणानुश्रुति हैं (या वे कौन से गुण / लाभ हैं जो इस भजन को सुनाने से मिलते हैं)। जो लोग Maruti Stotra Ka Path करते हैं, उनकी सभी परेशानियां, मुश्किलें और चिंताएं श्री हनुमान के आशीर्वाद से गायब हो जाती हैं। वे अपने सभी शत्रुओं और सभी बुरी चीजों से मुक्त हो जाते हैं। इस आर्टिकल में आपको Maruti Stotra Lyrics Marathi अथवा हिंदी में सम्पूर्ण भावार्थ सहित दिया गया है और PDF Download Link भी दी गयी है।

    श्री मारुति स्तोत्र वास्तविक में संस्कृत में है। भगवान हनुमान (मारुति) के भक्त आस्था, भक्ति और एकाग्रता के साथ प्रतिदिन इस स्तोत्र का जाप करके भगवान हनुमान को प्रसन्न कर सकते हैं। भगवान हनुमान के आशीर्वाद से उनकी सभी परेशानियां, मुश्किलें और चिंताएं दूर हो जाती हैं। वे अपने सभी शत्रुओं और सभी बुरी चीजों से मुक्त हो जाते हैं। इस तरह उनका जीवन सुखी हो जाता है। उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

    Maruti Stotra In Marathi Lyrics हिंदी भावार्थ सहित

    भीमरूपी महारुद्रा वज्र हनुमान मारुती ।
    वनारि अंजनीसूता रामदूता प्रभंजना ॥ 1॥

    हिंदी भावार्थः बड़े शरीर वाले, क्रोधी, हीरे के समान शरीर वाले, हनुमान, मारुति के पुत्र, जो वन में रहते हैं।
    राम का दूत, अंजना का पुत्र, जो एक तूफान की तरह है।

    मराठी भावार्थः मोठा देह असलेला, विचित्र, हिरा सारखा शरीर, जंगलात राहणारा मारुतीचा मुलगा हनुमान.
    रमाचा मेसेंजर, अंजनाचा मुलगा जो वादळासारखा आहे.

    महाबळी प्राणदाता सकळां उठवी बळें ।
    सौख्यकारी दुःखहारी धूर्त वैष्णव गायका ॥ 2॥

    हिंदी भावार्थः जीवन का सबसे शक्तिशाली, साँसों को प्रदान करने वाला, जो अपनी ताकत से दूसरों को लुभाता है।
    खुशी का सबसे अच्छा समय, दुखों का निवारण, चतुर व्यक्ति, जो विष्णु की प्रशंसा का गायक है।

    मराठी भावार्थः आयुष्यातील सर्वात सामर्थ्यवान, देणारा श्वास घेतो आणि इतरांना आपल्या सामर्थ्याने बुडवितो.
    आनंदाचा सर्वोत्तम काळ, दुःखापासून मुक्तता, हुशार, जो विष्णूची स्तुती गायक आहे.

    दीनानाथा हरीरूपा सुंदरा जगदांतरा ।
    पातालदेवताहंता भव्यसिंदूरलेपना ॥ 3॥

    हिंदी भावार्थः कंबल का सशक्तिकरण-एक के चेहरे के साथ, जो चंद्रमा की तरह सुंदर है, वह जो दुनिया के अंत तक जा सकता है। पाताल लोक के राजाओं का नाश करने वाला, जिसका विशाल शरीर सिंदूर से लदा हुआ है।

    मराठी भावार्थः ब्लँकेटचे सबलीकरण – एक चेहरा असलेला, जो चंद्रासारखा सुंदर आहे, जो जगाच्या शेवटी जाऊ शकतो। हेडिसच्या राजांचा विध्वंसक, ज्यांचे विशाल शरीर सिंदूरने भरलेले आहे.

    लोकनाथा जगन्नाथा प्राणनाथा पुरातना ।
    पुण्यवंता पुण्यशीला पावना परितोषका ॥ 4॥

    हिंदी भावार्थः जो संसार का स्वामी है, जो संसार का स्वामी है, जो आत्माओं का स्वामी है, जो सांस लेता है, जो प्राचीन है। जो मन, वाणी और शरीर से शुद्ध है, जिसके पास एक शुद्ध चरित्र है, पावना का पुत्र: एक शुद्ध पुरुष, वह जो अपने भक्तों की इच्छाओं को पूरा करता है और संतुष्टि प्रदान करता है।

    मराठी भावार्थः जो जगाचा स्वामी आहे, जो जगाचा स्वामी आहे, जो आत्म्यांचा स्वामी आहे, जो श्वास घेतो, जो प्राचीन आहे। जो मनाने, बोलण्यात व देहाने शुद्ध आहे, ज्याचे शुद्ध चरित्र आहे, पवनाचा मुलगा: शुद्ध मनुष्य, जो आपल्या भक्तांच्या इच्छांची पूर्तता करतो आणि समाधान देतो.

    ध्वजांगें उचली बाहो आवेशें लोटला पुढें ।
    काळाग्नि काळरुद्राग्नि देखतां कांपती भयें ॥ 5॥

    हिंदी भावार्थः वह एक झंडे के कर्मचारियों की तरह हाथ बढ़ाते हुए गुस्से से आगे बढ़ता है।
    यहां तक कि यम की अग्नि, और काल उसे इस रूप में देखकर कांप जाते हैं।

    मराठी भावार्थः तो झेंडाच्या कर्मचार्‍यांप्रमाणे हात उंचावून रागाने फिरतो.
    अगदी यमची आग आणि काल त्याला या रूपात पाहून थरथर कापू लागला.

    ब्रह्मांडें माइलीं नेणों आंवळे दंतपंगती ।
    नेत्राग्नि चालिल्या ज्वाळा भ्रकुटी तठिल्या बळें ॥ 6॥

    हिंदी भावार्थः वह जिसके मुंह में ब्रह्मांड बना है, जब वह अपने दांत काटता है।
    जिसकी आँखें भयंकर गुस्से में उसकी भौंहों को सिकोड़ती हैं, वह आग को जला देती है।

    मराठी भावार्थः ज्याच्या तोंडावर विश्‍व बनला आहे, तो दात चावतो.
    ज्यांच्या डोळ्यांत भयंकर रागाने त्याचे भुवके टेकले जातात, त्याने आग जाळली.

    पुच्छ तें मुरडिलें माथां किरीटी कुंडलें बरीं ।
    सुवर्णकटिकांसोटी घंटा किंकिणि नागरा ॥ 7॥

    हिंदी भावार्थः अपनी पूंछ को अपने सिर पर ले जाने के साथ, वह शानदार झुमके के साथ एक मुकुट खेलता है।
    उसकी सुनहरी कमर गूँजती है (हर जगह)।

    मराठी भावार्थः शेपूट त्याच्या डोक्यावर उंच करून, तो भव्य कानातले सह एक मुकुट खेळतो.
    त्याच्या सोन्याचे कंबर प्रतिध्वनी (सर्वत्र).

    ठकारे पर्वताइसा नेटका सडपातळू ।
    चपळांग पाहतां मोठें महाविद्युल्लतेपरी ॥ 8॥

    हिंदी भावार्थः एक विशाल पर्वत की तरह, परिपूर्ण अंगों और पतला रूप में स्थित है।
    वह धधक रहा है और बिजली की एक बड़ी लकीर की तरह आंख की झपकी में चला जाता है।

    मराठी भावार्थः परिपूर्ण हातपाय आणि पातळ स्वरूपात वसलेल्या विशाल पर्वताप्रमाणे.
    तो चमकत आहे आणि विजेच्या मोठ्या पट्ट्यासारख्या डोळ्याच्या डोळ्यांकडे जातो.

    कोटिच्या कोटि उड्डणें झेपावे उत्तरेकडे ।
    मंदाद्रीसारिखा द्रोणू क्रोधें उत्पाटिला बळें ॥ 9॥

    हिंदी भावार्थः जिसने उत्तर की ओर करोड़ों की दूरी तय की और अपनी ताकत से मंदराचल जैसे द्रोणागिरि को उखाड़ फेंका।

    मराठी भावार्थः ज्याने उत्तर दिशेकडे कोट्यांचा प्रवास केला आणि त्याने आपल्या ताकदीने मंदारचल सारख्या द्रोणागिरीला उधळले.

    आणिला मागुती नेला आला गेला मनोगती ।
    मनासी टाकिलें मागें गतीसी तूळणा नसे ॥ 10॥

    हिंदी भावार्थः पर्वत (लंका में) लाकर उसने वापस लौटा और इसे मन की गति से बदल दिया।
    यहां तक कि उसकी गति ने अपना दिमाग खो दिया है और कोई भी उसके वेग से मेल नहीं खा सकता है।

    मराठी भावार्थः डोंगर (लंकेत) आणून तो परत आला आणि त्याने तो मनाच्या वेगाने बदलला.
    जरी त्याच्या वेगाने त्याचे मन गमावले आहे आणि कोणीही त्याच्या वेगाशी जुळत नाही.

    अणूपासोनि ब्रह्मांडायेवढा होत जातसे ।
    तयासी तुळणा कोठें मेरुमांदार धाकुटें ॥ 11॥

    हिंदी भावार्थः एक परमाणु के आकार से लेकर ब्रह्मांड के आकार तक फैला हुआ है।
    मेरु पर्वत और मंदरा के आकार के बराबर कोई कहां हो सकता है?

    मराठी भावार्थः अणूच्या आकारापासून ते विश्वाच्या आकारापर्यंत वाढवितो.
    माउंट मेरु आणि मंद्राच्या आकारात कोठे असू शकते?

    ब्रह्मांडाभोंवते वेढे वज्रपुच्छें करूं शके ।
    तयासी तुळणा कैंची ब्रह्मांडीं पाहतां नसे ॥ 12

    हिंदी भावार्थः वह अपनी हीरे जैसी पूंछ से ब्रह्मांड की घेराबंदी कर सकता है।
    ब्रह्मांड को इससे अधिक कभी नहीं देखा गया है।

    मराठी भावार्थः तो आपल्या हीरे सारख्या शेपटीने विश्वाला वेढा घालू शकतो.यापेक्षा ब्रह्मांड यापूर्वी कधी पाहिले नव्हते.

    आरक्त देखिलें डोळां ग्रासिलें सूर्यमंडळा ।
    वाढतां वाढतां वाढे भेदिलें शून्यमंडळा ॥ 13॥

    हिंदी भावार्थः जिसकी आँखों में लाल सूरज की झलक मिलती है और वह उसे निगल जाता है। (उसके लिए) वह इस हद तक बढ़ गया कि उसने सूर्यमंडल में प्रवेश कर लिया।

    मराठी भावार्थः ज्याचे डोळे लाल सूर्य पाहतात आणि गिळंकृत करतात. (त्याच्यासाठी) तो इतका वाढला की त्याने सूर्यमंडळात प्रवेश केला.

    धनधान्य पशुवृद्धि पुत्रपौत्र समग्रही ।
    पावती रूपविद्यादि स्तोत्रपाठें करूनियां ॥ 14॥

    हिंदी भावार्थः धन, भोजन, पशु, बच्चे पलते हैं और जब कोई व्यक्ति इस भजन को सुनता है, तो उसे स्वास्थ्य और ज्ञान प्राप्त होता है।

    मराठी भावार्थः पैसा, अन्न, प्राणी, मुले भरभराट होतात आणि जेव्हा एखादी व्यक्ती हे स्तोत्र ऐकते तेव्हा एखाद्याला आरोग्य आणि ज्ञान प्राप्त होते.

    भूतप्रेतसमंधादि रोगव्याधि समस्तही ।
    नासती तूटती चिंता आनंदे भीमदर्शनें ॥ 15॥

    हिंदी भावार्थः हनुमान के दर्शन से सभी चिंताएं, भूत, लाश, आत्मा आदि रोग और परेशानियां नष्ट हो जाती हैं और भक्त को प्रसन्नता प्राप्त होती है।

    मराठी भावार्थः हनुमानाच्या दर्शनाने सर्व चिंता, भुते, झोम्बी, आत्मा इत्यादी रोग आणि त्रास नष्ट होतात आणि भक्ताला आनंद होतो.

    हे धरा पंधराश्लोकी लाभली शोभली भली ।
    दृढदेहो निःसंदेहो संख्या चंद्रकलागुणें ॥ 16॥

    हिंदी भावार्थः ये 15 श्लोक, जो लाभ प्रदान करते हैं जो शरीर को शुद्ध करते हैं और मन को श्रेष्ठता प्रदान करते हैं, प्रकृति में चंद्रमा के 15 अंकों की तरह हैं। (चंद्रमा को अक्सर अमृता की संपत्ति कहा जाता है, इसलिए ये छंद अमृत के समान हैं)

    मराठी भावार्थः शरीराला शुद्ध करणारे आणि मनाला श्रेष्ठत्व देणारे फायदे प्रदान करणारे हे १ verses श्लोक निसर्गातील चंद्रातील १ digit अंकांसारखे आहेत. (चंद्राला बर्‍याचदा अमृताची संपत्ती म्हणतात, म्हणून हे श्लोक अमृतसारखेच आहेत)

    रामदासीं अग्रगण्यू कपिकुळासि मंडणू ।
    रामरूपी अन्तरात्मा दर्शने दोष नासती ॥ 17॥

    हिंदी भावार्थः आप राम के भक्तों में सबसे आगे हैं, जिन्होंने बंदरों (कापियों) की दौड़ में प्रसिद्धि प्राप्त की।
    आपकी दृष्टि से, हृदय / आत्मा में राम के रूप, सभी दोष दूर हो जाते हैं।

    मराठी भावार्थः माकडांच्या शर्यतीत (प्रसिद्धीस) प्रसिद्ध झालेल्या राम भक्तांमध्ये तुम्ही आघाडीवर आहात.
    तुमच्या दृष्टिकोनातून, हृदय / आत्म्यात रामचे स्वरूप, सर्व दोष दूर होतात.

    ॥ इति श्री रामदासकृतं संकटनिरसनं नाम श्री मारुतिस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

    हिंदी भावार्थः इससे मारुति स्तोत्र समाप्त होता है। जो समर्थ रामदास द्वारा रचित सभी कठिनाइयों को समाप्त करने में सक्षम है।

    मराठी भावार्थः याने मारुती स्तोत्र संपविला जो समर्थ रामदासांनी रचलेल्या सर्व अडचणींचा शेवट करण्यास सक्षम आहे.

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    मारुती स्तोत्र के फायदे और पूजा की विधि

    hanuman stotra benefits
    • हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान मारुति को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए मारुति स्तोत्र का नियमित जप सबसे शक्तिशाली तरीका है।
    • सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए आपको सुबह स्नान करने के बाद और भगवान मारुति की मूर्ति या तस्वीर के सामने मारुति स्तोत्र का जाप करना चाहिए।
    • आपको अगर Maruti Stotra Benefits चाहिये तोह सबसे पहले उसका हिंदी में अर्थ समझना चाहिए ताकि इसका प्रभाव बढ़ सके।
    • मारुति स्तोत्र का नियमित जाप मानसिक शांति प्रदान करता है और आपके जीवन से सभी बुराईयों को दूर रखता है और आपको स्वस्थ, समृद्ध और समृद्ध बनाता है।
    • Maruti Stotra Ke Fayde अन्य है लेकिन माना जाता है कि इस स्तोत्रम का 1100 बार पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

    Download Maruti Stotra PDF निचे दी गई Link से।

    इस PDF में आपको संछेप में मारुती स्त्रोत्र का मराठी अर्थ सम्पूर्ण विवरण के साथ मिल जायेगा। अगर आपको इस लिंक से PDF Download करने में कोई दुविधा होती है तोह हमे निचे comment में ज़रूर बताये।

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    जय श्री राम। जय बजरंगबली। 

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  • Hanuman Ashtak Lyrics In Hindi PDF भावार्थ सहित। संकट मोचन हनुमान अष्टक
  • संकट मोचन हनुमान अष्टक, जिसे Hanuman Ashtak के रूप में भी जाना जाता है, एक भक्तिमय हिंदी भजन है जो भगवान हनुमान को समर्पित है। Sankat Mochan Hanuman Ashtak (संकट मोचन नाम तिहारो) हनुमान के एक महान भक्त तुलसीदास द्वारा लिखा गया था। अष्टक या अष्टकम् का शाब्दिक अर्थ है आठ और प्रार्थना में भगवान हनुमान की स्तुति में आठ छंद होते हैं और भजन दोहा के साथ समाप्त होता है। भगवान हनुमानजी के अधिकांश मंदिरों में, हनुमान चालीसा के बाद इस संकटमोचन हनुमानस्तक का जाप किया जाता है।

    Hanuman Ashtak Ka Path हनुमान जी को याद दिलाता है, जो अनंत शक्तियों के स्वामी हैं। इसलिए हनुमान चालीसा की तरह हनुमान अष्टक का पाठ भी बहुत पुण्यकारी है और संकटों से मुक्ति देता है।

    हनुमान अष्टक हिंदी भावार्थ सहित

    बाल समय रवि भक्ष लियो तब,तीनहुं लोक भयो अंधियारों I
    ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात  न टारो I
    देवन आनि करी बिनती तब, छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो I
    को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो I 1

    भावार्थः एक बच्चा होते हुए, आपने सूरज को जकड़ लिया, तो तीनों दुनिया अंधेरे में चली गई। इस प्रकार दुनिया मुश्किल में थी, कोई भी संकट दूर नहीं हो सकता था, देवताओं ने फिर से आपसे प्रार्थना की, सूरज को छोड़कर, आपने उनके दुख को कम किया। खतरों के खिलाड़ी के रूप में आपका शीर्षक हे कपि, जिसे दुनिया में कोई नहीं जानता

    बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो I
    चौंकि महामुनि साप दियो तब , चाहिए कौन बिचार बिचारो I
    कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो I  2

    भावार्थः बाली के डर से, सुग्रीव ने पहाड़ी पर नृत्य किया, आपको महान भगवान के पास भेजा और उनकी वापसी की प्रतीक्षा की। चौंकाने वाला ऋषि का अभिशाप, और आपको जो सलाह चाहिए वह जानबूझकर है। एक ब्राह्मण के रूप में प्रच्छन्न, आपने महान भगवान को प्राप्त किया, इस प्रकार भक्त को दुःख से छुटकारा दिलाया। खतरों के खिलाड़ी के रूप में आपका खिताब, हे कापी, जो दुनिया में नहीं जानता है

    अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो I
    जीवत ना बचिहौ हम सो  जु , बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो I
    हेरी थके तट सिन्धु सबे तब , लाए सिया-सुधि प्राण उबारो I  3

    भावार्थः अंगद के साथ, आप सीता को लाने के लिए गए, “उसका पता लगाएं”, बंदर राजा ने “आप में से कोई भी मैं नहीं हूँ” घोषित किया, अगर आप यहाँ पैर रखते हैं तो उसके निशान के बिना! “जब सभी समुद्र के किनारे बीमार और थके हुए थे, तो आपको सीता का पता चला और इस तरह उन्होंने अपनी जान बचाई और इसलिए आपका नाम डेंजर डिस्पेल ओ कपि के रूप में है, जो दुनिया में नहीं जानते हैं?

    रावण त्रास दई सिय को सब , राक्षसी सों कही सोक निवारो I
    ताहि समय हनुमान महाप्रभु , जाए महा रजनीचर मरो I
    चाहत सीय असोक सों आगि सु , दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो I  4

    भावार्थः जब रावण ने सीता पर भय मारा, और सभी राक्षसों को अपने दुःख को कम करने के लिए कहा, हे हनुमान, महान भगवान, आप वहां पहुंचे और विशाल राक्षसों को एक मौत का झटका दिया; जब सीता ने अशोक वृक्ष से भगवान की अंगूठी देते हुए अग्नि की तलाश की, तो आपने उसे शांत किया। खतरों के खिलाड़ी के रूप में आपका खिताब, हे कापी, जो दुनिया में नहीं जानता है

    बान लाग्यो उर लछिमन के तब , प्राण तजे सूत रावन मारो I
    लै गृह बैद्य सुषेन समेत , तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो I 
    आनि सजीवन हाथ  दिए तब , लछिमन के तुम प्रान उबारो I 5

    भावार्थः जब एक तीर लक्ष्मण के सीने में लगा, तो रावण के पुत्र पर एक घातक प्रहार हुआ। आप घर और डॉक्टर सुशील को साथ ले आए, फिर द्रोण को एक झाड़ी के साथ माउंट करें जिसे आपने आसानी से उखाड़ दिया था, समय पर पहुंच गए और इसे संजीवनी को सौंप दिया, फिर आपने लक्ष्मण के जीवन को बचाने में मदद की और इसलिए इस उपाधि को खतरे में डाल दिया। आपका नाम दुनिया में हे कपि के रूप में है। नही पता

    रावन जुध अजान कियो तब , नाग कि फाँस सबै सिर डारो I
    श्रीरघुनाथ समेत सबै दल , मोह भयो यह संकट भारो I
    आनि खगेस तबै हनुमान जु , बंधन काटि सुत्रास निवारो I  6

    भावार्थः जब रावण ने बेहूदा युद्ध किया, और नाग ने श्री रघुनाथ और पूरे शव को सभी के सिर पर फेंक दिया, तो डेलुद ने उसे एक कठिन झटका दिया, जब गरुड़ पहुंचे, हनुमान के लिए धन्यवाद, उन्होंने बंधन काट दिया और शोक व्यक्त किया। समाप्त, शीर्षक के रूप में आपका खतरा प्रदर्शित करता है ओ कापी, दुनिया में कौन नहीं जानता है?

    बंधू समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पताल सिधारो I
    देबिन्हीं पूजि भलि विधि सों बलि , देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो I
    जाये सहाए भयो तब ही , अहिरावन सैन्य समेत संहारो I 7

    भावार्थः जब अहिरावण ने नाथ क्षेत्र में अपने छोटे भाई रघुनाथ का अपहरण किया, तो देवी को विधिपूर्वक पूजा करने और यज्ञ करने के लिए बुलाया, उन्होंने सभी को विचार-विमर्श के लिए बुलाया; आप उस तात्कालिक सहायता के लिए पहुँच गए, अहिरावण और सेना को तब नीचे जाने दिया गया, आपका नाम खतरे में है, हे कापी, दुनिया में कौन नहीं जानता?

    काज किये बड़ देवन के तुम , बीर महाप्रभु देखि बिचारो I
    कौन सो संकट मोर गरीब को , जो तुमसे नहिं जात है टारो I
    बेगि हरो हनुमान महाप्रभु , जो कछु संकट होए हमारो I  8

    भावार्थः हे वीर, महान भगवान, आपके लिए किए गए देवताओं के लिए महान हो सकता है, देखो और मुझे लगता है कि संकट जो मुझ पर आया है, तुम पर प्रहार नहीं कर सकता, हे हनुमान, भगवान महान, जल्दी दूर करो, हमारे लिए कोई भी खतरा हो सकता है प्रवाह, खतरों के खिलाड़ी के रूप में आपका शीर्षक कपि है, जो दुनिया में नहीं जानता है?

    दोहा

    लाल देह लाली लसे , अरु धरि लाल लंगूर I
    वज्र देह दानव दलन , जय जय जय कपि सूर II

    संकट मोचन हनुमान अष्टक दोहा

    भावार्थः हम लाल रंग का सिंदूर लगाते हैं, लाल और लंबी पूंछ वाला शरीर, वज्र जैसा मजबूत शरीर जो राक्षसों को नष्ट करता है, श्री कपि को बार-बार नमस्कार करता है।

    यह भी पढ़े : Bajrang Baan PDF हिंदी भावार्थ के साथ

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    Hanuman Ashtak Lyrics के लाभ

    Sankat Mochan Hanuman Ashtak को दुश्मनों से बाधाओं, खतरों और परेशानियों को दूर करने के लिए पूरे भारत में हनुमान के भक्तों द्वारा सुनाया जाता है। संकट मोचन हनुमान अष्टक का पाठ ग्रहों, विशेष रूप से शनि और मंगल के बुरे प्रभावों से बचाता है। यह प्रार्थना शनिवार और मंगलवार को शनि और मंगल के साप्ताहिक दिन हनुमान मंदिरों में की जाती है।

    • हनुमान के अधिकांश मंदिरों में, हनुमान चालीसा के बाद इस अष्टक का जाप किया जाता है।
    • इस मंत्र से न केवल इसका जप करने वालों को बल्कि उनके परिवार के सदस्यों को भी लाभ मिलता है।
    • यह मंत्र मानसिक विश्राम में मदद करता है और परिवार में शांति की भावना पैदा करता है।
    • इस मंत्र का जप नियमित रूप से वयस्कों और बच्चों की स्वास्थ्य स्थितियों को बेहतर बनाने में योगदान देता है।
    • ऐसे मामले भी हैं जिनमें यह मंत्र सकारात्मक न्यायिक परिणाम प्राप्त करने में सफल रहा है।
    • संकटमोचन हनुमान अष्टक एक व्यक्ति और उसके परिवार की सामान्य भलाई के लिए गाया जाता है।
    • सभी बाधाएं आसानी से समाप्त हो जाती हैं और चुने हुए क्षेत्र में सफल होने के लिए कोई बाधाएं नहीं हैं।
    • संकटमोचन हनुमान का अष्टकम गीत भी शिक्षा में सफलता की गारंटी देता है और लोगों को उनकी इच्छानुसार उच्च शिक्षा प्रदान करने में मदद करता है।

    हनुमान अष्टक (हनुमान अष्टक) का पाठ अत्यंत लाभकारी है। प्रतिदिन Hanuman Ashtak (हनुमान अष्टक) का पाठ करने से व्यक्ति को सभी संकटों और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। जब हनुमान जी छोटे थे, तब उनकी अपार शक्तियाँ खेल में ऋषि-मुनियों के लिए समस्या उत्पन्न करती थीं। इस समस्या से बचने के लिए, उन्हें बचपन में यह शाप मिला कि वह अपनी सारी शक्तियों को तब तक भूल जाएंगे जब तक कोई उन्हें उनकी शक्तियों की याद नहीं दिलाता।

    Video Credits: Bhakti Bhajan Mantra

    Hanuman Ashtak PDF Download करने की विधि।

    1. इस पेज को print का command दे।
    2. वहा आपको ‘Save As PDF’ का option दिखेगा।
    3. इसके बाद Hanuman Ashtak PDF आपके फ़ोन में download हो जायेगा।

    अगर आपको कोई दिक्कत होती है Hanuman Ashtak Lyrics PDF Download करने में तोह comment करके बताये।

    जय श्री राम। जय बजरंगबली 

    यह भी पढ़े : Hanuman Chalisa PDF हिंदी भावार्थ सहित।

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  • Bajrang Baan PDF हिंदी भावार्थ सहित | बजरंग बाण
  • श्री Bajrang Baan PDF सम्पूर्ण निचे दिया गया है। हनुमान जी की महिमा बोहोत निराली है। बजरंग बाण का उच्चारण रोज़ करे और जीवन में सुख शान्ति प्राप्त करे। हनुमान जी की कृपा पाने के लिए सभी भक्त हनुमान जी की अलग-अलग तरह से पूजा करते हैं, जिसमें हनुमान चालीसा और इस Bajrang Baan PDF का नियमित पाठ करना हनुमान जी को बहुत प्रिय है। हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ हमेशा बोलकर ही करना चाहिए, मंत्र का जाप करते समय मन में मंत्र का जाप करना चाहिए।

    सम्पूर्ण श्री Bajarang Baan PDF हिंदी भावार्थ सहित

    ॥दोहा॥

    निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।
    तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।। 

    भावार्थ : जो भी राम भक्त, श्री बजरंग बली हनुमान के सामने संकल्प के साथ, पूरी श्रद्धा और प्रेम के साथ उनसे प्रार्थना करता है, श्री हनुमान उसके सभी कार्यों की कामना करते हैं।

    ॥चौपाई॥

    जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥
    जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥

    भावार्थ : हे भगवान हनुमान, जो संतों का आशीर्वाद देते हैं, हे प्रभु, हमारी प्रार्थना सुनो। हे बजरंग बली वीर हनुमान, अब भक्तों को संवारने में देर न करें और जल्दी से प्रसन्नता प्रदान करें।

    जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
    आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका॥
    जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा॥
    बाग उजारि सिन्धु महं बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा॥
    अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
    लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुर पुर महं भई॥

    भावार्थ : हे बजरंग बली जैसे आपने उछलकर समुद्र को पार किया। एक दानव जैसी सुरसा ने भी आपको अपने विशालकाय शरीर के साथ लंका जाने से रोकने की कोशिश की, लेकिन जिस तरह से आप उसे लात मारकर देवभूमि पहुंच गए। जिस तरह से आप लंका गए, आपने विभीषण को खुशी दी। माता सीता को पाकर परम पद को प्राप्त किया। आपने रावण की लंका के बागों को नष्ट कर दिया और आप रावण को भेजे गए सैनिकों के लिए यम के दूत बन गए। जिस तेजी से आपने अक्षय कुमार को मार डाला, जैसे आपने लंका के महल की तरह अपनी पूंछ से लंका को जला दिया, जिससे आपकी महिमा स्वर्ग में होने लगी।

    अब विलम्ब केहि कारण स्वामी। कृपा करहुं उर अन्तर्यामी॥
    जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होइ दु:ख करहुं निपाता॥
    जय गिरिधर जय जय सुख सागर। सुर समूह समरथ भटनागर॥
    ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्त हठीले। बैरिहिं मारू बज्र की कीले॥
    गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥

    भावार्थ : हे भगवान, अब देर क्यों हो रही है, हे भगवान दयालु बनें। भगवान हनुमान, जो भगवान राम के भाई लक्ष्मण के रक्षक हैं, आपकी जय हो। मैं बहुत चिंतित हूं, आप मेरे कष्टों से छुटकारा पाएं। हे गिरिधर (पर्वत को धारण करने वाले) जय हो, बजरंग बली, सुख के सागर। आप सभी देवताओं और स्वयं भगवान विष्णु की शक्ति के साथ पवन पुत्र हनुमान की जय हो। हे हनुमान बजरा, हे भगवान की स्पाइक्स के साथ दुश्मनों पर हमला करें। अपनी गदा से शत्रुओं का नाश करो। हे बजरंग बली महाराज प्रभु इस दास से छुटकारा पाइए।

    ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो॥
    ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥
    सत्य होउ हरि शपथ पायके। रामदूत धरु मारु धाय के॥
    जय जय जय हनुमन्त अगाधा। दु:ख पावत जन केहि अपराधा॥

    भावार्थ : ओ वीर हनुमान, ओंकार की ध्वनि पर, अब कष्टों पर हमला करो और अपनी गदा मारने में देर न करो। हे शक्तिमान परमेश्वर कपिश्वर बजरंग बली हनुमान। हे परमेश्वर हनुमान, दुश्मनों के सिर को शरीर से अलग कर दें। भगवान श्री हरि स्वयं कहते हैं कि रामदूत बजरंग बली हनुमान आते हैं और अपने शत्रुओं का तुरंत विनाश करते हैं। हे बजरंग बली मैं तुम्हारे हृदय की अथाह गहराइयों से उबरता हूं, लेकिन प्रभु, तुम्हारे होते हुए भी लोग किस अपराध के कारण दुखी हैं।

    पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
    वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुमरे बल हम डरपत नाहीं॥
    पाय परौं कर जोरि मनावों। यह अवसर अब केहि गोहरावों॥
    जय अंजनि कुमार बलवन्ता। शंकर सुवन धीर हनुमन्ता॥

    भावार्थ : हे महावीर, आपके सेवक को पूजा, जप, तपस्या, नियम, आचरण के बारे में कुछ भी नहीं पता है, हम आपकी कृपा से कहीं भी जंगलों में, नाले में, रास्ते में, पहाड़ों में या घर पर नहीं डरते। भगवान, मैं आपके चरणों में, अर्थात् पूजा करके या हाथ जोड़कर आपको मना सकता हूं। मैं तुम्हें इस समय कैसे बुलाऊं, हे अंजनी पुत्र, हे हनुमान, भगवान हनुमान के अंश, आपकी जय हो।

    यह भी पढ़े : Hanuman Ji Ke Totke | हनुमान जी क टोटके

    बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
    भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल काल मारीमर॥
    इन्हें मारु तोहि शपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥
    जनकसुता हरि दास कहावो। ताकी शपथ विलम्ब न लावो॥
    जय जय जय धुनि होत अकाशा। सुमिरत होत दुसह दु:ख नाशा॥
    चरण शरण करि जोरि मनावों। यहि अवसर अब केहि गोहरावों॥

    भावार्थ : हे वीर हनुमान, आपका शरीर काल के समान विशाल है। आप हमेशा भगवान श्री राम के सहायक बनें, हमेशा उनके वचन को कायम रखें। आप अपनी आग से रात में घूमने वाले भूत, प्रेत, पिशाच और बुरी आत्माओं का उपभोग करते हैं। आपके पास भगवान राम की शपथ है, उन्हें मार डालो और भगवान राम और अपने नाम, स्वामी की गरिमा बनाए रखो। आपको माता सीता का दास भी कहा जाता है, आप उनकी कसम भी खाते हैं, इस काम में देरी न करें। आकाश में भी आपकी जयकार की ध्वनि सुनाई देती है। आपके स्मरण से कष्टों का निवारण भी होता है। अपने पैरों में पनाह लेना और अपने हाथों को मोड़ना, आपसे निवेदन करना, हे प्रभु, मैं आपको कैसे बुलाऊं, मेरा मार्गदर्शन करें, मुझे रास्ता सुझाएं, मुझे क्या करना चाहिए।

    उठु उठु चलु तोहिं राम दुहाई। पांय परौं कर जोरि मनाई॥
    ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता॥
    ॐ हं हं हांक देत कपि चञ्चल। ॐ सं सं सहम पराने खल दल॥

    भावार्थ : हे वीर हनुमान, आप भगवान श्री राम का रोना है, उठो और अपने पैरों को गिरने दो और तुम्हारे सामने हाथ जोड़ो। हे हनुमान, जो हमेशा चलते रहते हैं, आते हैं। आओ हे हनु हनु हनु हनु श्री हनुमान अरे हाँ, हे वानर, राजा आपकी हुंकार से डर गया है, भयभीत हो गया है।

    अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनन्द हमारो॥
    यहि बजरंग बाण जेहि मारो। ताहि कहो फिर कौन उबारो॥
    पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की॥
    यह बजरंग बाण जो जापै। तेहि ते भूत प्रेत सब कांपे॥
    धूप देय अरु जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहे कलेशा॥

    भावार्थ : हे बजरंग बली श्री हनुमान, अपने भक्तों का तत्काल कल्याण करें। हमने आपके कॉल का आनंद लिया। यह बजरंग बाण किसको मिलेगा फिर कौन उसे बचा सकता है। जो इस बजरंग बाण का पाठ करता है, श्री हनुमान स्वयं उसके प्राणों की रक्षा करते हैं। जो भी इस बजरंग बाण का जाप करता है, उसके भूत भय से कांपने लगते हैं। जो बजरंग बली महावीर हनुमान को धूप आदि अर्पित कर बजरंग बाण का जप करता है, वह किसी भी तरह से परेशान नहीं होता है।

    ॥दोहा॥

    प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान।
    तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करै हनुमान॥

    भावार्थ : हे बजरंग बली श्री हनुमान, अपने भक्तों का तत्काल कल्याण करें। हमने आपके कॉल का आनंद लिया। यह बजरंग बाण किसको मिलेगा फिर इसे कौन बचा सकता है? जो इस बजरंग बाण का पाठ करता है, श्री हनुमान स्वयं उसके प्राणों की रक्षा करते हैं। जो भी इस बजरंग बाण का जाप करता है, उसके भूत डर से कांप जाते हैं। जो बजरंग बली महावीर हनुमान को धूप आदि अर्पित कर बजरंग बाण का जप करता है, वह किसी भी प्रकार से विचलित नहीं होता है।

    बजरंग बाण पाठ करने के लाभ – Bajrang Baan PDF Benefits

    • यदि आप नियमित रूप से बजरंग बाण का पाठ करते हैं, तो आप सभी प्रकार के भय आदि से मुक्त हो जाएंगे। इसके साथ ही आपका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।
    • अगर आप अपने किसी शत्रु से परेशान हैं तो बजरंग बाण का नियमित पाठ करें। इससे आपको कोई नुकसान नहीं होगा।
    • व्यापार और व्यवसाय बढ़ाने के लिए बजरंग बाण का पाठ करें।
    • जिन लोगों को अपना काम नहीं मिलता है या समाप्त काम गलत हो जाता है, उन्हें भी रोजाना बजरंग बाण का पाठ करना चाहिए।
    • अगर आप भी दिल की बीमारी और ब्लड प्रेशर की बीमारी से पीड़ित हैं तो आपको भी रोजाना बजरंग बाण का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से स्वास्थ्य में विशेष लाभ होता है।
    • अगर शादी में कोई समस्या है, या आपका वैवाहिक जीवन ठीक नहीं चल रहा है, तो बजरंग बाण का पाठ करें। पाठ करने से सभी दुख दूर हो जाते हैं और जीवन सुखमय हो जाता है।

    कैसे करें बजरंग बाण का पाठ – Bajrang Baan PDF

    1. हालांकि एक व्यक्ति रोजाना बजरंग बाण का पाठ भी कर सकता है, लेकिन अगर अभी भी समय की कमी है, तो मंगलवार या शनिवार को बजरंग बाण का पाठ विशेष रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है। इसका पाठ सुबह, एकांत स्थान पर करना चाहिए। यदि आप मंदिर में बजरंग बाण का पाठ कर रहे हैं, तो आपको भी इसे गोपनीयता में जपना होगा।
    2. हनुमान जी की मूर्ति और भगवान राम की मूर्ति के सामने बैठें और धी का दीपक जलाकर मूर्तियों के सामने रखें। आप एक साफ आसन पर बैठें। ध्यान रहे कि पूरे जप के दौरान दीपक जलते रहना चाहिए। सबसे पहले भगवान राम की आरती करें और उसके बाद हनुमान चालीसा का पाठ करें।
    3. फिर आप हनुमान बाण का जाप करें, यहां शुरू से ही बताया गया है। बेहतर होगा कि आप हनुमान बाण का कम से कम 5 बार जप करें। हनुमान जी को स्वच्छता बहुत पसंद है। इसलिए जहां पूजा होती है, वहां गंदगी नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा भगवान हनुमान को अपने अनुभव के अनुसार गुड़ या चना या जो भी आप चाहते हैं, चढ़ाएं।
    4. यदि आप इस विधि में बजरंग बाण का पाठ करते रहेंगे, तो जल्द ही आप महसूस करेंगे कि आपके दुख कम हो रहे हैं और आप अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत कर पा रहे हैं।

    यह भी पढ़े : Sundar Kand पाठ हिंदी में , भावार्थ सहित।

    Bajrang Baan PDF Download कैसे करे ?

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    जय श्री राम। जय बजरंगबली।।

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  • Sundar Kand in Hindi, Sunderkand Ka Path हिंदी में।
  • Sundar Kand Ramayan जो कि ‘राम-चरित-मानस’ में एक अध्याय है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखा गया है, को पढ़ना उतना ही शुभ माना जाता है, जितना कि ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करना। सुंदर-कांड में, हनुमानजी को जाम्बवान द्वारा इस तथ्य के बारे में याद दिलाया जाता है कि हनुमानजी के पास बहुत बड़ी शक्तियां हैं, जिनकी बाद की कोई स्मृति नहीं है। इस मामले में हनुमानजी को इस तथ्य के बारे में याद रखने के लिए बनाया गया है कि वे उड़ान भरने में सक्षम हैं। यहाँ हमने Sundar Kand in Hindi सक्छेप में सभी भावार्थों के साथ दिया है जिससे आपको समझने में आसानी होगी। किसी भी बड़े अवसर पर Sunderkand Ka Path पढ़ना बोहोत ही शुभ माना ज्याता है।

    Sunderkand Paath भगवान हनुमान की यात्रा और माता सीता को खोजने की उनकी कहानी है। भगवान हनुमान अपनी शक्ति और शक्ति के बारे में बेखबर थे जब तक कि जाम्बवंत ने उनकी प्रशंसा नहीं की और उन्हें अपनी महान शक्ति का एहसास कराया। यह ठीक उसी समय है जब उन्होंने रामायण में माता सीता की खोज करने के लिए अपनी यात्रा शुरू करने का फैसला किया, जिन्हें रावण ने अपहरण कर लिया था। आप जिस भी पाठ के बारे में पढ़ना चाहते हैं निचे दि गयी उसकी लिंक पर क्लिक करें।

    1. पंचम सोपान-मंगलाचरण – Sunderkand Ka Path

    शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
    ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌।
    रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
    वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥1॥

    श्लोक

    भावार्थ : शांता, सनातन, अचूक, अमृतपर्व, मोक्षरूपा, परम देव-दाता, ब्रह्मा, शंभु और शेषजी द्वारा निरंतर सेवित, वेदांत के ज्ञाता, सर्वव्यापी, देवताओं से महान, मानव रूप में माया से प्रकट, सभी पाप। । सेवा। मैं जगदीश्वर की पूजा करता हूं, जिन्होंने रघुकुल में सर्वश्रेष्ठ और राजाओं के शिरोमणि राम को हराया।

    नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
    सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
    भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
    कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥2॥

    श्लोक

    भावार्थ : हे रघुनाथजी! मैं सच कहता हूं और फिर आप सभी में विवेक है (हर कोई जानता है) कि मेरे दिल में कोई और इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! कृपया मुझे अपनी निडर (पूर्ण) भक्ति दें और मेरे मन को कर्मों आदि से रहित करें।

    अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
    दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌।
    सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
    रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥3॥

    श्लोक

    भावार्थ : अतुल बल धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान सुडौल शरीर, अग्नि रूप दानव (सत्यानाश करने वाला), ज्ञान में अग्रदूत, सभी गुणों से संपन्न, वानरों के स्वामी, पवनपुत्र श्री, प्रिय भक्त श्री रघुनाथजी। । मैं हनुमानजी को नमन करता हूं।

    2. हनुमाहनुमान जी का लंका में प्रस्थान, सुरसा से मिलना, छाया को पकड़ने वाले राक्षस को मारना

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sundar Kand in Hindi

    sunderkand path
    हनुमान ने सिमिका को मार डाला
    जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
    तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥1॥

    भावार्थ : जाम्बवान के सुंदर वचन सुनकर हनुमानजी का मन बहुत प्रसन्न हुआ। (वे बोले-) हे भाई! जब तक आप पीड़ित हैं और जड़-फल खाते हैं, तब तक मेरा मार्ग देखें

    जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
    यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥2॥

    भावार्थ : जब तक मैं सीताजी को देखकर वापस नहीं आता। काम जरूर होगा, क्योंकि मैं बहुत खुश हूं। ऐसा कहते हुए और सबके सिर लेकर श्री रघुनाथजी को हृदय में धारण करके हनुमानजी हर्षित होकर चले

    सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
    बार-बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥3॥

    भावार्थ : समुद्र के तीर पर एक सुंदर पर्वत था। हनुमानजी खेल से ही (अनैच्छिक रूप से) कूद गए और उसके ऊपर चढ़ गए और श्री रघुवीर को बार-बार याद करने के बाद, एक बहुत शक्तिशाली हनुमानजी ने बड़ी तेजी से उस पर छलांग लगाई।

    जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
    जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥4॥

    भावार्थ : जिस पर्वत पर हनुमानजी अपने पैरों से चलते थे (जिससे वह उछला), वह तुरंत पतवार में फंस गया। जिस प्रकार श्री रघुनाथजी के अमोघ बाण चलते हैं, उसी प्रकार हनुमानजी भी।

    जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥5॥

    भावार्थ : समुद्र ने उन्हें श्री रघुनाथजी का दूत मानते हुए पर्वत मानक से कहा, “हे मनक! आप उनकी थकावट को दूर करने वाले हैं (यानी उन्हें खुद पर आराम दें)।

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
    राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥

    दोहा

    भावार्थ : हनुमानजी ने उसका हाथ छुआ, फिर झुककर कहा – भाई! श्री रामचंद्रजी की आज्ञा के बिना मैं कहाँ विश्राम कर सकता हूँ?

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sundar Kand in Hindi

    जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
    सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥1॥

    भावार्थ : देवताओं ने पवनपुत्र हनुमानजी को दूर जाते देखा। अपनी विशेष शक्ति और बुद्धिमत्ता (परीक्षाओं के लिए) को जानने के लिए उन्होंने सुरसा नामक नाग की माता को भेजा, उन्होंने आकर हनुमानजी से यह कहा।

    आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
    राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥2॥

    भावार्थ : तब मैं तुम्हारे मुंह में आकर (तुम मुझे खाओगे)। हे माँ! मैं सच कहता हूं, मुझे अभी जाने दो। जब उन्होंने किसी भी तरह से जाने नहीं दिया, तो हनुमानजी ने कहा – फिर मुझे मत खाना।

    तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
    कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥3॥

    भावार्थ : तब मैं तुम्हारे मुंह में आकर (तुम मुझे खाओगे)। हे माँ! मैं सच कहता हूं, मुझे अभी जाने दो। जब उन्होंने किसी भी तरह से जाने नहीं दिया, तो हनुमानजी ने कहा – फिर मुझे मत खाना।

     जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥
    सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥4॥

    भावार्थ : उसने योजनभर (चार कोस में) मुँउसने अपना चेहरा योजनहार (चार श्रापों में) फैला दिया। तब हनुमानजी ने अपने शरीर में दो वृद्धि की। उन्होंने सोलह योजनाओं का सामना किया। हनुमानजी तुरंत बत्तीस योजन हो गए

     जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
    सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥5॥

    भावार्थ : जैसा कि सुरसा मुंह बड़ा करती थी, हनुमानजी अपना दोहरा रूप दिखाते थे। उसने सौ योजना (चार सौ कोस की) का सामना किया। तब हनुमानजी ने बहुत छोटा रूप धारण किया

    बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
    मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥6॥

    भावार्थ : और उसके मुख में घुऔर उसके मुंह में प्रवेश (तुरंत), वह फिर से बाहर आया और अलविदा कहने के लिए अपना सिर घुमाया। (उन्होंने कहा-) मैंने आपकी बुद्धि खोजी है, जिसके लिए देवताओं ने मुझे भेजा था

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
    आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥2॥

    दोहा

    भावार्थ : आप श्री रामचंद्रजी के सभी कार्य करेंगे, क्योंकि आप शक्ति और ज्ञान के भंडार हैं। यह आशीर्वाद देने के बाद, वह चली गई, तब हनुमानजी प्रसन्न होकर चले

    Sundar Kand Hindi – Sundar Kand Ki Chaupai

    निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
    जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥1॥

    भावार्थ : समुद्र में एक दानव रहता था। वह माया के साथ आकाश में उड़ने वाले पक्षियों को पकड़ता था। वे जीव जो पानी में अपनी छाया देखकर आकाश में उड़ते थे

    गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
    सोइ छल हनूमान्‌ कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥2॥

    भावार्थ : वह छाया को पकड़ती थी, ताकि वे उड़ न सकें (और पानी में गिर सकें) इस प्रकार वह हमेशा आकाश में उड़ने वाले प्राणियों को खाती थी। उन्होंने वही चाल हनुमानजी को दी। हनुमानजी ने तुरंत उनकी धोखाधड़ी को पहचान लिया

    ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
    तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥3॥

    भावार्थ : पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्री हनुमानजी ने उनका वध किया और समुद्र के पार चले गए। वहां जाकर उन्होंने जंगल की सुंदरता देखी। मधु (पुष्प रस) के लोभ से बुलबुले गुनगुना रहे थे।

    3. लंका वर्णन, लंकिनी वध, लंका में प्रवेश – Sundar Kand in Hindi

    Sunderkand Paath – Sundar Kand in Hindi

    sundar kand hindi
    लंकिनी से मिलना
    नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
    सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥4॥

    भावार्थ : अनेकों प्रकार के वृक्ष फलकई प्रकार के पेड़ों को फलों और फूलों से सजाया जाता है। जब वे पक्षियों और जानवरों का एक समूह देखते थे तो उनके मन में बहुत खुशी होती थी। सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमानजी ने भय त्याग दिया और उसके ऊपर दौड़े

    उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
    गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥5॥

    भावार्थ : (शिव कहते हैं-) हे उमा! इसमें बंदर हनुमान का कोई आवर्धन नहीं है। यह ईश्वर की महिमा है, जो काल को भी खा जाता है। उसने पहाड़ पर चढ़कर लंका देखी। बहुत बड़ा किला, कुछ नहीं कहा

    अति उतंग जलनिधि चहुँ पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥6॥

    भावार्थ : वह बहुत ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सुनहरी रोशनी परम प्रकाश है

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

     कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
    चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
    गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
    बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥1॥

    छंद

    भावार्थ : एक सोने की ज्वैलरी है जो अजीबोगरीब मोतियों से जड़ी है, इसके अंदर कई खूबसूरत घर हैं। यहां चौराहे, बाजार, सुंदर मार्ग और गलियां हैं, खूबसूरत शहर कई तरह से सजा हुआ है। हाथियों, घोड़ों, खच्चरों और पैदल और रथों के समूहों की गिनती कौन कर सकता है! कई रूपों के राक्षसों की टीमें हैं, उनकी अत्यंत शक्तिशाली सेना का वर्णन नहीं किया गया है

    बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
    नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
    कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
    नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥2॥

    छंद

    भावार्थ : वन, उद्यान, उद्यान (उद्यान), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सजी हैं। गंधर्वों के मनुष्य, नाग, देवता और देवता अपनी सुंदरता से ऋषियों के मन को मोह लेते हैं। कहीं पहाड़ की तरह विशाल शरीर वाला बहुत बड़ा मल्ल (पहलवान) गरज रहा है। वे कई अखाड़ों में टकराते हैं और एक-दूसरे पर चिल्लाते हैं।

    करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
    कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
    एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
    रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥3॥

    छंद

    भावार्थ : चारों ओर से चारों दिशाओं में (चारों ओर से) बड़े भयंकर शरीर वाले (बड़े ध्यान से) योद्धाओं ने नगर की रक्षा की। कहीं दुष्ट राक्षस भैंस, इंसान, गाय, गधे और बकरी खा रहे हैं। तुलसीदास ने अपनी कहानी के बारे में थोड़ा कहा है कि वह पवित्र तीर्थ में श्री रामचंद्रजी के बाणों का त्याग अवश्य करेंगे।

    Sundar Kand Path in Hindi – दोहा

    पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
    अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार॥3॥

    दोहा

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sundar Kand in Hindi

    भावार्थ : शहर के अधिकांश अभिभावकों को देखकर, हनुमानजी ने मन में सोचा कि बहुत छोटे रूप में रात में शहर में प्रवेश करना चाहिए और

    मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
    नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥1॥

    भावार्थ : हनुलंकिनी नाम की एक राक्षसी थी, जो भगवान श्री रामचंद्रजी को याद करके लंका (लंका के द्वार पर) गई थी, जिसने हनुमानजी मच्छर के समान (छोटे) रूप का पुरुष रूप धारण किया था। उसने कहा- वह मेरा अनादर (मुझसे पूछे बिना) कहाँ जा रहा है?

    जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
    मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥2॥

    भावार्थ : अरे मूर्ख! तुम मेरे रहस्य को अब तक नहीं जान पाए हो (जितने भी) चोर हैं, वे मेरे भोजन हैं। महाकापी हनुमानजी ने उसे एक मुक्का मारा, जिससे वह रक्त में उल्टी कर गया और पृथ्वी से जा टकराया।

    पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
    जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंच कहा मोहि चीन्हा॥3॥

    भावार्थ : लंकिनी फिर से खड़ी हो गई और हाथ जोड़कर विनती करने लगी। (उसने कहा-) जब ब्रह्माजी ने दुल्हन को रावण दिया, तो चलते समय उसने मुझसे कहा कि यह दानव विनाश की पहचान है

    बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
    तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥4॥

    भावार्थ : जब आप बंदर की हत्या से परेशान होते हैं, तो आप जानते हैं कि राक्षस मारे गए हैं। हे तात मेरे बड़े गुण हैं, जिन्हें मैं श्री रामचंद्रजी के दूत (आप) की आँखों से देख सकता था

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
    तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥4॥

    दोहा

    भावार्थ : हे तात भले ही स्वर्ग और मोक्ष के सभी सुखों को तराजू के एक पान में रख दिया जाए, लेकिन वे सभी प्रेम (क्षण) के सत्संग से मिलने वाले सुख के बराबर नहीं हो सकते।

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Path

    प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
    गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥1॥

    भावार्थ : अयोध्यापुरी नरेश श्री रघुनाथजी की नगरी में ह्रदय से प्रवेश करके सभी कार्य करें। विष उसके लिए अमृत बन जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के समान हो जाता है, अग्नि शांत हो जाती है

    गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
    अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥2॥

    भावार्थ : और हे गरुड़! सुमेरु पर्वत उसके लिए एक राजा की तरह हो जाता है, जिसे कभी श्री रामचंद्रजी ने आशीर्वाद दिया था। तब हनुमानजी ने बहुत छोटा रूप धारण किया और भगवान का स्मरण कर नगर में प्रवेश किया।

    मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
    गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥3॥

    भावार्थ : उन्होंने प्रत्येक महल की खोज की। हर जगह असंख्य योद्धा देखें। फिर वह रावण के महल में गया। इतना विचित्र था

    सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
    भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥4॥

    भावार्थ : हनुहनुमानजी ने रावण को सोते हुए देखा, लेकिन जानकी जी महल में दिखाई नहीं दीं। तभी एक सुंदर महल दिखाई दिया। वहाँ (उसमें) भगवान का एक अलग मंदिर था।

    4. हनुमान्‌-विभीषण संवाद – Sunderkand Ka Path

    sundar kand in hindi
    हनुमान्‌-विभीषण संवाद

    Sunderkand Path – दोहा

    रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
    नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई॥5॥

    दोहा

    भावार्थ : महल को श्री रामजी के आयुध (धनुष और बाण) के प्रतीक के साथ अंकित किया गया था, इसकी सुंदरता का वर्णन नहीं किया जा सकता है। कपिराज श्री हनुमानजी को वहां नई तुलसी के नए वृक्षों को देखकर प्रसन्नता हुई।

    Sundar Kand Hindi – Sundar Kand Ki Chaupai

    लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
    मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥1॥

    भावार्थ : लंका राक्षसों के समूह का निवास स्थान है। यहाँ एक सज्जन (ऋषि) का निवास कहाँ है? हनुमानजी के मन में इस प्रकार तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे

    राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
    एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥2॥

    भावार्थ : उन्होंने (विभीषण) राम के नाम का स्मरण (उच्चारण) किया। हनुमानजी उन्हें एक सज्जन व्यक्ति के रूप में जानते थे और उनके हृदय में प्रसन्न थे। (हनुमानजी ने सोचा कि) मैं हठपूर्वक उनका (अपनी ओर से) परिचय करा दूंगा, क्योंकि भिक्षु काम को नुकसान नहीं पहुंचाता। (प्रत्यक्ष लाभ है)

    बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
    करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥3॥

    भावार्थ : ब्राह्मण का रूप लेने के बाद, हनुमानजी ने उन्हें (उच्चारण) उच्चारण किया। यह सुनकर विभीषणजी उठे और वहाँ आ गए। नमस्कार करते हुए कुशाल ने पूछा (और कहा) हे ब्रह्मदेव! अपनी कहानी समझाएं

    की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
    की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥4॥

    भावार्थ : क्या आप कोई भक्त हैं? क्योंकि आपको देखकर मेरे दिल में बहुत सारा प्यार उमड़ रहा है। या आप खुद गरीबों से प्रेम करने वाले श्री रामजी हैं, जो मुझे बड़ा साथी (घर से दर्शन देकर) बनाने आए हैं?॥4॥

    Sundar Kand Path in Hindi – दोहा

    तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
    सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥6॥

    दोहा

    भावार्थ : तब हनुमानजी ने श्री रामचंद्रजी की पूरी कहानी सुनाकर उनका नाम बताया। उनके दोनों शरीरों को सुनकर और श्री रामजी के गुणों को याद करके, उनके दोनों मन (प्रेम और आनंद में) तल्लीन हो गए।॥6॥

    Sunderkand Paath – Sundar Kand in Hindi

    सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
    तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥1॥

    भावार्थ : (विभीषणजी ने कहा-) हे पवनपुत्र! मेरी बात सुनो, मैं यहां रहता हूं, दांतों के बीच खराब जीभ के रूप में। हे तात मुझे अनाथ जानकर क्या सूर्यकुल के पुत्र श्री रामचंद्रजी कभी मुझ पर कृपा करेंगे?॥1॥

    तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीत न पद सरोज मन माहीं॥
    अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥2॥

    भावार्थ : मेरे तामसी (दानव) शरीर का कोई मतलब नहीं है, न ही मन में श्री रामचंद्रजी के चरणों में प्रेम है, लेकिन हे हनुमान! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्री रामजी मुझ पर प्रसन्न हैं, क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते।॥2॥

    जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
    सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीति॥3॥

    भावार्थ : जब श्री रघुवीर ने मुझे प्रसन्न किया है, तब आपने मुझे (अपनी ओर से) दर्शन दिए हैं। (हनुमानजी ने कहा-) हे विभीषणजी! सुनो, यह भगवान का रिवाज है कि वे हमेशा नौकर से प्यार करते हैं।॥3॥

    कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
    प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥4॥

    भावार्थ : ओह बताओ, मैं कौन हूँ, महान महान? मैं एक चंचल बंदर हूं और हर तरह से मैं हीन हूं, सुबह अगर हम लोगों (बंदरों) का नाम लेते हैं, तो उस दिन उन्हें भोजन नहीं मिलेगा।॥4॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
    कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥7॥

    दोहा

    भावार्थ : अरे दोस्त! सुनो, मैं इतना गरीब व्यक्ति हूं, लेकिन श्री रामचंद्रजी ने भी मुझे आशीर्वाद दिया है। भगवान के गुणों को याद करने के बाद भगवान हनुमान के दोनों नेत्रों में पानी भर आया।॥7॥

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

    जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
    एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥1॥

    भावार्थ : जो ऐसे स्वामी (श्री रघुनाथजी) को जानते हुए भी (विषयों के पीछे) भटकते रहते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस तरह उन्होंने श्री रामजी के गुणों को कहकर अवर्णनीय (परम) शांति प्राप्त की।॥1॥

    पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
    तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥2॥

    भावार्थ : तब विभीषणजी ने बताया कि श्री जानकीजी वहां (लंका में) कैसे रहती थीं। तब हनुमानजी ने कहा- अरे भाई सुनो, मैं जानकी माता को देखना चाहता हूं॥2॥

    5. अशोक वाटिका में सीताजी को देखकर हनुमानजी दुखी हो जाते हैं और रावण सीताजी को भय दिखाता है।

    sunderkand paath
    अशोक वाटिका में सीताजी को देखकर हनुमानजी दुखी ( इमेज सोर्स : unsplash.com)

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sundar Kand in Hindi

    जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवन सुत बिदा कराई॥
    करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥3॥

    भावार्थ : विभीषणजी (माता के दर्शन) ने सभी उपाय (उपाय) बताए। तब हनुमानजी अलविदा लेकर चले गए। तब उन्होंने रूप धारण किया (पहले की मस्ज़िद की तरह) जहाँ अशोक जंगल में रहते थे (जंगल का हिस्सा)।॥3॥

    देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
    कृस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥4॥

    भावार्थ : सीताजी को देखकर हनुमानजी उनके सामने झुक गए। वे रात को चौबीस घंटे बैठे रहते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिर पर जटा का एक शिरा (चोटी) है। हृदय में श्री रघुनाथजी के गुणों का पाठ करें॥4॥

    Sunderkand Path – दोहा

    निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
    परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥8॥

    दोहा

    भावार्थ : श्री जानकी जी के चरणों में (नीचे की ओर देखकर) आँखें स्थिर हैं और मन श्री रामजी के चरण कमलों में लीन है। जानकी जी दीन (दुखी) देखकर पवनपुत्र हनुमानजी बहुत दुखी हुए॥8॥

    Sundar Kand Ramayan – Sundar Kand in Hindi

    तरु पल्लव महँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
    तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥1॥

    भावार्थ : हनुमानजी पेड़ की पत्तियों में छिप गए और सोचने लगे, हे भाई! मुझे क्या करना चाहिए (उनकी पीड़ा को कैसे दूर किया जाए)? उसी समय, रावण कई महिलाओं के साथ वहाँ आया॥1॥

    बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
    कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥2॥

    भावार्थ : उस दुष्ट व्यक्ति ने सीता को कई तरह से समझाया। प्रदर्शित सामग्री, दान, भय और रहस्य। रावण ने कहा- हे सुमुखी! हे सयानी! बात सुनो! मंदोदरी आदि सभी रानियों को।॥2॥

    तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
    तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥3॥

    भावार्थ : मैं तुम्हें अपनी दासी बना लूँगा, यह मेरी प्रतिज्ञा है। एक बार तुम मेरी तरफ देखो तो सही! अपने परम स्नेही कोषाधिश, श्री रामचंद्रजी को याद करते हुए, जानकी जी ने पुआल की आड़ में ढकना शुरू किया।॥3॥

    सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
    अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥4॥

    भावार्थ : हे दशमुख! सुनो, क्या जुगनू की रोशनी से कमलिनी कभी खिल सकती है? जानकी जी फिर कहती हैं- तू (अपने लिए) अपने मन में यह बात समझनी चाहिए। हे दुष्ट! तू श्री रघुवीर के बाण से अवगत नहीं हैं॥4॥

    सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥5॥

    भावार्थ : अरे पापी! तू मुझे हर सुनने के लिए लाए हैं। ओ अधम! मुखर! तुझे लज्जा नहीं आती?॥5॥

    Sundar Kand Path in Hindi – दोहा

    आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
    परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥9॥

    दोहा

    भावार्थ : खुद को जुगनू की तरह सुनना और रामचंद्रजी को सूरज की तरह सुनना और सीताजी के कठोर शब्दों को सुनना, रावण ने एक तलवार निकाली और बड़े गुस्से में कहा -॥9॥

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Path

    सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
    नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥1॥

    भावार्थ : सीता! तुमने मेरा अपमान किया है। मैं इस कठोर कृपाण से तुम्हारा सिर काट दूंगा। अन्यथा (अभी भी), मुझे जल्द ही पालन करें। हे सुमुखी! अन्यथा आपको अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा॥1॥

    स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
    सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥2॥

    भावार्थ : (सीताजी ने कहा-) हे दशग्रीव! प्रभु की भुजा, जो श्याम कमल की माला की तरह सुंदर है और हाथी की सूंड (पुष्ट और विशाल) की तरह है, या तो वह भुजा मेरे गले में या आपकी भयानक तलवार में गिरेगी। ओ प्यारे! अरे यह मेरा सच्चा व्रत है॥2॥

    चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
    सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥3॥

    भावार्थ : सीताजी कहती हैं- हे चंद्रहास (तलवार)! श्री रघुनाथजी की अग्नि से उत्पन्न मेरी महान जलन को दूर करो, हे तलवार! तुम शीतल, तेज और महान हो (अर्थात, तुम्हारी धारा ठंडी और तेज है), तुम मेरे दुःख का बोझ हटा दो॥3॥

    सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
    कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥4॥

    भावार्थ : सीताजी के वचन सुनकर वह मारने के लिए दौड़ा। तब माया दानव की बेटी मंदोदरी ने इसे नीति कहकर समझाया। तब रावण ने सभी युवतियों को बुलाया और कहा कि जाओ और सीता को बहुत भय दिखाओ।॥4॥

    मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥5॥

    भावार्थ : अगर मैंने एक महीने में यह नहीं कहा, तो मैं इसे तलवार से मार दूंगा।॥5॥

    Sunderkand Path – दोहा

    भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
    सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥10॥

    दोहा

    भावार्थ : (इस प्रकार कहते हुए) रावण घर चला गया। यहां राक्षसों के समूहों ने कई दुष्ट रूप धारण किए और सीताजी को भय दिखाना शुरू कर दिया।॥10॥

    Sundar Kand Hindi – Sundar Kand Ki Chaupai

    त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
    सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥1॥

    भावार्थ : उनमें एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी। श्री रामचंद्रजी के चरणों में उनका प्रेम था और वे विवेक (ज्ञान) में अनुरक्त थे। उन्होंने सभी को बुलाया और अपना सपना सुनाया और कहा – सीता की सेवा करो और अपना कल्याण करो।॥1॥

    सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
    खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥2॥

    भावार्थ : सपना (मैंने देखा कि) एक बंदर ने लंका जला दी। राक्षसों की पूरी सेना मार दी गई थी। रावण नग्न है और गधे पर सवार है। उसका सिर मुंडा हुआ है, बीस भुजाएँ कटी हुई हैं॥2॥

    एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
    नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥3॥

    भावार्थ : इस तरह, वह दक्षिण (यमपुरी की) दिशा में जा रहा है और मानो लंका विभीषण ने इसे पा लिया हो। शहर में फिर से श्री रामचंद्रजी की पुकार। तब भगवान ने सीताजी को बुलाया॥3॥

    यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
    तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥4॥

    भावार्थ : मैं आह्वान करता हूं (दृढ़ संकल्प के साथ) कि यह सपना चार (कुछ) दिनों के बाद साकार होगा। उनकी बातें सुनकर वे सभी राक्षस डर गए और जानकी के चरणों में गिर पड़े।॥4॥

    6. श्री सीता-त्रिजटा संवाद – Sundar Kand in Hindi

    Sundar Kand Path in Hindi – दोहा

    जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
    मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥11॥

    दोहा

    Sunderkand Paath – Sundar Kand in Hindi

    भावार्थ : तब (उसके बाद) वे सभी जहाँ भी गए। सीताजी मन में सोचने लगीं कि एक महीने बाद राक्षस रावण मुझे मार डालेगा॥11॥

    त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
    तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥1॥

    भावार्थ : सीताजी ने हाथ जोड़कर कहा – हे माता! तुम मेरी विपत्ति के साथी हो। जल्दी से कोई ऐसा उपाय करो जिससे मैं शरीर छोड़ सकूं। विरह असहनीय हो गया है, अब यह समाप्त नहीं हुआ है॥1॥

    आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
    सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥2॥

    भावार्थ : एक लकड़ी ले आओ और एक चिता के साथ सजाने। हे माँ! फिर उसमें आग लगा दी। हे सयानी! तुम मेरे प्यार को सच करो। रावण की ध्वनि की तरह दुःख देने वाले कानों को किसने सुना?॥2॥

    सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
    निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।3॥

    भावार्थ : सीताजी के वचन सुनकर, त्रिजटा ने चरणों को पकड़ लिया और उन्हें समझाया और प्रभु की महिमा, शक्ति और सुयश को बताया। (उन्होंने कहा-) हे सुकुमारी! सुनो, रात को आग नहीं लगेगी। यह कहकर कि वह अपने घर चली गई॥3॥

    कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
    देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥4॥

    भावार्थ : सीताजी कहने लगीं (मन ही मन) – (मैं क्या करूँ), विधाता ने इसके विपरीत किया। न तो आग लगेगी और न ही दर्द मिटेगा। आकाश में अंगारे दिखाई पड़ते हैं, लेकिन पृथ्वी पर एक भी तारा दिखाई नहीं देता॥4॥

    पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
    सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥5॥

    भावार्थ : चंद्रमा उग्र है, लेकिन यहां तक कि अगर मैं इसे हठवाहिनी जानकर अग्नि नहीं देता। हे अशोक वृक्ष! मेरे अनुरोध को सुनो मेरे दुःख को दूर करो और अपना (अशोक) नाम सच करो॥5॥

    नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
    देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥6॥

    भावार्थ : आपके नए कोमल पत्ते आग की तरह हैं। अग्नि दें, विरहा की बीमारी को समाप्त न करें (अर्थात, विरहा की बीमारी को बढ़ाकर सीमा तक न पहुंचें) सीताजी को विरहा से परम व्याकुल देखकर, वह क्षण एक चक्र की तरह हनुमानजी के पास गया।॥6॥

    7. श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद – Sunderkand Ka Path

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
    जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥12॥

    दोहा

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

    भावार्थ:- तब हनुमानजी ने हाड़ा (सीताजी के सामने) में विचार किया और अंगूठी डाल दी, मानो अशोक ने अंगारा दे दिया हो। (यह जानकर) सीताजी प्रसन्न होकर उठ खड़ी हुईं और उन्हें अपने हाथ में ले लिया॥12॥

    तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
    चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥1॥

    भावार्थ:- तब उन्होंने राम-नाम से अंकित अत्यंत सुंदर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठी को पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं॥1॥

    जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
    सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥2॥

    भावार्थ:- तब हनुमानजी ने हाड़ा (सीताजी के सामने) में विचार किया और अंगूठी डाल दी मानो अशोक ने अंगारा दे दिया हो। (यह जानकर) सीता प्रसन्न होकर खड़ी हो गईं और उन्हें अपने हाथ में ले लिया॥2॥

    रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
    लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥3॥

    भावार्थ:- उन्होंने श्री रामचंद्रजी के गुणों का वर्णन करना शुरू किया, (जिनके सुनने पर) सीता का दुःख दूर भाग गया। वह उसे कानों और दिल से सुनने लगी। हनुमानजी ने शुरू से लेकर वर्तमान तक की सभी कहानियां बताईं॥3॥

    श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥
    तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥4॥

    भावार्थ:- (सीताजी ने कहा-) जिसने इस सुंदर कथा को कानों को अमृत कहा है, वह हे भाई! यह दिखाई क्यों नहीं देता? तब हनुमानजी पास गए। उन्हें देखकर सीताजी ने कहा (पलट कर)? उन्हें आश्चर्य होता है॥4॥

    राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
    यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥5॥

    भावार्थ:- (हनुमानजी ने कहा-) हे माता जानकी, मैं श्री रामजी का दूत हूं। मैं करुणानिधान की सच्ची शपथ लेता हूँ, हे माँ! मैं यह अंगूठी लाया हूं। श्री रामजी ने मुझे आपके लिए यह सहिदानी (संकेत या पहचान) दी है॥5॥

    नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥6॥

    भावार्थ:- (सीताजी ने पूछा-) आपने नर और वानर से कैसे कहा? फिर हनुमानजी ने कथा कही, ऐसा ही हुआ॥6॥

    Sunderkand Path – दोहा

    कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास
    जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥13॥

    दोहा

    Sundar Kand Ramayan – Sundar Kand in Hindi

    भावार्थ:- हनुमानजी के स्नेह भरे शब्दों को सुनकर, सीता जी के मन में विश्वास हो गया, यह जानकर कि यह मन, वचन और कर्म से श्री रघुनाथजी के दास हैं।॥13॥

    हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
    बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥1॥

    भावार्थ:- भगवान के व्यक्ति (सेवक) को जानकर वह बहुत सुंदर हो गई। (नेत्रों में) जल भर गया और शरीर पुलकित हो गया (सीताजी ने कहा-) हे तात हनुमान! तुम मुझे वीरसागर में डूबते हुए जहाज भेज दो॥1॥

    अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
    कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥2॥

    भावार्थ:- मैं बलिहारी जाता हूँ, अब मुझे छोटे भाई लक्ष्मीजी के साथ खार के शत्रु, सुखधाम प्रभु का कुश-मंगल कहो। श्री रघुनाथजी कोमल हृदय और दयालु हैं। फिर हे हनुमान! किस कारण से उन्होंने यह निर्ममता बरती है?॥2॥

    सहज बानि सेवक सुखदायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
    कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥3॥

    भावार्थ:- नौकर को खुशी देना उसका स्वाभाविक उपहार है। क्या वह कभी मुझे याद करते हैं, श्री रघुनाथजी? हे तात क्या मेरी आंखें कभी उनके कोमल भद्दे अंगों को देखकर ठंडी हो जाएंगी?॥3॥

    बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
    देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥4॥

    भावार्थ:- शब्द (मुँह से) नहीं निकलता, आँखों में पानी भर आया (आँसुओं के साथ)। (उसने बड़े दुःख के साथ कहा-) हे नाथ! तुम मुझे पूरी तरह से भूल गए हो! सीता जी को परम व्याकुल देखकर हनुमानजी ने कोमल और नम्र वचन कहा।॥4॥

    मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
    जनि जननी मानह जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥5॥

    भावार्थ:- हे माँ! सुंदर कृपा का वास भगवान भाई लक्ष्मणजी के कुशल (शरीर से) है, लेकिन आपके दुःख से दुःखी है। हे माँ! अपने मन में अपराध को स्वीकार न करें (कम न हों और दुखी महसूस करें)। श्री रामचंद्रजी के हृदय में आपका दोहरा प्रेम है॥5॥

    Sundar Kand Path in Hindi – दोहा

    रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
    अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥14॥

    दोहा

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Path

    भावार्थ:- हे माँ! अब धैर्य के साथ श्री रघुनाथजी का संदेश सुनो। यह कहते हुए हनुमानजी प्रेम से अभिभूत हो गए। पानी (उसकी आँखों में) पानी से भर गया॥14॥

    कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
    नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥1॥

    भावार्थ:- (हनुमानजी ने कहा-) श्री रामचंद्रजी ने कहा है, हे सीता! आपके वियोग में मेरे लिए सारी चीजें प्रतिकूल हो गई हैं। पेड़ों की नई कोमल पत्तियों की तरह, आग की तरह, रात की रात की तरह, सूरज की तरह चाँद॥1॥

    कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
    जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥2॥

    भावार्थ:- और कमल के जंगल बेलसम जंगलों की तरह हो गए हैं। यह वैसा ही है जैसे बादल उबलते हुए तेल की वर्षा करते हैं। जो लोग रुचि रखते थे, वे अब पीड़ित हैं। त्रिदोष (ठंडी, नीरस, सुगंधित) हवा जहरीली (गर्म और जहरीली) सांस लेने जैसी हो गई है।॥2॥

    कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
    तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥3॥

    भावार्थ:- मन का दुःख कहना भी कुछ कम करता है। लेकिन किसके साथ? इस दुःख को कोई नहीं जानता। हे मधु केवल मेरा मन ही तुम्हारे और तुम्हारे प्रेम का रहस्य जानता है॥3॥

    सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
    प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥4॥

    भावार्थ:- और वह मन हमेशा तुम्हारे साथ रहता है। बस मेरे प्यार का मर्म समझ लो। भगवान का संदेश सुनते ही जानकीजी प्रेम में मग्न हो गईं। उनके पास शरीर की कोई देखभाल नहीं है॥4॥

    कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
    उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥5॥

    भावार्थ:- हनुमानजी ने कहा- हे माता! अपने दिल में धैर्य रखें और श्री रामजी को याद करें जो नौकरों को खुशी देते हैं। श्री रघुनाथजी की प्रभुता को हृदय से लगाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ो॥5॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
    जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥15॥

    दोहा

    भावार्थ:- राक्षसों के समूह पतंग की तरह हैं और श्री रघुनाथजी के बाण अग्नि के समान हैं। हे माँ! धैर्य रखें और राक्षसों को जलाने पर विचार करें॥15॥

    Sundar Kand Hindi – Sundar Kand Ki Chaupai

    जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
    राम बान रबि उएँ जानकी। तम बरुथ कहँ जातुधान की॥1॥

    भावार्थ:- यदि श्री रामचंद्रजी को खबर मिलती, तो वे सहमत नहीं होते। हे शहद जब सूर्य रामबाण की तरह उगता है तो राक्षसों की सेना का अंधेरा कहां रह सकता है?॥1॥

    अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयुस नहिं राम दोहाई॥
    कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥2॥

    भावार्थ:- हे माँ! मुझे अब यहां से जाने दो, लेकिन श्री रामचंद्रजी की शपथ, मुझे प्रभु (उन्हें) की अनुमति नहीं है। (अतः) हे माता! कुछ और दिनों के लिए धैर्य रखें। श्री रामचंद्रजी बंदरों के साथ यहां आएंगे॥2॥

    निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
    हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥3॥

    भावार्थ:- और राक्षसों को मारकर तुम्हें ले जाएगा। नारद आदि (ऋषि-ऋषि) तीनों लोकों में उनकी ख्याति गाएंगे। (सीताजी ने कहा-) हे पुत्र! सभी बंदर आपके जैसे होंगे (छोटे लोगों से), राक्षस बहुत मजबूत हैं, योद्धा हैं।॥3॥

    मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥
    कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥4॥

    भावार्थ:- इसलिए मेरे दिल में बहुत संदेह है (आप जैसे राक्षस कैसे राक्षसों पर विजय प्राप्त करेंगे!)। यह सुनकर हनुमानजी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पहाड़ (सुमेरु) के आकार का (बहुत विशाल) शरीर था, जो युद्ध में बहुत मजबूत और बहादुर था, जिससे दुश्मनों के दिलों में डर पैदा हो गया।॥4॥

    सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥5॥

    भावार्थ:- तब (उसे देखकर) सीताजी को अपने मन का विश्वास हुआ। हनुमानजी ने फिर एक छोटा रूप धारण किया॥5॥

    Sunderkand Path – दोहा

    सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
    प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥16॥

    दोहा

    Sunderkand Paath – Sundar Kand in Hindi

    भावार्थ:- हे माँ! सुनो, वानरों में बहुत शक्ति और बुद्धि नहीं है, लेकिन यहां तक कि एक छोटा सांप भी प्रभु की महिमा से गरुड़ को खा सकता है। (यहां तक कि बहुत कमजोर एक महान बल को मार सकता है)॥16॥

    मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
    आसिष दीन्हि राम प्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥1॥

    भावार्थ:- हनुमान जी की आवाज सुनकर भक्ति, तेज, तेज और बल में लीन सीता जी संतुष्ट हो गईं। उन्होंने यह जानकर हनुमानजी को आशीर्वाद दिया कि वे श्री रामजी के प्रिय हैं। आप शक्ति और विनय के भंडार हैं॥1॥

    अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
    करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥2॥

    भावार्थ:- हे पुत्र तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों का खजाना हो। श्री रघुनाथजी आप पर मेहरबान रहें। ‘भगवान प्लीज ’सुनते ही हनुमानजी पूरे प्रेम में मग्न हो गए।॥2॥

    बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
    अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥3॥

    भावार्थ:- हनुमानजी ने बार-बार सीताजी के चरणों में प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर कहा – हे माता! अब मैं आभारी हूं। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है॥3॥

    सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
    सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥4॥

    भावार्थ:- हे माँ! सुनो, मैं सुंदर फलों वाले वृक्षों को देखकर बहुत भूखा हूं। (सीताजी ने कहा-) हे पुत्र! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस जंगल की रक्षा करते हैं॥4॥

    तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥5॥

    भावार्थ:-(हनुमानजी ने कहा-) हे माता! यदि आप अपने मन में खुशी (खुशी) स्वीकार करते हैं, तो मुझे उनसे कोई डर नहीं है।॥5॥

    8. हनुमानजी ने अशोक वाटिका विध्वंस, अक्षय कुमार वध और मेघनाद को हनुमानजी को नागपाश में ले लिया और उन्हें बैठक में ले गए

    sunderkand ka path
    हनुमानजी ने अशोक वाटिका विध्वंस

    Sundar Kand Path in Hindi – दोहा

    देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
    रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥17॥

    दोहा

    भावार्थ:- हनुमानजी को बुद्धि और बल में कुशल देखकर जानकी जी ने कहा – जाओ। हे तात श्री रघुनाथजी के चरणों को अपने हृदय में धारण करो और मीठे फल खाओ॥17॥

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

    चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
    रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥1॥

    भावार्थ:- वे सीताजी के पास गए और सिर झुकाकर बगीचे में प्रवेश किया। फल खाएं और पेड़ों को तोड़ना शुरू करें। कई योद्धा रखवाले थे। उनमें से कुछ मारे गए और कुछ ने रावण को बुलाया ॥1॥

    नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
    खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥2॥

    भावार्थ:- (और कहा-) हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है। उन्होंने अशोक वाटिका को तबाह कर दिया। फल खाएं, पेड़ों को उखाड़ें और जमीन पर रखवालों को शोक दें॥2॥

     सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
    सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥3॥

    भावार्थ:- यह सुनकर रावण ने कई योद्धा भेजे। उन्हें देखकर हनुमानजी दहाड़ उठे। हनुमानजी ने सभी राक्षसों को मार डाला, कुछ जो आधे मरे हुए थे, चिल्लाते हुए चले गए॥3॥

    पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
    आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥4॥

    भावार्थ:- रावण ने तब अक्षयकुमार को भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओं को साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमानजी एक वृक्ष (हाथ में) लेकर चिल्लाए और बड़ी ध्वनि (बड़ी जोर-शोर) से उसकी पिटाई की।॥4॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
    कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥18॥

    दोहा

    Sundar Kand Ramayan – Sundar Kand in Hindi

    भावार्थ:- उन्होंने सेना में से कुछ को मार डाला और कुछ को मार डाला और कुछ को धूल में मिला दिया। कुछ ने फिर पुकार कर कहा, हे प्रभु! बंदर बहुत मजबूत है॥18॥

    सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
    मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥1॥

    भावार्थ:- पुत्र के वध की बात सुनकर, रावण क्रोधित हो गया और उसने (उसके पहले पुत्र) शक्तिशाली मेघनाद को भेजा। (उससे कहा-) हे पुत्र! मारना मत, उसे बाँध कर ले आना। देखें कि बंदर कहां का है॥1॥

    चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
    कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥2॥

    भावार्थ:- मेघनाद, अतुलनीय योद्धा जिसने इंद्र को जीत लिया। अपने भाई को मारने की बात सुनकर वह क्रोधित हो गया। हनुमानजी ने देखा कि यह भयानक योद्धा आया है। फिर उन्होंने पिटाई की और भाग गए॥3॥

    अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
    रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दई निज अंगा॥3॥

    भावार्थ:- उन्होंने एक बहुत बड़े पेड़ को उखाड़ फेंका और (अपने आघात से) लंकेश्वर रावण के पुत्र मेघनाद को बिना रथ के गिरा दिया। (रथ को तोड़कर नीचे पटक दिया)। बड़े-बड़े योद्धा जो उनके साथ थे, उन्हें पकड़कर हनुमानजी ने उनके शरीर से मसलना शुरू कर दिया।॥3॥

    तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
    मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥4॥

    भावार्थ:- उन्हें मारने के बाद सभी मेघनाद से लड़ने लगे। (वे लड़ते हुए दिखे) मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) टकरा गए हों। हनुमानजी ने उसे एक मुक्का मारा और पेड़ पर चढ़ गए। वह एक पल के लिए बेहोश हो गया॥4॥

    उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥5॥

    भावार्थ:- फिर उसने उठकर बहुत भ्रम पैदा किया, लेकिन पवन के बेटे उससे नहीं जीते।॥5॥

    Sunderkand Path – दोहा

    ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
    जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥19॥

    दोहा

    भावार्थ:- अंत में, उन्होंने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया, फिर हनुमानजी ने मन में सोचा कि अगर मैं ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता, तो उनकी अपार महिमा मिट जाएगी।॥19॥

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Path

    ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
    तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥1॥

    भावार्थ:- उन्होंने हनुमानजी को ब्रह्मबाण मारा, (जैसे ही वह पेड़ से नीचे गिरा), लेकिन गिरते समय उन्होंने बहुत सारी सेना को मार डाला। जब उन्होंने देखा कि हनुमानजी बेहोश हो गए हैं, तो उन्होंने उसे नागपाश से बांध दिया और उसे ले गए॥1॥

    जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
    तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥2॥

    भावार्थ:- (शिव कहते हैं-) सुनो, हे भवानी, क्या वह दूत जिसके ज्ञानी (विवेकवान) मनुष्य संसार (जन्म और मृत्यु) के बंधन को तोड़ सकते हैं? लेकिन हनुमानजी ने खुद को भगवान के काम के लिए बांध लिया॥2॥

    कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
    दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥3॥

    भावार्थ:- बंदर को बाँधते हुए सुनकर, राक्षस भागे और सभी कौतुक (तमाशा देखने) के लिए एकत्रित हुए। हनुमानजी गए और रावण की सभा को देखा। उनकी सर्वोच्च संप्रभुता को कुछ नहीं कहा जाता है॥3॥

    कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
    देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥4॥

    भावार्थ:- देवता और डिकपाल ने विनम्रता के साथ हाथ जोड़े, वे सभी रावण को घूर रहे थे। (उनका रुख देखकर) इतनी बड़ी महिमा देखकर भी हनुमानजी बिल्कुल नहीं डरे। वह निहत्था था, जैसे कि सांपों के एक समूह में, गरुड़ (निहत्था) निडर॥4॥

    9. हनुमान्‌-रावण संवाद – Sundar Kand in Hindi

    sundar kand ramayan
    हनुमान जी को रावण के महल में

    Sundar Kand Path in Hindi – दोहा

    कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
    सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिसाद॥20॥

    दोहा

    भावार्थ:- हनुमानजी को देखकर रावण बहुत हंसा, उसे अपशब्द कहे। तब बेटे को वध की याद आई, तो उसके दिल में एक उदासी थी।॥20॥

    Sundar Kand Hindi – Sundar Kand Ki Chaupai

    कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
    की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥1॥

    भावार्थ:- लंकापति रावण ने कहा – हे वानर! तुम कौन हो? किसके बल पर आपने जंगल को उजाड़ा और नष्ट किया? क्या आपने कभी अपने कानों से मुझे (मेरा नाम और प्रसिद्धि) नहीं सुना? ओ प्यारे! मैं तुम्हें देख रहा हूं॥1॥

    मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
    सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥2॥

    भावार्थ:-आपने राक्षसों का क्या अपराध किया? रे मूर्ख! बताओ, क्या तुम मरने से नहीं डरते? (हनुमानजी ने कहा-) हे रावण! सुनो, जिसकी ताकत से माया पूरे ब्रह्मांड के समूह बनाती है।॥2॥

    जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
    जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥3॥

    भावार्थ:-किसके बल से, हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः) ब्रह्मांड का निर्माण, पोषण और विनाश करते हैं, जिसके बल पर शेषजी पर्वत (चरण) पर्वत और वन सहित पूरे ब्रह्मांड को धारण करते हैं।,॥3॥

    धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
    हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥4॥

    भावार्थ:- जो देवताओं की रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के शरीर धारण करते हैं, और जो आप जैसे मूर्खों को सिखाने वाले हैं, जिन्होंने शिव के कठोर धनुष को तोड़ा और उन्हें राजाओं के समूह पर गर्व किया।॥4॥

    खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥5॥

    भावार्थ:- जिन्होंने खार, दुशान, त्रिशिरा और बाली को मार डाला, जो सभी अतुलनीय बलवान थे,॥5॥

    Sundar Kand in Hindi – दोहा

     जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
    तास दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥21॥

    दोहा

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

    भावार्थ:- मैं उन लोगों का संदेशवाहक हूं जिनकी कम शक्ति के कारण आपने पूरी दुनिया को जीत लिया है और जिनकी प्यारी पत्नी को आप (चोरी से) लाए हैं॥21॥

    जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥
    समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥1॥

    भावार्थ:- मैं आपकी आधिपत्य को बहुत जानता हूं, सहस्रबाहु के साथ आपका झगड़ा हुआ था और आपने बाली से युद्ध करने के बाद प्रसिद्धि प्राप्त की। हनुमानजी के वचन (मार्मिक) को सुनकर रावण हंस पड़ा और बात को टाल गया।॥1॥

    खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
    सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥2॥

    भावार्थ:- हे (दानव) स्वामी मैं भूखा था, (इसलिए) मैंने फल खाए और बंदर के स्वभाव के कारण पेड़ तोड़ दिए। हे (निशाचर) स्वामी! शरीर सबको प्रिय है। जब सड़क पर चलने वाले दुष्ट (दुष्ट) राक्षस मुझे मारने लगते हैं॥2॥

    जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
    मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥3॥

    भावार्थ:- फिर जिन्होंने मुझे मारा, मैंने उन्हें भी मारा। उस पर आपके बेटे ने मुझे (लेकिन) बांध दिया, मुझे खुद बाध्य होने में शर्म नहीं है। मैं अपने स्वामी का काम करना चाहता हूं॥3॥

    बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
    देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥4॥

    भावार्थ:- हे रावण! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूं, आप मेरा अभिमान छोड़ें और मेरी बात सुनें। अपने पवित्र कबीले के बारे में सोचो और भ्रम को छोड़ो और ईश्वर भक्त की पूजा करो।॥4॥

    जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
    तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥5॥

    भावार्थ:- जो कोई भी देवता, दानव और सभी चरागाहों को खाता है, यहां तक कि उन लोगों को भी जो डर से बेहद डरते हैं, कभी भी उनसे नफरत नहीं करते हैं और जैसा कि मैं कहता हूं, उन्हें जानकीजी को दे दो।॥5॥

    Sundar Kand Path in Hindi – दोहा

    प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
    गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥22॥

    दोहा

    भावार्थ:- खार के शत्रु श्री रघुनाथजी शरणार्थियों के रक्षक और दया के समुद्र हैं। भगवान आपके अपराध को भूल जाएंगे और आपको अपनी शरण में रखेंगे॥22॥

    Sundar Kand Ramayan – Sundar Kand in Hindi

    राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
    रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥1॥

    भावार्थ:- आपको श्री राम के चरण कमलों को अपने हृदय में धारण करना चाहिए और लंका का स्थायी राज्य बनाना चाहिए। ऋषि पुलस्त्यजी की प्रसिद्धि निर्मल चंद्रमा के समान है। उस चाँद में कलंक मत बनो॥1॥

    राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
    बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥2॥

    भावार्थ:- राम के नाम के बिना, भाषण सूट नहीं करता है, मध-मोह को छोड़कर, सोच-समझकर देखें। हे देवताओं के शत्रु! यहां तक कि सभी आभूषणों से सजी एक सुंदर महिला भी बिना कपड़ों के सजी नहीं है॥2॥

    राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
    सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥3॥

    भावार्थ:- रामविमुख भी व्यक्ति की संपत्ति और संप्रभुता रखने में खो जाता है और उसे अपना कब्जा नहीं मिलने जैसा है। जिन नदियों के उद्गम स्थल पर पानी का कोई स्रोत नहीं है। (अर्थात, जिनके पास केवल बारिश में आश्रय है) वे बारिश के बीत जाने के तुरंत बाद सूख जाते हैं।॥3॥

    सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
    संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥4॥

    भावार्थ:- हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि रामविमुख की रक्षा करने वाला कोई नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा, जो श्री रामजी के साथ दुर्भावना रखते हैं, आपको नहीं बचा सकते।॥4॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
    भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥23॥

    दोहा

    भावार्थ:- मोह जिसकी उत्पत्ति ऐसी (अज्ञानी) है, बहुत पीड़ादायक है, संयम अभिमान को त्याग देता है और कृपा के समुद्र, रघुकुल के स्वामी भगवान रामचंद्र की पूजा करता है।॥23॥

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Path

    जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
    बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥1॥

    भावार्थ:- यद्यपि हनुमानजी ने भक्ति, ज्ञान, विरक्ति और महान हित की नीति की बात कही, फिर भी उस महान अभिमानी रावण ने हंसी (व्यंग्यात्मक) से कहा कि हमें यह महान बंदर गुरु मिला!॥1॥

    मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥
    उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥2॥

    भावार्थ:- हे दुष्ट! तुम्हारी मृत्यु निकट आ गई है। निम्मी ने मुझे शिक्षा दी। हनुमानजी ने कहा- यह उलटा होगा (अर्थात, मृत्यु तुम्हारे निकट आई है, मेरी नहीं)। यह आपका मतिभ्रम है, मैंने सीधे जाना है॥2॥

    सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
    सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥3॥

    भावार्थ:- हनुमानजी के वचन सुनकर वह बहुत क्रोधित हुआ। (और कहा- अरे! इस मूर्ख का जीवन जल्द क्यों नहीं छूट जाता? दानव उन्हें मारने के लिए दौड़े, यह सुनकर विभीषणजी उसी समय मंत्रियों के साथ वहाँ पहुँचे।॥3॥

    नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
    आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥4॥

    भावार्थ:- उन्होंने रावण को सिर झुकाकर कहा और बहुत विनती की कि दूत को न मारा जाए, यह नीति के विरुद्ध है। हे गोसाईं। कोई और सजा दी जाए। सबने कहा- भाई! यह सलाह एकदम सही है॥4॥

    सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥5॥

    भावार्थ:- यह सुनकर रावण ने हँसकर कहा – ठीक है, वानर को बहकने दो और वापस भेज दो।॥5॥

    10. लंकादहन – Sunderkand Ka Path

    lanka dahan
    लंका दहन

    Sunderkand Path – दोहा

    कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
    तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥24॥

    दोहा

    भावार्थ:- मैं सभी को समझाता हूं कि एक बंदर का प्यार पूंछ पर है। इसलिए कपड़े को तेल में डुबो कर, उसकी पूंछ में बाँध दें और फिर से आग लगा दें॥24॥

    Sundar Kand Hindi – Sundar Kand Ki Chaupai

    पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
    जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥1॥

    भावार्थ:-जब बिना पूंछ का यह बंदर वहां (अपने मालिक के पास) जाएगा, तो यह मूर्ख अपने मालिक को अपने साथ ले आएगा। जिन लोगों ने इसे बढ़ाया है, मैं उनकी संप्रभुता देखूंगा।॥1॥

    बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
    जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥2॥

    भावार्थ:-हनुमानजी यह वचन सुनते ही मेरे दिल में मुस्कुरा उठे (और मेरे दिल में कहा) कि मुझे पता चला, सरस्वतीजी (ऐसा ज्ञान देने में) ने मदद की है। रावण के वचन सुनकर मूर्ख राक्षस तैयार होने लगे (पूंछ में आग लगाने के लिए)।॥2॥

    रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
    कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥3॥

    भावार्थ:-(पूंछ को लपेटने में इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि) शहर में और कोई कपड़ा, घी और तेल नहीं था। हनुमानजी ने ऐसा खेल किया जिससे पूंछ बड़ी (लंबी) हो गई। शहरवासी तमाशा देखने आए। वे हनुमानजी को पैर से मारते हैं और उस पर हंसते हैं॥3॥

    बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
    पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघुरूप तुरंता॥4॥

    भावार्थ:-ढोल बड्रम बजाए जाते हैं, हर कोई तालियां बजाता है। हनुमानजी शहर में आ गए, फिर पूंछ में आग लगा दी। अग्नि को जलता हुआ देखकर हनुमानजी तुरंत ही बहुत छोटे हो गए।॥4॥

    निबुकि चढ़ेउ कप कनक अटारीं। भईं सभीत निसाचर नारीं॥5॥

    भावार्थ:-बंधन से निकलने के बाद, वे सोने की अटारी पर गए। राक्षसों की स्त्रियाँ उन्हें देखकर घबरा गईं।॥5॥

    Sundar Kand in Hindi – दोहा

    हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
    अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥25॥

    दोहा

    भावार्थ:-उस समय, ईश्वर की प्रेरणा से, उनतालीस हवाएँ चलने लगीं। हनुमानजी दहाड़ कर आकाश से उठे॥25॥

    Sunderkand Paath – Sundar Kand in Hindi

    देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
    जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥1॥

    भावार्थ:-शरीर बहुत बड़ा है, लेकिन बहुत हल्का (फुर्तीला) है। वे एक महल से दूसरे में भागते और चढ़ते हैं। शहर जल रहा है और लोग परेशान हैं। करोड़ों की ज्वलंत लपटें लटक रही हैं॥1॥

    तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
    हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥2॥

    भावार्थ:-हाय बाप! हाय मेरे प्यारे इस अवसर पर हमें कौन बचाएगा? (चारों ओर) यह पुकार सुनी जा रही है। हमने पहले ही कहा था कि यह बंदर नहीं है, बंदर के रूप में कोई देवता नहीं है!॥2॥

    साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
    जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥3॥

    भावार्थ:-भिक्षु के अपमान का परिणाम यह है कि शहर एक अनाथ की तरह जल रहा है। हनुमानजी ने एक पल में पूरे शहर को जला दिया। एक विभीषण का घर नहीं जलाया गया॥3॥

    ताकर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
    उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥4॥

    भावार्थ:-(शिव कहते हैं-) हे पार्वती! हनुमानजी उन लोगों के दूत हैं जिन्होंने अग्नि को बनाया था। इसीलिए वे आग से नहीं जलते थे। हनुमानजी पूरी लंका (एक ओर से दूसरी ओर) पूरे लंका में पलट गए। फिर वे समुद्र में कूद गए॥4॥

    11. लंका जलाने के बाद, हनुमानजी को सीताजी से विदाई लेने और चूड़ामणि प्राप्ति – Sundar Kand in Hindi

    Sundar Kand Path in Hindi – दोहा

    पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
    जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥26॥

    दोहा

    भावार्थ:-पूंछ को बुझाने के बाद, थकावट को दूर करने और फिर एक छोटा रूप लेते हुए, हनुमानजी श्री जिवजी के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए॥26॥

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

    मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
    चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥1॥

    भावार्थ:-(हनुमानजी ने कहा-) हे माता! मुझे एक चिन्ह (पहचान) दीजिए, जैसे श्री रघुनाथजी ने मुझे दिया था। तब सीताजी ने चूड़ामणि को हटा दिया। हनुमानजी उसे हर्षित होकर ले गए॥1॥

    कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
    दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ सम संकट भारी॥2॥

    भावार्थ:-(जानकीजी ने कहा-) हे तात! मेरी आज्ञा मानो और इस प्रकार कहो – हे प्रभु! यद्यपि आप सभी पूर्ण काम कर रहे हैं (आपकी कोई इच्छा नहीं है), यह आपकी दया है (और मैं विनम्र हूं) गरीबों (दुखों) पर दया करना, इसलिए उस वीरदा को याद करके, हे नाथ! मेरा क्रंच साफ़ करो॥2॥

    तात सक्रसुत कथा सनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
    मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥3॥

    भावार्थ:-हे तात इन्द्रपुत्र जयंत की कथा (घटना) का वर्णन करने और उसके बाण भगवान को समझाने (याद दिलाने) की। अगर एक महीने में नाथ नहीं आए तो आप मुझे नहीं जीत पाएंगे॥3॥

    कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
    तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥4॥

    भावार्थ:-हे हनुमान! कहो, मैं कैसे मरूँ? हे तात तुम भी अब छोड़ने को कह रहे हो। आपको देखकर छाती ठंडी हो गई थी। फिर उसी दिन और उसी रात मेरे लिए!॥4॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
    चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥27॥

    दोहा

    भावार्थ:-जानकी जी को समझाकर और उनके चरणों में सिर झुकाकर हनुमानजी ने बड़े धीरज से श्री रामजी को प्रणाम किया।॥27॥

    12. सागर के पार पहुँचकर, सभी को लौटाते हुए, मधुवन प्रवेश, सुग्रीव मिलन, श्री राम-हनुमान संवाद

    sundar kand ki chaupai
    हनुमान जी वापिस लौटे

    Sundar Kand Ramayan – Sundar Kand in Hindi

    चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
    नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥1॥

    भावार्थ:-चलते समय, वे महाधमनी से बहुत गर्जना करते हैं, जिसके बारे में सुनकर राक्षसों के गर्भ गिरना शुरू हो गए। समुद्र को पार करने के बाद, वे इसके पार आए और उन्होंने भिक्षुओं को किलकिला (हर्षध्वनि) शब्द सुनाया।॥1॥

    हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
    मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥2॥

    भावार्थ:-हनुमानजी को देखते ही सभी लोग हर्षित हुए और फिर वानरों ने अपना नया जन्म समझा। हनुमानजी का चेहरा प्रसन्न है और वे शरीर में विराजमान हैं, (जिससे वे समझ गए कि) वे श्री रामचंद्रजी के कार्य में आए हैं।॥2॥

    मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
    चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥3॥

    भावार्थ:-सभी लोग हनुमानजी से मिले और बहुत खुश हुए, मानो यातना भरी मछली को पानी मिल गया हो। सभी ने खुश होकर नया इतिहास (कालक्रम) पूछा – कहा, श्री रघुनाथजी के पास जाओ॥3॥

    तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
    रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥4॥

    भावार्थ:-तब सभी लोग मधुवन के अंदर आए और अंगद की सहमति से उन सभी ने मीठे फल (या शहद और फल) खाए। जब रखवाले बरसने लगे, तो पंच मारते ही सभी रखवाले निकल गए॥4॥

    जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि काई॥
    एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥1॥

    भावार्थ:-यदि सीता को खबर न मिली होती, तो क्या वे मधुवन के फल खा सकते थे? इस तरह से राजा सुग्रीव मन में सोच रहे थे कि समाज के साथ वानर भी आए।॥1॥

    आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
    पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥2॥

    भावार्थ:-(सभी लोग आए और सुग्रीव के चरणों में झुक गए। कपिराज सुग्रीव ने बड़े प्रेम से सभी से मुलाकात की। उन्होंने कुशाल से पूछा, (तब बंदरों ने उत्तर दिया-) आपके चरणों की दृष्टि से सब ठीक है। श्री रामजी की कृपा से) विशेष कार्य किया गया था ( कार्य में विशेष सफलता मिली है)॥2॥

    नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
    सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥3॥

    भावार्थ:-हे नाथ! हनुमान ने सभी काम किए और सभी बंदरों की जान बचाई। यह सुनकर सुग्रीवजी फिर से हनुमानजी से मिले और सभी वानरों के साथ श्री रघुनाथजी के पास गए।॥3॥

    राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
    फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥4॥

    भावार्थ:-जब श्री रामजी ने बंदरों को काम पर आते देखा, तो वे विशेष प्रसन्न हुए। दोनों भाई क्रिस्टल रॉक पर बैठे थे। सभी वानर जाकर उनके चरणों में गिर पड़े॥4॥

    Sunderkand Path – दोहा

    प्रीति सहित सब भेंटे रघुपति करुना पुंज॥
    पूछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥29॥

    दोहा

    भावार्थ:-दया की राशि श्री रघुनाथजी ने सबसे प्रेम से अवतार लिया और उनसे कुशल पूछा। (वानरों ने कहा-) हे नाथ! आपका चरण कमल देखने से अधिक कुशल है॥29॥

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Path

    जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
    ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥1॥

    भावार्थ:-जाम्बवान ने कहा- हे रघुनाथजी! बात सुनो। हे नाथ! आप जिस पर दया करते हैं वह हमेशा कल्याणकारी और लगातार कुशल होता है। देवता, मनुष्य और संत सभी उस पर प्रसन्न होते हैं।॥1॥

    सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
    प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥2॥

    भावार्थ:-वह विजयी है, वह विजयी है और वह सद्गुणों का सागर बन जाता है। उनकी खूबसूरत ख्याति तीनों लोकों में प्रकाशित है। ईश्वर की कृपा से सारा काम हो गया। आज हम पैदा हुए थे॥2॥

    नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
    पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥3॥

    भावार्थ:-हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान ने जो किया, उसका वर्णन एक हज़ार चेहरों के साथ भी नहीं किया जा सकता है। तब जाम्बवान ने हनुमानजी के सुंदर चरित्र (कार्य) को श्री रघुनाथजी को सुनाया॥3॥

    सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
    कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥4॥

    भावार्थ:-श्री रामचंदजी के मन में कृपानिधि (उन पात्रों) को सुनकर बहुत अच्छा लगा। उन्होंने आनन्दित होकर हनुमानजी को अपने हृदय से लगा लिया और कहा – हे तात! कहो, सीता कैसे रहती है और अपने जीवन की रक्षा कैसे करती है?॥4॥

    Sundar Kand in Hindi – दोहा

    नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
    लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥30॥

    दोहा

    भावार्थ:-(हनुमानजी ने कहा-) आपका नाम दिन-रात पहरा देने वाला है, आपका ध्यान किन्नर है। आंखें अपने पैरों पर रखो, यह बंद है, फिर अगर आप मौत के पास जाते हैं, तो किस रास्ते से?॥30॥

    Sundar Kand Hindi – Sundar Kand Ki Chaupai

    चलत मोहि चूड़ामनि दीन्हीं। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
    नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥1॥

    भावार्थ:-चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि दी। श्री रघुनाथजी ने उसे हृदय से लगा लिया। (हनुमानजी ने फिर कहा-) हे नाथ! दोनों आँखों में पानी भर जाने के कारण, जानकी जी ने मुझसे कुछ शब्द कहे -॥1॥

    अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
    मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥2॥

    भावार्थ:-छोटे भाई (और यह कहते हुए) के साथ प्रभु के चरण पकड़ना कि आप दीनबंधु हैं, शरण के कष्टों को हरने वाले हैं और मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों का अनुयायी हूं। फिर स्वामी (आप) ने मुझे किस अपराध में छोड़ दिया?॥2॥

    अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
    नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥3॥

    भावार्थ:-(हां) मेरा एक दोष है (बेशक) मेरा मानना है कि आपके अलग होने के बाद मेरा जीवन नहीं चला, लेकिन हे नाथ! यह आंखों का अपराध है जो जीवन में बाधा डालता है।॥3॥

    बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
    नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥4॥

    भावार्थ:-विरहा अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास वायु है, इस प्रकार (अग्नि और वायु के संयोग के कारण) यह शरीर एक क्षण में जल सकता है, लेकिन ईश्वर के स्वयं के स्वरूप (प्रसन्न होने के लिए) जल को देखने वाली आंख आँसू)) बारिश, ताकि हिंसा की आग से भी शरीर जल न जाए॥4॥

    सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥5॥

    भावार्थ:-सीताजी का दुख बहुत बड़ा है। हे दीनदयालु! वह बहुत अच्छी है (आपको बहुत कष्ट होगा)॥5॥

    Sundar Kand Path in Hindi – दोहा

    निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
    बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥31॥

    दोहा

    भावार्थ:-हे करुणानिधान! उनका हर एक पल एक चक्र की तरह गुजरता है। इसलिए हे प्रभु! तुरंत चलें और अपनी भुजाओं के सहारे बुराई की टीम को जीतकर सीताजी को ले आएं॥31॥

    Sunderkand Paath – Sundar Kand in Hindi

    सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥
    बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥1॥

    भावार्थ:-सीता के दुःख को सुनकर, खुशियों की बाढ़ ने प्रभु की कमल आँखों को भर दिया (और उन्होंने कहा-) मन, शब्द और शरीर के साथ, जो मेरा एकमात्र आंदोलन (मेरा एकमात्र आश्रय) है, क्या यह सपने में भी एक आपदा हो सकता है?॥1॥

    कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
    केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥2॥

    भावार्थ:-हनुमानजी ने कहा- भगवन! विपत्ति वही (केवल) है जब आपके भजन याद नहीं किए जाते हैं। हे भगवान! राक्षसों की बात कितनी है? आप दुश्मन पर विजय प्राप्त करेंगे और जानकी को लेंगे॥2॥

    सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
    प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥3॥

    भावार्थ:-(भगवान कहने लगे-) हे हनुमान! सुनो, तुम्हारी तरह मेरे परोपकारी देवता कोई मनुष्य या संत नहीं हैं। मुझे आपके समकक्ष (बदले में परोपकार) का क्या करना चाहिए, मेरा मन आपके सामने नहीं हो सकता॥3॥

    सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
    पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥4॥

    भावार्थ:-हे पुत्र सुनो, मैंने अपने मन में (बहुत) सोचा है और देखा है कि मैं तुमसे उधार नहीं लिया जा सकता। देवताओं के रक्षक, हनुमानजी बार-बार देख रहे हैं। आंखें समय से पहले पानी से भर जाती हैं और शरीर बहुत स्पंदित होता है॥4॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
    चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥32॥

    दोहा

    भावार्थ:-प्रभु के वचनों को सुनकर और उनके (प्रसन्न) मुख (पुलकित) अंगों को देखकर हनुमानजी प्रसन्न हो गए और प्रेम में कांपते हुए बोले, ‘हे प्रभु! । मेरी रक्षा करो, मेरी रक्षा करो ’कहते हुए श्री रामजी के चरणों में गिर पड़ा॥32॥

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

    बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
    प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥1॥

    भावार्थ:-भगवान उन्हें बार-बार उठाना चाहते हैं, लेकिन प्यार में डूबे हनुमानजी को पैरों से उठना पसंद नहीं है। भगवान का काम हनुमानजी के सिर पर है। उस स्थिति को याद करने के बाद शिव प्रेम में थे।॥1॥

    सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
    कपि उठाई प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥2॥

    भावार्थ:-फिर सावधान मन से, शंकरजी ने एक बहुत ही सुंदर कहानी सुनानी शुरू की – हनुमानजी को उठाने के बाद, भगवान ने इसे दिल से लगाया और हाथों को पकड़े हुए इसे बहुत बारीकी से बैठाया।॥2॥

    कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
    प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥3॥

    भावार्थ:-हे हनुमान! मुझे बताओ, आपने रावण द्वारा सुरक्षित लंका और उसके बड़े बांके किले को कैसे जलाया था? हनुमानजी ने भगवान को प्रसन्न किया और उन्होंने घोर वचन दिया- ॥3॥

    साखामग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
    नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥4॥

    भावार्थ:-बंदर का सबसे बड़ा प्रयास है कि वह एक शाखा से दूसरी शाखा में जाए। जिस समुद्र को मैंने पार किया, सोने के शहर को जलाया, और राक्षसों को मार डाला, और अशोक वन को नष्ट कर दिया,॥4॥

    सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥5॥

    भावार्थ:-यह सब श्री रघुनाथजी हैं! वह आपका ऐश्वर्य है। हे नाथ! मुझमें कुछ नहीं है॥5॥

    Sunderkand Path – दोहा

    ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
    तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥33॥

    दोहा

    भावार्थ:-हे भगवान! किसी के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है जिससे आप खुश हैं। आपके प्रभाव से, कपास (जो स्वयं बहुत जल्दी जलने वाली वस्तु है) निश्चित रूप से बरनवाल को जला सकती है (अर्थात असंभव संभव हो सकता है)॥3॥

    Sundar Kand Ramayan – Sundar Kand in Hindi

    नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
    सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥1॥

    भावार्थ:-हे नाथ! कृपया मुझे अपनी अविभाजित भक्ति प्रदान करें, जिससे मुझे अपार खुशी मिलती है। हनुमानजी की अत्यंत सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब भगवान श्री रामचंद्रजी ने कहा ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो)।॥1॥

    उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
    यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥2॥

    भावार्थ:-हे उमा जो कोई भी श्री रामजी के स्वरूप को जानता है, उसके लिए भजन के सिवाय और कोई बात नहीं है। स्वामी-सेवक का यह संवाद उनके दिल में उतर गया, उन्हें श्री रघुनाथजी के चरणों की भक्ति मिली।॥2॥

    सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
    तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥3॥

    भावार्थ:-प्रभु के वचन सुनकर वानर कहने लगे – कृपया आनंद रामानंद श्री राम जी की जय हो, जय हो, जय हो! तब श्री रघुनाथजी ने कपिराज सुग्रीव को बुलाया और कहा – चलने की तैयारी करो।॥3॥

    अब बिलंबु केह कारन कीजे। तुरंत कपिन्ह कहँ आयसु दीजे॥
    कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥4॥

    भावार्थ:-अब देरी क्या होनी चाहिए? वानरों को तुरंत आज्ञा दें। इस लीला (रावणवध की तैयारी) (ईश्वर) को देखकर, देवता आकाश से अपने लोगों के लिए कई फूलों की वर्षा करके और जयकारे लगाते हुए चले जाते हैं।॥4॥

    13. श्री रामजी वानरों की सेना के साथ चले और समुद्र तट पर पहुँचे – Sunderkand Ka Path

    sunderkand path
    श्री रामजी वानरों की सेना के साथ लंका चले

    Sundar Kand in Hindi – दोहा

    कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
    नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥34॥

    दोहा

    भावार्थ:-वानरराज सुग्रीव ने जल्द ही बंदरों को बुलाया, जनरलों के समूह पहुंचे। वानरों के झुंड कई रंगों के हैं और उनमें अविश्वसनीय ताकत है।॥34॥

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Path

     प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
    देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥1॥

    भावार्थ:-वे प्रभु के चरण कमलों में सिर रखते हैं। महान भालू और गर्जन गर्जन कर रहे हैं। श्री रामजी ने वानरों की पूरी सेना को देखा। फिर कमल की आँखों से कृपापूर्वक उसकी ओर देखा॥1॥

    राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
    हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥2॥

    भावार्थ:-राम की कृपा की शक्ति के साथ, महान वानर पंखों के साथ बड़े पहाड़ बन गए। तब श्री रामजी प्रसन्न हुए और प्रस्थान किया। कई सुंदर और अच्छी किस्मत॥2॥

    जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
    प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥3॥

    भावार्थ:-जिनकी प्रसिद्धि सभी मार्शलों के साथ पूरी हो जाती है, उनके प्रस्थान के समय यह नीति (लीला की गरिमा रखना) है। भगवान जानकीजी भी भगवान को विदा करना जानते थे। उसके बायें अंग फटे हुए मानो कह रहे हों कि (श्री रामजी आ रहे हैं)॥3॥

    जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहिं सोई॥
    चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥4॥

    भावार्थ:-शकुनि जो कुछ भी जानकीजी को करते थे, वह रावण के लिए बुरा हो गया। सेना चल सकती है, इसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू दहाड़ते हैं॥4॥

    नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
    केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥5॥

    भावार्थ:-नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक) चलने वाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षों को धारण किए कोई आकाश मार्ग से और कोई पृथ्वी पर चले जा रहे हैं। वे सिंह के समान गर्जना कर रहे हैं। (उनके चलने और गर्जने से) दिशाओं के हाथी विचलित होकर चिंग्घाड़ रहे हैं॥5॥

    Sunderkand Paath – Sundar Kand in Hindi

    चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
    मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
    कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
    जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥1॥

    छंद

    भावार्थ:-दिशाओं में हाथियों को चीरना शुरू हो गया, पृथ्वी कांपने लगी, पहाड़ चंचल (हिल गए) हो गए और समुद्र चक्कर काटने लगा। गन्धर्व, देवता, ऋषि, नाग, यक्ष सभी मन में आनन्दित हुए कि ‘(अब) हमारे दुखों का औसत हो गया है। कई करोड़ों वानर योद्धा काट रहे हैं और करोड़ों भाग रहे हैं। वे ‘प्रबल प्रताप कोसलनाथ श्री रामचंद्रजी की जय हो’ का जाप करते हुए उनके गुण गा रहे हैं।॥1॥

    सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
    गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥
    रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
    जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥2॥

    छंद

    भावार्थ:-यहाँ तक कि परोपकारी (सर्वोच्च और महान) सर्वराज शेषजी भी सेना का भार नहीं उठा सके, उन्हें बार-बार मोहित (भयभीत) किया जाता है और फिर से कछुए की कड़ी पीठ को दांतों से पकड़ लिया जाता है। ऐसा करते समय (अर्थात, बार-बार दांतों को काटकर और कछुए की पीठ पर एक रेखा खींचते हुए), वे कैसे आसन कर रहे हैं जैसे कि श्री रामचंद्रजी की निष्कलंक पवित्र यात्रा को सरचराज शिखाजी कच्छप की पीठ पर लिखना, उनकी बेदाग पवित्र कहानी को जानना।॥2॥

    Sunderkand Path – दोहा

    एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
    जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥35॥

    दोहा

    भावार्थ:-इस तरह कृपानिधान श्री रामजी समुद्र तट पर गए। कई भालू और बंदर हर जगह फल खाने लगे॥35॥

    14. मंदोदरी-रावण संवाद – Sundar Kand in Hindi

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    मंदोदरी-रावण संवाद

    Sundar Kand Hindi – Sundar Kand Ki Chaupai

    उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब तें जारि गयउ कपि लंका॥
    निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।1॥

    भावार्थ:-वहाँ (लंका में), जब से हनुमानजी लंका को जलाने गए, तब से दैत्य डरने लगे। उनके घरों में हर कोई सोचता है कि राक्षस कबीले की रक्षा करने का कोई तरीका नहीं है।॥1॥

    जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
    दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥2॥

    भावार्थ:-किसके दूत का वर्णन नहीं किया जा सकता है, कौन अच्छा है जब वह खुद शहर में आता है (हमारी बहुत बुरी हालत होगी)? दूतों से नगरवासियों की बातें सुनकर मंदोदरी बहुत व्याकुल हो गई॥2॥

    रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
    कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥3॥

    भावार्थ:-उसने अपने हाथों को एकांत में मोड़ लिया और अपने पति (रावण) के चरणों में जा बैठी और नितीरास में बोला – हे प्रिय! श्री हरि का विरोध छोड़ो। मेरे कहने को जानना बहुत लाभदायक है और इसे हृदय में धारण करो॥3॥

    समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥
    तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥4॥

    भावार्थ:-जिसके दूत करने का विचार (जैसे ही हमें याद आता है), राक्षसों की महिलाओं के गर्भ गिर जाते हैं, हे प्रिय स्वामी! यदि आप चाहते हैं, तो अपने मंत्री को फोन करें और अपनी महिला को उसके साथ भेजें॥4॥

    तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
    सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥5॥

    भावार्थ:-सीता एक सर्दियों की रात की तरह आई हैं जो आपके कुल कमल कमल के जंगल को शोक में डाल रही हैं। हे नाथ। सुनो, सीता को दिए बिना (वापसी), तुम शंभू और ब्रह्मा के बिना अच्छा नहीं कर सकते।॥5॥

    Sundar Kand in Hindi – दोहा

    राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
    जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥36॥

    दोहा

    भावार्थ:-श्री रामजी के बाण साँपों के समूह के समान हैं और राक्षसों के समूह मेंढक की तरह हैं। जब तक वे उन्हें नहीं पीसते (निगलते हैं) तक हठपूर्वक उपाय करें॥36॥

    Sunderkand Paath – Sundar Kand in Hindi

    श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
    सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥1॥

    भावार्थ:-मूर्ख और विश्वप्रसिद्ध अभिमानी रावण उसकी आवाज सुनकर बहुत हंसा (और कहा-) महिलाओं का स्वभाव वास्तव में बहुत डरपोक है। आप मंगल से भी डरते हैं। तुम्हारा मन (हृदय) बहुत कच्चा है॥1॥

    जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
    कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥2॥

    भावार्थ:-यदि वानरों की सेना आती है, तो गरीब राक्षस इसे खाएंगे और अपना जीवन व्यतीत करेंगे। लोकपाल उस महिला से भी डरता है जिसकी थरथराहट, हंसी का विषय है॥2॥

    अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
    फमंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥3॥

    भावार्थ:-रावण ने हँसते हुए कहा कि वह उसे हृदय से लगाकर ममता (अधिक स्नेह दिखाते हुए) बढ़ाकर सभा में गया। मंदोदरी को दिल में चिंता होने लगी कि माता-पिता उसके पति से दुश्मनी कर लें।॥3॥

    बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥
    बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥4॥

    भावार्थ:-जब वह विधानसभा में बैठे, तो उन्हें खबर मिली कि दुश्मन की पूरी सेना समुद्र पार कर गई है, उन्होंने मंत्रियों से उचित सलाह (अब क्या करें?) कहने के लिए कहा। तब वे सभी हंस पड़े और कहा कि चुप रहो (इसमें क्या सलाह है?)॥4॥

    जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥5॥

    भावार्थ:-आपने देवताओं और राक्षसों पर विजय प्राप्त की, तब कोई श्रम नहीं था। फिर मनुष्यों और वानरों की संख्या कितनी है?॥5॥

    15. विभीषण का रावण को समझाना और विभीषण का अपमान करना

    sundar kand in hindi
    रावण द्वारा विभीषण का अपमान

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
    राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥37॥

    दोहा

    भावार्थ:- मंत्री, वैद्य और गुरु- यदि ये तीनों भय (दुःख की बात) के साथ (हित की बात नहीं) या (लाभ की) आशा से (ठाकुर को अलविदा कहने लगते हैं), तो (क्रमशः) अवस्था, शरीर और धर्म तीनों में शीघ्रता से बोलते हैं नाश॥37॥

    Sunderkand Ka Path – Sundar Kand Ki Chaupai

    सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
    अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥1॥

    भावार्थ:- रावण के लिए वही मदद (संयोग) आई है। मंत्री ने उसकी (मुँह ऊपर) तारीफ की। (उसी समय) विभीषणजी को अवसर की जानकारी हुई। उसने बड़े भाई के चरणों में सिर नवाया॥1॥

    पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥
    जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥2॥

    भावार्थ:- फिर से बैठकर, वह अपनी सीट पर बैठ गया और आदेश मिलने के बाद, इन शब्दों में कहा – हे कृपाल, जब तुमने मुझसे (राय) पहले ही पूछ लिया है, हे तात! अपनी बुद्धि के अनुसार, मैं आपकी रुचि के लिए बोलता हूं-॥2॥

    जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
    सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥3॥

    भावार्थ:- जो मनुष्य अपना कल्याण, सुंदर प्रसिद्धि, ज्ञान, अच्छी गति और अन्य कई प्रकार के सुख चाहता है, वह स्वामी है! महिला के माथे को चौथ के चाँद के रूप में त्यागें (जैसे, लोग चौथ का चाँद नहीं देखते हैं, उसी तरह महिला का चेहरा नहीं देखें)।॥3॥

    चौदह भुवन एक पति होई। भूत द्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
    गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥4॥

    भावार्थ:- चौदह भुवन में से केवल एक ही भगवान है, वह भी प्राणियों से घृणा करके (नष्ट) नहीं हो सकता है, जो गुणों और स्मार्ट का एक समुद्र है, चाहे वह कितना भी लोभी हो, कोई भी अच्छा नहीं कहता है॥4॥

    काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
    सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥38॥

    दोहा

    भावार्थ:-हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ – ये सभी नरक के रास्ते हैं, इन सब को छोड़ कर श्री रामचंद्रजी के पास जाओ, जिन्हें संत (सतपुरुष) भेजते हैं।॥38॥

    तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
    ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥1॥

    भावार्थ:- हे तात राम पुरुषों के राजा नहीं हैं। वह सभी लोकों का स्वामी है और काल का भी। वे भगवान हैं (पूर्ण अपारदर्शिता, त्याग, श्री, धर्म, अरुचिकर और ज्ञान के भंडार), वे निरमाया (अपवित्र), अजन्मे, विकृत, अजेय, अनन्त और अनंत ब्रह्म हैं॥1॥

    गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥
    जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥2॥

    भावार्थ:- भगवान के अनुग्रह के उन समुद्र ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गो और देवताओं के लाभ के लिए मानव शरीर लिया है। अरे भाई! सुनो, वे वे हैं जो नौकरों को खुशी देते हैं, दुष्टों के समूह को नष्ट करते हैं और वेदों और धर्म की रक्षा करते हैं।॥2॥

    ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
    देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥3॥

    भावार्थ:- घृणा को त्यागने के बाद उन्हें सिर दें। वह श्री रघुनाथजी की शरण का नाश करने वाला है। हे नाथ! उस स्वामी (सर्वेश्वर) को जीवन दो और श्री रामजी को भेजो जो तुम्हें बिना किसी कारण के प्रेम करते हैं॥3॥

    सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
    जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥4॥

    भावार्थ:-जिसने भी पूरी दुनिया को बदनाम करने का पाप महसूस किया है, उसकी शरण में जाने पर भगवान भी उसे नहीं छोड़ता। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करने वाला है, वे भगवान (भगवान) के रूप में प्रकट हुए हैं। हे रावण! इसे दिल में उतारो॥4॥

    बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
    परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥39क॥

    दोहा

    भावार्थ:- हे दाशिश! मैं बार-बार आपके चरणों को सुनता हूं और प्रार्थना करता हूं कि आप अपने मन, मोह और मद को त्याग दें और भगवान रामजी की पूजा करें (39 (क)॥

    मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
    तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥39ख॥

    दोहा

    भावार्थ:- मुनि पुलस्त्यजी ने यह बात अपने शिष्य को भेजी है। हे तात एक सुंदर अवसर मिलने पर, मैंने तुरंत उस बात को भगवान (आप) को बताया ॥39 (ख)॥

    माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
    तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥1॥

    भावार्थ:- मालवन नाम का एक बहुत ही बुद्धिमान मंत्री था। उसकी (विभीषण) की बातें सुनकर उसे बड़ा आनंद आया (और कहा-) हे तात! आपका छोटा भाई नितिभूषण है (जो भूषण रूप में नीति धारण करता है, अर्थात निति मनम)। विभीषण जो कह रहे हैं उसे अपने दिल में उतारो॥1॥

    रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥
    माल्यवंत गह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥2॥

    भावार्थ:- (रावण ने कहा-) ये दोनों मूर्ख शत्रु की महिमा बता रहे हैं। यहाँ किसी को भी? उन्हें हटाओ मत! तब मलयवन घर लौटा और विभीषणजी ने हाथ जोड़कर फिर कहा -॥2॥

    सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
    जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥3॥

    भावार्थ:- हे नाथ! पुराणों और वेदों का कहना है कि सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) और कुबुद्धि (खोई हुई बुद्धिमत्ता) सभी के दिल में रहती है, जहाँ सुबुद्धि होती है, वहाँ कई प्रकार के धन (सुख की स्थिति) होते हैं और जहाँ गलतफहमी होती है, वह दुख का परिणाम है ( दुःख)) रहता है॥3॥

    तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
    कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥4॥

    भावार्थ:- उलटा दिल तुम्हारे दिल में बस गया। इसके साथ, आप हित को हानि और शत्रु को मित्र मानते हैं। सीता के लिए तुम्हारा महान प्रेम जो दानव कुल के लिए कालरात्रि (के रूप में) है।॥4॥

    तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
    सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हारा॥40॥

    दोहा

    भावार्थ:- हे तात मैं चरण पकड़ता हूं और आपसे (भीख) मांगता हूं। कि तुम मुझे संजो लो (मेरे बच्चे के अनुरोध को स्नेहपूर्वक स्वीकार करो) सीता को श्री रामजी को दे दो, जिसमें तुम आहत नहीं हो॥40॥

    बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥
    सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहिं निकट मृत्यु अब आई॥1॥

    भावार्थ:- विभीषण ने नीति को पंडितों, पुराणों और वेदों द्वारा स्वीकृत (स्वीकृत) आवाज के साथ कहा। लेकिन यह सुनकर रावण गुस्से में उठा और कहा कि तुम दुष्ट हो! अब मौत तुम्हारे करीब आ गई!॥1॥

    जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
    कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥2॥

    भावार्थ:- अरे मूर्ख! आप रहते हैं, मैं हमेशा जीवित रहता हूं (यानी, मैं अपने भोजन से बढ़ रहा हूं), लेकिन आप मूर्ख हैं! आप दुश्मन को ही पसंद करते हैं। हे दुष्ट! मुझे बताओ, दुनिया में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी बाहों की मदद से नहीं जीता है?॥2॥

    मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
    अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥3॥

    भावार्थ:- मेरे शहर में रहना तपस्वियों को बहुत पसंद है। बेवकूफ! जाकर उनसे मिलें और उन्हें नीति बताएं। यह कहते हुए, रावण ने उसे लात मारी, लेकिन छोटे भाई विभीषण (मारे जाने पर भी) ने बार-बार उसके पैर पकड़ लिए।॥3॥

    उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
    तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥4॥

    भावार्थ:- (शिव कहते हैं-) हे उमा! यह उस संत की महानता (महिमा) है जिसे वह बुराई करते हुए भी (बुराई करने वाले) का भला करता है। (विभीषणजी ने कहा-) आप मेरे पिता के समान हैं, मुझे मारो, मैंने अच्छा किया, पर हे नाथ! श्री रामजी की आराधना करना ही आपका हित है॥4॥

    सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥5॥

    भावार्थ:- (इतना कहते हुए) विभीषण अपने मंत्रियों को अपने साथ आकाश में ले गया और सबको बताने के बाद वह कहने लगा ॥5॥

    16. विभीषण का प्रस्थान और भगवान श्री रामजी की शरण में जाना – Sunderkand Ka Path

    sunderkand paath
    विभीषण का भगवान श्री रामजी की शरण

    रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
    मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥

    दोहा

    भावार्थ:- श्री रामजी साक्षात् संकल्प (और सर्वशक्तिशाली) स्वामी हैं और (हे रावण) आपकी विधानसभा अवधि का आधिपत्य है। इसलिए मैं अब श्री रघुवीर की शरण में जाता हूं, मुझे दोष मत दो॥41॥

    अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयू हीन भए सब तबहीं॥
    साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥1॥

    भावार्थ:- जैसे ही विभीषणजी यह कहते हुए आगे बढ़े, सभी दैत्य अचेत हो गए। (वह मर गया)। (शिव कहते हैं-) हे भवानी! भिक्षु का अपमान तुरंत सभी को मार डालता है (नष्ट कर देता है)।॥1॥

    रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
    चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥2॥

    भावार्थ:- जिस क्षण रावण ने विभीषण का त्याग किया, वह क्षण दुर्भाग्यपूर्ण वैभव (ऐश्वर्या) से हीन हो गया। विभीषणजी प्रसन्न हुए और मन में अनेक कामनाओं के साथ श्री रघुनाथजी के पास गए॥2॥

    देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
    जे पद परसि तरी रिषनारी। दंडक कानन पावनकारी॥3॥

    भावार्थ:- (वह सोचता था-) मैं जाकर प्रभु के कोमल और लाल रंग के कमल के सुंदर और सुंदर पैर देखूंगा, जो सेवकों को सुख देने वाला है, जिसके पैर ऋषि पत्नी अहल्या को छू गए और जो जा रहे हैं दंडकवन को पवित्र करने के लिए।॥3॥

    जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
    हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥4॥

    भावार्थ:- जानकी जी ने जो कदम अपने हृदय में धारण किए हैं, जो पृथ्वी पर पाखंडी (उन्हें पकड़ने के लिए) और जो लोग भगवान शिव के हृदय के रूप में चरणकमल में निवास करते हैं, मैं आज उन्हें देखकर भाग्यशाली हूं।॥4॥

    जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
    ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥42॥

    दोहा

    भावार्थ:- जिन चरणों में भरतजी ने अपना मन लगाया है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणों को देखूंगा और इन आंखों से देखूंगा॥42॥

    ऐहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंदु एहिं पारा॥
    कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥1॥

    भावार्थ:- इस तरह, वह जल्द ही अपने प्यार को देखते हुए इस समुद्र (जो श्री रामचंद्रजी की सेना थी) के सामने आ गया। जब बंदरों ने विभीषण को आते देखा, तो उन्होंने महसूस किया कि दुश्मन का एक विशेष दूत है॥1॥

    ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
    कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥2॥

    भावार्थ:- उन्हें (गार्ड को) नियुक्त करते हुए, वे सुग्रीव के पास आए और उन्हें सारी खबर बताई। सुग्रीव (श्री रामजी के पास जाते हुए) बोले- हे रघुनाथजी! सुनो, रावण का भाई तुम्हें देखने आया है॥2॥

    कह प्रभु सखा बूझिए काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
    जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥3॥

    भावार्थ:- भगवान श्री रामजी ने कहा- हे मित्र! आपको क्या लगता है (आपकी क्या राय है)? वानरराज सुग्रीव ने कहा- हे महाराज! सुनो, राक्षसों के दैत्य का पता नहीं है। यह ज्ञात नहीं है कि उसने अपनी इच्छा क्यों बदली॥3॥

    भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
    सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥4॥

    भावार्थ:- (ऐसा लगता है) यह मूर्ख हमारा भेद लेने के लिए आया है, इसलिए मैं इसे बांधकर रखना पसंद करता हूं। (श्री रामजी ने कहा-) हे मित्र! आपने नीति को अच्छी तरह से माना है, लेकिन मेरी प्रतिज्ञा शरण के डर को हराने के लिए है!॥4॥

    सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥5॥

    भावार्थ:- भगवान के वचन सुनकर, हनुमानजी प्रसन्न हुए (और अपने मन में कहने लगे) कि भगवान कैसे शरणागत व्यक्ति हैं (जो शरण में आते हैं लेकिन पिता की तरह प्रेम करते हैं)॥5॥

    सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
    ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥43॥

    दोहा

    भावार्थ:- (श्री रामजी ने तब कहा-) मनुष्य जो अपने नुकसान का अनुमान लगाते हैं और जो शरण में आते हैं उन्हें त्याग देते हैं, पामर (क्षुद्र), पापी हैं, उन्हें देखने के लिए भी नुकसान होता है (पाप सोचो)॥43॥

    कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
    सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥1॥

    भावार्थ:- जिनके करोड़ों ब्राह्मण मारे गए हैं, उनकी शरण में आने पर भी मैंने उनका त्याग नहीं किया। जैसे ही कोई प्राणी मेरे सामने होता है, उसके लाखों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।॥1॥

    पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
    जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥2॥

    भावार्थ:- यह पापी का सहज स्वभाव है कि मेरा भजन उसे कभी प्रसन्न नहीं करता। अगर वह (रावण का भाई) दुष्ट दिल का होता, तो क्या वह मेरे सामने आता?॥2॥

    निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
    भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥3॥

    भावार्थ:- जो शुद्ध मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे धोखेबाजी और धोखेबाजी पसंद नहीं है। भले ही रावण ने उसे भेद मांगने के लिए भेजा हो, हे सुग्रीव! कोई डर या नुकसान नहीं है॥3॥

     जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
    जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥4॥

    भावार्थ:- क्योंकि हे मित्र! संसार के सभी दैत्य, लक्ष्मण उन सभी को एक क्षण में मार सकते हैं और यदि वह भय से मेरे स्थान पर आ गया है, तो मैं उसे आत्मा की तरह रखूंगा।॥4॥

    उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
    जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥44॥

    दोहा

    भावार्थ:- श्री रामजी, कृपा के निवास स्थान, हँसे और कहा- उसे दोनों स्थितियों में ले आओ। तब अंगद और हनुमान के साथ सुग्रीवजी ने ‘कपालु श्री रामजी की जय हो’ कहा।॥4॥

    सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
    दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥1॥

    भावार्थ:- विभीषणजी का सम्मान करने के बाद, बंदर फिर से आगे बढ़ा, जहाँ श्री रघुनाथजी दया के पात्र थे। विभीषणजी ने दोनों भाइयों (बहुत ही सुखद) को दूर से ही नेत्रों को सुख का दान देते देखा।॥1॥

    बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
    भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥2॥

    भावार्थ:- फिर, शोभा के निवास श्री रामजी को देखकर, उन्होंने पलक (धड़कन) बंद कर दी और घूरते (घूरते) रहे और घूरते रहे। भगवान की विशाल भुजाएँ हैं, आँखें लाल कमल जैसी हैं, और शरण की आशंका को नष्ट करने वाला एक काला शरीर॥2॥

    सघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
    नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥3॥

    भावार्थ:- शेर के कंधे होते हैं, विशाल छाती (चौड़ी छाती) बहुत सुंदर होती है। यह वह मुंह है जो असंख्य कामदेव के दिलों को रोमांचित करता है। भगवान के स्वरूप को देखकर विभीषणजी की आँखें (प्रेमश्रु की) पानी से भर गईं और शरीर बहुत स्पंदित हो गया। फिर उसके दिल में धैर्य के साथ, उसने नरम शब्दों का उच्चारण किया॥3॥

    नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
    सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥4॥

    भावार्थ:- हे नाथ! मैं दशमुख रावण का भाई हूं। हे देवताओं के रक्षक! मैं दानव कबीले में पैदा हुआ था। मेरे पास एक मजबूत शरीर है, स्वभाव से मैं पाप को प्यार करता हूं, जैसे एक उल्लू को अंधेरे के लिए एक सरल स्नेह है।॥4॥

    श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
    त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥45॥

    दोहा

    भावार्थ:- मैं तुम्हारी प्रसन्नता को कानों से सुनता आया हूं, कि भगवान भव (जन्म और मृत्यु) के भय को नष्ट करने वाले हैं। हे श्री रघुवीर, जो पीड़ितों के कष्टों को दूर करते हैं और शरणार्थियों को सुकून देते हैं! मेरी रक्षा करो रक्षा करो॥45॥

    अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
    दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥1॥

    भावार्थ:- जब प्रभु ने उन्हें यह कहते हुए अनुष्ठान करते देखा, तो वे तुरंत बहुत उत्साहित हुए। विभीषणजी के विनम्र शब्दों को सुनकर प्रभु का मन बहुत प्रसन्न हुआ। उसने अपनी विशाल भुजाओं से उन्हें पकड़ लिया और उन्हें हृदय से लगा लिया॥1॥

    अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भय हारी॥
    कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥2॥

    भावार्थ:- छोटे भाई लक्ष्मणजी के साथ लेटे हुए, श्री रामजी ने उनके पास बैठकर ऐसे शब्द बोले जो भक्तों के भय को परास्त कर देंगे – हे लंकेश! परिवार के साथ अपने कौशल को कहें। तुम बुरी जगह पर रहते हो॥2॥

    खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
    मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥3॥

    भावार्थ:- दिन-रात आप दुष्टों के घेरे में रहते हैं। (ऐसी स्थिति में) हे मित्र! आपका धर्म कैसे काम करता है? मैं आपके सभी रीति-रिवाजों (व्यवहार) को जानता हूं। आप बहुत चतुर हैं, आपको सुंदरता पसंद नहीं है॥3॥

    बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
    अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥4॥

    भावार्थ:- हे तात यह नरक में रहने के लिए अच्छा है, लेकिन दुष्ट के साथ निर्माता (कभी नहीं)। (विभीषणजी ने कहा-) हे रघुनाथजी! अब मैं आपके चरणों को देखकर कुशल हूँ, यह जानकर कि आप एक सेवक हैं और मुझ पर दया करते हैं॥4॥

    तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
    जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥

    दोहा

    भावार्थ:- तब तक, जीव कुशल नहीं है और न ही उसके सपने में, उसके पास मन की शांति है, जब तक वह शोक (विषय-वस्तु) के अलावा श्री रामजी की पूजा नहीं करता।॥46॥

    ब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
    जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥1॥

    भावार्थ:- लालच, मोह, मत्सर (ईर्ष्या), मद और सम्मान आदि कई दुष्ट हृदय में रहते हैं, जब तक श्री रघुनाथजी, धनुष और बाण धारण करते हैं और कमर में करधनी धारण करते हैं, तब तक हृदय में वास होता है।॥1॥

    ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
    तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥2॥

    भावार्थ:- ममता पूरी अंधेरी रात है, जो राग और द्वेष के रूप में उल्लुओं को खुशी देगी। वह (ममता जैसी रात) प्राणी के मन में तब तक रहता है जब तक कि सूर्य भगवान के राजसी रूप में नहीं उगता।॥2॥

    अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
    तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥3॥

    भावार्थ:- हे श्री रामजी! अब मैं आपके चरणारविन्द के दर्शन करने के बाद ठीक हूँ, मेरे भारी भय मिट गए हैं। हे दयालु! तीन प्रकार की भवशूल (आध्यात्मिक, अर्ध-आध्यात्मिक और अर्ध-भौतिक ऊष्मा) आपको अनुमति नहीं देती है॥3॥

    मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
    जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥4॥

    भावार्थ:- हे श्री रामजी! अब मैं आपके चरणारविंद को देखकर ठीक हूं, मेरे महान भय गायब हो गए हैं। हे दयालु तीन प्रकार के भवशूल (आध्यात्मिक, अर्ध-आध्यात्मिक और अर्ध-भौतिक ताप) आपको अनुमति नहीं देते हैं॥4॥

    अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
    देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥47॥

    दोहा

    भावार्थ:- हे कृपा और प्रसन्नता के स्वामी, श्री रामजी! मेरा परम सौभाग्य है, जिसे मैंने अपनी आँखों से देखा कि ब्रह्मा और शिव द्वारा सेवा करने वाले युगल चरण कमल हैं॥47॥

    सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
    जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥1॥

    भावार्थ:- (श्री रामजी ने कहा-) हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव बताता हूं, जिसे काकभुशुंडि, शिव और पार्वती भी जानते हैं। यदि कोई भी व्यक्ति (संपूर्ण) जड़-चेतन जगत का पुरुषवादी है, अगर वह भी डर के मारे मेरी जगह आ जाता है,॥1॥

    तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
    जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥2॥

    भावार्थ:- और यदि आप मद, मोह और विभिन्न प्रकार के कर्मों के धोखे को छोड़ देते हैं, तो मैं उसे बहुत जल्द संत की तरह बना देता हूं। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार॥2॥

    सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
    समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥3॥

    भावार्थ:- इन सभी मम्मट-लाइक टैग्स को इकट्ठा करके और उन सभी की नाल बनाइए जो मेरे दिल को मेरे चरणों में बांधती हैं। (मुझे सभी सांसारिक संबंधों का केंद्र बनाता है), जो एक दूरदर्शी है जिसकी कोई इच्छा नहीं है और जिसके पास खुशी, दुःख और भय नहीं है॥3॥

    अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
    तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥4॥

    भावार्थ:- ऐसे सज्जन मेरे दिल में कैसे बसते हैं, जैसे एक लालची आदमी के दिल में रहता है। आई लव यू लाइक यू संत। मैं किसी और के शरीर को सहन नहीं करता (शुक्र है)॥4॥

    Sunderkand Path – दोहा

    सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
    ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥48॥

    दोहा

    भावार्थ:- जो लोग ईश्वर (बोध) के उपासक हैं, दूसरों के हित में लगे हैं, नीति और नियमों में दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है, वे मेरे जीवन के समान हैं।॥48॥

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Ka Path

    सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥।
    राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥1॥

    भावार्थ:- हे लंकापति! सुनो, तुम्हारे पास उपरोक्त सभी गुण हैं। तुम मुझे इसके साथ बहुत प्यारे हो। श्री रामजी के वचन सुनकर सभी वानरों के समूह कहने लगे – कृपा के समूह श्री रामजी॥1॥

    सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
    पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥2॥

    भावार्थ:- प्रभु की वाणी सुनकर और उसे कानों के लिए अमृत के रूप में जानकर, विभीषणजी डरने वाले नहीं हैं। वे बार-बार श्री रामजी के चरण पकड़ते हैं, अपार प्रेम है, हृदय नहीं है॥2॥

    सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
    उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥3॥

    भावार्थ:- (विभीषणजी ने कहा-) हे भगवान! हे चराचर जगत के स्वामी! हे शरणागत के रक्षक! हे जो सबके दिल के अंदर जानता है! सुनो, पहले मेरे दिल में कुछ वासना थी। वह प्रभु के चरणों में प्रेम की नदी में बह गया॥3॥

    अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
    एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥4॥

    भावार्थ:- अब आप दयालु हैं! मुझे अपनी पवित्र भक्ति दीजिए, जो हमेशा शिवजी के मन को प्रिय लगती है। ) इवामस्तु ’(ऐसा ही हो) कहकर रणधीर प्रभु श्री रामजी ने तुरंत समुद्र का पानी माँगा।॥4॥

    जदपि सखा तव इच्छा नहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
    अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥5॥

    भावार्थ:- (और कहा-) हे मित्र! यद्यपि आप नहीं चाहते हैं, दुनिया में मेरी दृष्टि अचूक है (यह विफल नहीं है)। यह कहते हुए श्री रामजी ने उनका राज्याभिषेक किया। फूल आकाश से संग्रहित थे॥5॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
    जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥49क॥

    दोहा

    भावार्थ:- श्री रामजी, रावण की उग्र अग्नि में, जो उनके (विभीषण के) श्वास (शब्द) हवा से उखड़ रहे थे, ने जलते हुए विभीषण को बचाया और उन्हें एक अखंड राज्य दिया।॥49 (क)॥

    जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
    सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥49ख॥

    दोहा

    भावार्थ:- शिवजी ने जो संपत्ति रावण को दस सिर की बलि देने के लिए दी थी, श्री रघुनाथजी ने विभीषण को बहुत सुरक्षित रूप से दी।॥49 (ख)॥

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

    अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
    निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥1॥

    भावार्थ:- ऐसे दयालु भगवान को छोड़कर, जो मनुष्य दूसरों की पूजा करते हैं वे बिना सींग और पूंछ के जानवर हैं। अपने सेवक को जानकर विभीषण ने श्री रामजी को गोद ले लिया। भगवान का स्वभाव वानरकुल को बहुत (बहुत) प्रसन्न करने वाला है॥1॥

    पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
    बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥2॥

    भावार्थ:- तब श्री रामजी, जो सब कुछ जानते थे, सभी के दिल में बस गए, एक मानव बन गए (सभी रूपों में प्रकट हुए), सबसे रहित, उदासीन, भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए (राक्षसों को प्रसन्न करने के लिए) और राक्षसों के परिवार को नष्ट कर दिया। रक्षक के शब्द बोले-॥2॥

    17. समुद्र पार करने के लिए विचार, रावणदूत शुक का आगमन और लक्ष्मणजी के पत्र के साथ वापस आना

    Sunderkand Ka Path – Sundar Kand Ki Chaupai

    सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
    संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँति॥3॥

    भावार्थ:- हे वीर वानरराज सुग्रीव और लंकापति विभीषण! सुनो, इस गहरे समुद्र को कैसे पार करना है? कई जातियों के सांपों और मछलियों से भरा हुआ, समुद्र को पार करने के लिए सभी तरह से बेहद मुश्किल है।॥3॥

    कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
    जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥4॥

    भावार्थ:- विभीषणजी ने कहा- हे रघुनाथजी! सुनो, भले ही तुम्हारा एक तीर करोड़ों समुद्रों को सोखने वाला हो (हो सकता है), नीति में कहा गया है (यह उचित होगा) (पहले) जाओ और समुद्र से प्रार्थना करो॥4॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि॥
    बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥50॥

    दोहा

    भावार्थ:- हे भगवान! आपके परिवार में समुद्र बड़े (पूर्वज) हैं, वे विचार करेंगे और विचार देंगे। तब भालू और वानरों की पूरी सेना बिना परिश्रम के समुद्र पार कर जाएगी॥50॥

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Ka Path

    सखा कही तुम्ह नीति उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।
    मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥1॥

    भावार्थ:- (श्री रामजी ने कहा-) हे सखा! आपने एक अच्छा उपाय बताया। यह किया जाना चाहिए, अगर दैवीय रूप से मददगार। लक्ष्मणजी को यह सलाह पसंद नहीं आई। उन्हें श्री रामजी के वचन सुनकर बहुत दुख हुआ॥1॥

    नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
    कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥2॥

    भावार्थ:-(लक्ष्मणजी ने कहा-) हे नाथ! कौन दाएव पर भरोसा करता है! अपने मन में क्रोधित हो जाओ (इसे लाओ) और समुद्र को सुखा दो। यह दिव्य रूप कायर के मन का आधार है। आलसी लोग उन्हें दिन और दिन कहते हैं॥2॥

    सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
    अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥3॥

    भावार्थ:-यह सुनकर श्री रघुवीर हँसे और बोले – ऐसा करो, मन में धीरज रखो। भगवान श्री रघुनाथजी अपने छोटे भाई को यह समझाकर समुद्र के पास गए॥3॥

    प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
    जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥4॥

    भावार्थ:- उसने पहले अपना सर झुकाया। फिर कुश किनारे पर बैठ गया। जैसे ही विभीषणजी प्रभु के पास आए, रावण ने उनके पीछे दूत भेजे।॥4॥

    Sunderkand Path – दोहा

    सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
    प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥51॥

    दोहा

    भावार्थ:- उसने वानर के शरीर को कपट से धारण करके सारी लीलाएँ देखीं। वह अपने दिल में भगवान के गुणों और शरण के लिए स्नेह की सराहना करने लगा।॥51॥

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

     प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
    रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥1॥

    भावार्थ:- तब उन्होंने प्रकट रूप में भी श्री रामजी के स्वरूप को अत्यंत प्रेम से बढ़ाना शुरू कर दिया, वे दुर्वासा (भेष) को भूल गए। सभी बंदर जानते थे कि वे दुश्मन के दूत हैं और उन्होंने उन सभी को बांध दिया और उन्हें सुग्रीव के पास ले गए।॥1॥

    कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
    सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥2॥

    भावार्थ:- सुग्रीव ने कहा- सब वानर! सुनो, दैत्यों द्वारा दैत्यों को बाहर भेजो। सुग्रीव के वचन सुनकर वानर भागे। उसने दूतों को बांध दिया और उन्हें सेना के चारों ओर भगा दिया॥2॥

    बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
    जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥3॥

    भावार्थ:- वानरों ने उन्हें कई तरह से मारना शुरू कर दिया। उन्होंने दीनता दी और पुकारा, फिर भी वानरों ने उन्हें नहीं छोड़ा। (तब दूतों ने पुकारा और कहा-) जो कोई हमारी नाक और कान काटेगा, वह कोसलधाम रामजी पर बकाया है।॥ 3॥

    सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
    रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥4॥

    भावार्थ:- यह सुनकर लक्ष्मणजी ने सभी को पास बुलाया। उन्होंने बड़ी दया की, मुस्कुराते हुए और उन्होंने तुरंत राक्षसों को बचाया। (और उससे कहा-) रावण के हाथ में यह पत्र देना (और कहना-) हे हत्या! लक्ष्मण के शब्द (संदेश) बजाओ॥4॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
    सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥52॥

    दोहा

    भावार्थ:- फिर उस मूर्ख से मेरी उदार (कृपा से भरी) बात कहने के लिए कहें कि सीता जी को उससे मिलने के लिए (श्री रामजी) से, अन्यथा तुम्हारा समय आ गया है (समझो)॥52॥

    Sunderkand Ka Path – Sundar Kand Ki Chaupai

    तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
    कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥1॥

    भावार्थ:- लक्ष्मणजी के चरणों में दूत तुरंत चले गए, श्री रामजी के गुणों की कथा सुनाकर, सिर नवाकर। श्री रामजी की ख्याति कहते हुए वे लंका आए और उन्हें रावण के चरणों में सिर नवाया।॥1॥

    बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
    पुन कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥2॥

    भावार्थ:- दशमुख रावण ने हंसकर पूछा – शुक! आप अपना कुशल क्यों नहीं कहते? फिर उस भाग्य की खबर सुनी, मृत्यु जो बहुत करीब आ गई है॥2॥

    करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी॥
    पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥3॥

    भावार्थ:- मूर्ख ने शासन करते हुए लंका को त्याग दिया। दुर्भाग्य से, यह अब जौ का कीड़ा (घुन) बन जाएगा (जैसा कि घुन भी जौ के साथ काटा जाता है, इसलिए इसे नर वानरों के साथ मार दिया जाएगा), फिर भलु और वानरों की सेना की स्थिति कहें, जो यहां के साथ चले गए कठिन समय की प्रेरणा। आ गया॥3॥

    जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
    कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥4॥

    भावार्थ:- और जिनका जीवन एक कोमल मन (यानी) के साथ एक गरीब समुद्र बन गया है, अगर उनके और राक्षसों के बीच कोई समुद्र नहीं था, तो अब तक राक्षसों ने उन्हें मार डाला और खा लिया। फिर मुझे उन तपस्वियों के बारे में बताइए जिनके मन में बहुत भय है।॥4॥

    18. दूत रावण को मना लेता है और लक्ष्मणजी का पत्र देता है – Sundar Kand in Hindi

    Sunderkand Path – दोहा

    की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
    कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ॥53॥

    दोहा

    भावार्थ:- क्या आप उससे मिले थे या वह मेरे सुयश को कानों से सुनकर लौटा था? दुश्मन सेना की ताकत और ताकत क्यों नहीं कहता है? आपका मन बहुत हैरान है॥53॥

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Ka Path

    नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
    मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥1॥

    भावार्थ:- (दूत ने कहा-) हे नाथ! बस क्रोध को छोड़ दो और मेरी आज्ञा मानो जैसे तुमने मुझसे पूछा है (मेरा विश्वास करो)। जब आपके छोटे भाई श्री रामजी से मिले, तो श्री रामजी ने पहुँचते ही उनका राज्याभिषेक किया॥1॥

    रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हें दुख नाना॥
    श्रवन नासिका काटैं लागे। राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥2॥

    भावार्थ:- हम रावण के दूत हैं, कानों से यह सुनकर, बंदरों ने हमें बांध दिया और हमें बहुत दर्द दिया, यहां तक कि वे हमारी नाक और कान काटने लगे। उन्होंने हमें श्री रामजी की शपथ पर कहीं छोड़ दिया॥2॥

    पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
    नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥3॥

    भावार्थ:- हे नाथ! आपने श्री रामजी की सेना से पूछा, तो इसका वर्णन सौ करोड़ चेहरों के साथ भी नहीं किया जा सकता है। कई रंगों के भालू और वानरों की एक सेना है, जो भयंकर-से, विशाल शरीर वाले और भयानक हैं।॥3॥

    जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
    अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥4॥

    भावार्थ:- जिसने शहर को जला दिया और आपके बेटे अक्षय कुमार को मार डाला, वह सभी वानरों के बीच बहुत कम ताकत है। असंख्य नामों के साथ बहुत कठिन और भयंकर योद्धा हैं। उनके पास असंख्य हाथियों की शक्ति है और वे विशाल हैं॥4॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
    दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥54॥

    दोहा

    भावार्थ:- द्विवेदी, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकासस्य, दधिमुख, केसरी, निष्ठा, शत और जाम्बवान ये सभी बल हैं।॥54॥

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

    ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
    राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥1॥

    भावार्थ:- ये सभी बंदर बल में सुग्रीव की तरह हैं और उनकी तरह करोड़ों (एक या दो नहीं) हैं, जो उन लोगों की गिनती बहुत कम कर सकते हैं। श्री रामजी की कृपा से उनके पास एक अतुलनीय बल है। वे तीनों लोकों को मानते हैं जैसे (तुच्छ)॥1॥

    अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
    नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥2॥

    भावार्थ:- हे दशग्रीव! मैंने अपने कानों से सुना है कि अठारह पद्म अकेले बंदरों के सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेना में कोई भी बंदर नहीं है, जो आपको युद्ध में जीत न सके॥2॥

    परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
    सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥3॥

    भावार्थ:- हर कोई अत्यधिक क्रोध के साथ हाथ बंटाता है। लेकिन श्री रघुनाथजी उन्हें आज्ञा नहीं देते। हम समुद्र को मछलियों और सांपों से भिगो देंगे। अन्यथा, वे इसे बड़े पहाड़ों से भर देंगे।॥3॥

    मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
    गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥4॥

    भावार्थ:- और रावण को कुचलकर धूल में मिला देगा। सभी बंदर इसी तरह के शब्द कह रहे हैं। सभी प्रवृत्तियाँ निर्भय हैं, इस प्रकार गरजती है और डांटती है मानो लंका को निगल जाना चाहती हो॥4॥

    Sunderkand Path – दोहा

    सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
    रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥55॥

    दोहा

    भावार्थ:- सभी वानर और भालू आसानी से शूरवीर हैं और फिर उनके सिर पर भगवान राम (सर्वेश्वर) श्री रामजी हैं। हे रावण! वे युद्ध में करोड़ों बार जीत सकते हैं॥55॥

    Sunderkand Ka Path – Sundar Kand Ki Chaupai

    राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
    सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥1॥

    भावार्थ:- लाखों लोग श्री रामचंद्रजी की शक्ति (सामर्थ्य), बल और बुद्धि की अधिकता को नहीं गा सकते। वे एक ही तीर से सैकड़ों समुद्र भिगो सकते हैं, लेकिन नीति के एक गुरु श्री रामजी ने आपके भाई से एक उपाय पूछा (नीति की रक्षा के लिए)।॥1॥

    तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
    सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥2॥

    भावार्थ:- उनके (आपके भाई के) कथन सुनकर, वह (श्री रामजी) समुद्र से रास्ता पूछ रहे हैं, उनके मन में भी दया है (इसलिए वे उन्हें भिगोते नहीं हैं)। दूत की बातें सुनकर रावण बहुत हंसा (और कहा-) जब उसके पास ऐसी बुद्धि है, तब उसने वानरों को मददगार बना दिया है!॥2॥

    सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥
    मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥3॥

    भावार्थ:- स्वाभाविक रूप से, कायर विभीषण के वचन के प्रमाण से, उसने समुद्र (तिल) को निर्धारित किया है। अरे मूर्ख! झूठे डींग क्या करता है? बस, मुझे शत्रु की शक्ति और ज्ञान मिल गया (राम)॥3॥

    सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥
    सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥4॥

    भावार्थ:- सुनील खल बचन दूत सामे बिचारी पत्रिका कढ़ी निकली॥4॥

    रामानुज दीन्हीं यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
    बिहसि बाम कर लीन्हीं रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥5॥

    भावार्थ:- (और कहा-) श्री रामजी के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पत्रिका दी है। हे नाथ! इसे बचाएं और छाती को ठंडा करें। रावण हंसा और उसे अपने बाएं हाथ से ले गया और मंत्री को बुलाने के बाद, मूर्ख ने उसे वितरित करना शुरू कर दिया।॥5॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
    राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥56क॥

    दोहा

    भावार्थ:- (पत्रिका में लिखा गया था-) अरे मूर्ख! केवल बात करके अपने मन को भ्रष्ट करके अपने परिवार को नष्ट न करें। आप श्री रामजी का विरोध करके विष्णु, ब्रह्मा और महेश की शरण में जाने के बाद भी नहीं बचेंगे।॥56 (क)॥

    की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
    होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥56ख॥

    दोहा

    भावार्थ:- या तो अभिमान छोड़ दो और अपने छोटे भाई विभीषण की तरह भगवान के चरण कमलों की गलतफहमी बन जाओ। या हे दुष्ट! श्री रामजी के रूप में अग्नि में, अपने परिवार के साथ पतंगा (दोनों की आवाज़ अच्छी है) पर जाएँ॥56 (ख)॥

    Sundar Kand Ki Chaupai – Sunderkand Ka Path

    सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
    भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥1॥

    भावार्थ:- पत्रिका सुनते ही रावण मन में भयभीत हो गया, लेकिन उसके चेहरे से (ऊपर से) मुस्कुराते हुए उसने सबको सुना और कहने लगा – जैसे कोई पृथ्वी पर पड़े हाथ से आकाश को पकड़ने की कोशिश करता है, वैसे ही यह छोटा तपस्वी (लक्ष्मण) वाग्विलास करता है (डींग मारने)॥1॥

    कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
    सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥2॥

    भावार्थ:- शुक (दूत) ने कहा- हे नाथ! अभिमानी प्रकृति (इस पत्र में लिखे गए) को छोड़कर, सब कुछ सच मानें। क्रोध को जाने दो और मेरा वचन सुनो। हे नाथ! श्री रामजी से घृणा का त्याग करें॥2॥

    अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
    मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥3॥

    भावार्थ:- यद्यपि श्री रघुवीर सभी लोकों के स्वामी हैं, उनका स्वभाव बहुत ही कोमल है। जैसे ही आप इसे प्राप्त करेंगे भगवान आपके प्रति दयालु होंगे और वह आपके किसी भी अपराध को अपने दिल में नहीं रखेंगे॥3॥

    जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
    जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥4॥

    भावार्थ:- जानकीजी को श्री रघुनाथजी को दे दो। हे भगवान! मुझे यह बताइए जब उन्होंने (दूत) जानकीजी को देने के लिए कहा, तो दुष्ट रावण ने उन्हें लात मारी।॥4॥

    नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
    करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥5॥

    भावार्थ:- वह भी (विभीषण की तरह) अपने पैरों से अपने पैरों में चल पड़ा, जहाँ श्री रघुनाथजी दयालु थे। उन्होंने प्रणाम किया और अपनी कहानी सुनाई और श्री रामजी की कृपा से उनकी गति (मुनि का रूप) प्राप्त कर ली।॥5॥

    रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
    बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥6॥

    भावार्थ:- (शिव कहते हैं-) हे भवानी! वह एक विद्वान साधु थे, जो अगस्त्य ऋषि के शाप से उत्पन्न हुए थे। बार-बार श्री रामजी के चरणों का पाठ करने के बाद, वह ऋषि उनके आश्रम में गए।॥6॥

    19. समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध और समुद्र की याचना, श्री राम की स्तुति की महिमा

    sunderkand ka path
    समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध

    Sunderkand Path – दोहा

    बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
    बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥

    दोहा

    भावार्थ:- यहां तीन दिन बीत चुके हैं, लेकिन जड़ सागर सहमत नहीं है। तब श्री रामजी क्रोध से बोले – बिना भय के कोई प्रेम नहीं होता!॥57॥

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

    लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
    सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपन सन सुंदर नीति॥1॥

    भावार्थ:- हे लक्ष्मण! धनुष और बाण लाओ, मैं समुद्र को अग्नि से भिगो देता हूँ। मुर्ख से भयावह, मनहूस से प्रेम, स्वाभाविक रूप से कंजूस सुंदर नीति (उपदेश उदारता),॥1॥

    ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
    क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥2॥

    भावार्थ:- ममता में फंसे एक आदमी से ज्ञान की कहानी, बड़ी व्यग्रता के साथ विरक्ति का वर्णन, क्रोध के साथ शमी (शांति) की बात, और कामी से भगवान की कहानी, का वैसा ही फल है जैसा कि ओसार (ओसार में) ) जैसे बीज बोना, यह सब व्यर्थ हो जाता है)॥2॥

    अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
    संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥3॥

    भावार्थ:- यह कहते हुए श्री रघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह राय लक्ष्मणजी के मन के लिए बहुत अच्छी थी। प्रभु ने भयंकर (अग्नि) बाण चलाए, जिससे समुद्र के हृदय के भीतर अग्नि की ज्वाला फैल गई॥3॥

    मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
    कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥4॥

    भावार्थ:- हालांकि, सांप और मछली के समूह परेशान थे। जब समुद्र ने प्राणियों को जलाया, तब सोने की थाली में कई रत्नों (रत्नों) को भरने के बाद, उन्होंने अभिमान छोड़ दिया और ब्राह्मण बनकर आए।॥4॥

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
    बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥58॥

    दोहा

    भावार्थ:- (काकभुशुंडिजी कहते हैं-) हे गरुड़! सुनो, चाहे जितने उपायों से सिंचाई की जाए, लेकिन केला काटने के बाद ही बढ़ता है। नीच विनय का पालन नहीं करता, वह फटकार लगाता है (रास्ते में आता है)॥58॥

    सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।
    गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥1॥

    भावार्थ:- समुद्र ने घबराकर प्रभु के चरण पकड़ लिए और कहा – हे नाथ! मेरे सभी अवगुणों (दोषों) को क्षमा करो। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी – ये सभी प्रकृति द्वारा निहित हैं॥1॥

    तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
    प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥2॥

    भावार्थ:- आपकी प्रेरणा से, माया ने उन्हें सृष्टि के लिए बनाया, यही सभी ग्रंथों ने गाया है। जिसके लिए, जैसा कि मालिक ने आज्ञा दी है, उसे उसी तरह जीने में आनंद मिलता है।॥2॥

    प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
    ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥3॥

    भावार्थ:- प्रभु ने अच्छा किया है जिसने मुझे शिक्षा (दंड) दी, लेकिन मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी है। ढोल, गदर, शूद्र, पशु और स्त्री – ये सभी शिक्षा के हकदार हैं॥3॥

    प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
    प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥4॥

    भावार्थ:- मैं प्रभु की महिमा से सूख जाऊंगा और सेना पार हो जाएगी, इसमें मेरी कोई प्रशंसा नहीं है (मैं जीवित नहीं रहूंगा)। हालाँकि, प्रभु की आज्ञा उदासीन है (अर्थात, आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है)। अब तुम जो चाहो, मुझे तुरंत करने दो॥4॥

    Sunderkand Path – दोहा

    सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
    जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥59॥

    दोहा

    भावार्थ:- समुद्र के अत्यंत कृपापूर्ण वचन सुनकर श्री रामजी मुस्कुराए और बोले – हे तात! जैसे-जैसे बंदरों की सेना पार होती है, मुझे इसका समाधान बताइए॥59॥

    Sundar Kand Ramayan – Sunderkand Ka Path

    नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
    तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥1॥

    भावार्थ:- (समुद्र ने कहा)) हे नाथ! नील और नल दो बंदर भाई हैं। उन्हें बचपन में एक ऋषि का आशीर्वाद प्राप्त था। उनके स्पर्श मात्र से ही भारी पहाड़ भी आपकी महिमा के साथ समुद्र पर तैरने लगेंगे।॥1॥

    मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
    एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥2॥

    भावार्थ:- मैं अपने हृदय में प्रभु की प्रभुता भी धारण करूँगा और अपनी सामर्थ्य के अनुसार (जहाँ तक मैं कर सकता हूँ) मदद करूँगा। हे नाथ! समुद्र को इस तरह से बांधें, कि आपकी सुंदर ख्याति तीनों लोकों में गाई जा सके।॥2॥

    एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
    सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥3॥

    भावार्थ:- इस तीर से मेरे उत्तरी तट पर रहने वाले पाप के बुरे लोगों का वध होगा। समुद्र की पीड़ा सुनकर कृपालु और रणधीर श्री रामजी ने उसे तुरंत पराजित किया (अर्थात, उन दुष्टों को बाणों से मार डाला)।॥3॥

    देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
    सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥4॥

    भावार्थ:- श्री राम के विशाल बल और साहस को देखकर समुद्र खुश और प्रसन्न हो गए। उसने उन दुष्टों का पूरा चरित्र भगवान को बताया। फिर पैरों की पूजा करके समुद्र में चला गया॥4॥

    निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
    यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
    सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
    तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

    छंद 

    भावार्थ:- समुंद्र अपने घर गया, श्री रघुनाथजी को यह विचार (उसकी सलाह) पसंद आया। यह चरित्र कलियुग के पापों को हरने वाला है, तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार इसे गाया है। श्री रघुनाथजी के गुण सुख के वास हैं, संदेह का नाश करने वाले और अवसाद का शमन करने वाले हैं। अरे मूर्ख मन! आप दुनिया की सभी आशा और विश्वास को त्याग देते हैं और गाते हैं और उन्हें लगातार सुनते हैं।

    Sunderkand Ka Path – दोहा

    सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
    सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥60॥

    दोहा

    भावार्थ:- श्री रघुनाथजी की स्तुति संपूर्ण सुंदर वनों को करना है। जो लोग इसे सम्मान के साथ सुनेंगे, वे भवसागर को बिना किसी जहाज (अन्य साधनों) के अनुमति देंगे।॥60॥

    मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
    इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पंचमः सोपानः समाप्तः।


    कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले श्री रामचरित मानस का यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ।


    (सुंदरकाण्ड समाप्त)

    जय श्री राम। जय बजरंगबली। 

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  • Hanuman Ji Ke Totke – बजरंगबली के चमत्कारी टोट्के
  • कहा जाता है कि बजरंगबली की पूजा करने से भक्तों का हर संकट दूर हो जाता है और उनके दुख-दर्द दूर हो जाते हैं। मंगलवार और शनिवार को हनुमानजी का दिन कहा जाता है। कहा जाता है कि इस दिन पीपल की पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होती है, जबकि हनुमानजी आपको आशीर्वाद देते हैं। Hanuman Ji Ke Totke का पालन करने से आपको सद्भोधि और मन की शांति प्राप्त होती है और जीवन में सफलता की राह आसान हो जाती है।

    मंगलवार को हनुमान की पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि बजरंगबली अपने भक्तों को प्रसन्न करते हैं और सभी कष्टों को हर लेते हैं और उन पर अपनी कृपा दिखाते हैं। मंगलवार के दिन कई उपाय और टोटके भी बताए गए हैं, जिन्हें बीच में न करने से व्यक्ति के जीवन में खुशियां लौट आती हैं। इसलिए आज हम आपको बता रहे हैं कि मंगलवार के दिन ऐसा उपाय अपनाने से आपके सारे कष्ट मिट जाएंगे। मंगलवार को हनुमान का दिन माना जाता है। लेकिन यह दिन गणेश जी के लिए भी शुभ माना जाता है। कर्ज से मुक्ति के लिए यह दिन सबसे अच्छा माना जाता है। कहा जाता है कि मंगलवार के दिन किए जाने वाले आसान उपायों को धन के साथ-साथ मानसिक शांति के लिए भी अच्छा माना जाता है। हनुमान जी कलयुग में सबसे सक्रिय देवताओं में से एक हैं।

    Hanuman Ji Ke Totke करें तो यह सावधानी ज़रूर बरतें।

    सच्चे मन से हनुमान जी के टोटकों / उपायों पर विश्वास करें और पूरी पवित्रता के साथ करें तभी वह सफल होंगे।

    इलाज से मुक्ति के लिये हनुमान जी के टोटके / उपाय

    1. मंगलवार के दिन पूरे पानी के साथ एक नारियल लें और इसे रोगी के सिर पर 21 बार प्रयोग करें और भगवान हनुमान के मंदिर की आग में जला दें।
    2. हनुमान जी की मूर्ति के सिर का सिंदूर सीधे हाथ के माथे से लेकर माता सीता के चरणों में लगाएं।

    कर्ज से मुक्ति के लिए – Hanuman Ji Ke Totke

    1. एक नारियल पर लाल चंदन से स्वस्तिक बनाएं और उसे हनुमान मंदिर में हनुमान को अर्पित करें और उनके सामने ऋणी मंगल स्तोत्र का पाठ करें।

    धन की प्राप्ति के लिए – हनुमान जी के टोटके

    1. रात को सोते समय हनुमान जी की तस्वीर के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं और हनुमान चालीसा पढ़ें।
    2. हनुमान जी अपने घर की उत्तर दिशा की दीवार पर एक चित्र टांगेंगे, ताकि उनका चेहरा दक्षिण की ओर हो, और उस चित्र की प्रतिदिन पूजा करें।
    3. हर मंगलवार / शनिवार को हनुमान मंदिर जाएं और हनुमान जी को केले का पान चढ़ाएं
    4. हर मंगलवार / शनिवार को हनुमान मंदिर में जाकर 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें

    यदि कोई भक्त तंत्र शास्त्र के अनुसार वर्णित अनुशासन के तहत ईमानदारी से तरीके का पालन करता है और भक्ति में पर्याप्त भक्ति है, तो निश्चित रूप से भगवान हनुमान के दर्शन उनके सपने में मिल सकते हैं। आइए आपको बताते हैं तंत्र शास्त्र के वो उपाय जो भगवान हनुमान देख सकते हैं। आप इन उपायों को किसी भी मंगलवार को शुरू कर सकते हैं। मंगलवार को भगवान हनुमान का दिन माना जाता है। इस दिन हनुमानजी के भक्त पूरी श्रद्धा के साथ उनकी पूजा करते हैं। मंगलवार के अलावा आप इस उपाय को हनुमान जयंती पर भी कर सकते हैं। इस दिन को सबसे अच्छा माना जाता है।

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  • Panchmukhi Hanuman Kavach Mantra Story and Benefits
  • Panchmukhi Hanuman Kavach सबसे शक्तिशाली यंत्रों में से एक है। पंचमुखी हनुमान की नियमित पूजा से भक्त को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है। Panchmukhi Hanuman Ji Kavach व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जाओं और प्रभावों से बचाता है। यह बुरी नजर और काले जादू से भी बचाता है। पंचमुखी कवच सभी वास्तु दोषों को भी दूर करता है और सूर्य, मंगल और शनि के प्रयास को निर्दिष्ट करता है। सूर्य, मंगल और शनि (महादशा और अंतरदशा) से पीड़ित लोगों को भी Panchmukhi Hanuman Kavach नियमितता की पूजा करनी चाहिए। यह ढाल दुर्घटनाओं और दुर्घटनाओं से सुरक्षा प्रदान करती है और आपकी यात्रा को सुरक्षित और सुरक्षित बनाती है। इस प्रकार, Panchmukhi Hanuman Ji Kavach एक दिव्य यंत्र है जो संपूर्ण आनंद प्रदान करता है, सभी बीमारियों, खतरों, दुर्भाग्य से बचाता है, सभी उपक्रमों में सफलता प्रदान करता है, और सभी बाधाओं को दूर करता है जो सफलता के मार्ग में बाधा डालते हैं और आध्यात्मिकता को भी बढ़ाते हैं।

    श्री पंचमुखी हनुमान कवच
    श्री गणेशाय नम:।
    ओम अस्य श्रीपंचमुख हनुम्त्कवचमंत्रस्य ब्रह्मा रूषि:।
    गायत्री छंद्:।
    पंचमुख विराट हनुमान देवता। ह्रीं बीजम्।
    श्रीं शक्ति:। क्रौ कीलकम्। क्रूं कवचम्।
    क्रै अस्त्राय फ़ट्। इति दिग्बंध्:।
    श्री गरूड उवाच्।।
    अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि।
    श्रुणु सर्वांगसुंदर। यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमत्: प्रियम्।।१।।
    पंचकक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम्।बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिध्दिदम्।।२।।
    पूर्वतु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम्। दंष्ट्राकरालवदनं भ्रुकुटीकुटिलेक्षणम्।।३।।
    अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम्। अत्युग्रतेजोवपुष्पंभीषणम भयनाशनम्।।४।।
    पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुण्डं महाबलम्।सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम्।।५।।
    उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दिप्तं नभोपमम्।पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम्।ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम्। येन वक्त्रेण विप्रेन्द्र तारकाख्यमं महासुरम्।।७।।
    जघानशरणं तस्यात्सर्वशत्रुहरं परम्।ध्यात्वा पंचमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम्।।८।।
    खड्गं त्रिशुलं खट्वांगं पाशमंकुशपर्वतम्। मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुं।।९।।
    भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रा दशभिर्मुनिपुंगवम्। एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम्।।१०।।
    प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरण्भुषितम्। दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानु लेपनम सर्वाश्चर्यमयं देवं हनुमद्विश्वतोमुखम्।।११।।
    पंचास्यमच्युतमनेकविचित्रवर्णवक्त्रं शशांकशिखरं कपिराजवर्यम्। पीताम्बरादिमुकुटै रूप शोभितांगं पिंगाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि।।१२।।
    मर्कतेशं महोत्राहं सर्वशत्रुहरं परम्। शत्रुं संहर मां रक्ष श्री मन्नपदमुध्दर।।१३।।
    ओम हरिमर्कट मर्केत मंत्रमिदं परिलिख्यति लिख्यति वामतले। यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं यदि मुंच्यति मुंच्यति वामलता।।१४।।
    ओम हरिमर्कटाय स्वाहा ओम नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारकाय स्वाहा।
    ओम नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाया।
    ओम नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गरूडाननाय सकलविषहराय स्वाहा।
    ओम नमो भगवते पंचवदनाय उत्तरमुखाय आदिवराहाय सकलसंपत्कराय स्वाहा।
    ओम नमो भगवते पंचवदनाय उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशकराय स्वाहा।
    मूल मंत्र : इस कवच का मूल मंत्र है : ॐ श्री हनुमंते नमः

    Panchmukhi Hanuman Kavach Story

    यह कवचम हनुमान के इस उग्र रूप को संबोधित करता है। यह कावक्रम एक भजन नहीं है, बल्कि एक तांत्रिक मंत्र है जिसका उद्देश्य मंत्र को सुरक्षा प्रदान करना है। कुछ लोगों का मानना ​​है कि इस नारे का पाठ नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि पांच मुख वाले हनुमान की पूजा की जानी चाहिए। स्तोत्र के अंत में लिखा है कि यह राम द्वारा सीता को उनके अनुरोध के अनुसार सिखाया गया था। लेकिन पहली कुछ पंक्तियों से पता चलता है कि यह एक संस्करण गरुड़ द्वारा पढ़ाया गया था, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया है कि यह भगवान के भगवान द्वारा बनाया गया था।

    ओम अस्य श्री पंच मुखा हनुमथ कवच महा महाश्री ब्रह्मा ऋषि, गायत्री चंदा, पंच मुखी विराट हनुमान देवता, ह्रीम भजेम श्रीराम शक्ति, कूर्म कीलकम, क्रुम कवचम, क्रियाम् अष्टम चरणम्।

    पाँच हनुमान का सामना करने वाले महान कवच के कवच के लिए ओम, ऋषि ब्रह्मा हैं, गायत्री मीटर है, देवता को संबोधित है रीगल पांच हनुमान का सामना किया है, हरेम जड़ है, सीरम शक्ति है, क्रुम कील है। किरम कवच है और करीम तीर है। इस तरह सभी दिशाएँ बंध जाती हैं।

    यह भी पढ़े: पंचमुखी हनुमान जी की कहानी और मंत्र।

    Panchmukhi Hanuman Kavach मंत्र हिंदी में अर्थ।

    ओम अस्य श्री पंच मुखा हनुमथ कवच महा मानवश्री ब्रह्मा ऋषि, गायत्री चंदा, पंच मुखी विराट हनुमान देवता, ह्रीं भजेम् श्रीम् शक्ति, कूर्म कीलकम्, क्रूम कवचम्, क्रियम् अस्त्राय फा। इति दिग्बन्दा

    पाँच हनुमान का सामना करने वाले महान कवच के कवच के लिए ओम, ऋषि ब्रह्मा हैं, गायत्री मीटर है, देवता को संबोधित है रीगल पांच हनुमान का सामना किया है, हरेम जड़ है, सीरम शक्ति है, क्रुम कील है। किरम कवच है और करीम तीर है। इस तरह सभी दिशाएँ बंध जाती हैं।

    आद्या ध्यानम् स्तवक्ष्मी, श्रुणु सर्वगंगा सुन्दरी,
    यत् क्रतुम देव दीवान धीमानं हनुमंथा प्रियम्। १

    मैं अब ध्यान मंत्र का पाठ कर रहा हूं, ओह सुंदर महिला,
    भगवान के भगवान द्वारा बनाया गया है और हनुमान द्वारा प्यार किया है,

    पंच वक्त्रम महा भीम, त्रिपंच नयनार युतम,
    बाहुभिर दशबीर युकथम, सर्व कामार्थ सिद्धिधाम। २

    जिसके पाँच मुख हैं, जो बहुत स्थूल है, जिसकी पंद्रह आँखें थीं,
    और दस हाथ थे और सभी इच्छाओं को पूरा करेगा।

    पुरवम थ्व वनाराम वक्त्रम, कोटि सोर्या सम प्रभाम,
    द्वादशांत करोति वदनम्, ब्रुकुटि कुटीलक्षणम् त्र। ३

    पूर्व में अरबों सूर्यों की महिमा के साथ बंदर का चेहरा है,
    उभरे हुए दांतों वाले काले चेहरे में, जो घुमावदार और गुस्से में होता है।

    अस्येव दक्षिणम् वक्त्रम् नरसिम्हम महाधुतम्,
    अथयुग्रह वपुश्मं भेषं भासं नश्यम् जो। ४

    दक्षिण में बहुत ही अद्भुत नरसिंह का चेहरा है,
    जो बहुत गंभीर है, ईश्वर भयभीत है और भय का नाश करने वाला है।

    पशिचम गरुड़म वक्त्रम वक्र थंडम महाबलम,
    सर्व नाग प्रणामं विष्टि भूतिधि कुरुन्दनम् अस। ५

    पश्चिम में एक बहुत मजबूत गरुड़ का चेहरा है, जिसके पास एक घुमावदार चोंच है,
    वह जो सभी साँपों को वश में करता है और जो विष और भूतों को दूर करता है

    उतराम स्मरकम् वक्त्रम् कृष्णम् धम्मं नंबोपमम्,
    पाताल सिह वेताल जग रागधि क्रांतिम

    उत्तर की ओर एक सूअर का चेहरा है, जो काला है, चमक रहा है और आकाश के बराबर है,
    और जो अंडरवर्ल्ड, शेर, भूत, बुखार और बीमारी को दूर करता है।

    और्ववम हनननम घोरम दानवन्थकरम परम,
    यं वक्त्रेण विप्रेंद्रम् तारकमयं महानं शरणम् त्यागम्

    सबसे ऊपर घोड़े का डरावना चेहरा है, जो असुरों को नष्ट करता है,
    किस चेहरे का उपयोग करके, ब्राह्मणों के प्रमुख ने थरका नाम के महान असुर को मार डाला।

    जगण सरनम थसयथ सरव सतरु हरम परम,
    ध्यथ्वा पञ्च मुखम् रुद्रम हनुमंथम् ध्या निदिम्।

    दयालु और क्रोधी हनुमान का ध्यान करते हुए,
    जागने के तुरंत बाद और उसके सामने आत्मसमर्पण कर दिया,
    सभी शत्रुओं का अंत कर मोक्ष की ओर ले जाएगा।

    अंगम त्रिशूलम, गदवांगम, पसम अंगुसुम परवथम,
    मुष्टिम्, कौमोदकिम् द्रुक्शम दार्यन्थम कमंडलम्।, ९

    बिन्दीपालम् ज्ञान मुद्राम दशभिर मुनि पुंगवम्,
    यत्नाययुधं जालानि धर्यन्ता भजाम्यहम् १०

    मैं महान ऋषि के बारे में गाता हूं जो अपने अंगों से लैस है,
    त्रिशूल, तलवार, रस्सी, बकरी, पहाड़, मुट्ठी,
    गदा, पेड़ और पानी के बर्तन को पकड़े हुए,
    सुरक्षा के संकेत और अपने दस हाथों में ज्ञान भी।

    प्रथासनोपविंशतं तं सर्वभरणं भूतहितम्,
    दिव्य मालाम्बरधाम, दिव्य गणानुलेपनम्,
    सर्वेषां मयम् देवम् हनुमथ विस्वथो मुखम् ११

    हनुमान जो अपने सार्वभौमिक चेहरे के साथ बहुत आश्चर्यचकित करते हैं,
    एक लाश पर बैठता है, सभी प्रकार के गहने पहनता है,
    एक दिव्य माला पहनता है और दिव्य मलहम के साथ खुद को इंगित करता है।

    पंचश्याम अच्युतम मेनका विचित्रा वर्णम्,
    वक्त्रम ससंगा शिकारम कपि राज भिन्नम,
    पीतभद्रादि मकुतेर अप शोभितंगम्,
    पिंगक्षमध्यमानिसम् मनसा स्मरामि।, १२

    मैं मानसिक रूप से उसका ध्यान करता हूँ, जिसके विष्णु के पाँच मुख हैं,
    जिसके पास बहुरंगी और विविध चेहरे हैं,
    सभी बंदरों द्वारा सम्मानित शीर्ष कौन था,
    जो पीले रेशम में चमकता है जिसे वह अपने सिर पर बांधता है,
    जिसके पास लाल आँखें हैं और जो हमेशा पहली है।

    मरकटिसम महोत्सहम सरवा शतरु हरम परम,
    शत्रुम् समरा मम रक्ष सिमन आपद उधारा।, १३

    हे वानर देवता जो अतिउत्साही हैं और जो अपने सभी शत्रुओं का नाश करते हैं
    कृपया मेरे सभी दुश्मनों को मारकर मुझे बचाएं, हे भगवान जो लोगों को खतरे से बचाता है।

    ओम हरिमारकता मन्त्र मन्त्रमिदम्, परिलक्षि लिहयति वम तले,
    यदी नस्यति नास्ति शत्रु कुलम्, यदी मुच्यति मुच्यति वामा लट्।, १४

    ओम, यदि विष्णु के बन्दर का यह दिव्य जप, विष्णु का बन्दर बाईं ओर लिखा जाता है, तो दुश्मन नष्ट हो जाएंगे, नष्ट हो जाएंगे और इसके विपरीत पहलुओं को क्षमा कर दिया जाएगा, क्षमा कर दिया जाएगा।

    ओम ह्रीं निशानाय स्वाहा

    विष्णु के वानर को अग्नि में मेरा प्रसाद ओम

    ओम नमो भगवते पंच वदनया पूरव कपिमुखाय शक् त शत्रु समाहाराय स्वाहा

    अग्नि के माध्यम से ओम को मेरे प्रसाद को पाँच सामना करना पड़ा, जिसके पूर्व की ओर बंदर का चेहरा है और वह भगवान जो हमारे सभी शत्रुओं का नाश करता है।

    ओम नमो भगवते पंचे वदनाय दक्षिणाय मुक्, करला वदनाया, नरसिम्हाय साकलं भूतं प्रमाधनाय स्वाहा

    पांच अग्नि के माध्यम से ओम को मेरे प्रसाद ने भगवान का सामना किया, जिनके दक्षिण की ओर नरसिंह का काला चेहरा है और सभी प्राणियों को पीड़ा पहुंचाने वाले भगवान को।

    ओम् नमो भगवते पंचे वदनाय, पश्यति मुखाय गरुड़ाननया सकलं हरः स्वाहा।

    पाँच अग्नि के माध्यम से ओम को मेरे प्रसाद का सामना करना पड़ा, जिसमें पश्चिम की तरफ गरुड़ का चेहरा है और सभी प्रकार के जहर को ठीक करने वाले भगवान को।

    ओम नमो भगवते पञ्च वदनाय, उतारा मुखाय आधि वाराह्य, साकल सम्पथकाराय स्वाहा।

    पाँच अग्नि के माध्यम से ओम को मेरे प्रसाद का सामना करना पड़ा, जिसके पास प्रधान वरदान का चेहरा है और जो सभी प्रकार के धन के साथ आशीर्वाद देता है।

    ओम नमो भगवते पञ्च वदनाय, उर्ध्व मुखाय, हयग्रीवै, सकलं जनसंस्काराय स्वाहा।

    पांच अग्नि के माध्यम से ओम को मेरा प्रसाद भगवान का सामना करना पड़ा जिनके पास भगवान हयग्रीव (घोड़े) का चेहरा है और सभी प्राणियों को आकर्षित करने वाले भगवान को।

    ओम अस्य श्री पंच हनुमान महामंत्र, श्री रामचंद्र ऋषि, अनुष्टुप चंदा, पंच मुखी वीरा हनुमान देवता,
    हनुमंथि भीजम, वायु पुत्रा इति शक्ती, अंजनी सुथा इति कीलकम,
    श्री राम धूता हनुमथ प्रसादा सिधार्थे जपे विनियोग। इति ऋष्याधिका विन्यासथ।

    ओम ने हनुमान का सामना करने के लिए पांच जप किए, ऋषि भगवान रामचंद्र हैं, मीटर अनुष्टुप हैं, संबोधित भगवान पांच हनुमान हैं, जड़ हनुमान हैं, शक्ति पवन देवता का पुत्र है, नाखून का पुत्र है अंजना, और जाप हनुमान को खुश करने के लिए किया जा रहा है जो श्री राम के दूत हैं। इस प्रकार ऋषि से शुरू होने वाले पूर्वाग्रहों को करते हैं।

    यह भी पढ़े : हनुमान चालीसा सम्पूर्ण हिंदी में अर्थ क साथ।

    Panchmukhi Hanuman Ji Kavach मंत्र की विधियां।

    panchmukhi hanuman kavach benefits

    हाँथो से करने वाले जाप।

    ओम अंजनी सुताय अंगुष्ठाभ्याम नमः
    ओम् रुद्रं मृथाये थार्जन्यभ्याम नमः
    ओम वायु पुष्टाय मध्यमाभ्याम्
    ओम अग्नि गर्भाय अनामिकाभ्याम्
    ओम राम धूताय कनिष्टिकाभ्याम्
    ओम पंच मुखा हनुमथ कर थला कर प्रातःभ्यम् नमः
    इति कारा निसा

    ओम के अंगूठे के माध्यम से अंजना के पुत्र को प्रणाम
    ओम की पहली उंगली के माध्यम से रुद्र मूर्ति को सलाम
    मध्यमा उंगली के माध्यम से पवन देवता के पुत्र को ओम नमस्कार
    ओम उसे नमस्कार करता है जो चौथी उंगली के माध्यम से उसके भीतर आग है
    ओम छोटी उंगली के माध्यम से राम के दूत को सलाम करता है
    ओम उन्हें नमस्कार करता है जिनके पास पूरी हथेली के माध्यम से पांच चेहरे हैं।
    इस प्रकार हाथ का कर्मकांड

    ह्रदय पर हाथो को रख कर।

    ओम अंजनी सुताय हृदयं नमः
    ओम रुद्र मृथाये सिरसे स्वाहा
    ओम वायु पुष्टाय शिखा वषट्
    ओम अग्नि गर्भाय कवचाय हुम्
    ओम राम धूताथाय नेत्रत्रय वषट्
    ओम् पंच मुखा हनुमथे अस्त्राय फट्
    ओम् पंच मुखा हनुमते स्वाहा
    इति हृदयाधि नः

    ओम को अंजना के बेटे के लिए दिल से सलाम
    रुद्र मूर्ति को अग्नि भेंट करते ओम
    सिर में पवन देवता के पुत्र के लिए ओम वसत
    उस व्यक्ति के कवच के लिए ओम हूम जो उसके भीतर आग है
    राम के दूत के लिए आँखों के लिए ओम वसत्
    पांचों के तीर के लिए ओम चरण ने हनुमान का सामना किया
    पांच अग्नि में ओम अर्पित करने से हनुमान का सामना हुआ
    इस प्रकार दिल में संस्कार समाप्त हो जाते हैं

    ध्यान करते समय।

    वन्दे वानरा नरसिम्हा खगरात कृतदास्वा वक्त्रनवितम्
    दिव्यलंकराणं त्रिं पंचायणं धीमदीप्यं मनम् रूचा,
    हस्तिभधाय रासी खेता पुष्टका सुधा कुंभा अंगुशदिम हलाम,
    गदवांगम फनी भूरुहम् दसा भुजम सरवरी वीरपहाम।

    उसके सामने एक बंदर, नरसिंह, पक्षियों के राजा, घोड़े और एक सूअर के चेहरे पर सलाम,
    जो दिव्य रूप से सुशोभित हैं, पंद्रह आँखें हैं, जो बेहद चमकती हैं,
    जिसके पास दस हाथ हैं और वह ढाल, पुस्तक, अमृत, बकरी, हल और रखता है
    तलवार और पूरे शरीर में उसके शरीर के साथ चलता है और हर जगह वीरतापूर्ण है।

    अधा मंथरा (जाप)

    ओम श्री राम धूताय, अंजनियाय, वायु पुत्राय, महा बल पराक्रम,
    सीता सुख निवारनया, लंका दहन करनया, महा बाला प्राचंदया, फाल्गुन साखा,
    कोलाहा सक्ला ब्रह्मानंद विस्वा रोपैया, सप्त समधरा निलांगणया, पिंगला नारायण,
    अमिता विक्रमाय, सूर्या बिम्ब फला सेवनया, दुश निवारनया, द्रुति निरालंकृता,
    संजीविनि संजीविथंगदा लक्ष्मण महा कपि संत प्रनाध्या, दासा कंधा विदवांसनाय,
    रमेशताय, महा फाल्गुन सखा, सीता संहिता रथ वर प्रदा,
    शाद प्रयाग गामा पंच मुख वीरा हनुमान मंथरा जप विनियोग।

    मैं छह मुखों के अनुष्ठान के साथ पांच मुखों वाले शूरवीर हनुमान का जाप शुरू करता हूं, और राम के दूत, अंजना का पुत्र, पवन देव का पुत्र, बहुत वीर, सीता के दुखों को दूर करने वाले, की आराधना करता हूं। जो लंका को जलाने का कारण था, वह जो बहुत शक्तिशाली के रूप में जाना जाता है, वह जो अर्जुन का मित्र है, वह जो प्रचंड रूप धारण करता है, सात समुद्रों को पार करने वाला, लाल आंखें वाला वह जो बहुत वीरतापूर्ण है, जिसने सोचा कि सूर्य एक फल है, वह जो बुरे लोगों को सुधारता है, वह जो दृढ़ दृष्टि वाला होता है, वह जो संजीवनी पर्वत लाकर बंदरों और भगवान लक्ष्मण की सेना को जीवनदान देता है, जो टूट गया दस में से एक, जो राम का करीबी है, एक जो अर्जुन का बहुत अच्छा दोस्त है और जो राम और सीता के साथ वरदान देता है,

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  • Bajrangbali Ke 12 Naam Mantra की महिमा और लाभ
  • कलियुग में, हनुमानजी को बहुत प्रसन्न देवता माना जाता है। बजरंग बली की कृपा भी सरल पूजा और सरल उपायों से प्राप्त होती है। इस कारण से, विशेष रूप से प्रत्येक मंगलवार और प्रत्येक शनिवार को, भगवान हनुमान के मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है। पवनपुत्र की नियमित पूजा से कुंडली के सभी ग्रह दूर हो जाते हैं। शनि की साढ़ेसाती और ढैया में भी लाभ होता है, यदि कोई व्यक्ति मंगली है, तो उसके लिए हनुमानजी की पूजा करना भी सबसे अच्छा उपाय है। Bajrangbali Ke 12 Naam भी उनके भक्तो में बोहोत प्रसिद्ध है।

    यहां जानिए एक ऐसा उपाय जो सभी 12 राशियों के लोग कर सकते हैं और यह उपाय बहुत सरल भी है। शास्त्रों के अनुसार, हनुमानजी के बारह चमत्कारी नाम हैं। इन नामों का जाप करने से मुश्किल समय में भी किसी को लाभ मिल सकता है। हालांकि हनुमान चालीसा का भी जाप किया जा सकता है, लेकिन यहां बताए गए हनुमानजी के बारह नाम भी चमत्कारिक रूप से सकारात्मक परिणाम प्रदान करते हैं।

    श्री राम भक्त हनुमान जी के अलग-अलग नाम हमेशा उनके भक्तों पर ध्यान देते हैं।

    हनुमान जी का स्मरण करने से ही भक्तों के जीवन से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

    अजर-अमर हनुमान जी एकमात्र भगवान हैं जो इस कलयुग में थोड़ी सी प्रार्थना और पूजा से प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों की प्रार्थना करते हैं।

    आज हम आपको Bajrangbali Ke 12 Naam बताने जा रहे हैं, जिनके निरंतर ध्यान और जप से आपके जीवन की सभी बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी और हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होगी।

    Hanuman Ji Ke 12 Naam की अपनी महिमा है। हर नाम का जाप करने से आपको कई लाभ और परेशानियां मिलेगी। हनुमान जी के 12 नाम पवित्र नाम Bajrangbali Ke 12 Naam को याद करने से न केवल आपकी उम्र बढ़ती है बल्कि सभी सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है। श्री हनुमानजी महाराज दस दिशाओं और आकाश से लगातार 12 नामों का जाप करने वाले व्यक्ति की रक्षा करते हैं।

    Bajrangbali Ke 12 Naam Mantra और उनके अर्थ।

    क्र.नाम मंत्र अर्थ:
    1.हनुमानॐ श्री हनुमते नमः।भक्त हनुमान, जिसकी ठुड्डी में फांक है
    2. अञ्जनी सुतॐ अञ्जनी सुताय नमः।जो देवी अंजनी के पुत्र हैं
    3. वायु पुत्रॐ वायुपुत्राय नमः।वायु देव का पुत्र कौन है
    4.महाबलॐ महाबलाय नमः।जिसके पास बड़ी ताकत हो
    5.रामेष्टॐ रामेष्ठाय नमः।जो श्री राम को समर्पित है
    6.फाल्गुण सखाॐ फाल्गुण सखाय नमः।अर्जुन का मित्र कौन है
    7.पिङ्गाक्षॐ पिंगाक्षाय नमः।जिसकी आँखें पीली या लाल-भूरी हों
    8.अमित विक्रमॐ अमितविक्रमाय नमः।जिसकी वीरता अथाह या असीम है
    9.उदधिक्रमणॐ उदधिक्रमणाय नमः।जिसने सागर पार कर लिया हो
    10.सीता शोक विनाशनॐ सीताशोकविनाशनाय नमः।जिन्होंने देवी सीता के दुःख को दूर किया
    11.लक्ष्मण प्राण दाताॐ लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः।जो श्री लक्ष्मण को जीवन देने वाले हैं
    12.दशग्रीव दर्पहाॐ दशग्रीवस्य दर्पाय नमः।जिसने दस सिर वाले रावण के गौरव को नष्ट कर दिया

    यह भी पढ़े : पंचमुखी हनुमान जी की कहानी, मंत्र और उनके लाभ।

    Hanuman Ji Ke 12 Naam Mantra की स्तुति।

    Bajrangbali Ke 12 Naam Mantra Stuti

    हनुमानञ्जनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबल:।
    रामेष्ट: फाल्गुनसख: पिङ्गाक्षोऽमितविक्रम:।।
    उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशन:।
    लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।।
    एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मन:।
    स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च य: पठेत्।।
    तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भेवत्।
    राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन।।

    पद्य की शुरुआत में, पहला नाम हनुमान को दिया गया, दूसरा नाम अंजनेसुनु, तीसरा नाम वायुपुत्र, चौथा नाम महाबल, पांचवा नाम रमेश यानी श्री राम का प्रिय, छठा नाम फाल्गुनसुख यानी अर्जुन का मित्र, सातवाँ नाम पिंगाक्ष यानि भूरी आँखों वाला, आठवाँ नाम अमितविक्रम, नौवाँ नाम उद्दिक्रमण है अर्थात जो लोग समुद्र का अतिक्रमण करते हैं, दसवाँ नाम सीताशविनन है अर्थात सीताजी का कोई दुःख नहीं। उस के लिए शब्द, गहर्रवन का नाम लक्ष्मणप्रताद है जिसका अर्थ है कि लक्ष्मण जीवन भर दवाइयाँ और बह्रन नाम से जीवित रहते हुए दशग्रीव या रावण के घमंड को दूर करते हैं।

    इस स्तुति में हनुमान के बारह नामों का उल्लेख है। यह प्रशंसा आनंद रामायण में दी गई है। यह एक बहुत ही चमत्कारी स्तवन है और अगर कोई व्यक्ति इस स्तवन का नियमित रूप से जाप करता है, तो उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यदि आप इस श्लोक का जाप नहीं करना चाहते हैं तो सभी बारह नामों को सरल भाषा में बताया जा रहा है। आप इनका जाप भी कर सकते हैं।

    Bajrangbali Ke 12 Naam जाप करने के लाभ।

    Bajrangbali Ke 12 Naam का उल्लेख इस स्तवन में किया गया है और यह स्तवन आनंदरामायण में दिया गया है। अगर आप इसे नियमित रूप से पढ़ते हैं। तो यह आपको बहुत सारे लाभ देता है और आपको हर समस्या से दूर करता है। आइए अब जानते हैं आपको संकटमोचन हनुमान के नाम कब और कैसे याद करने चाहिए …

    • Bajrangbali को प्रिय इन 12 नामों का जाप करने से व्यक्ति नियमित नियम का पक्ष लेता है।
    • सुबह उठते ही जिस व्यक्ति ने अपने बारह नाम 11 बार लिए, वह लंबा है।
    • दैनिक नियम से दोपहर में नाम लेने वाला व्यक्ति धनवान होता है।
    • दोपहर और शाम के बीच नाम लेने से पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है।
    • रात को सोते समय नाम लेने से शत्रु जीत जाता है।
    • बजरंगबली उस व्यक्ति की रक्षा करते हैं जो इन बारह नामों का जप लगातार दस दिशाओं और आकाश से करता है।
    • भोजपत्र पर हनुमान जी के इन बारह नामों को लाल स्याही से नई कलम से लिखकर उसी दिन ताबीज की तरह बांधना कभी सिरदर्द नहीं होता।

    Benefits of reciting 12 names of Hanuman Ji अन्य है और ये सभी नाम हनुमानजी की शक्तियों और गुणों को दर्शाते हैं। साथ ही भगवान राम के प्रति उनकी भक्ति भी दर्शनीय है। इसीलिए इन नामों का जाप करने से पवनपुत्र जल्दी प्रसन्न होते हैं। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में मुश्किल समय आ रहा है, कुंडली में किसी प्रकार का ग्रह दोष है, कार्यों में कोई सफलता नहीं है, घर या परिवार में कोई शांति या खुशी नहीं है, किसी तरह का डर है, बुरे सपने। आइए, यदि विचारों की शुद्धता में गड़बड़ी है, तो यहां दिए गए हनुमानजी के बारह नामों का जाप करना चाहिए।

    यह भी पढ़े : हनुमान जी की आरती और उसका सम्पूर्ण अर्थ।

    हनुमान जी के 12 नामो की महिमा।

    • हनुमान जी को कलयुग का सबसे प्रभावशाली देवता माना जाता है।
    • ऐसा माना जाता है कि हनुमान अमर हैं और अभी भी जीवित हैं।
    • उनकी अद्भुत और कठोर भक्ति के कारण, उन्हें अष्टसिद्धि और नवनिधि का आशीर्वाद मिला है।
    • इस वरदान और अपने प्रिय श्री राम के आशीर्वाद के कारण, हनुमान जी अपने भक्तों के कष्टों को हरने में सक्षम हैं।
    • इनकी पूजा तुरंत फलदायी होती है और हर तरह के संकट का नाश करती है।

    यदि आप भी अपने जीवन से सभी समस्याओं से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो Bajrangbali Ke 12 Naam का प्रतिदिन ध्यान करें, निश्चित रूप से कुछ ही दिनों में आपको इसका परिणाम दिखेगा।

    Hanuman Ji Ke 12 Naam Kaun Kaun Se Hain – Video

    Benefits of Reciting 12 Names of Hanuman Ji का व्यक्तिगत लाभ

    बजरंगबली के नाम के अन्य लाभ है जिनका कोइन अंत नहीं है। अगर आप सही रूप से इन सब का उच्चारण करे तोह इनका लाभ अनगिनत है। निचे Hauman Ji Ke 12 Naam Batao गये है उनके व्यक्तिगत लाभ सहित। यदि आपको इनमे से किसी भी लाभ की प्राप्ति करनी है तोह उस नाम का उच्चारण रोज़ निश्चित करे।

    1. वायु पुत्र – शारीरिक, मानसिक रूप से प्रेरणा प्रदान करें
    2. हनुमान – बुद्धिमत्ता प्रदान करें
    3. अंजनी सुत – आशीर्वाद प्रदान करें
    4. महाबल – सकारात्मक शक्ति प्रदान करें
    5. फाल्गुन सखा – सकारात्मक समुदाय प्रदान करें
    6. रामेष्टः – ईश्वर की शक्ति देने में मदद करें
    7. उदधिक्रमण – असंभव को संभव कार्य में बदलें
    8. पिंगाक्ष – शत्रु पर विजय
    9. अमित विक्रम – असीम शक्ति प्रदान करें
    10. सीता शोका विनाशन – जीवन की किसी भी नकारात्मक स्थिति को दूर करें
    11. दशग्रीव दरपहा – अहंकार का नाश करो
    12. लक्ष्मण प्राण दाता – किसी भी महत्वपूर्ण समय में जीवन प्रदान करें

    हमे आशा है की आपको हनुमान जी के १२ नाम की जानकारी से बोहोत लाभ हो। इस पोस्ट को अपने दोस्तों और परिवार में भी share करे और उन्हें भी बजरंगबली के 12 नामो के लाभ बताये।

    अगर आप Hanuman Ji Ke 12 naam PDF download करना चाहते है तोह आप इस पेज को print command देकर इसको save as pdf कर सकते है।

    जय श्री राम। जय बजरंगबली। 

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  • Panchmukhi Hanuman Ji Mantra, Story and Benefits
  • आप सभी हनुमान जी क बारे में बोहोत कुछ जानते होंगे लेकिन क्या आप Panchmukhi Hanuman Ji क बारे में ज्ञान रखते है. आज हम आपको इस आर्टिकल क तहत हनुमान जी इस चमत्कारी अवतार क बारे में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले है। तोह आये जानते है Panchmukha Hanuman Ji का नाम कैसे पड़ा. Panchmukhi Hanmuman Kavach क क्या महत्व है. और इस आर्टिकल में हम आपको पंचमुखा हनुमनजी क मंत्र क जाप करने के विधि और महत्त्व भी बताएँगे।

    तोह चलिये दोस्तों बिना किसी खेद क शुरू करते है इस आर्टिकल को। हमे प्राथना करते है की आपको यह आर्टिकल खूब पसंद आएगा और आप इसे खूब शेयर भी करेंगे।

    Panchmukha Hanuman Ji के पीछे कहानी क्या है?

    Panchmukhi Hanuman Ji Story

    Panchmukhi Hanuman Ji एक बोहित ही अनोखी हनुमान जी की प्रतिमा है। और इस प्रतिमा से जोड़ी बोहत ही विशेष कहानिया और अलग अलग व्यख्याय जोड़ी है। कहा जाता है की भगवान् हनुमान, राघवेन्द्रस्वामी के पास ें अनोखे रूप में प्रकट हुवे। इस रूप में उन्होंने पांच अनोखे रूप धारण किये हुवे थे। इन पांचो अवतार क नाम है वराह, गरुड़, अंजनेया, नरसिम्हा और हयग्रीव, इस प्रकार पांच सरो वाला।

    Panchmukhi Hanuman Ji की शुरुआत कहा से हुई थी और Ramayan से कैसे जोड़ी है ?

    श्री पंचमुख हनुमान की उत्पत्ति का वर्णन रामायण में एक कहानी से किया जा सकता है। भगवान राम और रावण के बीच युद्ध के दौरान। रावण ने महिरावण की मदद ली जो पाताल लोक का राजा है।

    Panchmukhi Hanuman Ramayan

    भगवान राम और लक्ष्मण की रक्षा के लिए भगवान हनुमान ने अपनी पूंछ से एक किले का निर्माण किया। महिरावण ने विभीषण का रूप लिया और भगवान राम और लक्ष्मण को पाताल लोक ले गया। राम और लक्ष्मण की खोज में हनुमान ने पाताल लोक में प्रवेश किया, उन्होंने पाया कि माहिरावण को मारने के लिए उन्हें एक ही समय में पांच अलग-अलग दिशाओं में पांच दीपक जलाने थे, इसलिए उन्होंने हनुमान, हयग्रीव, नरसिंह, गरुड़, हनुमान का पंचमुखी रूप धारण किया और वराह ने चेहरों को बुझा दिया और माहिरावन को मार डाला।

    श्री विद्यारण्यतन्त्रम में हनुमथ प्रकरनम के अनुसार, अंजनेया के पाँच चेहरे (पंच मुखा) और दस हथियार हैं। पाँच मुख भगवान हनुमान, भगवान नरसिंह, भगवान आदिवराह, भगवान हयग्रीव और भगवान गरुड़ के हैं।

    हनुमान एक महान योगी (रहस्यवादी) हैं जिन्होंने पांच इंद्रियों (पंच इन्द्रियों) को पार किया है। कम्बा रामायणम (तमिल में) में, संख्या पांच का महत्व खूबसूरती से इस प्रकार बताया गया है:

    • पाँच तत्वों में से एक का बेटा (पवन का बेटा – पवन थाना)
    • पांच तत्वों में से एक को पार किया (पानी – सागर),
    • पांच तत्वों (आकाश) में से एक के माध्यम से,
    • पांच तत्वों में से एक की बेटी से मुलाकात की (पृथ्वी की बेटी – सीता देवी)
    • पांच तत्वों (अग्नि) में से एक लंका को जला दिया।

    शायद यही कारण है कि हनुमान की मूर्ति को पांच बार या 14, 23, 41 के आसपास घूमने की सलाह दी जाती है। अंकों के योग पांच देते हैं।

    Panchmukha Hanuman Ji की आराधना करने के 5 अनमोल फ़ायदे।

    पंचमुखी हनुमान की पूजा करने के लाभ कई गुना अधिक हैं।

    1. पूर्व की ओर अंजन्या व्यक्ति की इच्छाओं को पूरा करती है। जो कभी-कभी स्वार्थी और व्यक्तिगत स्वभाव का हो सकता है।
    2. दक्षिण की ओर मुख करके अंजनेय अनुदान सभी के कल्याण की कामना करता है।
    3. हनुमान का सामना करने वाला पश्चिम सौभय या सौभाग्य का पक्ष लेता है।
    4. उत्तर की ओर वाला भाग समृद्धि और धन का उपहार प्रदान करता है।
    5. हयाग्रीव मुख आकाश का सामना करता है। हयग्रीव दुनिया के पूर्ण कल्याण और खुशी की गारंटी देता है।

    Panchamukhi Hanuman Ji Stuti

    Panchmukhi Hanuman Ji Stuti

    Panchamukhi Hanuman Stuti एक शक्तिशाली स्तोत्र है जो पाँच रूपों में से प्रत्येक की प्रशंसा करने के लिए है। यह स्तोत्र मुसीबतों को कम करने और बुरी ताकतों को दूर रखने में मदद करता है। यह उन भक्तों के लिए सुरक्षा का काम करता है जो अत्यधिक विश्वास के साथ जप करते हैं।

    ओम नमो भगवते पंचवदनायै गरीब कपि मुखे
    सकला शत्रु समाहारनाय स्वाहा

    अर्थ: भगवान हनुमान का पूर्वमुखी स्वरूप भक्तों को दुश्मनों से होने वाली समस्याओं से बचाता है। वह खुशी प्रदान करता है और इच्छाओं को पूरा करता है।

    ओम नमो भगवते पंचवदनाय दक्षिणाय मुखे
    करालं वदनाया नरसिम्हाया साकलं भूतं स्तुता प्रणमनाय स्वाहा

    अर्थ: भगवान नरसिंह का दक्षिणमुखी स्वरूप, सभी प्रकार के भय, पाप, आत्माओं और राक्षसों के प्रतिकूल प्रभावों को दूर करता है और हमारी इच्छाओं को पूरा करता है।

    ओम नमो भगवते पंचवदनाय पश्यति मुखे
    गरुड़ाय सकल दर्शन हरनाय स्वाहा

    अर्थ: भगवान गरुड़ का पश्चिम मुखी रूप सभी प्रकार की व्याधियों, नकारात्मकताओं, काले जादू, विष और भय को दूर करता है।

    ओम नमो भगवते पंचवदनाय उथरे मुखे
    आदिवाराहाय सकला सम्पतकाराय स्वाहा

    अर्थ: भगवान वराह का उत्तर-मुख वाला रूप अष्टधातु (धन के आठ अलग-अलग रूप) प्रदान करता है।

    ओम नमो भगवते पंचवदनाय ऊध्व मुखे
    हयग्रीवै सकालं जन वशेखरनाय स्वाहा

    अर्थ: भगवान हयग्रीव का ऊपर की ओर मुख वाला रूप भक्तों को लोगों की सद्भावना को आकर्षित करने में मदद करता है। उनके भक्तों के शब्द वास्तविकता में बदल जाते हैं। वह उन्हें ज्ञान, मित्रों की अच्छी कंपनी, बुद्धिमत्ता, अच्छे बच्चे और मोक्ष पाने में उन्नति के लिए शुभकामना देता है।

    Panchmukhi Hanjuman Mantra (ध्यान मंत्र)और उसका पूर्ण अर्थ हिंदी में।

    Panchmukha Hanuman Ji Mantra Dhyan

    पंचश्याच्युत्मानमेका विचित्रा वेरीम |
    श्री शंख चक्र रामन्या भुजगरा देसम ||

    अर्थ : पूर्व की ओर मुख अपने मूल रूप में श्री हनुमान मुख है। यह चेहरा पाप के सभी दोषों को दूर करता है और मन की शुद्धता (चित्त सुधा) को दूर करता है।

    दक्षिण की ओर मुंह करके श्री करला उग्रविरा नरसिम्हा स्वामी दुश्मनों का भय दूर करते हैं और जीत हासिल करते हैं।

    पीताम्बरम् मकारा कुण्डला नूपुरंगम |
    ध्यायेतिथम् कपिवरम चौथि भवमयी ||

    अर्थ: पश्चिम की ओर मुख वाला चेहरा भगवान श्री महावीर गरुड़ का है और यह चेहरा बुरी मंत्र, काले जादू प्रभाव आदि को दूर भगाता है और एक शरीर में सभी जहरीले प्रभावों को दूर करता है।

    श्री लक्ष्मी वराह मूर्ति उत्तर की ओर, ग्रहों के बुरे प्रभावों के कारण होने वाली परेशानियों को दूर करती है और सभी समृद्धि – अष्ट ऐश्वर्य का सामना करती है।

    बुधादिरबलम् यशो धीर्याम निर्भयत्त्वम अरोगता |
    अजादित्यम वक्रपटुवम च हनुमत स्मार्नाद्भव ||

    अर्थ : उर्ध्व मुख श्री हयग्रीव स्वामी के ऊपर की ओर मुख करके ज्ञान, विजय, अच्छी पत्नी और संतान प्रदान करता है।

    जैसा कि निम्नलिखित मंत्र बताता है, भगवान हनुमान अपने भक्तों को ज्ञान, शक्ति, साहस और स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।

    Panchmukha Hanjuman Ji Gayatri Mantra ( हनुमान गायत्री मंत्र )

    Hanuman Ji Gayatri Mantra

    श्री Panhchmuka Hanuman Ji Gayatri Mantra का उचारण करने से ज़िन्दगी में आने वाली कठनाईयो का आसानी से सामना किया जा सकता है।

    यदि कोई बुरे प्रभावों से परेशान है, और भय, शत्रुओं, और गुप्तचर से सुरक्षा चाहता है, तो Panchmukhi Hanuman Ji उसके लिए भगवान हैं। वह उन लोगों की रक्षा करता है जो उसकी शरण लेते हैं।

    ओम अंजनेया विद्महे पंचवक्त्राय धीमहि|
    तन्नो हनुमथ प्रचोदयात् ||

    हनुमान, नरसिंह, गरुड़, वराह और हयग्रीव नामक पांच रूपों को भी विशिष्ट गायत्री मंत्रों का जाप करके व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित किया जा सकता है।

    हनुमान गायत्री मंत्र :

    “श्री आंजनेय्या विद्महे महाबलाय धीमहि तन्नो कपि प्रच्छोदयेत्”

    नरसिंह गायत्री मंत्र :

    “वज्रनखाय विद्महे तक्षणाद्शमश्रयाति धीमहि तन्नो नरसिंह प्रमोद्यते”

    गरुड़ गायत्री मंत्र :

    “तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णं पश्यं धीमहि तन्नो गरुड़ प्रचोदयात्”

    वराह गायत्री मंत्र :

    “ओम धानुर्धराय विद्महे वक्रदामश्रय धीमहि तन्नो वराह: प्रचोदयात्”

    हयग्रीव गायत्री मंत्र :

    “ओम वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवया धीमहि तन्नो हंशो प्रपद्ये”

    संरक्षण के लिए Panchmukhi Hanuman Mantra

    ओम् ह्रीं ह्रीं मरकट मार्काय स्वाहा ||
    ओम् ह्रीं ह्रीं मार्कत मार्कतय वाम वम वाम वम वाम स्वर स्वर स्वाहा ||
    ओम् ह्रीं ह्रीं मार्कत मार्कतयाफम फूं फूं फूं फूं फट् स्वाहा ||
    ओम् ह्रीं ह्रीं मार्कत मम-कर्ताय खुं खं खं खं खं मरनाय स्वाहा ||
    ओम् ह्रीं ह्रीं मरकट मरकटायुं थूं थूं थूं थंम्बा-नाया स्वाहा ||
    ओम् ह्रीं ह्रीं मरकट मार्कयतायदोन दोनां दोनां अदर्शनश्याकाल समाप्ता कराय पंचमुखी वीर हनुमथाय परा यन्त्र तन्त्रो चा-चतुर्दाय स्वाहा ||

    Panchmukhi Hanuman Ji Mantra for Protection

    Shri Hanuman Ji अक्सर सिंधूर के साथ लागू मंदिरों में पाए जाते हैं। सिंधूर केसर का एक संशोधित संस्करण है जिसे एक पेस्ट में बनाया जाता है। रंग एक गहरे लाल रंग में अंकित होता है जो भगवान हनुमान की अपार शक्ति का प्रतीक है और बोल्डनेस का रंग भी है। रंग लाल एक बार फिर मूलाधार चक्र (मानव शरीर में बहुत पहला चक्र) को दर्शाता है और यह जीवित रहने की वृत्ति और गहरी जड़ें भय परिसरों का आधार है। इस गहरे लाल रंग को देखने से कुछ आशंकाओं से छुटकारा मिलता है और इसलिए भगवान हनुमान को मंदिरों में गहरे लाल रंग से रंगा जाता है।

    Video Source: Spiritual Activity

    Panchmukhi Hanuman Ji Pooja निम्न कारणों से ऊर्जा के संदर्भ में की जाती है:

    • कष्टप्रद ऊर्जा को दूर करने के लिए: आत्माओं, काले जादू, पूर्वजों के सूक्ष्म शरीर, शनि के कारण पीड़ित आदि के कारण होने वाली समस्याओं को दूर करने के लिए।
    • सुखद ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए: यदि सक्रिय कुंडलिनी (आध्यात्मिक ऊर्जा) के मार्ग में कोई बाधा है, तो इसे दूर करने और इसे उचित रूप से चैनल करने के लिए।

    तोह हमे उम्मीद है दोस्तों की आपको ये सम्पूर्ण आर्टिकल जो की Panchmukha Hanuman Ji के बारे में लगबघ सभी जानकरी आपको दे रहा है। कृपया अगर आपको यह आर्टिकल पसनद आया तोह इसे अपने दोस्तों क साथ और अपने परिवार के साथ शेयर करें ताकि वे भी Panchmukhi Hanuman Ji के बारे में जाने और इनके मंत्रो का ध्यान कर सके.

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    और पढ़े : Hanuman Chalisa हिंदी में सम्पूर्ण अर्थ के साथ।

    Jai Bajrangbali!

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  • Hanuman Aarti in English with Meaning
  • Chanting the Shri Hanuman Ji Aarti daily will rectify away all the sins that have arisen within you either by having insulted someone knowingly or unknowingly. This post will provide you with comprehensive Shri Hanuman Aarti in English with meaning. It is believed that chanting Shri Hanuman Ji Aarti will help you overcome the hardships in your life and you will be blessed with strength and wisdom.

    Hanuman Aarti in English Meaning Verses 1-7

    Aarti Kijay Hanuman Lala Ki।
    Dusht Dalan Ragunaath Kalaa Ki॥

    Sing the Aarti of Lord Hanuman, the destroyer of all that is wicked, and an exalted hero in Shri Ram’s sportive play on earth.

    English Meaning Verse 1

    Jakey Bal Se Girivar Kanpe।
    Rog Dosh Ja Kay Nikat Na Jhankey॥

    His massive power makes even mountains shake. Neither sickness nor impurities can come close to his devotees.

    English Meaning Verse 2

    Anjanii Putr Mahaa Baldae।
    Santann Kay Prabhuu Sadaa Sahai॥

    The son of Mother Anjani, is immensely powerful. He always provides help and protection to the good.

    English Meaning Verse 3

    De Bera Raghunath Pathaye।
    Lanka Jari Siya Sudhi Laye॥

    Lord Ram entrusted brave Hanuman with the task of finding Sita, for which he jumped to Lanka and burnt the capital.

    English Meaning Verse 4

    Lanka So Kot Samudra-Si Khai।
    Jaat Pawan Soot Baar Na Lai॥

    The impregnable fort of Lanka and the deep moat of the surrounding sea could not hamper his progress. He succeeded in bringing the news of Sita.

    English Meaning Verse 5

    Lanka Jari Asur Sanhare।
    Siya Ramji Ke Kaj Sanware॥

    He burned Lanka, slew the demons, and completed the work of Lord Ram and Mother Sita.

    English Meaning Verse 6

    Laksman Morchit Pade Sakare।
    Aani Sanjivani Praan Ubhare॥

    When Lakshman was lying unconscious, Hanuman went quickly for the life-saving Sajivani herb. Bringing it by early morning, he saved Lakshman’s life.

    English Meaning Verse 7

    Hanuman Aarti English Meaning Verses 7-14

    Paithi Patal Tori Jam-kare।
    Ahiravaan Ke Bhujaa Ukhare॥

    Hanuman went quickly to the realm of death and tore apart Ahiravana’s arms.

    English Meaning Verse 8

    Bayen Bhujaa Asur Dal Mare।
    Dahinee Bhuja Sab Sant Jan Ubhare॥

    Hanuman’s mighty arms are ever engaged in protecting the good and slaying the demons.

    English Meaning Verse 9

    Sur Nar Muni Jan Aarti Utare।
    Jai Jai Jai Hanuman Uchaare॥

    All the gods, humans, sages, and seers aver perform his arati and chant ‘Glory to Hanuman’ with great enthusiasm.

    English Meaning Verse 10

    Kanchan Thaar Kapoor Lau Chhaai।
    Aarti Karat Anjana Maai॥

    Mother Anjani performs the Aarti of her beloved son, burning camphor on a golden plate.

    English Meaning Verse 11

    Jo Hanumanji Ki Aarti Gaave।
    Basi Baikunth Param Pad Pave॥

    Whoever sings the Aarti of Lord Hanuman attains the highest state and dwells in Vaikuntha, the highest heaven.

    English Meaning Verse 12

    Lankvidhvansh Kinah Raghurai।
    Tulsidas Prabhu Kirati Gaai।।

    Swai Tulsidas Ji sings the glory of the Hanuman, who destroyed the Lanka with the blessings of Lord Rama

    English Meaning Verse 13

    Aarti Kijay Hanuman Lala Ki।
    Dusht Dalan Ragunath Kala Ki।।

    Sing the Aarti of Lord Hanuman, the destroyer of all that is wicked and an exalted hero in Sri Ram’s sportive play on earth.

    English Meaning Verse 14

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    Also Read: Shri Hanuman Ji Aarti in Hindi

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