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  • ब्रह्माण्ड के शुरुआती सितारों के जन्म का रहस्य
  • महा विस्फोट का सिद्धांत ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संदर्भ में सबसे ज्यादा मान्य है। यह सिद्धांत व्याख्या करता है कि कैसे आज से लगभग 13.8 अरब वर्ष पूर्व एक अत्यंत गर्म और घनी अवस्था से ब्रह्मांड का जन्म हुआ। इसके अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक बिन्दु से हुयी थी।

    प्रस्तावित ब्रह्माण्ड का सबसे पहला निर्मित तारा, विशाल आकार के साथ नीले रंग में दिखाया गया है। यह तारा पूरी तरह से गैसीय तंतुओं से निर्मित हुआ है इसके पृष्टभूमि पर खगोलीय माइक्रोवेव(cosmic microwave background: CMB) को देखा जा सकता है। यह छवि रेडियो अवलोकनों पर आधारित है क्योंकि हम शुरुआती तारों को सीधे तौर पर नही देख सकते। शोधकर्ताओं के अनुसार खगोलीय माइक्रोवेव पृष्टभूमि की मंदता से तारे की उपस्थिति का अनुमान लगाने में मदद मिलती है क्योंकि खगोलीय माइक्रोवेव सितारों से निकले परावैगनी प्रकाश को अवशोषित कर लेते है। छवि में जहां पर खगोलीय माइक्रोवेव पृष्टभूमि कम है यह दर्शाता है वहां गैसीय तंतु अपेक्षा से कही अधिक ठंडे हो सकते है संभव है वे डार्क मैटर के साथ परस्पर प्रतिक्रिया कर रहे हो। Credit: N.R.Fuller, National Science Foundation.

    प्रस्तावित ब्रह्माण्ड का सबसे पहला निर्मित तारा, विशाल आकार के साथ नीले रंग में दिखाया गया है। यह तारा पूरी तरह से गैसीय तंतुओं से निर्मित हुआ है इसके पृष्टभूमि पर खगोलीय माइक्रोवेव(cosmic microwave background: CMB) को देखा जा सकता है। यह छवि रेडियो अवलोकनों पर आधारित है क्योंकि हम शुरुआती तारों को सीधे तौर पर नही देख सकते। शोधकर्ताओं के अनुसार खगोलीय माइक्रोवेव पृष्टभूमि की मंदता से तारे की उपस्थिति का अनुमान लगाने में मदद मिलती है क्योंकि खगोलीय माइक्रोवेव सितारों से निकले परावैगनी प्रकाश को अवशोषित कर लेते है। छवि में जहां पर खगोलीय माइक्रोवेव पृष्टभूमि कम है यह दर्शाता है वहां गैसीय तंतु अपेक्षा से कही अधिक ठंडे हो सकते है संभव है वे डार्क मैटर के साथ परस्पर प्रतिक्रिया कर रहे हो। Credit: N.R.Fuller, National Science Foundation.

    ब्रह्माण्ड का जन्म अर्थात बिग बैंग के लगभग 400000 साल बाद भी ब्रह्माण्ड पूरी तरह से स्याह काला था। कोई तारा या मंदाकिनी का जन्म भी उस समय तक नही हुआ था। उस समय ब्रह्माण्ड मुख्य रूप से उदासीन हाइड्रोजन गैस से भरा हुआ था फिर अगले, 50-100 मिलियन वर्षो तक गुरुत्वाकर्षण ने धीरे-धीरे अपना कार्य किया इन उदासीन गैसों को एक क्षेत्र में एकत्रित कर दिया जिससे वह क्षेत्र काफी घना होता चला गया। अंत मे इन घने गैसों ने तारों का रूप ले लिया इस प्रकार सबसे पहले तारे का जन्म हुआ। खगोलविज्ञानी लंबे समय से ब्रह्माण्ड के शुरुआती तारों के जन्म और इन तारों द्वारा ब्रह्माण्ड पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में लगे रहे है। लगभग 12 सालो के प्रयोगिक प्रयासों के बाद स्कूल ऑफ अर्थ( ASU School of Earth) और स्पेस एक्सप्लोरेशन(Space Exploration) के खगोलविदों ने ब्रह्माण्ड के शुरुआती सितारों के जन्म के रहस्य को बताया है जिसका उल्लेख ऊपर के पंक्तियों में किया गया है।

    जुड बोमन(Judd Bowman) के नेतृत्व वाली खगोलविदों की टीम ने रेडियो संकेतों के उपयोग कर बताया है की ब्रह्माण्ड के जन्म के केवल 180 मिलियन वर्ष बाद ही प्रथम तारा का जन्म हो गया था। यह सुनने या लिखने में बड़ा सरल तथ्य लगता है लेकिन इन आंकड़ों को जुटाना वैज्ञानिकों के लिए भी बड़ी चुनौती होती है चाहे वे कितनी ही अत्याधुनिक तकनीक या रेडियो संकेतों का उपयोग क्यों न कर रहे हो। इसका कारण ब्रह्माण्डीय शोर है क्योंकि ब्रह्माण्ड का शोर रेडियो संकेतों के मुकाबले कई हजार गुना ज्यादा शक्तिशाली होते है। शुरुआती रेडियो संकेतों को खोजना उतना ही कठिन है जितना कठिन संपूर्ण पृथ्वी पर एक खास कण को खोजना है। नेशनल साइंस फाउंडेशन(National Science Foundation: NSF) समर्थित इस शोध में कई रेडियो एंटीना और अंतरिक्ष में मौजूद शक्तिशाली दूरबीनों का उपयोग किया गया है। रेडियो खगोलविज्ञान वेद्यशाला(Radio-astronomy Observatory) के साथ दक्षिणी गोलार्द्ध स्थित सभी वेधशालाओं से प्राप्त खगोलीय संकेतों और रेडियो स्पेक्ट्रम को मापा गया है। रेडियो स्पेक्ट्रोमीटर से प्राप्त आंकड़े संकेत देते है की उदासीन हाइड्रोजन गैस शुरुआती ब्रह्माण्ड में बड़े पैमाने पर उपस्थित थे और इन गैसों ने ही शुरुआती तारों बाद में, ब्लैकहोल और आकाशगंगाओं का गठन किया है साथ ही उन्हें विकसित भी करते रहे है।

    खगोलविज्ञानी जुड बोमन कहते है

    “हम किसी भी तरह प्रत्यक्ष तौर पर शुरुआती जन्मे तारों के इतिहास को नही देख सकते लेकिन जो संकेत मिले है वे हमें इन तारों के जन्म और विकास को दर्शाते हैं। यह प्रोजेक्ट हमें दिखाता है की नयी तकनीक एक बेहतरीन प्रदर्शन कर सकती है और नये खगोलीय खोजों में ऐसी तकनीक बेहतर विकल्प है। इस शोध के परिणाम शुरुआती सितारों के गठन और उसके बुनियादी गुणों के सामान्य सिद्धान्तों की पुष्टि भी कर रहे है।”

    MIT के खगोलविज्ञानी एलन रोजर्स(Alan Rogers) का कहना है

    “घनी हाइड्रोजन गैस ने विकरणों को अवशोषित कर लिया। वास्तव में हम उस समय के हाइड्रोजन गैस से उत्सर्जित विकरणों को देख पा रहे है। हम लगभग 78 मेगाहर्ट्ज पर रेडियो संकेतों को पकड़ते है यह आवृत्ति बिग बैंग के बाद करीब 180 मिलियन वर्ष के आसपास की है। यह पहला वास्तविक संकेत है जो बताता है बिग बैंग के 180 मिलियन साल बाद पहला तारा का जन्म हुआ।”

    अध्ययन से पता चलता है की शुरुआती ब्रह्माण्ड में मौजूद गैस संभावित अपेक्षा से कही अधिक ठंडी रही होगी। ज्यादातर पिछले शोधों द्वारा प्रस्तावित तापमान, इस नई प्रस्तावित तापमान से आधे से भी कम है।

    चित्र 2: ब्रह्माण्ड की समय रेखा जिसमे देखा जा सकता है की बिग बैंग के 180 मिलियन वर्षो के बाद संभावित प्रथम तारा का जन्म हुआ था। Credit: N.R.Fuller, National Science Foundation.

    चित्र 2: ब्रह्माण्ड की समय रेखा जिसमे देखा जा सकता है की बिग बैंग के 180 मिलियन वर्षो के बाद संभावित प्रथम तारा का जन्म हुआ था। Credit: N.R.Fuller, National Science Foundation.

    खगोलशास्त्री रेननं बरकाना(Rennan Barkana) ने एक अवधारणा प्रस्तावित किया था जिसके अनुसार बेरिऑन(baryons) ने डार्क मैटर के साथ परस्पर प्रतिक्रिया की होगी और इसके फलस्वरूप प्रारंभिक ब्रह्माण्ड में धीरे-धीरे डार्क मैटर ने अपनी ऊर्जा खो दिया होगा। जुड बोमन कहते है अगर हमारा शोध रेननं बरकाना के अवधारणाओं की पुष्टि करता है तो हमें डार्क मैटर के बारे में बहुत कुछ जानने को मिल सकता है।

    चित्र 1: प्रस्तावित ब्रह्माण्ड का सबसे पहला निर्मित तारा, विशाल आकार के साथ नीले रंग में दिखाया गया है। यह तारा पूरी तरह से गैसीय तंतुओं से निर्मित हुआ है इसके पृष्टभूमि पर खगोलीय माइक्रोवेव(cosmic microwave background: CMB) को देखा जा सकता है। यह छवि रेडियो अवलोकनों पर आधारित है क्योंकि हम शुरुआती तारों को सीधे तौर पर नही देख सकते। शोधकर्ताओं के अनुसार खगोलीय माइक्रोवेव पृष्टभूमि की मंदता से तारे की उपस्थिति का अनुमान लगाने में मदद मिलती है क्योंकि खगोलीय माइक्रोवेव सितारों से निकले परावैगनी प्रकाश को अवशोषित कर लेते है। छवि में जहां पर खगोलीय माइक्रोवेव पृष्टभूमि कम है यह दर्शाता है वहां गैसीय तंतु अपेक्षा से कही अधिक ठंडे हो सकते है संभव है वे डार्क मैटर के साथ परस्पर प्रतिक्रिया कर रहे हो। Credit: N.R.Fuller, National Science Foundation.

    चित्र 2: ब्रह्माण्ड की समय रेखा जिसमे देखा जा सकता है की बिग बैंग के 180 मिलियन वर्षो के बाद संभावित प्रथम तारा का जन्म हुआ था। Credit: N.R.Fuller, National Science Foundation.

    Journal reference: Nature(2018).
    स्रोत: Arizona State University.

    लेखिका परिचय

    प्रस्तुति : पल्लवी कुमारी

    प्रस्तुति : पल्लवी कुमारी

    पलल्वी  कुमारी, बी एस सी प्रथम वर्ष की छात्रा है। वर्तमान  मे राम रतन सिंह कालेज मोकामा पटना मे अध्यनरत है।



  • जब एंड्रोमिडा आकाशगंगा हमारी आकाशगंगा से टकरायेगी
  • आज से तकरीबन चार अरब वर्षों के बाद हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी (मिल्की वे) और एंड्रोमेडा आकाशगंगा आपस मे टकरा जाएगी लेकिन अफसोस तबतक हमारा सूर्य एक विशाल लाल तारा बन चुका होगा। न ही पृथ्वी और न ही सौर मंडल इस खगोलीय टकराव का साक्षी होगा। दो पड़ोसी आकाशगंगाओं का मिलन बड़ा दुर्लभ होता है और इसके प्रभाव बड़े पैमाने पर देखे जाते है। लेकिन यहां तो चार अरब वर्षो के बाद दो बड़े आकाशगंगा एक दूसरे से विलय करेंगी। एंड्रोमेडा आकाशगंगा जो की एक अण्डाकार आकाशगंगा है और हमारी मिल्की वे एक सर्पीली आकाशगंगा। शोधकर्ताओं द्वारा भविष्यवाणी की गई है की इस अद्भुत टकराव के बाद दोनों आकाशगंगाओं की वर्तमान संरचना बिल्कुल बदल जायेगी खासकर मिल्की वे की सर्पीली संरचना।

    चित्र1: 3.75 अरब साल बाद एंड्रोमेडा और मिल्की वे लगभग आमने सामने आ जायेंगे और अंतरिक्ष से वो नजारा कुछ ऐसा ही दिखाई देगा। Credit: NASA/ESA/Z. Levay/R. van der Marel/T. Hallas/A. Melliger.

    चित्र1: 3.75 अरब साल बाद एंड्रोमेडा और मिल्की वे लगभग आमने सामने आ जायेंगे और अंतरिक्ष से वो नजारा कुछ ऐसा ही दिखाई देगा। Credit: NASA/ESA/Z. Levay/R. van der Marel/T. Hallas/A. Melliger.

    फ़िलहाल एंड्रोमेडा गैलेक्सी हमारी आकाशगंगा से 250 लाख प्रकाश वर्ष दूर है लेकिन गुरुत्वाकर्षण के पारस्परिक पुल के कारण एंड्रोमेडा लगभग 70 मील/110 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से हमारी आकाशगंगा के पास आ रहा है। इस दर से यदि अनुमान लगाया जाय तो यह टक्कर शुरू होने से लगभग चार अरब वर्ष शेष हैं। हालांकि जब मिल्की वे और एंड्रोमेडा एक-दूसरे से विलय करना आरंभ करेंगे तो उनके लिए पूरी तरह से एक दूसरे में विलीन हो जाने और एक नये विशाल अण्डाकार आकाशगंगा के रूप में निर्मित होने में एक या दो अरब साल और लगेंगे। इसके अलावा नासा के अनुसार, स्थानीय समूह की तीसरी सबसे बड़ी आकाशगंगा, त्रिकोणीय आकाशगंगा(M33) भी विलय की गई जोड़ी के चारों ओर अपनी कक्षा स्थापित करेंगी लेकिन अंततः बाद की तारीख में M33 भी उन दोनों एकीकृत होते आकाशगंगाओं के साथ विलय कर सकती है ऐसा वैज्ञानिकों को उम्मीद है।

    एंड्रोमेडा आकाशगंगा में लगभग एक ट्रिलियन तारे हैं और हमारी आकाशगंगा में लगभग 300 अरब सितारें है। इसके बावजूद दोनों आकाशगंगाओं में बहुत बड़ी जगह खाली है इसलिए वैज्ञानिकों को लगता है की आपस मे तारों के टकराने की संभावना बहुत कम हो सकती है। स्पेस टेलिस्कोप साइंस इंस्टीट्यूट(Space Telescope Science Institute, Baltimore) के वैज्ञानिक टोनी सोहं(Tony Sohn) का कहना है

    “जब हम कहते हैं की दो आकाशगंगाएं आपस मे टकराने जा रही है इसका मतलब है दोनों आकाशगंगाओं में उपस्थित डार्क मैटर का भी विलय होगा। डार्क मैटर अभी भी खगोलविज्ञानियों और कण भौतिकविदों के लिए अज्ञात क्षेत्र है लेकिन एक चीज सुनिश्चित है कि इन कणों को वर्तमान ब्रह्मांड में नहीं बनाया जा रहा है।”

     

    चित्र2: जब एंड्रोमेडा और मिल्की वे एकीकृत हो रहे होंगे तब M33 आकाशगंगा इन दोनों की परिक्रमा कर रही होगी। Credit: NASA/ESA/STScI/A.Felid/R. van der Marel.

    चित्र2: जब एंड्रोमेडा और मिल्की वे एकीकृत हो रहे होंगे तब M33 आकाशगंगा इन दोनों की परिक्रमा कर रही होगी। Credit: NASA/ESA/STScI/A.Felid/R. van der Marel.

    इन आकाशगंगाओं का विलय दोनों आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद अतिसंवेदनशील बड़े ब्लैक होल को पास ले आयेगा। ये ब्लैक होल एक-दूसरे की ओर बढ़ेंगे और अंत में जब वे बहुत करीब होंगे तो वे एक-दूसरे के गुरुत्वाकर्षण पुल से बच नहीं सकते हैं। बड़े ब्लैकहोल का विलय एक बहुत ही हिंसक घटना है जो अंतरिक्ष-समय के फैब्रिक के माध्यम से भारी गुरुत्वाकर्षण लहरों को अंतरिक्ष मे प्रसारित करते है। इन गुरुत्वाकर्षण लहरों की तीव्रता बहुत शक्तिशाली होती है और यह भी संभव है की बहुत सारे सितारों को आकाशगंगा से ही बाहर फेंक सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इन परिस्थितियों में हमारे सौर मंडल वर्तमान की तुलना में कही और नई कक्षा में स्थापित हो जाएगा।

    ऐसा भी नही है की वैज्ञानिकों ने अबतक किसी आकाशगंगा की टकराव को नही देखा है। कोर्वस नक्षत्र(Corvus constellation) में एंटीना आकाशगंगाओ NGC-4038 and 4039 की टक्कर आजतक चल रही है। इन दोनों युवा आकाशगंगाओं का टकराव करीब 200 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ था जो अबतक जारी है। ताजा आकड़ों के अनुसार इन आकाशगंगाओं और इनके घने क्षेत्रों के भीतर कई गोलाकार समूहों का गठन हो चुका है। इस टकराव में भी एक आकाशगंगा का आकार सर्पीली है इसलिये इस विलय को देखकर वैज्ञानिक, एंड्रोमेडा और मिल्की वे के साथ होने वाली टक्कर के बारे में उपयोगी अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं।

    ब्रह्मांड में इस प्रकार के आकाशगंगाओं का टकराव एक सामान्य प्रक्रिया हैं क्योंकि स्थानीय स्तर पर, गुरुत्वाकर्षण पुल ब्रह्मांड के समग्र विस्तार से अधिक शक्तिशाली होता है दूसरे शब्दों में कहा जाय तो गुरुत्वाकर्षण बल संपूर्ण ब्रह्मांड के विस्तार पर हावी हो जाता है। हमसब जानते है की ब्रह्माण्ड विस्तार कर रहा है लेकिन किसी एक गुब्बारा पर कई डॉट्स आसपास हो और उसे फुलाया जाता है तब वे डॉट्स काफी बड़े हो जाते है। इन ब्रह्माण्डीय परिस्थितियों में गुरुत्वाकर्षण बड़े वस्तुओं के लिए जीत जाता है और वस्तुओं को एक-दूसरे के निकट ले आता है। वास्तव में हमारी आकाशगंगा और एंड्रोमेडा के बीच की दूरी बहुत करीब मानी जाता है यह इतनी करीब है की इनके गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव ब्रह्मांड के विस्तार पर हावी है। वास्तव में गुरुत्वाकर्षण को एक कमजोर बल माना जाता है लेकिन यह ब्रह्माण्ड का असली नायक है।

    टोनी सोहं का कहना है

    “जब एंड्रोमेडा हमारी आकाशगंगा तक पहुचेगा उससे पहले ही सूर्य एक लाल विशालकाय तारा बन चुका होगा और इस तारे की सतह ने पहले से ही पृथ्वी को अपने घेरे में ले लिया होगा। हम इस खगोलीय टकराव को रोक तो नही पायेंगे और न ही देख सकते है लेकिन कम्प्यूटर सिमुलेशन हमे इस टकराव की झलक दिखा रहे है और भविष्य में अधिक सटीकता से दिखाते ही रहेंगे।”

    चित्र3: चित्रों की यह श्रृंखला हमे बताती है मिल्की वे आकाशगंगा और एंड्रोमेडा आकाशगंगा के बीच अबतक से लेकर टकराव की संभावित समय सीमा। छवियां दिखाती हैं की रात का आकाश कैसा दृष्टिगोचर होगा: वर्तमान दिन (पंक्ति 1, बाएं); 2 अरब वर्ष (पंक्ति 1, दाएं); 3.75 अरब वर्ष (पंक्ति 2, बाएं); 3.85 अरब साल (पंक्ति 2, दाएं); 3.9 बिलियन वर्ष (पंक्ति 3, बाएं); 4 अरब वर्ष (पंक्ति 3, दाएं); 5.1 अरब साल (पंक्ति 4, बाएं); और 7 अरब वर्ष (पंक्ति 4, दाएं)। Credit: NASA/ESA/Z. Levay/R. van der Marel/T. Hallas/A. Melliger.

    चित्र3: चित्रों की यह श्रृंखला हमे बताती है मिल्की वे आकाशगंगा और एंड्रोमेडा आकाशगंगा के बीच अबतक से लेकर टकराव की संभावित समय सीमा। छवियां दिखाती हैं की रात का आकाश कैसा दृष्टिगोचर होगा: वर्तमान दिन (पंक्ति 1, बाएं); 2 अरब वर्ष (पंक्ति 1, दाएं); 3.75 अरब वर्ष (पंक्ति 2, बाएं); 3.85 अरब साल (पंक्ति 2, दाएं); 3.9 बिलियन वर्ष (पंक्ति 3, बाएं); 4 अरब वर्ष (पंक्ति 3, दाएं); 5.1 अरब साल (पंक्ति 4, बाएं); और 7 अरब वर्ष (पंक्ति 4, दाएं)। Credit: NASA/ESA/Z. Levay/R. van der Marel/T. Hallas/A. Melliger.

     

    नोट: एंड्रोमेडा और मिल्की वे आकाशगंगाओं में स्थित तारों की संख्या पिछली शोध अध्ययन के अनुसार दर्शाये गए हो सकते है।

    ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं ने अपने ताजा शोध अध्ययन में कहा है की एंड्रोमेडा और हमारी आकाशगंगा मिल्की वे दोनों का आकार लगभग समान ही है और दोनों का द्रव्यमान लगभग 800 बिलियन सौर द्रव्यमान के बराबर है। 2014 में शोधकर्ताओं ने अपने शोध अध्ययन में एंड्रोमेडा को मिल्की वे से तीन गुनी बड़ी बतायी थी लेकिन ताजा शोध ने इसे पूरी तरह से नकार दिया है। इस पूरे शोध पत्र को 14.2.2018/Monthly Notices of the Royal Astronomical Society के जर्नल में प्रकाशित किया गया है जिसे Astronomy Magazine में भी पढ़ा जा सकता है।

    स्रोत: Astronomy magazine.

    लेखिका परिचय

    प्रस्तुति : पल्लवी कुमारी

    प्रस्तुति : पल्लवी कुमारी

    पलल्वी  कुमारी, बी एस सी प्रथम वर्ष की छात्रा है। वर्तमान  मे राम रतन सिंह कालेज मोकामा पटना मे अध्यनरत है।



  • हम तारों की दूरी कैसे ज्ञात कर लेते है ?
    • हम तारों की दूरी कैसे ज्ञात कर लेते है ?
    • हम कैसे बता पाते है की उस तारे की दूरी उतनी है इस तारे की दूरी इतनी है ?

    यह ऐसे सवाल है जो विज्ञान विश्व पृष्ठ पर सबसे ज्यादा लोगो ने सबसे ज्यादा बार पूछा है। ब्रह्माण्ड में स्थित तारों, ग्रहों या आकाशगंगाओं की दूरी को मापना कोई आसान काम नही होता क्योंकि पृथ्वी से इनकी दूरी आमतौर पर बहुत ज्यादा होती है। खगोलविज्ञानी ब्रह्माण्डीय दूरी को मापने के लिए कई विभिन्न तरीकों का उपयोग करते है। खगोलीय दूरी मापने में उपयोग होनेवाली सभी विधियां विज्ञान और गणित के अद्भुत संयोजन का उदाहरण है।

    • राडार मापन(Radar Measurement)
    • लंबन विधि(Parallax method)
    • सीफीड मापन(Cepheids Measurement)
    • सुपरनोवा मापन(la Supernova Measurement)
    • लाल विचलन और हबल सिद्धान्त द्वारा मापन(Redshift and Hubble’s Law Measurement)

    राडार मापन(Radar Measurement):

    राडार मापन(Radar Measurement)

    राडार मापन(Radar Measurement)

    :दूरी मापने का यह भी एक आधुनिक तरीका है। यह विधि इस तथ्य पर आधारित है की प्रकाश(रेडियो तरंग, माइक्रोवेव, दृश्य प्रकाश, X-किरण) 300000 km/s की रफ़्तार से यात्रा करता है। यह तकनीक सबसे सटीक मानी जाती है लेकिन इस विधि की भी अपनी सीमाएं है। खगोलविज्ञानी इस विधि से सौरमंडल तक कि दूरी तो निर्धारित कर सकते है लेकिन इससे अधिक दूरी के लिए यह विधि उपयोगी नही है। वैज्ञानिकों ने सौरमंडल में स्थित ग्रहों की दूरी निर्धारण के लिए इस तकनीक का उपयोग कई बार किया है खासकर पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी मापने के लिए यह सबसे नियमित तरीका है।

    इस विधि में पृथ्वी से संचारित संकेत(Transmitted signal) उस पिंड/ग्रह पर भेजे जाते है। संकेत उस ग्रह से टकराकर वापस लौटने पर पृथ्वी के संचारित केंद्रों द्वारा पकड़ लिए जाते है। वैज्ञानिक संचारित संकेतो के जाने और लौटने में लगने वाले समय को दर्ज कर लेते है इससे उस ग्रह की दूरी का पता लगा लिया जाता है।

    D(Distance) = V(Velocity) × T(Time)

    लंबन विधि(Parallax method):

    लंबन विधि(Parallax method)

    लंबन विधि(Parallax method)

    खगोलविज्ञानी अंतरिक्ष में स्थित किसी तारे की दूरी को पता करने के लिए सामान्यतः एक खास विधि का उपयोग करते है जिसे लंबन/तारकीय लंबन(Stellar Parallax) कहते है। दो विभिन्न बिंदुओं से किसी वस्तु की ओर देखने पर जो कोणीय विचलन(angular shift) प्रतीत होता है, उसे लंबन कहते हैं और इन बिंदुओं को मिलानेवाली आधार रेखा उस दूरस्थ वस्तु पर जो कोण बनाती है, उससे लंबन का निरूपण होता है। सरल शब्दों में लंबन दो अलग-अलग स्थानों से देखा गया किसी तारे की स्पष्ट स्थिति में अंतर ही है जो उसके बैकग्राउंड में स्थित वस्तुओं के कारण प्रतीत होता है। आधार रेखा जितनी ही बड़ी होगी(अर्थात्‌ प्रेक्षण के बिंदु जितने ही दूर होंगे) वस्तु पर कोण उतना ही बड़ा होगा और परिणाम में सटीकता/यथार्थता की संभावना भी उतनी ही ज्यादा होगी।

     प्रेक्षण स्थान A तथा B

    प्रेक्षण स्थान A तथा B

    अब सवाल है लंबन विधि द्वारा बड़ी दूरियों जैसे ग्रह अथवा तारे की दूरी का मापन हम कैसे करते है ? सबसे सरल तरीका है गणितीय विधि।

    किसी दूरस्थ तारे/ग्रह S की दूरी D ज्ञात करने के लिए, हम इसको पृथ्वी पर स्थित दो वेधशालाओं से भी प्रेक्षण कर सकते है लेकिन जैसा हमने ऊपर बताया की प्रेक्षण के बिंदु जितने ही ज्यादा दूर होंगे परिणाम की सटीकता उतना ही बेहतर होगी। इसलिए खगोलविज्ञानी पृथ्वी के परिक्रमण व्यास को अपनी प्रेक्षण बिंदु बनाते है इसके लिए बस खगोलविदों को 6 महीने के अंतराल पर प्रेक्षण करना पड़ता है।

    मान लीजिए प्रेक्षण बिंदु A तथा B है।

    A एवं B के बीच की दूरी AB = b

    पृथ्वी से जुलाई तथा जनवरी सूर्य की कक्षा की विपरीत दिशा वाली स्तिथियों मे किया निरीक्षण

    पृथ्वी से जुलाई तथा जनवरी सूर्य की कक्षा की विपरीत दिशा वाली स्तिथियों मे किया निरीक्षण

    इन दो स्थितियों से तारे की प्रेक्षण दिशाओं AS तथा BS के बीच का कोण θ = ∠ ASB माप लिया जाता है। यह कोण लम्बन कोण या लम्बनिक कोण(parallax angle) कहलाता है।
    तारे की पृथ्वी से दूरी D बहुत अधिक है अतः

    b << D

    इसलिए कोण θ बहुत ही छोटा है। अतः हम S को वृत्त का केंद्र, AS = D को त्रिज्या तथा AB = b चाप मान सकते हैं।

    ∵ त्रिज्या AS = BS,
    ∴ चाप AB = b
    ∵ कोण θ = चाप/त्रिज्या = AB/AS
    θ = b/D
    अतः तारे की दूरी
    D = b/θ

    इस सूत्र में मान रख कर लम्बन-विधि से ग्रह अथवा तारे की पृथ्वी से दूरी ज्ञात कर सकते हैं। यहाँ पर पृथ्वी के परिक्रमण व्यास को अपनी प्रेक्षण बिंदु बनाया गया है इसलिए वह दूरी 2AU(खगोलीय इकाई: Astronomical unit) है।

    ∴ तारे की दूरी D(Parsec) = 1/p(arcseconds).

    दूरस्थ तारों का लंबन कोण बहुत ही छोटा होता है उसका मापन अर्कसेकंड(arcseconds) में किया जाता है। चूंकि तारों की दूरी भी बहुत अधिक होती है इसलिए उसका मापन भी पारसेक(Parsec) में किया जाता है। यदि किसी तारे का लंबन कोण 0.723 अर्कसेकंड है तो उस तारे की दूरी होगी
    D = 1/0.723 = 1.38 पारसेक।

    लंबन विधि तारो की दूरी ज्ञात करने के लिए एक अच्छी विधि है लेकिन इस विधि की भी अपनी सीमाएं है। नजदीकी तारों की दूरी ज्ञात करने में यह विधि बेहद कारगर है लेकिन बहुत ज्यादा दूरी पर स्थित तारों के लिए यह विधि उपयोगी नही है। यदि ज्ञात लंबन कोण 0.01 अर्कसेकंड से भी छोटी है तब तारो की दूरी तय करना बड़ा कठिन होता है खासकर तब जब आपका प्रेक्षण बिंदु पृथ्वी पर ही स्थित हो क्योंकि ऐसी स्थितियों में पृथ्वी का वातावरण भी बड़ा प्रभाव डाल देता है। यही वजह है की पृथ्वी पर स्थित टेलिस्कोप के मुकाबले अंतरिक्ष में स्थित टेलिस्कोप तारों की दूरी संबंधित ज्यादा अच्छे परिणाम देते है। अंतरिक्ष में स्थित टेलिस्कोप 0.001 अर्कसेकंड/लंबन कोण पर भी दूरी का सटीक आकलन करने में सक्षम है।
    अभी भी आप सोच रहे होंगे की ये तो केवल 100 या 1000 पारसेक दूर स्थित तारों की दूरी ज्ञात करने की विधि है जबकि तारो की ब्रह्मांडीय दूरी तो बहुत ज्यादा है। यहां हम अन्य विधियों की भी चर्चा करेंगे जो बड़ी खगोलीय दूरी मापने में प्रयोग में लायी जाती है।

    सीफीड मापन(Cepheids Measurement):

    सीफीड मापन(Cepheids Measurement)

    सीफीड मापन(Cepheids Measurement)

    सीफीड मापन(Cepheids Measurement): सीफीड जिसे सीफीड परिवर्तन भी कहा जाता है। कुछ तारों में एक ख़ास गुण होता है वे अपने चमक को एक ख़ास अवधि में बढ़ाते और घटाते रहते है। वर्ष 1908 में, अमेरिकी खगोलविद हेनरिटा स्वान लीविट(Henrietta Swan Leavitt) जब मैग्लेनिक बादल(Magellanic Clouds) का अध्ययन कर रही थी तब उन्होंने एक तारे में इस गुण को देखा। उस तारे की चमक कभी तेज तो कभी मंद हो रही थी, उन्होंने उस तारे के अध्ययन के दौरान पाया की, उस तारे की उज्ज्वलता और मंदता का समय अवधि से बड़ा गहरा संबंध है। 1912 में प्रकाशित अपने अध्ययन में उन्होंने कहा सीफीड तारे एक निश्चित समय अंतराल में अपनी चमक में उतार चढ़ाव प्रदर्शित करते है।

    तारों का यह व्यवहार भी वैज्ञानिकों को दूरी मापने के लिए एक खगोलीय मापदंड प्रदान करता है जिससे वैज्ञानिक लाखों प्रकाशवर्ष दूर स्थित तारों की दूरी का आंकलन कर पाते है। सीफीड परिवर्तनशील तारे बेहद चमकीले होते है इन तारों की चमक सूर्य से 500 से 30000 गुणा तक ज्यादा हो सकती है। खगोल वैज्ञानिक सीफीड तारों की उज्ज्वलता और समय अवधि को बड़ी बारीकी से मापते है फिर पूर्ण और स्पष्ट आंकड़ो को दूरी मापांक समीकरण में स्थापित किया जाता है। इस तकनीक से लाखों प्रकाशवर्ष दूर स्थित तारों की दूरी का आंकलन किया जाता है। वैसे दूरी मापांक समीकरण को समझने से पहले आपको निरपेक्ष और सापेक्ष कांतिमान को समझना होगा।

    निरपेक्ष कांतिमान/चमक(Absolute Magnitude):

    निरपेक्ष कांतिमान/चमक(Absolute Magnitude): निरपेक्ष कांतिमान किसी खगोलीय वस्तु के अपने चमकीलेपन को कहते हैं। मिसाल के लिए अगर किसी तारे के निरपेक्ष कांतिमान की बात हो रही हो तो यह देखा जाता है कि यदि वह तारा ठीक 10 पारसेक की दूरी पर होता तो वह कितना चमकीला लगता। यदि सूर्य हमसे 10 पारसेक की दूरी पर होता तो वह कितना चमकीला हमें दिखता। वैसे सूर्य का मैग्निट्यूड -26.7 है यदि 10 पारसेक दूर सूर्य को भेज दे तो उसका मैग्निट्यूड +4.8 हो जाएगा। सरल शब्दों में आप कह सकते है की सूर्य का निरपेक्ष चमक +4.8 है।

    सापेक्ष कांतिमान/चमक(Apparent Magnitude)

    सापेक्ष कांतिमान/चमक(Apparent Magnitude): सापेक्ष कांतिमान किसी खगोलीय वस्तु के पृथ्वी पर बैठे प्रेक्षक द्वारा प्रतीत होने वाले चमकीलेपन को कहते हैं। सापेक्ष कान्तिमान को मापने के लिए यह शर्त होती है कि आकाश में कोई बादल, धूल, वगैरा न हो और वह वस्तु साफ़ देखी जा सके। निरपेक्ष कांतिमान और सापेक्ष कांतिमान दोनों को मापने की इकाई मैग्निट्यूड(Magnitude) है।

    एक निरीक्षक दो तारों को देखता है, तारा A दूसरे तारे B की तुलना मे अधिक दीप्तीमान दिखता है क्योंकि वह अधिक पास है। किसी तारे का निरपेक्ष कांतिमान/चमक(Absolute Magnitude) 10 पैरासेक की दूरी से दिखने वाली दीप्ती है। यदि तारा A तथा B दोनो निरीक्षक से 10 पैरासेक दूरी पर हो तारा B तारा A की तुलना मे अधिक चमकदार दिखेगा।

    एक निरीक्षक दो तारों को देखता है, तारा A दूसरे तारे B की तुलना मे अधिक दीप्तीमान दिखता है क्योंकि वह अधिक पास है।
    किसी तारे का निरपेक्ष कांतिमान/चमक(Absolute Magnitude) 10 पैरासेक की दूरी से दिखने वाली दीप्ती है। यदि तारा A तथा B दोनो निरीक्षक से 10 पैरासेक दूरी पर हो तारा B तारा A की तुलना मे अधिक चमकदार दिखेगा।

    निरपेक्ष कान्तिमान किसी वस्तु की स्वयं की चमक का माप है और इसमें हमेशा यह देखा जाता है कि 10 पारसेक की मानक दूरी पर वह वस्तु कितनी रौशन लगती है। मिसाल के लिए अगर किसी तारे के निरपेक्ष कांतिमान की बात हो रही हो तो यह देखा जाता है कि यदि देखने वाला उस तारे के ठीक 10 पारसेक की दूरी पर होता और उन दोनों के बीच में कोई खगोलीय धूल वग़ैराह न हो तो वह तारा उसे कितना चमकीला लगता। इस तरह से “निरपेक्ष कांतिमान” और “सापेक्ष कांतिमान” में गहरा अंतर है।
    खगोलशास्त्र में खगोलीय कान्तिमान किसी खगोलीय वस्तु की चमक का माप है। इसका अनुमान लगाने के लिए लघुगणक(लॉगरिदम: Algorithm) का इस्तेमाल किया जाता है। मैग्निट्यूड के आंकडे परखते हुए एक ध्यान-योग्य चीज़ यह है के किसी वस्तु का मैग्निट्यूड जितना कम हो वह वस्तु उतनी ही अधिक चमकीली होती है। पृथ्वी पर बैठे हुए प्रेक्षक के लिए मैग्निट्यूड का मतलब है: +6 से अधिक मैग्निट्यूड वाली वस्तुएँ इतनी धुँधली होतीं हैं के बिना दूरबीन के देखी ही नहीं जा सकती। धुँधली-सी दिखने वाली एण्ड्रोमेडा गैलेक्सी का मैग्निट्यूड +3 है। आकाश में रोशन तारे, व्याध तारा, का मैग्निट्यूड -1 है। पूर्णिमा के पूरे चाँद का मैग्निट्यूड -13 है। चढ़े हुए सूरज का मैग्निट्यूड -26.7 है(यानि शुन्य से लगभग 27 कम)। वापस दूरी मापांक समीकरण पर आते है।

    उदाहरण के लिए, मान लीजिए एक खगोलविद ने 34 दिनों की अवधि के साथ एक सीफीड सितारा के उज्ज्वलता को मापा है। उस सीफीड तारे का निरपेक्ष कांतिमान -5.65 मैग्निट्यूड है जबकि उसका सापेक्ष कांतिमान +23.0 मैग्निट्यूड दर्ज किया गया है। अब खगोलविज्ञानी इस दूरी मापांक समीकरण का उपयोग कर सकते है।

    m – M = 5 log d – 5

    यहाँ, m = सापेक्ष कांतिमान, M = निरपेक्ष कांतिमान, d = दूरी पारसेक(pc).
    व्यवस्थित करने पर,
    d = 10^(m – M + 5)/5 parsecs
    सीफीड तारे के आंकड़े रखने पर,
    d = 10^(23 – -5.65 + 5)/5 parsecs
    d = 10^6.73 parsecs
    d = 5.4 × 10^6 parsecs

    सीफीड मापन विधि से वैज्ञानिक द्वारा 1 किलो पारसेक से लेकर 50 मेगा पारसेक तक की दूरी का आंकलन किया जाता है। नासा के अनुसार भू-आधारित टेलिस्कोप इस विधि का उपयोग कर 13 मिलियन प्रकाशवर्ष दूर स्थित तारों की दूरी माप रहे है जबकि अंतरिक्ष में स्थापित हब्बल टेलिस्कोप या अन्य बड़े टेलिस्कोप तो 56 मिलियन प्रकाशवर्ष से ज्यादा दूरी तक इस तकनीक का बेहतर उपयोग कर रहे है।

    सुपरनोवा मापन(la Supernova Measurement):

    टायको द्वारा देखे गये सुपरनोवा के अवशेष

    टायको द्वारा देखे गये सुपरनोवा के अवशेष

    सुपरनोवा मापन(la Supernova Measurement): खगोलशास्त्र में सुपरनोवा किसी तारे के भयंकर विस्फोट को कहते हैं। सुपरनोवा नोवा से अधिक बड़ा धमाका होता है और इस से निकलता प्रकाश और विकिरण इतना ज़ोरदार होता है के कुछ समय के लिए अपने आगे पूरी आकाशगंगा को भी धुंधला कर देता है लेकिन फिर धीरे-धीरे ख़ुद धुंधला हो जाता है। जब तक सुपरनोवा अपनी चरमसीमा पर होता है, वह कभी-कभी कुछ ही हफ़्तों या महीनो में इतनी उर्जा प्रसारित कर सकता है जितनी की हमारा सूरज अपने अरबों साल के जीवनकाल में करेगा।

    सुपरनोवा तारें खगोलविज्ञानियों के लिए बड़े काम की चीज है क्योंकि सुपरनोवा तारा विस्फोट से गैसों के बादल अंतरिक्ष में प्रसारित हो जाते हैं। ये गैसें नये तारों के निर्माण हेतु कच्चे पदार्थ(raw materials) प्रदान करते है साथ ही सुपरनोवा तारें खगोलीय दूरी मापने के काम भी आते है।

    मानक दीपस्तंभ(Satandard Candle) से खगोलीय दूरीयों का मापन यदि आप जानते है कि यह तारा समान शक्ति के स्रोत का है तो एक विशिष्ट क्षेत्र मे उससे उत्सर्जित फोटानो की गणना कर उस स्रोत की दूरी ज्ञात की जा सकती है।(If you know you have same source strength of light, then counting the number of photons through a standard area detactor tells you the distance to source) किसी बिंदु स्रोत से उत्सर्जित प्रकाश के फोटानो मे व्युत्क्रम वर्ग नियम के अनुसार कमी होती है जो कि सीधे सीधे एक ज्यामितिय संबंध है।(Light from a point source drops off according to the inverse square law, a strictly geometrical relationship.)

    मानक दीपस्तंभ(Satandard Candle) से खगोलीय दूरीयों का मापन यदि आप जानते है कि यह तारा समान शक्ति के स्रोत का है तो एक विशिष्ट क्षेत्र मे उससे उत्सर्जित फोटानो की गणना कर उस स्रोत की दूरी ज्ञात की जा सकती है।(If you know you have same source strength of light, then counting the number of photons through a standard area detactor tells you the distance to source) किसी बिंदु स्रोत से उत्सर्जित प्रकाश के फोटानो मे व्युत्क्रम वर्ग नियम के अनुसार कमी होती है जो कि सीधे सीधे एक ज्यामितिय संबंध है।(Light from a point source drops off according to the inverse square law, a strictly geometrical relationship.)

    जब खगोलीय दूरी बहुत ज्यादा होती है तब लंबन विधि(parallax method) या सिफीड परिवर्तन(Cepheid variables) विधियों से दूरी का प्रत्यक्ष आंकलन करना संभव नही होता। खगोलविज्ञानियों के अनुसार जब 1 बिलियन प्रकाशवर्ष से ज्यादा की दूरी हो तो लंबन या सिफीड परिवर्तन विधियां सीधे तौर पर काम मे नही आती ऐसी स्थितियों में वैज्ञानिक सुपरनोवा तारें के माध्यम से खगोलीय दूरी का आंकलन करते है। खगोलविदों तब मानक दीपस्तंभ(standard candles) मानी जानेवाली सुपरनोवा को उपयोग में लाने वाली तरीकों की ओर अपना ध्यान केंद्रित करती है। इस तकनीक में वैज्ञानिक सर्वप्रथम किसी ऐसे पिंड को चुनते है जिसका निरपेक्ष कांतिमान उन्हें ज्ञात हो फिर तुलनात्मक रूप से देखा जाता है की वह पिंड अपने सापेक्ष किसी सुपरनोवा विस्फ़ोट से कितनी तीव्रता का प्रकाश ग्रहण करता है। इसी तुलनात्मक आधार पर किसी मापे जानेवाले पिंड(जिस खगोलीय पिंड के दूरी का मापन करना हो) का निरपेक्ष/सापेक्ष कांतिमान का आंकलन किया जाता है। अब प्रकाश तीव्रता का व्युत्क्रम वर्ग नियम(inverse square law for light intensity) का उपयोग खगोलीय दूरी मापन के काम मे लाया जाता है। कुछ विशेष प्रकार के सुपरनोवा की अनूठी विशेषताओं और विशाल चमक खगोलीय दूरी निर्धारित करने की अनुमति हमें देते रहे है।

    खगोलविज्ञानी सुपरनोवा के दूरी का आंकलन ज्यादातर सिफीड परिवर्तन के आधार पर करते है क्योंकि उसकी चमक बढ़ जाती है और फिर बाद में मंद हो जाती है। कुछ सुपरनोवा ऐसे होते है जो नियमित समय अंतराल में अपनी चमक को तेज और मंद करते है ऐसे सुपरनोवा को la प्रकार(type Ia) का सुपरनोवा कहा जाता है। खगोलविज्ञानी la प्रकार के सुपरनोवा की अधिकतम चमक(1/distance^2 rule) को ज्ञात करते है जो एक प्रकाशवर्ष की दूरी तक सभी तारों के लिए समान मानी जाती है। इस प्रकार के la सुपरनोवा हमारे मानक मोमबत्तियां(standard candles) मानी जाती है।

    यदि दूर की आकाशगंगा की दूरी की मापन करना हो तो सबसे पहले वैज्ञानिक एक प्रकार के la सुपरनोवा का पता लगाते है और फिर उसकी चमक को नियमित रूप से मापा जाता है। इस प्राप्त परिणाम की तुलना ऐसे सभी सुपरनोवों द्वारा प्राप्त ज्ञात अधिकतम उज्ज्वलता के साथ किया जाता है। इस विधि से आकाशगंगाओं की दूरी निर्धारित करने में मदद मिलती है। नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार, चूंकि सुपरनोवा बेहद उज्ज्वल होता है इसलिए यह विधि बहुत बड़ी दूरियों के लिए उपयोगी है। फ़िलहाल लगभग एक अरब प्रकाशवर्ष से लेकर 6 अरब प्रकाशवर्ष तक की दूरियों के लिए यह विधि ज्यादा उपयोग में लायी जा रही है।

    लाल विचलन और हबल सिद्धान्त द्वारा मापन(Redshift and Hubble’s Law Measurement)

    लाल विचलन और हबल सिद्धान्त द्वारा मापन(Redshift and Hubble’s Law Measurement): अमेरिकी खगोलविज्ञानी एडविन पॉवेल हबल(Edwin Powell Hubble) ने सन 1929 में अपने खगोलीय प्रेक्षण से यह खोज निकाला की कोई आकाशगंगा पृथ्वी से जितनी दूर होती है वह उतनी ही तेजी से पृथ्वी से और दूर होती जाती है। उन्होंने खगोलीय प्रेक्षण के दौरान पाया की आकाशगंगा जितनी दूर हो उन आकाशगंगाओं से आने वाले प्रकाश का डॉप्लर प्रभाव उतना ही अधिक होता है, सरल शब्दों में कहे तो उनके प्रकाश में लालिमा अधिक प्रतीत होती है क्योंकि उनसें उत्सर्जित प्रकाश वर्णक्रम में लाल रंग की ओर विचलित हो रहा है। इसे हबल सिद्धांत कहा जाता है और इसका सीधा अर्थ यह निकला की हमारा ब्रह्माण्ड निरंतर फैल रहा है। यह सिद्धांत खगोलशास्त्र मे आकाशीय पिंडों की गति और दूरी को मापने के लिये उपयोग मे लाया जाता है। इस विधि से खगोलीय दूरी मापने से पहले आपको डाप्लर प्रभाव और लाल विचलन को भलीभांति समझना होगा।

    डाप्लर प्रभाव(Doppler effect)

    डाप्लर प्रभाव(Doppler effect): यह किसी तरंग की तरंगदैधर्य(wavelength) और आवृत्ती(frequency) मे आया वह परिवर्तन है जिसे उस तरंग के श्रोत के पास आते या दूर जाते हुये निरीक्षक द्वारा महसूस किया जाता है। यह प्रभाव आप किसी अपने निकट पहुंचते वाहन की ध्वनी और दूर जाते वाहन की ध्वनी मे आ रहे परिवर्तनो से महसूस कर सकते है। इसे वैज्ञानिक रूप से देंखे तो होता यह है कि आप से दूर जाते वाहन की ध्वनी तरंगो(Sound waves) का तरंगदैधर्य बढ जाती है, और पास आते वाहन की ध्वनी तरंगो का तरंगदैधर्य कम हो जाती है। दूसरे शब्दो मे जब तरंगदैधर्य बढ जाती है तब आवृत्ती कम हो जाती है और जब तरंगदैधर्य कम हो जाती है आवृत्ती बढ जाती है।

    लाल विचलन (Red Shift):

    लाल विचलन(Redshift)

    लाल विचलन(Redshift)

    लाल विचलन (Red Shift): यह वह प्रक्रिया जिसमे किसी पिंड से उत्सर्जीत प्रकाश वर्णक्रम मे लाल रंग की ओर विचलीत होता है। वैज्ञानिक तौर से यह उत्सर्जीत प्रकाश किरण की तुलना मे निरिक्षित प्रकाश किरण के तरंगदैधर्य मे हुयी बढोत्तरी या उसकी आवृती मे कमी है। दूसरे शब्दो मे प्रकाश श्रोत से प्रकाश के पहुंचने तक प्रकाश किरणो के तरंगदैधर्य मे हुयी बढोत्तरी या उसकी आवृती मे कमी होती है।

    प्रकाश किरणों मे लाल रंग की प्रकाश किरणों का तरंगदैधर्य सबसे ज्यादा होता है, इसलिये किसी भी रंग की किरण का वर्णक्रम मे लाल रंग की ओर विचलन ‘लाल विचलन’ कहलाता है। यह प्रक्रिया अप्रकाशिय किरणों (गामा किरणें, X किरणें, पराबैगनी किरणें) के लिये भी लागु होती है और इसी नाम से जानी जाती है। वैसी किरणें जिनका तरंगदैधर्य लाल रंग की किरणों से भी ज्यादा होता है (अवरक्त किरणें(infrared), सूक्ष्म तरंगें(Microwave), रेडीयो तरंगें) यह विचलन लाल रंग से दूर होता है।

    सामान्यतः लाल विचलन उस समय होता है जब प्रकाश श्रोत प्रकाश निरिक्षक से दूर जाता है, बिलकुल ध्वनी तरंगो के डाप्लर सिद्धांत की तरह !

    खगोलविज्ञानी दूर की आकाशगंगाओं के लाल विचलन को सटीकता से मापने के लिए स्पेक्ट्रोस्कोपी(spectroscopy) का उपयोग करते है। प्रकाश किरणें जब किसी प्रिज्म पर पड़ती है तब वह सात रंगों(ROYGBIV) में विभक्त हो जाती है इसे ही स्पेक्ट्रम या स्पेक्ट्रा(spectrum) कहते है। खगोलविज्ञानी सितारों या आकाशगंगाओं से प्राप्त स्पेक्ट्रम को सामान्य स्पेक्ट्रम से उसकी तुलना करते है। ये उत्सर्जित वर्णक्रम किसी रासायनिक तत्व या रासायनिक यौगिक से उत्पन्न होने वाले विद्युतचुंबकीय विकिरण होते है जो हमें अरबों प्रकाशवर्ष दूर स्थित तारों व ग्रहों की रसायनिक रचना समझने में भी मददगार होते है। वैज्ञानिक तुलनात्मक रूप से देखते है की अवशोषण या उत्सर्जन वर्णक्रम लाइनें कितनी स्थानांतरित(shift) हो जाती है इससे पता चलता है की वह पिंड हमसे कितना दूर है।

    बहुत-बहुत दूर स्थित पिंडो ख़ासकर क्वासर(quasars) जैसे पिंड के वर्णक्रम स्पेक्ट्रोस्कोपी के माध्यम से भी बहुत धुँधले दिखाई देते है क्योंकि इनका लाल विचलन बहुत ज्यादा होता है। ऐसी स्थितियों में वैज्ञानिक फोटोमेट्रिक रेडशिफ्ट(photometric redshifts) से लाल विचलन का पता लगाते है। स्पेक्ट्रोस्कोपी से प्राप्त स्पेक्ट्रम यदि ज्यादा धुंधला हो तो विभिन्न फिल्टर के माध्यम से भी स्पेक्ट्रम का अध्ययन किया जाता है। लाल विचलन को लाल विचलन पैरामीटर z(redshift parameter z) से सूचित किया जाता है।

    z = (λobserved – λemitted)/λemitted.

    यहां, λobserved = स्पेक्ट्रम लाइन में देखा गया तरंगदैर्ध्य
    λemitted = सामान्य अवस्था मे स्रोत का तरंगदैर्ध्य

    यहाँ आप ध्यान दे, z आपको वर्षों की संख्या बताता है जो वस्तु से प्रकाश आपके पास पहुँचने में लगा समय है। यह पृथ्वी से उस वस्तु की वास्तविक दूरी नहीं है क्योंकि ब्रह्मांड विस्तार कर रहा है इसलिए वस्तु, z संख्या के मुकाबले पृथ्वी से बहुत दूर होती है।

    हब्बल डीप फ़िल्ड

    हब्बल डीप फ़िल्ड

    हमसब जानते है, कोई आकाशगंगा पृथ्वी से जितनी दूर होती है वह उतनी ही तेजी से पृथ्वी से और दूर होती जा रही है और इसे हबल स्थिरांक परिभाषित करता है। जिसे गणितीय रूप से इस समीकरण से प्रदर्शित किया जाता है।
    V = H × D ….(1)
    V = HoD ….(2)
    यहां V= वेग, H/Ho = हबल स्थिरांक, D = दूरी

    हालांकि हबल स्थिरांक का सटीक मान अभी भी कुछ अनिश्चित है लेकिन आम तौर पर दूरी के प्रत्येक मेगापारसेक के लिए लगभग 65~71 किलोमीटर प्रति सेकेंड माना जाता है। एक मेगापारसेक(1Mpc) का मतलब 3×10^6 प्रकाशवर्ष होता है। इसका मतलब यह है की एक आकाशगंगा यदि हमसे 1 मेगापारसेक दूर हो तो 65 Km/s की रफ्तार से दूर होता जा रहा है जबकि कोई आकाशगंगा यदि 100 मेगापारसेक की दूरी पर हो तो वह इससे 100 गुना तेज गति से दूर होती जाएगी। हबल स्थिरांक ब्रह्मांड का विस्तार करने वाली दर को दर्शाता है।

    खगोलविज्ञानियों द्वारा स्पेक्ट्रम के इस बदलाव से उसकी लाल विचलन पैरामीटर z निर्धारित करते है। इस लाल विचलन z के आधार पर यह पता चलता है की प्रकाश को स्रोत/आकाशगंगा से पृथ्वी पर आने में कितना समय लगा। इतनी दूरी पर वहाँ विस्तार की दर को हबल समीकरण से ज्ञात किया जाता है और फिर पृथ्वी से उस पिंड की दूरी निर्धारित की जाती है। यहां आप यह भी ध्यान दें की दूरी निर्धारित करने की यह विधि अवलोकन(स्पेक्ट्रम में बदलाव) और एक सिद्धांत(हबल सिद्धान्त) पर आधारित है। यदि हबल सिद्धांत सही नहीं है, तो इस तरह से दूरी का आंकलन करना गलत हो सकता है लेकिन अधिकांश खगोलविदों का मानना है की हबल सिद्धांत ब्रह्माण्ड में दूरी की एक बड़ी रेंज के लिए बिल्कुल सही हैं। इस खगोलीय विधि से 1 अरब प्रकाशवर्ष से लेकर 30 अरब प्रकाशवर्ष तक की दूरी का आंकलन किया जा सकता है।

     

    स्रोत:

    • NASA.
    • Las Cumbres Observatory.
    • National Science Foundation.
    • Wikipedia.

    लेखिका परिचय

    प्रस्तुति : पल्लवी कुमारी

    प्रस्तुति : पल्लवी कुमारी

    पलल्वी  कुमारी, बी एस सी प्रथम वर्ष की छात्रा है। वर्तमान  मे राम रतन सिंह कालेज मोकामा पटना मे अध्यनरत है।



  • स्टीफन विलियम हॉकिंग : ब्लैक होल को चुनौती देता वैज्ञानिक
  • विश्व प्रसिद्ध महान वैज्ञानिक और बेस्टसेलर रही किताब ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ के लेखक स्टीफन हॉकिंग ने शारीरिक अक्षमताओं को पीछे छोड़ते हु्ए यह साबित किया कि अगर इच्छा शक्ति हो तो व्यक्ति कुछ भी कर सकता है।

    हमेशा व्हील चेयर पर रहने वाले हॉकिंग किसी भी आम मानव से इतर दिखते हैं। कम्प्यूटर और विभिन्न उपकरणों के ज़रिए अपने शब्दों को व्यक्त कर उन्होंने भौतिकी के बहुत से सफल प्रयोग भी किए हैं।

    यूनिवर्सिटी ऑफ़ केम्ब्रिज में गणित और सैद्धांतिक भौतिकी के प्रेफ़ेसर रहे स्टीफ़न हॉकिंग की गिनती आईंस्टीन के बाद सबसे बढ़े भौतकशास्त्रियों में होती है।

     

    स्टीफन विलियम हॉकिंग (जन्म 8 जनवरी 1942), एक विश्व प्रसिद्ध ब्रितानी भौतिक विज्ञानी, ब्रह्माण्ड विज्ञानी, लेखक और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में सैद्धांतिक ब्रह्मांड विज्ञान केन्द्र (Centre for Theoretical Cosmology) के शोध निर्देशक थे।

    स्टीफ़न हॉकिंग का जन्म 8 जनवरी 1942 को फ्रेंक और इसाबेल हॉकिंग के घर में हुआ। परिवार वित्तीय बाधाओं के बावजूद, माता पिता दोनों की शिक्षा ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में हुई जहाँ फ्रेंक ने आयुर्विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की और इसाबेल ने दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। वो दोनों द्वितीय विश्व युद्ध के आरम्भ होने के तुरन्त बाद एक चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में मिले जहाँ इसाबेल सचिव के रूप में कार्यरत थी और फ्रेंक चिकित्सा अनुसंधानकर्ता के रूप में कार्यरत थे।

     

    महत्वपूर्ण पड़ाव

    1. वर्ष 1942 में 8 जनवरी को स्टीफ़न का जन्म इंग्लैंड के ऑक्सफ़ोर्ड में हुआ था
    2. वर्ष 1959 में वो नेचुरल साइंस की पढ़ाई करने ऑक्सफ़ोर्ड पहुंचे और इसके बाद कैम्ब्रिज में पीएचडी के लिए गए
    3. वर्ष 1963 में पता चला कि वो मोटर न्यूरॉन बीमारी से पीड़ित हैं और ऐसा कहा गया कि वो महज़ दो वर्ष जी पाएंगे
    4. वर्ष 1988 में उनकी किताब ए ब्रीफ़ हिस्टरी ऑफ़ टाइम आई जिसकी एक करोड़ से ज़्यादा प्रतियां बिकीं
    5. वर्ष 2014 में उनके जीवन पर द थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग बनी जिसमें एडी रेडमैन ने हॉकिंग का किरदार अदा किया था
    6. वर्ष 2018 मृत्यु

    स्टीफ़न हॉकिंग का विज्ञान जगत को योगदान

    हॉकिंग भौतिक विज्ञान के कई अलग-अलग लेकिन समान रूप से मूलभूत क्षेत्र जैसे गुरुत्वाकर्षण, ब्रह्मांड विज्ञान, क्वांटम थ्योरी, सूचना सिद्धांत और थर्मोडायनमिक्स को एक साथ ले आए थे।

    ब्लैकहोल और बिग बैंग

    हॉकिंग का सबसे उल्लेखनीय काम ब्लैक होल के क्षेत्र में है। जब 1959 में हॉकिंग ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में स्नातक की पढ़ाई शुरू की थी उस दौर में वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल के सिद्धांत को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया था।

    न्यू जर्सी स्थित प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के जॉन व्हीलर ने इस पर बेहद बारीकी से काम करते हुए कथित रूप से ब्लैक होल के नाम तक रख दिए थे। ब्रिटेन को रोजर पेनरोज़ और सोवियत यूनियन के याकोफ़ जेलदोविच भी इसी विषय पर काम कर रहे थे।

    भौतिक विज्ञान में अपनी डिग्री हासिल करने के बाद हॉकिंग ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैंब्रिज कोस्मोलॉजिस्ट डेनिस स्काइमा के निर्देशन में पीएचडी शुरू की।

    सामान्य सापेक्षता (जेनरल रिलेटिविटी) और ब्लैक होल में फिर से पैदा हुई वैज्ञानिकों की दिलचस्पी ने उनका भी ध्यान खींचा। यही वो समय था जब उनकी असाधारण मानसिक क्षमता सामने आने लगी।

    और इसी दौरान उन्हें मोटर न्यूरॉन (एम्योट्रोफ़िक लेटरल सिलेरोसिस) जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित होने के बारे में पता भी चला। इसी बीमारी की वजह से उनका शरीर लकवाग्रस्त हो गया था।

    स्काइमा के दिशानिर्देशन में ही हॉकिंग ने बिग बैंग थ्योरी के बारे में सोचना शुरू किया था। आज उनके ब्रह्मांड के इस निर्माण के सिद्धांत को बहुत हद तक वैज्ञानिकों ने स्वीकार कर लिया है।

    हॉकिंग को अहसास हुआ कि बिग बैंग दरअसल ब्लैक होल का उलटा पतन ही है। स्टीफ़न हॉकिंग ने पेनरोज़ के साथ मिलकर इस विचार को और विकसित किया और दोनों ने 1970 में एक शोधपत्र प्रकाशित किया और दर्शाया कि सामान्य सापेक्षता का अर्थ ये है कि ब्रह्मांड ब्लैक होल के केंद्र (सिंगुलैरिटी) से ही शुरु हुआ होगा।

    इसी दौरान हॉकिंग की बीमारी बेहद बढ़ गई थी और वो बैसाखी के सहारे से भी चल नहीं पा रहे थे। 1970 के ही दशक में जब वो बिस्तर से बंध से गए थे उन्हें अचानक ब्लैक होल के बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ।

    इसके बाद ब्लेक होल के बारे में कई तरह की खोजें हुईं।

    • हॉकिंग ने बताया था कि ब्लेक होल का आकार सिर्फ़ बढ़ सकता है और ये कभी भी घटता नहीं है।
    • ये बात सामान्य प्रकट होती है। क्योंकि ब्लेक होल के पास जाने वाली कोई भी चीज़ उससे बच नहीं सकती और उसमें समा जाती है और इससे ब्लेक होल का भार बढ़ेगा ही।
    • ब्लेक होल का भार ही उसका आकार निर्धारित करता है जिसे उसके केंद्र की त्रिज्या से नापा जाता है। ये केंद्र (घटना क्षितिज) ही वो बिंदू होता है जिससे कुछ भी नहीं बच सकता।
    • इसकी सीमा किसी फूलते हुए ग़ुब्बारे की तरह बढ़ती रहती है।
    • लेकिन हॉकिंग ने आगे बढ़कर बताया था कि ब्लेक होल को छोटे ब्लेक होल में विभाजित नहीं किया जा सकता।
    • उन्होंने कहा था कि दो ब्लेक होल के टकराने पर भी ऐसा नहीं होगा। हॉकिंग ने ही मिनी ब्लैक होल का सिद्धांत भी दिया था।

    क्वांटम थ्योरी और जनरल रिलेटीविटी का मिलन

    हॉकिंग ने भौतिक विज्ञान उन दो क्षेत्रों को एक साथ ले आए जिन्हें अभी तक कोई भी वैज्ञानिक एक साथ नहीं ला पाया था। ये हैं क्वांटम थ्योरी और जनरल रिलेटीविटी।

    क्वांटम थ्यौरी के ज़रिए बेहद सूक्ष्म चीज़ों जैसे की परमाणु का विवरण दिया जाता है जबकि जनरल रिलेटीविटी (सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत) के ज़रिए ब्रह्मांडीय पैमाने पर तारों और आकाशगंगाओं जैसे पदार्थों का विवरण दिया जाता है।

    मूल रूप में ये दोनों सिद्धांत एक दूसरे से असंगत लगते हैं। सापेक्षता का सिद्धांत मानता है कि अंतरिक्ष किसी काग़ज़ के पन्ने की तरह चिकना और निरंतर है।

    लेकिन क्वांटम थ्योरी कहती है कि ब्रह्मांड की हर चीज़ सबसे छोटे पैमाने पर दानेदार है और असतत ढेरों से बनी है।

    थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग

    हाकिंग रेडीयेशन

    हाकिंग रेडीयेशन

    दुनियाभर के भौतिक वैज्ञानिक दशकों से इन दो सिद्धांतों को एक करने में जुटे थे जिससे कि ‘द थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग‘ या हर चीज़ के सिद्धांत तक पहुंचा जा सके। इस तरह का सिद्धांत आधुनिक भौतिक विज्ञान के लिए किसी पवित्र बंधन की तरह होता।

    अपने करियर के शुरुआती दौर में स्टीफ़न हॉकिंग ने इसी थ्योरी में दिलचस्पी दिखाई लेकिन ब्लेक होल का उनका विश्लेषण इस तक नहीं पहुंच सका।

    हालांकि ब्लेक होल की क्वांटम एनेलिसिस में उन्होंने पहले से मौजूद इन दोनों सिद्धांतों में पैबंद लगाने का काम किया।

    क्वांटम थ्योरी के मुताबिक कथित तौर पर रिक्त स्थान वास्तव में शून्य से दूर हैं क्योंकि अंतरिक्ष सभी पैमानों पर सुचारू रूप से बिलकुल रिक्त नहीं हो सकता। इसके बजाए यहां गतिविधियां हो रही हैं और ये जीवित है।

    अंतरिक्ष में कण लगातार उतपन्न हो रहे हैं और एक दूसरे से टकरा रहे हैं। इनमें एक कण है और एक प्रतिकण। इनमें से एक कण पर धनात्मक( पॉज़ीटिव) ऊर्जा है और दूसरे पर ऋणात्मक( नेगेटिव) ऐसे में कोई नई ऊर्जा उतपन्न नहीं हो रही है।

    ये दोनों कण एक दूसरे को इतनी जल्दी ख़त्म कर देते हैं कि इन्हें देखा( डिटेक्ट) नहीं किया जा सकता। नतीजतन इन्हें आभासी कण( वर्चुअल पार्टिकल) कहा जाता है।

    लेकिन हॉकिंग ने सुझाया था कि ये वर्चुअल कण वास्विक हो सकते हैं यदि इनका निर्माण ठीक ब्लैक होल के पास  होता है। हॉकिंग ने संभावना जताई थी कि इन दो कणों में से एक ब्लैक होल के भीतर चला जाएगा और दूसरा अकेला रह जाएगा।

    ये अकेला रह गया कण अंतरिक्ष में बाहर निकलेगा। यदि ब्लैक होल में ऋणात्मक( नेगेटिव ऊर्जा) वाला कण समाया है तो ब्लैक होल की कुल ऊर्जा कम हो जाएगी और इससे उसका भार भी कम हो जाएगा और दूसरा कण  धनात्मक(पॉज़ीटिव) ऊर्जा लेकर अंतरिक्ष में चला जाएगा।

    इसका नतीजा ये होगा कि ब्लैक होल से ऊर्जा निकलेगी। इसी ऊर्जा को अब हॉकिंग विकिरण(रेडिएशन) कहा जाता है। हालांकि ये रेडिएशन लगातार कम होती रहती है। अपने इस सिद्धांत ने हॉकिंग ने अपने आप को ही ग़लत साबित कर दिया था।

    यानी ब्लैक होल का आकार कम हो सकता है। इसका ये अर्थ भी हो सकता है कि धीरे धीरे ब्लैक होल लुप्त हो जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो फिर वो ब्लैक होल होगा ही नहीं। यह संकुचन आवश्यक रूप से क्रमिक और शांत नहीं होगा।

    हॉकिंग ने अपनी थ्यौरी ऑफ़ एवरीथिंग से सुझाया था कि ब्रह्मांड का निर्माण स्पष्ट रूप से परिभाषित सिद्धांतों के आधार पर हुआ है।

    उन्होंने कहा था,

    “ये सिद्धांत हमें इस सवाल का जवाब देने के लिए काफ़ी हैं कि ब्रह्मांड का निर्माण कैसे हुआ, ये कहां जा रहा है और क्या इसका अंत होगा और अगर होगा तो कैसे होगा? अगर हमें इन सवालों का जवाब मिल गया तो हम ईश्वर के दिमाग़ को समझ पाएंगे।”

    फ़िल्मो, टीवी धारावाहिको मे स्टीफ़न हाकिंग

    लोकप्रिय टीवी धारावाहिक बिग बैंग थ्योरी मे

    लोकप्रिय टीवी धारावाहिक बिग बैंग थ्योरी मे

    स्टीफ़न हॉकिंग शायद आधुनिक दौर के सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक हैं. लेकिन अशक्त बना देने वाली बीमारी के ख़िलाफ़ संघर्ष और, तुंरत पहचान में आने वाली अपनी रोबोट जैसी आवाज़ और स्टार ट्रेक, द सिंपसन जैसे शो में दिखाई दिये है।

    उनके जीवन के इन्हीं रहस्यों से पर्दा उठाती, इस मशहूर ब्रिटिश वैज्ञानिक के जीवन पर आधारित एक फ़िल्म बन चुकी है। अपने जीवन पर बनी इस फ़िल्म के बारे में पूछने पर हॉकिंग कहते हैं

    ”यह फ़िल्म विज्ञान पर केंद्रित है, और शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे लोगों को एक उम्मीद जगाती है। 21 वर्ष की उम्र में डॉक्टरों ने मुझे बता दिया था कि मुझे मोटर न्यूरोन नामक लाइलाज बीमारी है और मेरे पास जीने के लिए सिर्फ दो या तीन साल हैं। इसमें शरीर की नसों पर लगातार हमला होता है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इस बीमारी से लड़ने के बारे में मैने बहुत कुछ सीखा”।

    स्टीफन हाकिंग के जीवन पर बनी फ़िल्म " थ्योरी आफ़ एवरीथींग "

    स्टीफन हाकिंग के जीवन पर बनी फ़िल्म ” थ्योरी आफ़ एवरीथींग “

    हॉकिंग का मानना है कि हमें वह सब करना चाहिए जो हम कर सकते हैं, लेकिन हमें उन चीजों के लिए पछताना नहीं चाहिए जो हमारे वश में नहीं है।

    ‘परिवार और दोस्तों के बिना कुछ नहीं’

    यह पूछने पर कि क्या अपनी शारीरिक अक्षमताओं की वजह से वह दुनिया के सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक बन पाए, हॉकिंग कहते हैं,

    ”मैं यह स्वीकार करता हूँ मैं अपनी बीमारी के कारण ही सबसे उम्दा वैज्ञानिक बन पाया, मेरी अक्षमताओं की वजह से ही मुझे ब्रह्माण्ड पर किए गए मेरे शोध के बारे में सोचने का समय मिला। भौतिकी पर किए गए मेरे अध्ययन ने यह साबित कर दिखाया कि दुनिया में कोई भी विकलांग नहीं है।”

    हॉकिंग को अपनी कौन सी उपलब्धि पर सबसे ज्यादा गर्व है? हॉकिंग जवाब देते हैं

    ”मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मैंने ब्रह्माण्ड को समझने में अपनी भूमिका निभाई। इसके रहस्य लोगों के लिए खोले और इस पर किए गए शोध में अपना योगदान दे पाया। मुझे गर्व होता है जब लोगों की भीड़ मेरे काम को जानना चाहती है।”

    हॉकिंग के मुताबिक यह सब उनके परिवार और दोस्तों की मदद के बिना संभव नहीं था। यह पूछने पर कि क्या वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं हॉकिंग कहते हैं,

    ”लगभग सभी मांसपेशियों से मेरा नियंत्रण खो चुका है और अब मैं अपने गाल की मांसपेशी के जरिए, अपने चश्मे पर लगे सेंसर को कम्प्यूटर से जोड़कर ही बातचीत करता हूँ।”

    मरने के अधिकार जैसे विवादास्पद मुद्दे पर हॉकिंग बीबीसी से कहते हैं,

    ”मुझे लगता है कि कोई भी व्यक्ति जो किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित है और बहुत ज्यादा दर्द में है उसे अपने जीवन को खत्म करने का अधिकार होना चाहिए और उसकी मदद करने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह की मुकदमेबाजी से मुक्त होना चाहिए।”

    स्टीफन हॉकिंग आज भी नियमित रूप से पढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय जाते हैं, और उनका दिमाग आज भी ठीक ढंग से काम करता है। ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी को समझने में उन्होंने अहम योगदान दिया है। उनके पास 12 मानद डिग्रियाँ हैं और अमेरिका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान उन्हें दिया गया है।

    2014 की उनकी एक वार्ता के अंश

    “इस ब्रह्माण्ड से अधिक बड़ा या पुराना कुछ नहीं है। मैं जिन प्रश्नों की बाबत बात करना चाहूँगा वे हैं: पहला, हम कहाँ से आये? ब्रह्माण्ड अस्तित्व में कैसे आया? क्या हम इस ब्रह्माण्ड में अकेले हैं? क्या कहीं और भी ‘एलियन’ जीवन है? मानव जाति का भविष्य क्या है?

    1920 के दशक तक हर कोई सोचता था कि ब्रह्माण्ड मूलतः स्थिर और समय के सापेक्ष अपरिवर्तनशील है। फिर यह खोज हुई कि ब्रह्माण्ड फैल रहा था। सुदूर तारामंडल हमसे और दूर जा रहे थे। इसका अर्थ यह हुआ कि पहले वे एक दूसरे के नज़दीक रहे होंगे। यदि हम पीछे इसके विस्तार में जाएं तो पाएंगे कि आज से करीब 15 बिलियन वर्ष पहले हम सब एक दूसरे के ऊपर रहे होंगे। यही ‘बिग बैंग’ था, ब्रह्माण्ड की शुरुआत।

    लेकिन क्या बिग बैंग से पहले भी कुछ था? अगर नहीं था तो ब्रह्माण्ड की रचना किसने की? बिग बैंग के बाद ब्रह्माण्ड उस तरह अस्तित्व में क्यों आया जैसा वह है? हम सोचा करते थे कि ब्रह्माण्ड के सिद्धांत को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला यह कि कुछ नियम थे जैसे मैक्सवेल की समीकरण वगैरह और यह देखते हुए कि एक दिए गए समय में समूचे स्पेस में उसकी जो अवस्था थी उसमें सामान्य सापेक्षता ने ब्रह्माण्ड के विकास को निर्धारित किया। और दूसरा यह कि ब्रह्माण्ड की प्रारंभिक अवस्था का कोई प्रश्न ही नहीं था।

    पहले हिस्से में हमने अच्छी तरक्की की है, और अब हमें केवल सबसे चरम परिस्थितियों के अलावा अन्य सभी परिस्थितियों में विकास के नियमों का ज्ञान है। लेकिन अभी हाल के समय तक हमें ब्रह्माण्ड के लिए प्रारम्भिक परिस्थितियों की बाबत बहुत कम ज्ञान था। यह और बात है कि विकास के नियमों में इस तरह का वर्गीकरण और प्रारम्भिक परिस्थितियां अलग और विशिष्ट होने के साथ ही समय और स्पेस पर निर्भर होती हैं। चरम परिस्थितियों में, सामान्य सापेक्षता और क्वांटम थ्योरी समय को स्पेस में एक अलग आयाम की तरह व्यवहार करने देती हैं। इस से समय और स्पेस के बीच का अंतर मिट जाता है, और इसका यह अर्थ हुआ कि विकास के नियम प्रारम्भिक परिस्थितियों को भी निर्धारित कर सकते हैं। ब्रह्माण्ड अपने आप को शून्य में से स्वतःस्फूर्त तरीके से रच सकता है।

    इसके अलावा, हम एक प्रायिकता की गणना कर सकते हैं कि ब्रह्माण्ड अलग-अलग परिस्थितियों में अस्तित्व में आया था। ये भविष्यवाणियाँ कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड के WMAP उपग्रह के पर्यवेक्षणों, जो कि बहुत शुरुआत के ब्रह्माण्ड की एक छाप है, से बहुत ज्यादा मेल खाती हैं। हम समझते हैं कि हमने सृष्टि के रहस्य की गुत्थी को सुलझा लिया है। संभवतः हमने ब्रह्माण्ड का पेटेंट करवाकर हर किसी से उसके अस्तित्व के एवज़ में रॉयल्टी वसूलनी चाहिए।

    अब मैं दूसरे बड़े सवाल से मुख़ातिब होता हूँ – क्या हम अकेले हैं या ब्रह्माण्ड में और भी कहीं जीवन है? हम विश्वास करते हैं कि धरती पर जीवन स्वतःस्फूर्त ढंग से उपजा, सो यह संभव होना चाहिए कि जीवन दूसरे उपयुक्त ग्रहों पर भी अस्तित्व में आ सके जिनकी संख्या पूरी आकाशगंगा में काफी अधिक है ।

    लेकिन हम नहीं जानते कि जीवन सबसे पहले कैसे अस्तित्व में आया। हमारे पास इसके पर्यवेक्षणीय प्रमाणों के तौर पर दो टुकड़े उपलब्ध हैं। पहला तो 3।5 बिलियन वर्ष पुराने एक शैवाल के फॉसिल हैं। धरती 4.6 अरब वर्ष पहले बनी थी और शुरू के पहले आधे अरब सालों तक संभवतः बहुत अधिक गर्म थी। सो धरती पर जीवन अपने संभव हो सकने के आधे अरब वर्षों बाद अस्तित्व में आया जो कि धरती जैसे किसी गृह के दस अरब वर्षों के जीवनकाल के सापेक्ष बहुत छोटा कालखंड है। इससे यह संकेत मिलता है कि जीवन के अस्तित्व में आने की प्रायिकता काफी अधिक है। अगर यह बहुत कम होती तो आप उम्मीद कर सकते थे कि ऐसा होने में उपलब्ध पूरे दस अरब वर्ष लग सकते थे।

    दूसरी तरफ, ऐसा लगता है कि अब तक हमारे गृह पर अजनबी ग्रहों के लोगों का आगमन नहीं हुआ। मैं UFO’s की रपटों को नकार रहा हूँ। वे सनकियों या अजीबोगरीब लोगों तक ही क्यों पहुँचते हैं? अगर ऐसा कोई सरकारी षडयंत्र है जो इन रपटों को दबाता है और अजनबी ग्रहवासियों द्वारा लाये गए वैज्ञानिक ज्ञान को अपने तक सीमित रखना चाहता है, तो ऐसा लगता है कि यह नीति अब तक तो पूरी तरह से असफल रही है। और इसके अलावा SETI प्रोजेक्ट के विषद शोध के बावजूद हमने किसी भी तरह के एलियन टीवी क्विज़ शोज़ के बारे में नहीं सुना है। इससे संभवतः संकेत मिलता है कि हमसे कुछ सौ प्रकाशवर्ष की परिधि में हमारे विकास की अवस्था में कहीं कोई एलियन सभ्यता नहीं है। इसके लिए सबसे मुफ़ीद उपाय यह होगा कि एलियनों द्वारा अपहृत कर लिए जाने की अवस्था के लिए बीमा पालिसी जारी की जाएं।

    अब मैं सबसे आख़िरी बड़े प्रश्न पर आ पहुंचा हूँ; मानव सभ्यता का भविष्य। अगर हम पूरी आकाशगंगा में अकेले बुद्धिमान लोग हैं, तो हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारा अस्तित्व बना रहे और चलता रहे। लेकिन हम लोग अपने इतिहास के एक लगातार अधिक खतरनाक होते हुए दौर में प्रवेश कर रहे हैं। हमारी आबादी और हमारी धरती के सीमित संसाधनों का दोहन बहुत अधिक तेज़ी से बढ़ रहे हैं, साथ ही हमारी तकनीकी क्षमता भी बढ़ रही है कि हम पर्यावरण को अच्छे या बुरे दोनों के लिए बदल सकें। लेकिन हमारा आनुवांशिक कोड अब भी उन स्वार्थी और आक्रामक भावनाओं को लिए चल रहा है जो बीते हुए समय में अस्तित्व बचाए रखने के लिए लाभदायक होती थीं। अगले सौ सालों में विनाश से बच पाना मुश्किल होने जा रहा है, अगले हज़ार या दस लाख साल की बात तो छोड़ ही दीजिये।

    हमारे अस्तित्व के दीर्घतर होने का इकलौता अवसर इस बात में निहित है कि हम अपनी पृथ्वी ग्रह पर ही न बने रहें, बल्कि हमें अन्तरिक्ष में फैलना चाहिए। इन बड़े सवालों के उत्तर दिखलाते हैं कि पिछले सौ सालों में हमने उल्लेखनीय तरक्की की है। लेकिन यदि हम अगले सौ वर्षों से आगे भी बने, बचे रहना चाहते हैं तो हमारा भविष्य अन्तरिक्ष में है। इसीलिये मैं हमेशा ऐसी अन्तरिक्ष यात्राओं का पक्षधर रहा हूँ जिसमें मनुष्य भी जाएँ।

    अपनी पूरी ज़िन्दगी मैंने ब्रह्माण्ड को समझने और इन सवालों के उत्तर खोजने की कोशिश की है। मैं भाग्यशाली रहा हूँ कि मेरी विकलांगता गंभीर अड़चन नहीं बनी। वास्तव में इसके कारण मुझे उससे अधिक समय मिल सका जितना अधिकतर लोग ज्ञान की खोज में लगाते हैं। सबसे आधारभूत लक्ष्य है ब्रह्माण्ड के लिए एक सम्पूर्ण सिद्धांत, और हम अच्छी तरक्की कर रहे हैं।

    मैं समझता हूँ कि यह बहुत संभव है कि कुछ सौ प्रकाशवर्षों के दायरे में हम इकलौती सभ्यता हों; ऐसा न होता तो हमने रेडियो तरंगें सुनी होतीं। इसका विकल्प यह है कि सभ्यताएं बहुत लम्बे समय तक नहीं बनी रह पातीं, वे खुद अपना विनाश कर लेती हैं।”

    स्टीफ़न हॉकिंग को क्या बीमारी थी और वो उनसे कैसे हार गई?

    21 साल का एक नौजवान जब दुनिया बदलने का ख़्वाब देख रहा था तभी कुदरत ने अचानक ऐसा झटका दिया कि वो अचानक चलते-चलते लड़खड़ा गया।  शुरुआत में लगा कि कोई मामूली दिक्कत होगी लेकिन डॉक्टरों ने जांच के बाद एक ऐसी बीमारी का नाम बताया जिसने इस युवा वैज्ञानिक के होश उड़ा दिए। ये स्टीफ़न हॉकिंग की कहानी हैं जिन्हें 21 साल की उम्र में कह दिया गया था कि वो दो-तीन साल ही जी पाएंगे।

    कब पता चला बीमारी का?

    हॉकिंग का पालन-पोषण लंदन और सेंट अल्बंस में हुआ और ऑक्सफ़ोर्ड से फ़िजिक्स में फ़र्स्ट क्लास डिग्री लेने के बाद वो कॉस्मोलॉजी में पोस्टग्रेजुएट रिसर्च करने के लिए कैम्ब्रिज चले गए।

    साल 1963 में इसी यूनिवर्सिटी में अचानक उन्हें पता चला कि वो मोटर न्यूरॉन बीमारी से पीड़ित हैं। कॉलेज के दिनों में उन्हें घुड़सवारी और नौका चलाने का शौक़ था लेकिन इस बीमारी ने उनका शरीर का ज़्यादातर हिस्सा लकवे की चपेट में ले लिया। साल 1964 में वो जब जेन से शादी करने की तैयारी कर रहे थे तो डॉक्टरों ने उन्हें दो या ज़्यादा से ज़्यादा तीन साल का वक़्त दिया था।

    लेकिन हॉकिंग की क़िस्मत ने साथ दिया और ये बीमारी धीमी रफ़्तार से बढ़ी। लेकिन ये बीमारी क्या थी और शरीर को किस तरह नुकसान पहुंचा सकती है?

    बीमारी का नाम क्या?

    इस बीमारी का नाम है मोटर न्यूरॉन डिसीज़ (MND)।

    एनएचएस के मुताबिक ये एक असाधारण स्थिति है जो दिमाग और तंत्रिका पर असर डालती है। इससे शरीर में कमज़ोरी पैदा होती है जो वक़्त के साथ बढ़ती जाती है। ये बीमारी हमेशा जानलेवा होती है और जीवनकाल सीमित बना देती है, हालांकि कुछ लोग ज़्यादा जीने में कामयाब हो जाते हैं। हॉकिंग के मामले में ऐसा ही हुआ था। इस बीमारी का कोई इलाज मौजूद नहीं है लेकिन ऐसे इलाज मौजूद हैं जो रोज़मर्रा के जीवन पर पड़ने वाले इसके असर को सीमित बना सकते हैं।

    क्या लक्षण हैं बीमारी के?

    इस बीमारी के साथ दिक्कत ये भी कि ये मुमकिन है कि शुरुआत में इसके लक्षण पता ही न चलें और धीरे-धीरे सामने आएं।

    इसके शुरुआती लक्षण ये हैं:

    1. एड़ी या पैर में कमज़ोरी महसूस होना। आप लड़खड़ा सकते हैं या फिर सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत हो सकती है
    2. बोलने में दिक्कत होने लगती है और कुछ तरह का खाना खाने में भी परेशानी होती है
    3. पकड़ कमज़़ोर हो सकती है। हाथ से चीज़ें गिर सकती हैं। डब्बों का ढक्कन खोलने या बटन लगाने में भी परेशानी हो सकती है
    4. मांसपेशियों में क्रैम्प आ सकते हैं
    5. वज़न कम होने लगता है। हाथ और पैरों की मांसपेशी वक़्त के साथ पतले होने लगते हैं।
    6. रोने और हंसने को क़ाबू करने में दिक्कत होती है

    ये बीमारी किसे हो सकती है?

    मोटर न्यूरॉन बीमारी असाधारण स्थिति है जो आम तौर पर 60 और 70 की उम्र में हमला करती है लेकिन ये सभी उम्र के लोगों को हो सकती है। ये बीमारी दिमाग और तंत्रिका के सेल में परेशानी पैदा होने की वजह से होती है। ये सेल वक़्त के साथ काम करना बंद कर देते हैं। लेकिन ये अब तक पता नहीं चला कि ये कैसे हुआ है।

    जिन लोगों को मोटर न्यूरॉन डिसीज़ या उससे जुड़ी परेशानी फ्रंटोटेम्परल डिमेंशिया होती है, उनसे करीबी संबंध रखने वाले लोगों को भी ये हो सकती है। लेकिन ज़्यादातर मामलों में ये परिवार के ज़्यादा सदस्यों को होती नहीं दिखती।

    कैसे पता चलता है बीमारी का?

    शुरुआती चरणों में इस बीमारी का पता लगाना मुश्किल है। ऐसा कोई एक टेस्ट नहीं है जो इस बीमारी का पता लगा सके और ऐसी कई स्थितियां हैं जिनके चलते इसी तरह के लक्षण हो सकते हैं।

    यही बीमारी है और दूसरी कोई दिक्कत नहीं है, ये पता लगाने के लिए ये सब कर सकते हैं:

    • रक्त जांच
    • दिमाग और रीढ़ की हड्डी का स्कैन
    • मांसपेशियों और तंत्रिका में विद्युत सक्रियता ( इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी) को आंकने का टेस्ट
    • लम्पर पंक्चर जिसमें रीढ़ की हड्डी में सुई डालकर द्रव लिया जाता है
    • इलाज में क्या किया जा सकता है?

    इसमें स्पेशलाइज्ड क्लीनिक या नर्स की ज़रूरत होती है जो ऑक्यूपेशनल थेरेपी अपनाते हैं ताकि रोज़मर्रा के कामकाज करने में कुछ आसानी हो सके

    • फ़िज़ियोथेरेपी और दूसरे व्यायाम ताकि ताक़त बची रहे
    • स्पीच थेरेपी और डाइट का ख़ास ख़्याल
    • रिलुज़ोल नामक दवाई जो इस बीमारी के बढ़ने की रफ़्तार कम रखती है
    • भावनात्मक सहायता

    कैसे बढ़ती है ये बीमारी?

    मोटन न्यूरॉन बीमारी वक़्त के साथ बिगड़ती जाती है। समय के साथ चलने-फिरने, खाना निगलने, सांस लेने में मुश्किल होती जाती है। खाने वाली ट्यूब या मास्क के साथ सांस लेने की ज़रूरत पड़ती है।

    ये बीमारी आख़िरकार मौत तक ले जाती है लेकिन किसी को अंतिम पड़ाव तक पहुंचने में कितना समय लगता है, ये अलग-अलग हो सकता है।

    हॉकिंग ने बीमारी को कैसे छ्काया?

    न्यूरॉन मोटर बीमारी को एमीट्रोफ़िक लैटरल स्क्लेरोसिस (ALS) भी कहते हैं। ये डिसऑर्डर किसी को भी हो सकता है। ये पहले मांसपेशियों को कमज़ोर बनाता है, फिर लकवा आता है और कुछ ही वक़्त में बोलने या निगलने की क्षमता जाती रहती है।

    इंडिपेंडेंट के मुताबिक ALS एसोसिएशन के मुताबिक इस बीमारी के ग्रस्त मरीज़ों का औसत जीवनकाल आम तौर पर दो से पांच साल के बीच होता है। बीमारी से जूझने वाले पांच फ़ीसदी से भी कम लोग दो दशक से ज़्यादा जी पाते हैं। और हॉकिंग ने ऐसी ही एक रहे।

    किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफ़ेसर निगल लेग़ ने कहा था,

    ”मैं ALS से पीड़ित ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं जानता जो इतने साल जिया हो।”

    फिर क्या हॉकिंग कैसे अलग हैं? क्या वो सिर्फ़ क़िस्मत के धनी हैं या फिर कोई और बात है? इस सवाल का जवाब कोई साफ़ तौर पर नहीं दे सकता।

    उन्होंने ख़ुद कहा था,

    ”शायद ALS की जिस क़िस्म से मैं पीड़ित हूं, उसकी वजह विटामिन का गलत अवशोषण है।”

    इसके अलावा यहां हॉकिंग की ख़ास व्हीलचेयर और उनकी बोलने में मदद करने वाली मशीन का ज़िक भी करना ज़रूरी है। वो ऑटोमैटिक व्हीलचेयर का इस्तेमाल करते थे और वो बोल नहीं पाते थे इसलिए कंप्यूटराइज़्ड वॉइस सिंथेसाइज़र उनके दिमाग की बात सुनकर मशीन के ज़रिए आवाज़ देते थे।

     निधन

    एक परिवार के प्रवक्ता के मुताबिक, 14 मार्च 2018 की सुबह सुबह अपने घर कैंब्रिज में ‘हॉकिंग की मृत्यु हो गई थी। उनके परिवार ने उनके दुःख व्यक्त करने वाले एक बयान जारी किया था।

    स्रोत :

    इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री(BBC, Wikipedia)

    साक्षात्कार साभार : अशोक पांडे

     



  • राबर्ट बायल : रायल सोसायटी के संस्थापक
  • रॉबर्ट बॉयल

    रॉबर्ट बॉयल

    राबर्ट बॉयल (Robert Boyle ; 25 जनवरी 1627 – 31 दिसंबर1691ई.) आधुनिक रसायनशास्त्र का प्रवर्तक, अपने युग के महान वैज्ञानिकों में से एक, लंदन की प्रसिद्ध रॉयल सोसायटी के संस्थापक तथा कॉर्क के अर्ल की 14वीं संतान थे।

    वे एक एंग्लो-आयरिश प्राकृतिक दार्शनिक, केमिस्ट, भौतिक विज्ञानी और आविष्कारक थे। उन्होंने वैक्यूम पंप का निर्माण किया। शब्द की गति, वर्ग-भंगिमा के तथा वर्णों के मूल कारण और स्फटिकों की रचना के संबंध में उन्होंने अनेक अनुसंधान किए।

    बचपन

    बॉयल का जन्म आयरलैंड के मुंस्टर प्रदेश के लिसमोर कांसेल में हुआ था। घर पर इन्होंने लैटिन और फ्रेंच भाषाएँ सीखीं और ईटन में तीन वर्ष अध्ययन किया।  वे अपने माता-पिता के 14 संतानो में 10वे नम्बर पर थे। 8 साल की उम्र में वह ईटं कॉइल में दाखिल हुए। तीन साल बाद उनका स्कूल छुड़वा दिया गया, ताकि वे महाद्वीप यूरोप की यात्रा कर आएं। इंग्लैंड का एक श्रेष्ठ नागरिक बनने के लिए यह यात्रा उस युग में आवश्यक समझी जाती थी। तब विद्यार्थी के लिए एक प्रकार से यह ‘दीक्षांत’ हुआ करता था।

    किंतु उसके लिए 11 साल की उम्र आमतौर पर काफी नहीं होती।  1638 ई. में इन्होंने फ्रांस की यात्रा की और लगभग एक वर्ष जेनेवा में भी अध्ययन किया। फ्लोरेंस में इन्होंने गैलिलियों के ग्रंथों का अध्ययन किया। 1641 में 14 साल के रोबर्ट इटली पहुंचे और वहां वह प्रख्यात वैज्ञानिक गैलीलियो  के संपर्क में आए। उन्होंने निश्चय कर लिया कि अब वह अपना जीवन विज्ञान के अध्ययन को ही अर्पित कर देंगे।

    1644 ई. में जब ये इंग्लैंड पहुँचे, तो इनकी मित्रता कई वैज्ञानिकों से हो गई। ये लोग एक छोटी सी गोष्ठी के रूप में और बाद को ऑक्सफोर्ड में, विचार-विनियम किया करते थे। यह गोष्ठी ही आज की जगत्प्रसिद्ध रॉयल सोसायटी है। 1646 ई. से बॉयल का सारा समय वैज्ञानिक प्रयोगों में बीतने लगा। 1654 ई. के बाद ये ऑक्सफोर्ड में रहे और यहँ इनका परिचय अनेक विचारकों एवं विद्वानों से हुआ। 14 वर्ष ऑक्सफोर्ड में रहकर इन्होंने वायु पंपों पर विविध प्रयोग किए और वायु के गुणों का अच्छा अध्ययन किया। वायु में ध्वनि की गति पर भी काम किया। बॉयल के लेखों में इन प्रयोगों का विस्तृत वर्णन है।

    कार्य

    रॉबर्ट बॉयल की सर्वप्रथम प्रकाशित वैज्ञानिक पुस्तक न्यू एक्सपेरिमेंट्स, फ़िज़िको मिकैनिकल, टचिंग द स्प्रिंग ऑव एयर ऐंड इट्स एफेक्ट्स, वायु के संकोच और प्रसार के संबंध में है। 1663 ई. में रॉयल सोसायटी की विधिपूर्वक स्थापना हुई। बॉयल इस समय इस संस्था के सदस्य मात्र थे। बॉयल ने इस संस्था से प्रकाशिल शोधपत्रिका “फिलोसॉफिकल ट्रैंजैक्शन्स” में अनेक लेख लिखे और 1680 ई. में ये इस संस्था के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। पर शपथसंबंधी कुछ मतभेद के कारण इन्होंने यह पद ग्रहण करना अस्वीकार किया। कुछ दिनों बॉयल की रुचि कीमियागिरी में भी रही और अधम धातुओं को उत्तम धातुओं में परिवर्त्तित करने के संबंध में भी इन्होंने कुछ प्रयोग किए। चतुर्थ हेनरी ने कीमियागिरी के विरुद्ध कुछ कानून बना रखे थे। बॉयल के यत्न से ये कानून 1689 ई. में उठा लिए गए।

    बॉयल ने तत्वों की प्रथम वैज्ञानिक परिभाषा दी और बताया कि अरस्तू के बताए गए तत्वों, अथवा क़ीमियाईगरों के तत्वों (पारा, गंधक और लवण) में से कोई भी वस्तु तत्व नहीं है, क्योंकि जिन पिंडों में (जैसे धातुओं में) इनका होना बताया जाता है उनमें से ये निकाले नहीं जा सकते। तत्वों के संबंध में 1661 ई. में बॉयल ने एक महत्वपूर्ण पुस्तिका लिखी “दी स्केप्टिकल केमिस्ट”। रसायन प्रयोगशाला में प्रचलित कई विधियों का बॉयल ने आविष्कार किया, जैसे कम दाब पर आसवन। बॉयल के गैस संबंधी नियम, उसके दहन संबंधी प्रयोग, हवा में धातुओं के जलने पर प्रयोग, पदार्थों पर ऊष्मा का प्रभाव, अम्ल और क्षारों के लक्षण और उनके संबंध में प्रयोग, ये सब युगप्रवर्तक प्रयोग थे जिन्होंने आधुनिक रसायन को जन्म दिया। बॉयल ने द्रव्य के कणवाद का प्रचलन किया, जिसकी अभिव्यक्ति डाल्टन के परमाणुवाद में हुई। उनके अन्य कार्य मिश्रधातु, फॉस्फोरस, मेथिल ऐलकोहल (वुड स्पिरिट), फॉस्फोरिक अम्ल, चाँदी के लवणों पर प्रकाश का प्रभाव आदि विषयक हैं।

    आदर्श गैस स्थिरांक

    सत्रहवी शताब्दी मे वैज्ञानिको पदार्थ की तीन अवस्थायें ही ज्ञात थी, ठोस,द्रव तथा गैस(चौथी अवस्था प्लाज्मा की खोज इसके सदीयों पश्चात हुयी है)। उस समय ठोस और द्रव के साथ प्रयोग करना गैस की तुलना मे कठिन था क्योंकि ठोस/द्रव मे किसी भी परिवर्तन को उस समय के उपकरणो से मापना आसान नही था। इसलिये अधिकतर प्रायोगिक वैज्ञानिक मूलभूत भौतिकी नियमो को खोजने के लिये प्रयोगो मे गैस का प्रयोग करते थे।

    राबर्ट बायल(Robert Boyle) शायद ऐसे पहले महान प्रायोगिक वैज्ञानिक थे और वे वर्तमान प्रायोगिक विधि की आधारशीला रखने वालो मे से है जिसमे किसी भी प्रयोग मे एक या एकाधिक ही कारक मे परिवर्तन कर अन्य कारको पर परिवर्तन का मापन किया जाता है। पुनरावलोकन मे यह प्रत्यक्ष दिखायी देता है लेकिन यह एक दूरदर्शिता भरा कदम था।

    राबर्ट बायल ने गैस के दबाव और आयतन के मध्य संबध को खोजा था, इसकी एक सदी बाद जैक्स चार्ल्स(Jacques Charles) तथा जोसेफ गे लुसाक(Joseph Gay-Lussac ) ने आयतन और तापमान के मध्य संबध खोजा था। यह खोज सफ़ेद जैकेट पहनकर किसी वातावनुकुलित प्रयोगशाला मे आधुनिक उपकरणो के प्रयोग से नही हुयी थी। इस प्रयोग के लिये गे-लुसाक एक गर्म हवा के गुब्बारे मे 23,000 फ़ीट की ऊंचाई पर गये थे, जोकि उस समय का विश्व रिकार्ड था।

    बायल, चार्ल्स तथा गे-लुसाक के प्रयोगो के परिणामो को एक साथ सम्मिलित करने पर कहा जा सकता है कि किसी गैस की निश्चित मात्रा मे तापमान, दबाव तथा आयतन के गुणनफल के अनुपात मे होता है। इस अनुपात के स्थिरांक को आदर्श गैस स्थिरांक कहा जाता है।

    R=8.3144621(75) J/ K/ mol

    बॉयल का नियम

    बॉयल की ख्याति विज्ञान में एक परीक्षण-प्रिय वैज्ञानिक के रूप में ही है, ‘बॉयल्ज लॉ’ के जनक के रूप में। बॉयल का नियम विज्ञान का वह नियम है जिसके द्वारा हम बता सकते हैं कि दबाव के घटने-बढ़ने से हवा की हालत में क्या अंतर आ जाता है। इस नियम का आविष्कार परीक्षणों द्वारा हुआ था और बहुत देर बाद ही जाकर कहीं उसे भौतिक-विज्ञान के एक सूत्र का रुप मिल सका था।

    बॉयल के सिद्धांत को आज भातिकी में हर वैज्ञानिक प्रतिदिन प्रयुक्त करता है — गैस का परिणाम, दबाव के अनुसार, विपरीत अनुपात में आदलता-बदलता रहता है। बॉयल के नियम की ही यही सूत्रात्मक परिभाषा है। अगली पीढ़ी के वैज्ञानिक ने विशेषत: जैकीज चार्ली ने, इसमें इतना और जोड़ दिया कि ‘यदि तापमान में परिवर्तन न आए. तब’।

    बॉयल के नियम का चलित प्रदर्शन (एनिमेशन)

    बॉयल के नियम का चलित प्रदर्शन (एनिमेशन)

    बॉयल का नियम आदर्श गैस का दाब और आयतन में सम्बंध बताता है। इसके अनुसार, नियत ताप पर गैस का आयतन दाब के व्यूत्क्रमानुपाती होता है।

    गणित में इसे निम्नलिखित रूप में अभिव्यक्त कर सकते हैं=-

    {\displaystyle P\propto {\frac {1}{V}}}

    या,

    {\displaystyle PV=k}

    जहाँ P गैस का दाब है , V गैस का आयतन है, और k एक नियतांक है।

    इसी को इस तरह से भी कह सकते हैं-

    {\displaystyle P_{1}V_{1}=P_{2}V_{2}.}

     

    महत्वपूर्ण कार्य

    • 1660 – New Experiments Physico-Mechanical: Touching the Spring of the Air and their Effects
    • 1661 – The Sceptical Chymist
    • 1662 – Whereunto is Added a Defence of the Authors Explication of the Experiments, Against the Obiections of Franciscus Linus and Thomas Hobbes (a book-length addendum to the second edition of New Experiments Physico-Mechanical)
    • 1663 – Considerations touching the Usefulness of Experimental Natural Philosophy (followed by a second part in 1671)
    • 1664 – Experiments and Considerations Touching Colours, with Observations on a Diamond that Shines in the Dark
    • 1665 – New Experiments and Observations upon Cold
    • 1666 – Hydrostatical Paradoxes[35]
    • 1666 – Origin of Forms and Qualities according to the Corpuscular Philosophy. (A continuation of his work on the spring of air demonstrated that a reduction in ambient pressure could lead to bubble formation in living tissue. This description of a viper in a vacuum was the first recorded description of decompression sickness.)[36]
    • 1669 – A Continuation of New Experiments Physico-mechanical, Touching the Spring and Weight of the Air, and Their Effects
    • 1670 – Tracts about the Cosmical Qualities of Things, the Temperature of the Subterraneal and Submarine Regions, the Bottom of the Sea, &tc. with an Introduction to the History of Particular Qualities
    • 1672 – Origin and Virtues of Gems
    • 1673 – Essays of the Strange Subtilty, Great Efficacy, Determinate Nature of Effluviums
    • 1674 – Two volumes of tracts on the Saltiness of the Sea, Suspicions about the Hidden Realities of the Air, Cold, Celestial Magnets
    • 1674 – Animadversions upon Mr. Hobbes’s Problemata de Vacuo
    • 1676 – Experiments and Notes about the Mechanical Origin or Production of Particular Qualities, including some notes on electricity and magnetism
    • 1678 – Observations upon an artificial Substance that Shines without any Preceding Illustration
    • 1680 – The Aerial Noctiluca
    • 1682 – New Experiments and Observations upon the Icy Noctiluca (a further continuation of his work on the air)
    • 1684 – Memoirs for the Natural History of the Human Blood
    • 1685 – Short Memoirs for the Natural Experimental History of Mineral Waters
    • 1686 – A Free Enquiry into the Vulgarly Received Notion of Nature
    • 1690 – Medicina Hydrostatica
    • 1691 – Experimentae et Observationes Physicae

    अन्य कार्य

    शब्द की गति, वर्ण-भंगिमा के तथा वर्णों के मूल कारण तथा स्फटिकों की रचना के संबंध में उन्होंने अनुसंधान किए। जिसे आदमी चला सके ऐसे एक वैक्यूम पंप का निर्माण भी किया, और साबित कर दिखाया की हवा से महरूम जगह में कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता, यह भी की वायु से शून्य स्थान में गंधक जलेगी नहीं। ‘रसायनिक तत्व’ का एक लक्षण भी, कहते हैं इसे बॉयल ने सुझाया था और जो हमारी वर्तमान ‘रसायन दृष्टि’ से कोई बहुत भिन्न नहीं। ‘वह द्रव जिसे छिन्न-भिन्न नहीं किया जा सकता,’ किंतु एक सच्चे वैज्ञानिक की भांति उन्होंने इसका जैसे संशोधन भी साथ ही कर दिया था कि — ‘किसी भी अघावधि ज्ञात तरीके से (तोडा-फोड़ा) नहीं जा सकता)।’ किन्तु आजकल की परीक्षणशालाओ में इन तत्वों की आंतरिक-रचना में भी परिवर्तन लाया जा चूका है।

    बॉयल का एक उदार हृदय व्यक्ति थे और यदि उन्होंने ‘बॉयलाज लॉ’ का आविष्कार नहीं भी किया होता तब भी इतिहास के अमर पुरुषों में उनका नाम सदा स्मरण किया ही जाता क्योंकि न्यूटन के ‘प्रिन्सिपिया’ के प्रकाशन की व्यवस्था उन्होंने ही पहले-पहल की थी

    बॉयल जीवन भर अविवाहित रहे। बेकन के तत्वदर्शन में उन्हें बड़ी आस्था थी। अमर वैज्ञानिकों में उनकी आज तक गणना होती है। 1660 ई. के बाद में उनका स्वास्थ्य गिरने लगा, किंतु रसायन संबंधी कार्य इस समय भी बंद न हुआ। 1661 ई. में उनका देहांत हो गया।



  • 2017-विज्ञान की शीर्ष 10 घटनायें : एक सिंहावलोकन
  • कुछ कड़वी और कुछ मीठी यादों के साथ साल 2017 विदा लेने ही वाला है। चाहें राजनीतिक घटनाक्रम हो या वैश्विक वैज्ञानिक घटनाक्रम हर मामले में यह साल कई मायनों में अलग रहा। इस साल कई अहम वैज्ञानिक घटनाक्रम, महत्वपूर्ण खोज, शोध अवलोकन और वैश्विक बदलाव भी प्रत्यक्ष रूप से सामने आए। प्रसिद्ध पत्रिका साइंस न्यूज़ मैगज़ीन(Science News Magazine) ने इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ विज्ञान घटनाओं को प्रस्तुत कर दिया है। पेश है 2017 की सर्वश्रेष्ठ दस वैज्ञानिक घटनाएं जिसने साइंस न्यूज़ मैगज़ीन में अपनी शीर्ष दस(टॉप टेन) में जगह बनाई है।

    1. न्यूट्रॉन तारो की टक्कर(Neutron star collision)
    2. मानव भ्रूण में जीन का संपादन(Gene editing in human embryos)
    3. लार्सन-C बर्फ शेल्फ का टूटना(Larsen C ice shelf break)
    4. मानव उत्पत्ति और आकार(Human origins take shape)
    5. ट्रैप्पिस्ट-1: सात नये ग्रह(TRAPPIST-1: Seven new planets)
    6. क्वांटम संचार(Quantum communication)
    7. पोषण और जलवायु परिवर्तन(Nutrition and climate change)
    8. सीएआर-टी कोशिका चिकित्सा(CAR-T cell therapy)
    9. फुटबॉल खिलाड़ियों का दिमाग(Football players’ brains)
    10. ज़िका वायरस(Zika virus subsides)

    1. न्यूट्रॉन तारो की टक्कर(Neutron star collision)

    न्युट्रान तारों की टक्कर

    न्युट्रान तारों की टक्कर

    एक दुर्लभ और लंबे समय से प्रतीक्षित खगोलीय घटना ने हजारों खगोलविदों को रोमांचित कर दिया। पृथ्वी से 130 मिलियन प्रकाशवर्ष दूर होनेवाली इस रोमांचक दुर्लभ टक्कर को देखने के लिए विश्व भर के हजारो खगोलविज्ञानी और 70 दूरबीन अपनी नजर लगातार बनाये हुए थे। खगोलविज्ञानियों का उत्साह और रोमांच के कारण ही इस घटना को टॉप टेन में प्रथम स्थान मिला है।

    2. मानव भ्रूण में जीन का संपादन(Gene editing in human embryos)

    मानव भ्रूण में जीन का संपादन(Gene editing in human embryos)

    मानव भ्रूण में जीन का संपादन(Gene editing in human embryos)

    अमेरिका में वैज्ञानिकों की टीम ने मानव भ्रूण से उस जीन म्यूटेशन को निकालने में सफलता पायी जो दिल की गंभीर बीमारी के लिए जिम्मेदार था। वैज्ञानिकों ने विवादित जीन एडिटिंग की मदद से बीमारी फैलाने वाले जीन को स्वस्थ जीन से बदल दिया। यह काम भ्रूण में किया गया। CRISPR-Cas9 के नाम से जानी जाने वाली तकनीक की मदद से यह किया गया। CRISPR-Cas9 तकनीक असल में कैंचियों के जोड़े की तरह काम करती है। यह बीमारी के लिए जिम्मेदार जीनोम के खास हिस्से को काट देती है। कटिंग से खाली हुई जगह को नए डीएनए से भर दिया जाता है।

    3. लार्सन-C बर्फ शेल्फ का टूटना(Larsen C ice shelf break)

    लार्सन-C बर्फ शेल्फ का टूटना(Larsen C ice shelf break)

    लार्सन-C बर्फ शेल्फ का टूटना(Larsen C ice shelf break)

    जैसा कि आप चित्र में भी देख पा रहे है कि विशाल हिमखंड लार्सन-C(Larsen-C) बर्फ शेल्फ से टूटकर दूर जा रहा है। लार्सन-C आइसबर्ग और बर्फ शेल्फ के बीच की दूरी लगभग 5 km की है जो चित्र में अंकित दिनांक की है। इसके अलावा 11 अन्य छोटे हिमखंड का एक क्लस्टर भी बन गया है जिसमे से एक हिमखंड 13 km लंबा है निकट भविष्य में ये हिमखंड भी टूटकर अलग हो सकते है ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है।

    ESA और पोलर ऑब्जरवेशन एंड मॉडलिंग(Centre for Polar Observation and Modelling: CPOM) और नेशनल पर्यावरण रिसर्च काउंसिल(National Environment Research Council) के शोधकर्ताओं की टीम ने कहा है कि हमें सेटेलाइट से मिली छवियों के आधार पर बहुत कुछ स्पष्ट रूप से पता चल रहा है। जैसे- विशाल आइसबर्ग कैसे टूट रहा है अन्य दरारें कैसे बढ़ती जा रही है। यदि कोई बड़ा हिमखंड, बर्फ वृद्धि के साथ अपना संपर्क खो देता है तो निरंतर हिमखंडों में एक अस्थिरता आ जाती है हमारा मानना है लार्सन-C की कहानी अभी खत्म नही हुई है। यह जलवायु परिवर्तन से होनेवाली नाटकीय प्राकृतिक घटना है या एक हिमखंड के रूप में प्राकृतिक जन्म-विकास-क्षय चक्र से जुड़ा है हम दोनों स्थितियों में इसकी जाँच कर रहे है। अंटार्टिक का यह बर्फ महासागर में जाने से निश्चित रूप से वैश्विक समुद्री स्तर में थोड़ी वृद्धि देखने को मिलेगी।

    4. मानव उत्पत्ति और आकार(Human origins take shape)

    मानव उत्पत्ति और आकार(Human origins take shape)

    मानव उत्पत्ति और आकार(Human origins take shape)

    2017 में जीवाश्म और आनुवंशिक अध्ययन ने एक सुझाव दिया। हमारे पूर्वजों या प्रजातियों के लिए कोई स्पष्ट प्रारंभिक समय या स्थान का पता हमारे पास कभी मौजूद नहीं है। मानव जाति की पहली जैविक गतिशीलता मानव जीन, होमो सेपियंस में उत्क्रांति के प्रयोग के समय में हुई थी। शोधकर्ताओं ने प्रस्तावित किया की होमो सेपियन्स की उत्पत्ति अफ्रीकी समुदायों में लगभग 300,000 साल पहले शुरू हुई है।
    इस परिदृश्य में हमे, मानव कंकाल उच्च, गोल मस्तियां, चिन, छोटे दाँत और चेहरे और मानव शरीर रचना के अन्य लक्षण अंततः 200,000 से 100,000 साल पहले एक एकीकृत पैकेज के रूप में दिखाई देते है।

    5. ट्रैप्पिस्ट-1: सात नये ग्रह(TRAPPIST-1: Seven new planets)

    ट्रैप्पिस्ट-1: सात नये ग्रह(TRAPPIST-1: Seven new planets)

    ट्रैप्पिस्ट-1: सात नये ग्रह(TRAPPIST-1: Seven new planets)

    खगोलविदों ने एक ही तारे की परिक्रमा करते धरती के आकार के कम-से-कम सात ग्रहों को खोज निकाला है। मशहूर विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन में इन ग्रहों की दूरी 40 प्रकाश वर्ष बताई गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इन सभी सात ग्रहों की सतह पर, इनकी दूसरी विशेषताओं के आधार पर, पानी मिलने की पूरी संभावना है। माना जा रहा है कि इनमें से तीन ग्रह पर जीवन की संभावना है और ये “बसने लायक” हैं।

    ये सातों ग्रह ट्रैप्पिस्ट-1 नाम के तारे के इर्द-गिर्द मौजूद हैं। यह तारा पृथ्वी से 40 प्रकाश वर्ष दूर है। यह आकार में छोटा और और ठंडा तारा है। ये सभी सात एक्सोप्लैनिट्स (सौर परिवार से बाहर किसी तारे का चक्कर लगाने वाले ग्रह) की संरचना बेहद सख्त है और ये TRAPPIST-1 नामक एक बेहद ठंडे छोटे से तारे के आसपास मिले। उनके द्रव्यमान के अनुमान से उनके ठोस चट्टानी सतह वाले ग्रह होने की संभावना जान पड़ती है न कि बृहस्पति की तरह गैस वाले ग्रह की। इनमें तीन ग्रहों की सतह पर समुद्र भी हो सकते हैं।

    6. क्वांटम संचार(Quantum communication)

    क्वांटम संचार(Quantum communication)

    क्वांटम संचार(Quantum communication)

    चीन के शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग कर यह बताया कि पृथ्वी और अंतरिक्ष के बीच क्वांटम संचार(Quantum Teleportation) संभव है, और अब उन्होंने क्वांटम टेलीपोर्टेशन का उपयोग करके अंतरिक्ष में एक फोटान भेजने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल किया है।

    क्वांटम टेलीपोर्टेशन की महत्वपूर्ण जरुरत एक खास प्रकार के क्वांटम इंटरनेट को बनाने के लिए बेहद जरुरी है, इससे सारे क्वांटम कंप्यूटर एक साथ जुड़ कर संपर्क बना सकते हैं। क्वांटम कंप्यूटर एक खास प्रकारे के कंप्यूटर होते हैं जो क्वांटम मैकेनिज़्म के नियमों का पालन करके सुपर कंप्यूटर से भी तेज गणना कर सकते हैं। यदि वैज्ञानिक इसमें कामयाब होते हैं तो यह कंप्यूटर भविष्य में एक क्रांति ला सकते हैं।

    7. पोषण और जलवायु परिवर्तन(Nutrition and climate change)

    पोषण और जलवायु परिवर्तन(Nutrition and climate change)

    पोषण और जलवायु परिवर्तन(Nutrition and climate change)

    वैज्ञानिक शोध अध्ययनों से पता चला है कि चावल, गेहूं और अन्य फलों ने प्रोटीन और खनिजों को काफी हद तक खो दिया है। लगातार बदल रही वातावरण परिस्थितियां मानव जाति के लिए नये संकट लेकर आ सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के वातावरण में लगातार बढ़ रही प्रदूषण और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा खाद्यान्नों से प्रोटीन और मिनिरल को चुरा रही है। वैसे वनस्पतियों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड जरूरी होता है लेकिन वर्तमान समय मे कार्बन डाइऑक्साइड की अत्यधिक मात्रा वनस्पतियों के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है।

    8. सीएआर-टी कोशिका चिकित्सा(CAR-T cell therapy)

    सीएआर-टी कोशिका चिकित्सा(CAR-T cell therapy)

    सीएआर-टी कोशिका चिकित्सा(CAR-T cell therapy)

    इस वर्ष, जीन थेरेपी अंततः ​​वास्तविक रूप में अस्पतालों और नर्सिंग होम में उपयोग में लायी जा सकेगी। संयुक्त राज्य अमेरिका ने इसकी स्वीकृति दे दी है अब जीन थेरेपी के द्वारा कई प्रकार के ल्यूकेमिया और लिम्फोमा वाले रोगियों को उपचार किया जा सकता है।

    शोधकर्ताओं ने सीएआर-टी सेल चिकित्सा के लिए अलग-अलग संस्करण विकसित कर रहे हैं और किये भी गए है। लेकिन ज्यादातर संस्करणों का मूल आधार समान ही है: डॉक्टर एक रक्त के नमूने से रोगी के टी कोशिकाओं (प्रतिरक्षा प्रणाली कोशिकाएं जो आक्रमणकारियों पर हमला करते हैं) को हटाते हैं और उनके सतहों पर कृत्रिम प्रोटीन उत्पन्न करने के लिए उसे आनुवंशिक रूप से उन्हें संशोधित करते हैं । उन प्रोटीनों जिन्हें चिमेरिक प्रतिजन रिसेप्टर्स(chimeric antigen receptors) कहा जाता है, रोगी के शरीर में कैंसर की कोशिकाओं को पहचानते हैं। संशोधित टी कोशिकाओं का उपयोग कर प्रयोगशाला मे संशोधित टी कोशिकाओं की बहुत सारी प्रतियां बनाई गई है। वे कैंसर कोशिकाओं को खोजने और मारने के लिए सक्षम है उनको रोगी के खून में डाल दिया जाता हैं।

    9. फुटबॉल खिलाड़ियों का दिमाग(Football players’ brains)

    फुटबॉल खिलाड़ियों का दिमाग(Football players’ brains)

    फुटबॉल खिलाड़ियों का दिमाग(Football players’ brains)

    जब पूर्व एनएफएल खिलाड़ियों के दिमाग का विस्तृत अध्ययन किया गया तब पता चला ज्यादातर खिलाड़ियों के मस्तिष्क के 99% नमूनों में दर्दनाक एंसेफैलापैथी के लक्षणों में काफी बढ़ोतरी देखी गयी। सरल शब्दों में कहे तो फुटबॉल के खिलाड़ियों के दिमाग में भारी क्षति का विवरण शोध अध्ययन में दिया गया है इसका एक कारण खिलाड़ियों द्वारा सर से बॉल को हिट करना भी माना गया है। लगभग हर नमूने में क्रोनिक आघातक एन्सेफैलोपैथी(chronic traumatic encephalopathy:CTE) या सीटीई के लक्षण दिखाई देते हैं जो स्मृति हानि, भावनात्मक अलगाव, अवसाद और मनोभ्रंश के लिए जिम्मेदार होते है।

    बोस्टन विश्वविद्यालय के न्यूरोसाइंटिस्ट जेसी मेज़ का कहना है कि यह एक चौंकाने वाला शोध अध्ययन है। यह अध्ययन फुटबॉल से प्यार करनेवाले लोग और फुटबॉल खिलाड़ियों के बीच नये नजरिये से सोचने पर विवश कर सकता है।

    10. ज़िका वायरस(Zika virus subsides)

    ज़िका वायरस(Zika virus subsides)

    ज़िका वायरस(Zika virus subsides)

    पश्चिमी गोलार्ध में ज़िका के मामलों की संख्या इस साल कम हो गई है लेकिन वायरस पर बुनियादी वैज्ञानिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य शोध की जरुरत बनी हुई है। 2016 की शीर्ष कहानियों में से एक 2017 में चुपचाप टॉप टेन में शामिल हो गई है। वैज्ञानिकों और सामान्य लोगो के बीच अच्छे कारणों के लिए यह अभी भी एक गर्म विषय बना हुआ है। पश्चिमी गोलार्ध में ज़िका वायरस उभरने जाने के बाद यह अमेरिका को भी दहशत में ला दिया था। जैसा कि आप जानते है ब्राजील और कोलंबिया के माध्यम से यह वायरस संयुक्त राज्य अमेरिका तक पहुंच गया था।

    ज़िका वायरस पर अध्ययन कर रहे शोधकर्ताओं का मानना है कि फिलहाल ज़िका वायरस के मामलों की संख्या में कमी आ गयी है लेकिन ज़िका वायरस का अंत अभी नही हुआ है संभव है ज़िका वायरस फिर से लौटने की तैयारी कर रहा है। यदि ज़िका वायरस फिर से उभरता है तो उससे निपटने के लिए शोधकर्ताओं का कार्य और भी चुनौतीपूर्ण होनेवाला है। ज़िका वायरस का वाहक केवल मच्छरों को मानना सही नही है इस वर्ष शोधकर्ताओं ने इस बारे में काफी अध्ययन कर लिया है अब शोधकर्ताओं द्वारा कहा गया है कि यह वायरस ग्रषित मनुष्यों द्वारा संभोग के माध्यम से भी फैल रहा है।

    स्रोत: TOP 10 Science stories of 2017(ScienceNews Magazine).

    संकलन और संपादन : पल्लवी कुमारी

    पलल्वी  कुमारी, बी एस सी प्रथम वर्ष की छात्रा है। वर्तमान  मे राम रतन सिंह कालेज मोकामा पटना मे अध्यनरत है।

    पल्लवी कुमारी

    पल्लवी कुमारी



  • लुई पाश्चर (Louis Pasteur) : मानवता के महान निष्काम सेवक
  • 19वी शताब्दी के जिन महान वैज्ञानिकों ने निष्काम भाव से मानवता की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया ,उनमे से एक थे लुई पाश्चर (Louis Pasteur)। लुई पाश्चर (Louis Pasteur) ने अपनी महान वैज्ञानिकों खोजो के द्वारा बीमारी के दौरान घाव उत्पन्न होने की स्थिति में जो असहनीय पीड़ा होती है उससे मुक्ति दिलाकर एक बड़ी मानव सेवा ही की थी।

    कर्म-क्षेत्र: रसायन शास्त्र, सूक्ष्म जीव शास्त्र

    शिक्षा: École Normale Supérieure

    विशेष खोज: रैबीज वैक्सिन

    कार्य : स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय, लील्ले विज्ञान तथा तकनिकी विश्वविद्यालय ,École Normale Supérieure ,पास्चर इंस्टीट्युट

    पुरस्कार-उपाधि: लीवेनहोएक मेडल, मान्ट्यान पुरस्कार ,कापली मेडल ,रमफ़र्ड मेडल, अलबर्ट मेडल

    सम्मान: लुई पास्चर के सम्मान मे ही दूध को 60 डीग्री सेल्सीयस तक गर्म कर कीटाणु रहित करने की प्रक्रिया को पास्चराइजेशन कहते है।,

    बचपन तथा शिक्षा

    लुई पास्चर(Louis Pasteur)

    लुई पास्चर(Louis Pasteur)

    लुई पाश्चर (Louis Pasteur) का जन्म 27 दिसम्बर 1822 को फ्रांस के डोल नामक स्थान नैपोलियन बोनापार्ट के एक व्यवसायी सैनिक के यहां हुआ था। उनके पिता की इच्छा थी कि उनका पुत्र पढ़ लिखकर कोई महान आदमी बने। वे उसकी पढाई के लिए कर्ज का बोझ भी उठाना चाहते थे। पिता के साथ काम में हाथ बंटाते हुए लुई पाश्चर ने अपने पिता की इच्छा पुरी करने के लिए अरबोय की एक पाठशाला में प्रवेश लिया किन्तु वहा के अध्यापको द्वारा पढाई गयी विद्या उनकी समझ के बाहर थी। उन्हें मंदबुद्धि और बुद्धू कहकर चिढाया जाता था।

    अध्यापको की उपेक्षा से दुखी होकर लुई पाश्चर विद्यालयीन पढाई तो छोड़ दी किन्तु उन्होंने कुछ ऐसा करने की सोची जिससे सारा संसार उन्हें बुद्धू नही कुशाग्र बुद्धि मानकर सम्मानित करे। पिता द्वारा जोर जबरदस्ती करने पर वे उच्च शिक्षा हेतु पेरिस गये और वही पर वेसाको के एक कॉलेज में अध्ययन करने लगे। उनकी विशेष रूचि रसायनशास्त्र में थी। वे रसायन शास्त्र के विद्वान डा.ड्यूमा से विशेष प्रभावित थे। इकोलनारमेल कॉलेज से उपाधि ग्रहण कर लुई पाश्चर ने 26 वर्ष की उम्र में रसायन की बजाय भौतिक विज्ञान पढाना आरम्भ किया।

    बाधाओं को पार करते हुए वे विज्ञान विभाग के अध्यक्ष बन गये। इस पद को स्वीकारने के बाद उन्होंने अनुसन्धान कार्य आरम्भ कर दिया। सबसे पहले अनुसन्धान करते हुए उन्होंने इमली के अम्ल से अंगूर अम्ल बनाया किन्तु उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण खोज “विषैले जन्तुओ द्वारा काटे जाने पर उनके विष से मानव के जीवन की रक्षा करनी थी। ” चाहे कुत्ते के काटने के बाद रेबीज का टीका बनाना हो या फिर किसी जख्म के सड़ने और उसमे कीड़े पड़ने पर अपने उपचार की विधि द्वारा उसकी सफल चिकित्सा करने का कार्य हो लुई पाश्चर (Louis Pasteur) ने उन्ही कार्यो में अपने प्रयोगों द्वारा सफलता पायी।

    लुई बचपन से ही दयालु प्रकृति के थे। अपने शैशवकाल में आपने गांव के आठ व्यक्तियों को पागल भेड़िए के काटने से मरते हुए देखा था। वे उनकी दर्दभरी चीखों को आप भूल नहीं सके थे। युवावस्था में भी जब यह अतीत की घटना स्मृति पटल पर छा जाती, तो लुई बेचैन हो उठते थे। पर वे पढ़ने-लिखने में विशेष तेज नहीं थे। इस पर भी आप में दो गुण मौजूद थे, जो विज्ञान में सफलता के लिए आवश्यक होते हैं – उत्सुकता एवं धीरज। युवावस्था में आपने लिखा था कि शब्दकोश में तीन शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं: इच्छाशक्ति, काम तथा सफलता।

    कॉलेज की पढ़ाई समाप्त कर, अपनी लक्ष्य प्राप्ति के लिए एक रसायन शाला में कार्य करना आरम्भ कर दिया। यहाँ पर उन्होने क्रिस्टलों का अध्ययन किया तथा कुछ महत्त्वपूर्ण अनुसंधान भी किए। इनसे रसायन के रूप में उन्हे को अच्छा यश मिलने लग गया।

    विवाह

    सन् 1849 ई. में फ्रांस के शिक्षा मंत्री ने आपको दिजोन के विद्यालय में भौतिकी पढ़ाने के लिए नियुक्त कर दिया। एक वर्ष बाद वे स्ट्रॉसबर्ग विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान का स्थानापन्न प्राध्यापक बना दिए गए। इस उन्नति का रहस्य यह था कि विश्वविद्यालय अध्यक्ष की एक कन्या थी जिसका नाम मेरी था। मेरी श्यामल केशों वाली सुन्दर किशोरी थी। आपकी उससे भेंट हुई। मेरी का अछूता लावण्य आपके ह्रदय में घर कर गया। भेंट के एक सप्ताह बाद ही आपने मेरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रख दिया। मेरी ने आपके प्रस्ताव को ठुकरा दिया। पर लुई पास्चर एक अच्छे वैज्ञानिक थे। धीरजता आप में थी। मेरी के इंकार करने पर भी आप प्रयत्नशील रहे। एक वर्ष के बाद आपको अपनी इच्छा पूर्ति में सफलता मिली। मेरी ने आपकी पत्नी बनना स्वीकार कर लिया।

    विवाह के उपरान्त आपकी रुची रसायन विज्ञान से हट कर जीवविज्ञान की ओर अग्रसर होने लग गई। यह जीवधारियों का विज्ञान है। यह विश्वविद्यालय फ्रांस के अंगूर उत्पादक क्षेत्र के मध्य में है। वहाँ के मदिरा तैयार करने वालों का एक दल, एक दिन लुई पास्चर से मिलने आया। उन्होने आप से पूछा कि हर वर्ष हमारी शराब खट्टी हो जाती है। इसका क्या कारण है?

    पास्चराइजेशन

    लुई पास्चर ने अपने सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा मदिरा की परीक्षा करने में घण्टों बिता दिए। अंत में आपने पाया कि जीवाणु नामक अत्यन्त नन्हें जीव मदिरा को खट्टी कर देते हैं। अब आपने पता लगाया कि यदि मदिरा को 20-30 मिनट तक 60 सेंटीग्रेड पर गरम किया जाता है तो ये जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। ताप उबलने के ताप से नीचा है। इससे मदिरा के स्वाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। बाद में आपने दूध को मीठा एवं शुद्ध बनाए रखने के लिए भी इसी सिद्धान्त का उपयोग किया। यही दूध ‘पास्चरित दूध’ कहलाता है।

    एक दिन लुई पास्चर को सूझा कि यदि ये नन्हें जीवाणु खाद्यों एवं द्रव्यों में होते हैं तो ये जीवित जंतुओं तथा लोगों के रक्त में भी हो सकते हैं। वे बीमारी पैदा कर सकते हैं। उन्हीं दिनों फ्रांस की मुर्गियों में ‘चूजों का हैजा’ नामक एक भयंकर महामारी फैली थी। लाखों चूजे मर रहे थे। मुर्गी पालने वालों ने आपसे प्रार्थना की कि हमारी सहायता कीजिए। आपने उस जीवाणु की खोज शुरू कर दी जो चूजों में हैजा फैला रहा था। आपको वे जीवाणु मरे हुए चूजों के शरीर में रक्त में इधर-उधर तैरते दिखाई दिए। आपने इस जीवाणु को दुर्बल बनाया और इंजेक्शन के माध्यम से स्वस्थ चूजों की देह में पहुँचाया। इससे वैक्सीन लगे हुए चूजों को हैजा नहीं हुआ। आपने टीका लगाने की विधि का आविष्कार नहीं किया पर चूजों के हैजे के जीवाणुओं का पता लगा लिया।

    इसके बाद लुई पाश्चर ने गायों और भेड़ों के ऐन्थ्रैक्स नामक रोग के लिए बैक्सीन बनायी: पर उनमें रोग हो जाने के बाद आप उन्हें अच्छा नहीं कर सके: किन्तु रोग को होने से रोकने में आपको सफलता मिल गई। आपने भेड़ों के दुर्बल किए हुए ऐन्थ्रैक्स जीवाणुओं की सुई लगाई। इससे होता यह था कि भेड़ को बहुत हल्का ऐन्थ्रैक्स हो जाता था; पर वह इतना हल्का होता था कि वे कभी बीमार नहीं पड़ती थीं और उसके बाद कभी वह घातक रोग उन्हें नही होता था। आप और आपके सहयोगियों ने मासों फ्रांस में घूमकर सहस्रों भेड़ों को यह सुई लगाई। इससे फ्रांस के गौ एवं भेड़ उद्योग की रक्षा हुई।

    रैबीज टीका

    लुई पाश्चर(Louis Pasteur) फ़्रेंच फ़्रेंक्स

    लुई पाश्चर(Louis Pasteur) फ़्रेंच फ़्रेंक्स

    आपने तरह-तरह के सहस्रों प्रयोग कर डाले। इनमें बहुत से खतरनाक भी थे। आप विषैले वाइरस वाले भयानक कुत्तों पर काम कर रहे थे। अत में आपने इस समस्या का हल निकाल लिया। आपने थोड़े से विषैले वाइरस को दुर्बल बनाया। फिर उससे इस वाइरस का टीका तैयार किया। इस टीके को आपने एक स्वस्थ कुत्ते की देह में पहुँचाया। टीके की चौदह सुइयाँ लगाने के बाद रैबीज के प्रति रक्षित हो गया। आपकी यह खोज बड़ी महत्त्वपूर्ण थी; पर आपने अभी मानव पर इसका प्रयोग नहीं किया था। सन् १८८५ ई। की बात है। लुई पाश्चर अपनी प्रयोगशाला में बैठे हुए थे। एक फ्रांसीसी महिला अपने नौ वर्षीय पुत्र जोजेफ को लेकर उनके पास पहुँची। उस बच्चे को दो दिन पहले एक पागल कुत्ते ने काटा था। पागल कुत्ते की लार में नन्हे जीवाणु होते हैं जो रैबीज वाइरस कहलाते हैं। यदि कुछ नहीं किया जाता, तो नौ वर्षीय जोजेफ धीरे-धीरे जलसंत्रास(hydrofobia) से तड़प कर जान दे देगा।

    आपने बालक जोजेफ की परीक्षा की। कदाचित् उसे बचाने का कोई उपाय किया जा सकता है। बहुत वर्षों से आप इस बात का पता लगाने का प्रयास कर रहे थे कि जलसंत्रास को कैसे रोका जाए? आप इस रोग से विशेष रूप से घृणा करते थे। अब प्रश्न था कि बालक जोजेफ के रैबीज वैक्सिन की सुईयाँ लगाने की हिम्मत करें अथवा नहीं। बालक की मृत्यु की सम्भावना थी। पर सुइयां न लगने पर भी उसकी मृत्यु निश्चित् है। इस दुविधा में आपने तत्काल निर्णय लिया और बालक जोजेफ का उपचार करना शुरू कर दिया। आप दस दिन तक बालक जोजेफ के वैक्सीन की बढ़ती मात्रा की सुइयाँ लगाते रहे और तब महान आश्चर्य की बात हुई। बालक जोजेफ को जलसंत्रास नही हुआ। इसके विपरीत वह अच्छा होने लग गया। इतिहास में प्रथम बार मानव को जलसंत्रास से बचाने के लिए सुई लगाई गई। आपने वास्तव में मानव जाति को यह अनोखा उपहार दिया। आपके देशवासियों ने आपको सब सम्मान एवं सब पदक प्रदान किए। उन्होंने आपको सम्मान में पास्चर इंस्टीट्यूट का निर्माण किया: किन्तु कीर्ति एव ऐश्वर्य से आप मे कोई परिवर्तन नहीं आया। आप जीवनपर्यन्त तक सदैव रोगों को रोक कर पीड़ा हरण के उपायों की खोज में लगे रहे।

    रेशम के कीड़ो के रोग की रोकथाम के लिए उन्होंने 6 वर्षो तक इतने प्रयास किये कि वे अस्वस्थ हो गये। पागल कुत्तो के काटे जाने पर मनुष्य के इलाज का टीका ,हैजा ,प्लेग आदि संक्रामक रोगों के रोकथाम के लिए उन्होंने विशेषत: कार्य किया। यह सचमुच एक महान कार्य था। इस तरह लुई पाश्चर (Louis Pasteur) एक सामान्य मानव से महामानव बने। चिकित्सा विज्ञान में उनके इस महायोगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।

    सन् 1895 ई। में आपकी निद्रावस्था में ही मृत्यु हो गई।

    लुई पाश्चर(Louis Pasteur)

    लुई पाश्चर(Louis Pasteur)



  • योहानस केप्लर :आकाश मे ग्रहो की गति के नियम के प्रतिपादक
  • जोहानस केपलर (योहानेस केप्लर) जर्मनी के महान वैज्ञानिक और गणितज्ञ थे। केपलर के अनुसार सूर्य की कक्षा मे परिक्रमा करते ग्रहों का मार्ग(कक्षा) गोलाकार नही अपितु दिर्घवृत्ताकार(अंडाकार) होता है। अपनी-अपनी परिधि में परिक्रमा करते हुए हर ग्रह की गति में निरंतर परिवर्तन आता रहता है, इन्होने घड़ी-पल सबकुछ गिन कर दिखा दिया की प्रत्येक नक्षत्र की वास्तविक स्थिति और गतिविधि कब क्या होनी चाहिए।

    बचपन और शिक्षा

    योहानस केप्लर

    योहानस केप्लर

    जोहानस केपलर का जन्म 21 दिसम्बर 1571 को जर्मनी के स्टट्गार्ट नामक नगर के निकट बाइल-डेर-स्टाड्स स्थान पर हुआ था। वह अभी 4 साल के ही थे कि चेचक की बड़ी बुरी तरह से शिकार हो गए। इससे उनकी आंखें बहुत कमजोर हो गए। उनके पिता एक सिपाही थे और उनकी मां एक सराय-मालिक की बेटी थी। पिता अक्सर नशे में होते, मां का दिमाग भी अक्सर कोई बहुत ठिकाने न होता। उनकी अपनी आंखें जवाब दे चुकी थी हाथ लुले और बाकी जिस्म भी कमजोर और बेकार था। इन सब बाधाओं के बावजूद केप्लर बचपन से ही एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे।

    चर्चों की व्यवस्थापिका संस्था ने उनका भविष्य निर्धारित कर दिया और वह धर्म-विज्ञान का अध्ययन करने के लिए इसाई के ‘गुरुकुल’ में दाखिल हो गए। टिबिंगैन विश्व विद्यालय की छात्रवृति पर स्नातक की उपाधि प्राप्त की। यहां पहुंचकर वह कोपरनिकस के विचारों के संपर्क में आए कि किस प्रकार ग्रह सूर्य के गिर्द परिक्रमा करते हैं। विज्ञान और गणित के प्रति उनका ये आकर्षण शीघ्र ही एक आंतरिक मोह में परिवर्तन हो गया। उन्होंने पादरी बनने के अपने सभी विचार छोड़ दिए। 23 वर्ष की आयु में ग्रथस विश्वविद्यालय ने उन्हें निमंत्रित किया और उन्होंने नक्षत्र विज्ञान के प्रधान अध्यापक के रूप में नियुक्ति स्वीकार कर ली।

    बड़ा आश्चर्य होता है यह जानकर कि वे विज्ञान के एक पुजारी होते हुए भी, ज्योतिष-शास्त्र में कुछ आस्था रखते थे। तारों और ग्रहों की स्थिति अंकित करते हुए वे अपने जीवन की दैवी घटनाओं का भी यथावत रिकॉर्ड रखा करते थे, हालाँकि उनका अपना कहना यही था कि मुझे ज्योतिष में रत्ती-भर भी विश्वास नहीं है किंतु अतीत के अंधविश्वास का प्रभाव उनके विचार पर कुछ न कुछ निसंदेह पड़ा था।

    कार्य

    केपलर को ग्रत्स छोड़ना पड़ा। इसके बाद जर्मन सम्राट् रूडॉल्फ द्वितीय, के राजगणितज्ञ टाइको ब्राहे के सहायक के रूप में 1601 ई ओ में नियुक्त हुए। यही दोनों वैज्ञानिक का सम्मिलन हुआ। किंतु ब्राहे कोपनिरकस का विरोधी था। उसकी आस्था भी  ईश्वरीय नियमो में थी जिसके अनुसार ब्रह्मांड के केंद्र मे सूर्य को मानलेना से धर्म संगत नही है। इसी आस्था के अनुसार उसने पुराने जमाने से चली आ रही इस धारणा को ही वैज्ञानिक रूप में प्रमाणित करने का प्रत्यन किया समस्त ब्रह्मांड का  केंद्र पृथ्वी है। ब्राहे के आकाशीय पिंड-संबंधित प्रत्यक्ष तथा सूक्ष्म निरीक्षणो की संख्या कितनी ही हजार तक पहुंच चुकी थी, और विज्ञान जगत आज भी 1592 में प्रकाशित तारों की आकाश में अपेक्षित स्थिति के उसके प्रतिपादन के लिए कृतज्ञ है। संभव हैं उसने स्वंय अनुभव भी किया हो की वह अबतक गलत थे था– क्योंकि केपलर को उसने अपने सहायक और उत्तराधिकारी के रुप में नियुक्त कर दिया, जबकि केप्लर की स्पष्ट धारणा यही थी कि ब्रह्मांड का केंद्र सूर्य हैं, पृथ्वी नहीं।

    टायको ब्राहे की मृत्यु हो गई। उसके बाद भी केपलर की ग्रह-गणनाएँ चलती रही। उनकी अध्यक्षता में 228 अन्य तारों का सूक्ष्म अध्ययन किया गया। ब्राहे के संग्रहीत अध्ययनों का विश्लेषण करते हुए ही केपलर ग्रहों की गतिविधि के संबंध में कुछ नियम निर्धारित कर सकें, जिनकी व्याख्या न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के मूल सिद्धांत के आधार पर आगे चलकर की। विज्ञान में आज भी केप्लर और न्यूटन के नियमों का सामायिक हैं। यही नियम है जो मानव निर्मित उपग्रहो के भी नियामक है।

    केपलर की नई खोज यही नही थी कि सूर्य के गिर्द ग्रहों का परिक्रमा-मार्ग दीर्घवृत्ताकार( अंडकार) होता है, अपितु यह भी थी की अपनी-अपनी परिधि में परिक्रमा करते हुए हर ग्रह की गति में निरंतर परिवर्तन आता रहता है। ग्रह ज्यों-ज्यों सूर्य के निकट पहुंचते जाते हैं, उनकी यह गति बढ़ती जाती है। केप्लर ने गणना द्वारा यह भी जान लिया कि किस ग्रह को सूर्य की परिक्रमा करने में कितना समय लगता है। जो ग्रह  सूर्य के निकट होते हैं, उन्हे इस परिक्रमा में समय अपेक्षया कुछ कम ही लगता है।

    गणित के नियमों के अनुसार ग्रहों के संबंध में केप्लर ने घड़ी-पल सबकुछ गिन कर दिखा दिया कि प्रत्येक ग्रह की वास्तविक स्थिति और गतिविधि कब क्या होनी चाहिए। केप्लर ने विज्ञान के अन्य संबद्ध क्षेत्रों में भी खोज किए। मानव दृष्टि तथा दृष्टि विज्ञान के संबंध में जो स्थापनाए उन्होंने विकसित की उनका प्रकाश के ‘अपसरण’ के क्षेत्र में बहुत महत्व है। यहां तक कि ग्रहों के अध्ययन के लिए एक दूरबीन तैयार करने की आधारशिला भी, नियमों के रूप में, वे रखते गए। गणित के क्षेत्र में उनकी खोजे प्राय: कैलकुलस का अविष्कार करने के निकट आ पहुंची थी और, साथी ही, गुरुत्वाकर्षण का उल्लेख अपने प्रथम प्रबंध में किया और यह भी बताया कि पृथ्वी पर समुदों में ज्वारभाटा चंद्रमा के आकर्षण के कारण आता है।

    इन्होंने ज्योतिष गणित पर 1609 ई में ‘दा मोटिबुस स्टेलाए मार्टिस’ (De Motibus Stellae martis) और 1619 ई. में ‘दा हार्मोनिस मुंडी’ (De Harmonis mundi) में अपने प्रबंधों को प्रकाशित कराया। इनमें इन्होंने ग्रहगति के नियमों का प्रतिपादन किया था।

    केप्लर के ग्रहीय गति के नियम

    चित्र १: केप्लेर के तीनो नियमों का दो ग्रहीय कक्षाओं के माध्यम से प्रदर्शन (1) कक्षाएँ दीर्घवृत्ताकार हैं एवं उनकी नाभियाँ पहले ग्रह के लिये (focal points) ƒ1 and ƒ2 पर हैं तथा दूसरे ग्रह के लिये ƒ1 and ƒ3 पर हैं। सूर्य नाभिक बिन्दु ƒ1 पर स्थित है। (2) ग्रह (१) के लिये दोनो छायांकित (shaded) सेक्टर A1 and A2 का क्षेत्रफल समान है तथा ग्रह (१) के लिये सेगमेन्ट A1 को पार करने में लगा समय उतना ही है जितना सेगमेन्ट A2 को पार करने में लगता है। (3) ग्रह (१) एवं ग्रह (२) को अपनी-अपनी कक्षा की परिक्रमा करने में लगे कुल समय a13/2 : a23/2 के अनुपात में हैं।

    चित्र १: केप्लेर के तीनो नियमों का दो ग्रहीय कक्षाओं के माध्यम से प्रदर्शन (1) कक्षाएँ दीर्घवृत्ताकार हैं एवं उनकी नाभियाँ पहले ग्रह के लिये (focal points) ƒ1 and ƒ2 पर हैं तथा दूसरे ग्रह के लिये ƒ1 and ƒ3 पर हैं। सूर्य नाभिक बिन्दु ƒ1 पर स्थित है। (2) ग्रह (१) के लिये दोनो छायांकित (shaded) सेक्टर A1 and A2 का क्षेत्रफल समान है तथा ग्रह (१) के लिये सेगमेन्ट A1 को पार करने में लगा समय उतना ही है जितना सेगमेन्ट A2 को पार करने में लगता है। (3) ग्रह (१) एवं ग्रह (२) को अपनी-अपनी कक्षा की परिक्रमा करने में लगे कुल समय a13/2 : a23/2 के अनुपात में हैं।

    खगोल विज्ञान में केप्लर के ग्रहीय गति के तीन नियम इस प्रकार हैं –

    1. सभी ग्रहों की कक्षा की कक्षा दीर्घवृत्ताकार होती है तथा सूर्य इस कक्षा के नाभिक (focus) पर होता है।
    2. ग्रह को सूर्य से जोड़ने वाली रेखा समान समयान्तराल में समान क्षेत्रफल तय करती है।
    3. ग्रह द्वारा सूर्य की परिक्रमा के आवर्त काल का वर्ग, अर्ध-दीर्घ-अक्ष (semi-major axis) के घन के समानुपाती होता है।

    इन तीन नियमों की खोज जर्मनी के गणितज्ञ एवं खगोलविद जॉन केप्लर (Johannes Kepler 1571–1630) ने की थी। और सौर परिवार के ग्रहों की गति के लिये वह इनका उपयोग करते थे। वास्तव में ये नियम किन्ही भी दो आकाशीय पिण्डों की गति का वर्णन करते हैं जो एक-दूसरे का चक्कर काटते हैं।

    इस महान गणितज्ञ एवं ज्योतिषी का 59 वर्ष की आयु में प्राग में 15 नवंबर 1630 ई को देहावसान हो गया।

     

    केप्लर : संक्षिप्त जीवन वृत्त

    जोहानस केप्लर(Kepler)

    जोहानस केप्लर(Kepler)



  • महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन
  • RamanujanSrinivasa-Color800pxश्रीनिवास रामानुजन् इयंगर (तमिल ஸ்ரீனிவாஸ ராமானுஜன் ஐயங்கார்) (22 दिसम्बर, 1887 – 26 अप्रैल, 1920) एक महान भारतीयगणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया।

    ये बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावान थे। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।

    महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को मद्रास से 400 किमी दूर इरोड नामक एक छोटे से गांव में हुआ था। रामानुजन जब एक वर्ष के थे तभी उनका परिवार पवित्र तीर्थस्थल कुंभकोणम में आकर बस गया था। इनके पिता यहाँ एक कपड़ा व्यापारी की दुकान में मुनीम का कार्य करते थे। पाँच वर्ष की आयु में रामानुजन का दाखिला कुंभकोणम के प्राथमिक विद्यालय में करा दिया गया।

    इनकी प्रारंभिक शिक्षा की एक रोचक घटना है। गणित के अध्यापक कक्षा में भाग की क्रिया समझा रहे थे। उन्होंने प्रश्न किया कि अगर तीन केले तीन विद्यार्थियों में बांटे जाये तो हरेक विद्यार्थी के हिस्से में कितने केले आयेंगे? विद्यार्थियों ने तत्काल उत्तर दिया कि हरेक विद्यार्थी को एक-एक केला मिलेगा। इस प्रकार अध्यापक ने समझाया कि अगर किसी संख्या को उसी संख्या से भाग दिया जाये तो उसका उत्तर एक होगा। लेकिन तभी कोने में बैठे रामानुजन ने प्रश्न किया कि, यदि कोई भी केला किसी को न बाँटा जाए, तो क्या तब भी प्रत्येक विद्यार्थी को एक केला मिल सकेगा? सभी विद्यार्थी इस प्रश्न को सुनकर हँस पड़े, क्योंकि उनकी दृष्टि में यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण था। लेकिन बालक रामानुजन द्वारा पूछे गए इस गूढ़ प्रश्न पर गणितज्ञ सदियों से विचार कर रहे थे। प्रश्न था कि अगर शून्य को शून्य से विभाजित किया जाए तो परिणाम क्या होगा? भारतीय गणितज्ञ भास्कराचार्य ने कहा था कि अगर किसी संख्या को शून्य से विभाजित किया जाये तो परिणाम `अनन्त’ होगा। रामानुजन ने इसका विस्तार करते हुए कहा कि शून्य का शून्य से विभाजन करने पर परिणाम कुछ भी हो सकता है अर्थात् वह परिभाषित नहीं है। रामानुजन की प्रतिभा से अध्यापक बहुत प्रभावित हुए।

    प्रारंभिक शिक्षा के बाद इन्होंने हाई स्कूल में प्रवेश लिया। यहाँ पर तेरह वर्ष की अल्पावस्था में इन्होने ‘लोनी’ कृत विश्व प्रसिद्ध ‘त्रिकोणमिति’ को हल किया और पंद्रह वर्ष की अवस्था में जार्ज शूब्रिज कार कृत `सिनोप्सिस ऑफ़ एलिमेंट्री रिजल्टस इन प्योर एण्ड एप्लाइड मैथेमैटिक्स’ का अध्ययन किया। इस पुस्तक में दी गयी लगभग पांच हज़ार प्रमेयों को रामानुजन ने सिद्ध किया और उनके आधार पर नए प्रमेय विकसित किये। इसी समय से रामानुजन ने अपनी प्रमेयों को नोटबुक में लिखना शुरू कर दिया था। हाई स्कूल में अध्ययन के लिए रामानुजन को छात्रवृत्ति मिलती थी परंतु रामानुजन के द्वारा गणित के अलावा दूसरे सभी विषयों की उपेक्षा करने पर उनकी छात्रवृत्ति बंद कर दी गई। उच्च शिक्षा के लिए रामानुजन मद्रास विश्वविद्यालय गए परंतु गणित को छोड़कर शेष सभी विषयों में वे अनुत्तीर्ण हो गए। इस तरह रामानुजन की औपचारिक शिक्षा को एक पूर्ण विराम लग गया। लेकिन रामानुजन ने गणित में शोध करना जारी रखा।

    कुछ समय उपरांत इनका विवाह हो गया गया और वे आजीविका के लिए नौकरी खोजने लगे। इस समय उन्हें आर्थिक तंगी से गुजरना पड़ा। लेकिन नौकरी खोजने के दौरान रामानुजन कई प्रभावशाली व्यक्तियों के सम्पर्क में आए। ‘इंडियन मेथमेटिकल सोसायटी’ के संस्थापकों में से एक रामचंद्र राव भी उन्हीं प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक थे। रामानुजन ने रामचंद्र राव के साथ एक वर्ष तक कार्य किया। इसके लिये इन्हें 25 रू. महीना मिलता था। इन्होंने ‘इंडियन मेथमेटिकल सोसायटी’ की पत्रिका (जर्नल) के लिए प्रश्न एवं उनके हल तैयार करने का कार्य प्रारंभ कर दिया। सन् 1911 में बर्नोली संख्याओं पर प्रस्तुत शोधपत्र से इन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली और मद्रास में गणित के विद्वान के रूप में पहचाने जाने लगे। सन् 1912 में रामचंद्र राव की सहायता से मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के लेखा विभाग में लिपिक की नौकरी करने लगे। सन् 1913 में इन्होंने जी. एम. हार्डी को पत्र लिखा और उसके साथ में स्वयं के द्वारा खोजी प्रमेयों की एक लम्बी सूची भी भेजी।

    यह पत्र हार्डी को सुबह नाश्ते के टेबल पर मिले। इस पत्र में किसी अनजान भारतीय द्वारा बहुत सारे प्रमेय बिना उपपत्ति के लिखे थे, जिनमें से कई प्रमेय हार्डी पहले ही देख चुके थे। पहली बार देखने पर हार्डी को ये सब बकवास लगा। उन्होंने इस पत्र को एक तरफ रख दिया और अपने कार्यों में लग गए परंतु इस पत्र की वजह से उनका मन अशांत था। इस पत्र में बहुत सारे ऐसे प्रमेय थे जो उन्होंने न कभी देखे और न सोचे थे। उन्हें बार-बार यह लग रहा था कि यह व्यक्ति या तो धोखेबाज है या फिर गणित का बहुत बड़ा विद्वान। रात को हार्डी ने अपने एक शिष्य के साथ एक बार फिर इन प्रमेयों को देखा और आधी रात तक वे लोग समझ गये कि रामानुजन कोई धोखेबाज नहीं बल्कि गणित के बहुत बड़े विद्वान हैं, जिनकी प्रतिभा को दुनिया के सामने लाना आवश्यक है। इसके बाद हार्डी और रामानुजन में पत्रव्यवहार शुरू हो गया। हार्डी ने रामानुजन को कैम्ब्रिज आकर शोध कार्य करने का निमंत्रण दिया। रामानुजन का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। वह धर्म-कर्म को मानते थे और कड़ाई से उनका पालन करते थे। वह सात्विक भोजन करते थे। उस समय मान्यता थी कि समुद्र पार करने से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। इसलिए रामानुजन ने कैम्ब्रिज जाने से इंकार कर दिया। लेकिन हार्डी ने प्रयास जारी रखा और मद्रास जा रहे एक युवा प्राध्यापक नेविल को रामानुजन को मनाकर कैम्ब्रिज लाने के लिए कहा। नेविल और अन्य लोगों के प्रयासों से रामानुजन कैम्ब्रिज जाने के लिए तैयार हो गए। हार्डी ने रामानुजन के लिए केम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में व्यवस्था की।

    जब रामानुजन ट्रिनिटी कॉलेज गए तो उस समय पी.सी. महलानोबिस [प्रसिद्ध भारतीय सांख्यिकी विद] भी वहां पढ़ रहे थे। महलानोबिस रामानुजन से मिलने के लिए उनके कमरे में पहुंचे। उस समय बहुत ठंड थी। रामानुजन अंगीठी के पास बैठे थे। महलानोबिस ने उन्हें पूछा कि रात को ठंड तो नहीं लगी। रामानुजन ने बताया कि रात को कोट पहनकर सोने के बाद भी उन्हें ठंड लगी। उन्होंने पूरी रात चादर ओढ़ कर काटी थी क्योंकि उन्हें कम्बल दिखाई नहीं दिया। महलानोबिस उनके शयन कक्ष में गए और पाया कि वहां पर कई कम्बल हैं। अंग्रेजी शैली के अनुसार कम्बलों को बिछाकर उनके ऊपर चादर ढकी हुई थी। जब महलानोबिस ने इस अंग्रेजी शैली के बारे में बताया तो रामानुजन को अफ़सोस हुआ। वे अज्ञानतावश रात भर चादर ओढ़कर ठंड से ठिठुरते रहे। रामानुजन को भोजन के लिए भी कठिन परेशानी से गुजरना पड़ा। शुरू में वे भारत से दक्षिण भारतीय खाद्य सामग्री मंगाते थे लेकिन बाद में वह बंद हो गयी। उस समय प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था। रामानुजन सिर्फ चावल, नमक और नीबू-पानी से अपना जीवन निर्वाह करने लगे। शाकाहारी होने के कारण वे अपना भोजन खुद पकाते थे। उनका स्वभाव शांत और जीवनचर्या शुद्ध सात्विक थी।

    रामानुजन ने गणित में सब कुछ अपने बलबूते पर ही किया। इन्हें गणित की कुछ शाखाओं का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था पर कुछ क्षेत्रों में उनका कोई सानी नहीं था। इसलिए हार्डी ने रामानुजन को पढ़ाने का जिम्मा स्वयं लिया। स्वयं हार्डी ने इस बात को स्वीकार किया कि जितना उन्होंने रामानुजन को सिखाया उससे कहीं ज्यादा रामानुजन ने उन्हें सिखाया। सन् 1916 में रामानुजन ने केम्ब्रिज से बी. एस-सी. की उपाधि प्राप्त की।

    रामानुजन और हार्डी के कार्यों ने शुरू से ही महत्वपूर्ण परिणाम दिये। सन् 1917 से ही रामानुजन बीमार रहने लगे थे और अधिकांश समय बिस्तर पर ही रहते थे। इंग्लैण्ड की कड़ी सर्दी और कड़ा परिश्रम उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हुई। इनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा और उनमें तपेदिक के लक्षण दिखाई देने लगे। इधर उनके लेख उच्चकोटि की पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे थे। सन् 1918 में, एक ही वर्ष में रामानुजन को कैम्ब्रिज फिलोसॉफिकल सोसायटी, रॉयल सोसायटी तथा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज तीनों का फेलो चुन गया। इससे रामानुजन का उत्साह और भी अधिक बढ़ा और वह शोध कार्य में जोर-शोर से जुट गए। सन् 1919 में स्वास्थ बहुत खराब होने की वजह से उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा।

    रामानुजन की स्मरण शक्ति गजब की थी। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी और एक महान गणितज्ञ थे। एक बहुत ही प्रसिद्ध घटना है। जब रामानुजन अस्पताल में भर्ती थे तो डॉ. हार्डी उन्हें देखने आए। डॉ. हार्डी जिस टैक्सी में आए थे उसका नम्बर था 1729 । यह संख्या डॉ. हार्डी को अशुभ लगी क्योंकि 1729 = 7 x 13 x 19 और इंग्लैण्ड के लोग 13 को एक अशुभ संख्या मानते हैं। परंतु रामानुजन ने कहा कि यह तो एक अद्भुत संख्या है। यह वह सबसे छोटी संख्या है, जिसे हम दो घन संख्याओं के जोड़ से दो तरीके में व्यक्त कर सकते हैं। (1729 = 12x12x12 + 1x1x1,और 1729 = 10x10x10 + 9x9x9)।

    सन् 1903 से 1914 के बीच, कैम्ब्रिज जाने से पहले रामानुजन अपनी `नोट बुक्स’ में तीन हज़ार से ज्यादा प्रमेय लिख चुके थे। उन्होंने ज्यादातर अपने निष्कर्ष ही दिए थे और उनकी उपपत्ति नहीं दी। सन् 1967 में प्रोफेसर ब्रूस सी. बर्नाड्ट को जब ‘रामानुजन नोट बुक्स’ दिखाई गयी तो उस समय उन्होंने इस पुस्तक में कोई रुचि नहीं ली। बाद में उन्हें लगा कि वह रामानुजन के प्रमेयों की उत्पत्तियाँ दे सकते हैं। प्रोफेसर बर्नाड्ट ने अपना पूरा ध्यान रामानुजन की पुस्तकों के शोध में लगा दिया। उन्होंने रामानुजन की तीन पुस्तकों पर 20 वर्षों तक शोध किया।

    सन् 1919 में इंग्लैण्ड से वापस आने के पश्चात् रामानुजन 3 महीने मद्रास, 2 महीने कोदमंडी और 4 महीने कुंभकोणम में रहे। उनकी पत्नी ने उनकी बहुत सेवा की। पति-पत्नी का साथ बहुत कम समय तक रहा। रामानुजन के इंग्लैंड जाने से पूर्व वे एक वर्ष तक उनके साथ रही और वहां से आने के एक वर्ष के अन्दर ही परमात्मा ने पति को सदा के लिए उनसे छीन लिया। उन्हें माँ होने का सुख भी प्राप्त नहीं हुआ। कहते हैं कि रामानुजन को ज्योतिष ज्ञान था जिसके आधार पर इन्होंने अपनी पत्नी को बताया था क़ि वे 34 साल से ज्यादा जीवित नहीं रहेंगे। लेकिन इससे पहले ही 26 अप्रैल 1920 को 32 वर्ष 4 महीने और 4 दिन की अल्पायु में रामानुजन का शरीर परब्रह्म में विलीन हो गया।

    गणितीय कार्य एवं उपलब्धियाँ

    रामानुजन ने इंग्लैण्ड में पाँच वर्षों तक मुख्यतः संख्या सिद्धान्त के क्षेत्र में काम किया।

    सूत्र

    रामानुजन् ने निम्नलिखित सूत्र प्रतिपादित किया-

     1+\frac{1}{1\cdot 3} + \frac{1}{1\cdot 3\cdot 5} + \frac{1}{1\cdot 3\cdot 5\cdot 7} + \frac{1}{1\cdot 3\cdot 5\cdot 7\cdot 9} + \cdots + {{1\over 1 + {1\over 1 + {2\over 1 + {3\over 1 + {4\over 1 + {5\over 1 + \cdots }}}}}}} = \sqrt{\frac{e\cdot\pi}{2}}

    इस सूत्र की विशेषता यह है कि यह गणित के दो सबसे प्रसिद्ध नियतांकों ( ‘पाई’ तथा ‘ई’ ) का सम्बन्ध एक अनन्त सतत भिन्न के माध्यम से व्यक्त करता है।

    पाई के लिये उन्होने एक दूसरा सूत्र भी (सन् १९१० में) दिया था-

     \pi = \frac{9801}{2\sqrt{2} \displaystyle\sum^\infty_{n=0} \frac{(4n)!}{(n!)^4} \times \frac{[1103 + 26390n]}{(4 \times 99)^{4n}}}

    रामानुजन संख्याएँ

    ‘रामानुजन संख्या’ उस प्राकृतिक संख्या को कहते हैं जिसे दो अलग-अलग प्रकार से दो संख्याओं के घनों के योग द्वारा निरूपित किया जा सकता है।

    उदाहरण – 9^3 + 10^3 = 1^3 + 12^3 = 1729.

    इसी प्रकार,

    • 2^3 + 16^3 = 9^3 + 15^3 = 4 104
    • 10^3 + 27^3 = 19^3 + 24^3 = 20 683
    • 2^3+ 34^3 = 15^3 + 33^3 = 39 312
    • 9^3 + 34^3 = 16^3 + 33^3 = 40 033

    अतः 1729, 4104, 20683, 39312, 40033 आदि रामानुजन संख्याएं हैं।

    सम्मान

    राष्ट्रीय गणित दिवस

    भारत में प्रत्येक वर्ष 22 दिसम्बर को महान गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन की स्मृति में ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है ।

    जीवन पर बनी फ़िल्म : द मैन हू न्यू इनफिनिटी

    द मैन हू न्यू इनफिनिटी फ़िल्म का पोस्टर

    द मैन हू न्यू इनफिनिटी फ़िल्म का पोस्टर

    यह फिल्म एक बॉयोपिक है और रामानुजन की जिंदगी पर आधारित है।

    पहले विश्वयुद्ध के समय पर बनी, फिल्म रॉबर्ट कनिगेल की किताब पर आधारित है। फिल्म की कहानी ऐसी दोस्ती पर आधारित है जिसने हमेशा के लिए गणित की दुनिया को बदलकर रख दिया। रामानुजन एक गरीब स्वयं पढ़ने वाले भारतीय गणितज्ञ थे। फिल्म की कहानी उनके ट्रिनिटी कॉलेज मद्रास से कैंब्रिज जाने की है।

    कैंब्रिज पहुंचने के बाद, रामानुजन और उनके प्रोफेसर जीएच हार्डी के साथ उनका बांड बन जाता है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे वह विश्वप्रसिद्ध गणितज्ञ बने। देविका भिसे, रामानुजन की पत्नी का किरदार निभा रही हैं। देविका एक शास्त्रीय नृत्यांगना हैं। देविका ने अपनी भूमिका के लिए बहुत अध्ययन किया। उन्होंने किताब के लेखर रॉबर्ट कनिगेल से भी बातचीत की, जो असली जानकी (रामानुजन की पत्नी) से मिल चुके हैं।

    एडवर्ड आर प्रेसमैन/एनीमस फिल्मस प्रोडक्शन और कैयेने पेपर प्रोडक्शन द्वारा निर्मित, द मैन हू न्यू इनफीनिटी में देव पटेल, जेरेमी आयरंस, देविका भिसे, स्टेफन फ्राय, टॉबी जॉंस और अरूंधती नाग की मुख्य भूमिकाएं हैं। फिल्म की कहानी लेखन और निर्देशन मैथ्यू ब्राउन ने किया है। फिल्म तमिल और अंग्रेजी में उपलब्ध है।

     



  • क्रोयोनिक्स : मृत्यु पर विजय पाने का प्रयास
  • वर्तमान मे ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़ते जा रही है जो अपने शरीर को क्रायोजेनिकली संरक्षित रखने के लिये कंपनीयों को बड़ी राशि प्रदान कर रहे है। उन्हे मृत्यु के पश्चात भी भविष्य मे पुनर्जीवन की आशा है।

    क्रोनिक्स के तीन प्रमुख संस्थानो मे संरक्षित शरीरों की संख्या

    क्रोनिक्स के तीन प्रमुख संस्थानो मे संरक्षित शरीरों की संख्या

    क्रायोजेनिक तकनीक को ‘निम्नतापकी’ कहा जाता है, जिसका ताप -0 डिग्री से -150 डिग्री सेल्सियस होता है।

    • ‘क्रायो’ यूनानी शब्द ‘क्रायोस’ से बना है, जिसका अर्थ ‘बर्फ जैसा ठण्डा’ है।

    यह तकनीक विज्ञान फ़तांशी कहानीयो से उपजी है जिसमे शरीर को भविष्य मे पुनर्जीवन की आश मे संरक्षित रखा जाता है। वर्तमान विज्ञान अभी इतना विकसीत नही है कि वह इन हिमीकृत शरीरो को पुनर्जीवित कर सके। इसके बावजूद अबतक 350 व्यक्तियों को हिमीकृत किया जा चूका है और 3000 व्यक्तियों ने अपने शरीर को हिमीकृत करवाने के लिये आरक्षण करवाया हुआ है। हिमीकरण कर शरीर के संरक्षण का समूर्ण व्यवसाय संपूर्ण विश्व मे इन तीन कंपनीयों के द्वारा नियंत्रित है। कुछ अन्य और भी कंपनीयाँ है जो शरीर का हीमीकरण कर इन कंपनीयों के शरीर संरक्षण केंद्र मे पहुचाने का व्यवसाय करती है।

    1. क्रायोनिक्स इंस्टीट्युट
    2. अल्कार फ़ाउंडेशन
    3. क्रायोरस

    क्रायोजेनिक्स संकल्पना

    1964 मे वैज्ञानिक और लेखक राबर्ट एटीन्गर(Robert Ettinger) ने एक 62 पृष्ठ का एक घोषणा पत्र प्रकाशित किया जिसका नाम था “द प्रास्पेक्ट आफ़ इम्मोर्टलीटी(अमरता की संभावना)”, अब यह घोषणा पत्र बढ़कर 200 पन्नो का हो चुका है और वह अब इस तकनीक से जुड़े वैज्ञानिक, नैतिक और आर्थिक पहलुओं का भी समावेश करता है। इस का आरंभ ऐसे होता है।

    सच्चाई(The Fact)

    अत्यंत कम तापमान पर वर्तमान मे मृत व्यक्तियों के शरीर को क्षति पहुंचाये बगैर अनंत काल तक संरक्षित किया जा सकता है।

    मान्यता(The Assumption)

    यदि सभ्यता पनपती रही तो भविष्य मे चिकित्सा विज्ञान शरीर मे हुई किसी भी क्षति का उपचार करने मे सक्षम होगा जिसमे हिमीकरण से उत्पन्न क्षति के साथ मृत्यु के कारण का भी समावेश है। 2011 मे राबर्ट एटींगर का शरीर भी उसके पहले संरक्षित उनकी माता और दो पत्नियों के शरीर के साथ भविष्य मे पुनर्जीवन की आशा मे संरक्षित कर दिया गया।

    विधि

    1. मृत्यु के तुरंत पश्चात शरीर को बाह्य बर्फ़ के पैकेटो की सहायता से शीतल कर संरक्षण केंद्र तक पहुंचाया जाता है। मृत्यु के बाद जितनी जल्दी हो सके, लाश को ठंडा कर जमा दिया जाता है ताकि उसकी कोशिकाएं, ख़ास कर मस्तिष्क की कोशिकाएं, ऑक्सीजन की कमी से टूट कर नष्ट न हो जाएं। इसके लिए पहले शरीर को बर्फ़ से ठंडा कर दिया जाता है।
    2. संरक्षण केंद्र मे पहुंचने के पश्चात शरीर से रक्त निकाल लिया जाता है और शरीर के अंगों के हिमीकरण से बचाव के लिये धमनीयों मे हिमीकरण रोधी द्रव डाला जाता है तथा खोपड़ी मे छोटे छिद्र बनाये जाते है।  इसके बाद ज़्यादा महत्वपूर्ण काम शुरू होता है. शरीर से ख़ून निकाल कर उसकी जगह रसायन डाला जाता है, जिन्हें ‘क्रायो-प्रोटेक्टेंट’ तरल कहते हैं। ऐसा करने से अंगों में बर्फ नही बनते। यह ज़रूरी इसलिए है कि यदि बर्फ़ जम गया तो वह अधिक जगह लेगा और कोशिका की दीवार टूट जाएगी।
    3. इसके बाद शरीर के एक शयन बैग मे डाल कर द्रव नाइट्रोजन मे -196 °C तापमान पर रख दीया जाता है।

      अमरीका में 150 से अधिक लोगों ने अपने शरीर तरल नाइट्रोजन से ठंडा कर रखवाए हैं। इसके अलावा 80 लोगों ने सिर्फ़ अपना मस्तिष्क सुरक्षित रखवाया है। पूरे शरीर को जमा कर सुरक्षित रखने में 1,60,000 डॉलर ख़र्च हो सकता है। मस्तिष्क को सुरक्षित रखने में 64,000 डॉलर का ख़र्च आता है।

    आशा

    रोगी इस आशा मे अपने शरीर का हिमीकरण कराते है कि भविष्य का चिकित्सा विज्ञान उनकी मृत्यु को वापिस कर उन्हे जीने का एक और अवसर देगा। इस तकनीक के समर्थक कहते है कि कुछ ऐसे जीव है जो हिमीकरण के पश्चात स्व्यं ही पुनर्जीवित हो उठते है। इन जीवो मे शामिल है :

    1. आर्कटिक क्षेत्र की जमीनी गिलहरी
    2. कछुये की कुछ प्रजाति
    3. आर्काटीक उनी कंबल किड़ा
    4. टार्डीग्रेड्स

    इस तकनीक के समर्थक मानते है कि भविष्य मे चिकित्सा विज्ञान इतना विकसित हो जायेगा कि इन व्यक्तियों को पुनर्जीवन दे देगा। यह 100 वर्ष पश्चात हो सकता है या इसमे अगले 1000 वर्ष भी लग सकते है।

    जोखिम

    • पुनर्जीवन की आस मे शरीर संरक्षण की किमत कम नही है। एक शरीर के संरक्षण की किमत कंपनी के अनुसार 30,000$ से 200,00 $ के मध्य होती है।
    • इस बात की कोई गारंटी नही है कि भविष्य का चिकित्सा शास्त्र मृत्यु को हरा कर पुनर्जीवन दे पायेगा। वर्तमान मे ही इस बात की कोई गारंटी नही है कि हिमीकरण से सामान्य स्तिथि मे शरीर को वापिस लाने की प्रक्रिया मे शरीर को कोई नुकसान नही पहुंचेगा। वर्तामान मे हिमीकरण से वापिस लाने पर शरीर की पेशीया पहले जैसी स्तिथि मे नही लाई जा सकी है।
    • यदि किसी तरह से शरीर को हानि पहुंचने से बचाया भी जा सके तो इस बात की कोई गारंटी नही है कि मानव को अन्य जीवो के जैसे पुनर्जीवित किया जा सकेगा।

    यदि आपको निश्चय मृत्यु और पुनर्जीवन की संभावना मे से कोई एक चुनना हो तो क्या आप अपने शरीर को हिमीकृत कराना पसंद करेंगे ? लेख को पोस्टर के रूप मे डाउनलोड करने निचे चित्र पर क्लिक करें



  • नासा ने सौर मंडल के जैसे एक और सौर मंडल खोजा : केप्लर 90
  • नासा ने हमारे सौर मंडल के तुल्य एक तारा-ग्रह प्रणाली खोजी है जिसके पास आठ ग्रह है। इस तारे का नाम केप्लर 90 है।

    केप्लर 90 और सौर मंडल के ग्रहों के आकार की तुलना

    केप्लर 90 और सौर मंडल के ग्रहों के आकार की तुलना

    अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा को एक बड़ी सफलता मिली है। NASA के केपलर अंतरिक्ष दूरबीम ने हमारे जितना बड़ा ही एक और तारा-ग्रह प्रणाली खोजी है। दरअसल, यह तारा और उसके ग्रह पहले ही खोजे गये था, अब वहीं पर आठवें ग्रह की भी पहचान कर ली गई है। ऐसे में सूर्य या उस जैसे किसी तारे की परिक्रमा करने के मामले में केपलर-90 प्रणाली की तुलना हमारे सौरमंडल से की जा सकती है।

    इसका अर्थ यह है कि केप्लर 90 के पास हमारे सूर्य के जैसे आठ ग्रह है। इसके पहले केप्लर 90 मे ट्रेपिस्ट -1 के जैसे सात ग्रह ज्ञात थे।

    खास बात यह है कि इस खोज में गूगल की ओर से कृत्रिम बुद्धि( आर्टिफिशल इंटेलिजेंस) की मदद ली गई, जो मानवों के रहने योग्य ग्रहों की तलाश करने में काफी मदद करेगा। केपलर-90 ग्रह प्रणाली के इस आठवें ग्रह का नाम केपलर 90i है। गूगल और नासा के इस प्रॉजेक्ट द्वारा हमारे जैसे ही सौर मंडल की खोज से इस बात की उम्मीद बढ़ी है कि ब्रह्मांड में किसी ग्रह पर परग्रही( ऐलियन) मौजूद हो सकते हैं।

    दिलचस्प है कि केपलर-90 के ग्रहों की व्यवस्था हमारे सौर मंडल जैसी ही है। इसमें भी छोटे ग्रह अपने तारे से नजदीक हैं और बड़े ग्रह उससे काफी दूर मौजूद हैं। NASA के अनुसार, इस खोज से पहली बार स्पष्ट होता है कि दूर कहीं तारा प्रणाली में हमारे जैसे ही सौर परिवार मौजूद हो सकते हैं। यह सौर मंडल हमसे करीब 2,545 प्रकाश वर्ष दूर है।

    नासा ने बताया कि इस ग्रह का तापमान करीब 800 डिग्री फारेनहाइट (426 डिग्री सेल्सियस) है।  नया खोजा ग्रह केपलर 90i इन ग्रहों में सबसे छोटा ग्रह है। यह ग्रह पृथ्वी की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत बड़ा होने का अनुमान है। केपलर 90i पृथ्वी की तरह एक पथरीला ग्रह है। केपलर 90i पर पृथ्वी की तरह एक वर्ष का समय दो हफ्तों का होगा। क्योंकि ये अपनी तारे की परिक्रमा में 14.4 दिन में कर लेता है। एंड्रयू वंडरबर्ग ने कहा कि केप्लर-90 का धरातल बुध ग्रह की तरह ही बहुत ज्यादा गर्म है।

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    टेक्सस यूनिवर्सिटी के नासा सगन पोस्टडॉक्टरल फेलो एवं खगोल विज्ञानी एंड्रयू वांडबर्ग ने कहा,

    ‘नया ग्रह पृथ्वी से करीब 30 प्रतिशत बड़ा माना जा रहा है। हालांकि यह ऐसी जगह नहीं है, जहां आप जाना चाहेंगे।’ उन्होंने बताया कि यहां काफी चट्टानें हैं और वातावरण भी घना नहीं है। सतह का तापमान काफी ज्यादा है और इससे लोग झुलस सकते हैं। वांडबर्ग के मुताबिक सतह का औसत तापमान करीब 800 डिग्री फ़ारनहाइट हो सकता है।

    केप्लर अंतरिक्ष वेधशाला को 2009 में प्रक्षेपित किया गया था, और इसने करीब 1,50,000 तारों को को छाना है। खगोल वैज्ञानिको ने केप्लर डाटा के जरिए अब तक 2,500 ग्रहों की खोज की है।

    नासा ने 14 दिसंबर 2017 को एक प्रेस कांफ़्रेंस मे घोषणा की है।

    नोट : बहुत सी बेहुदा वेबसाईट/समाचार पत्रों ने इस प्रेस कांफ़्रेंस को एलियन की घोषणा से जोड़ा था।



  • भौतिक विज्ञान को अनिश्चित कर देने वाले वर्नेर हाइजेनबर्ग
  • वर्नेर हाइजेनबर्ग(Werner Heisenberg)

    वर्नेर हाइजेनबर्ग(Werner Heisenberg)

    गणित में बेहद रूचि रखने वाले वर्नर हाइजेनबर्ग (Werner Heisenberg) भौतिकी की ओर अपने स्कूल के अंतिम दिनों में आकृष्ट हुए और फिर ऐसा कर गये जिसने प्रचलित भौतिकी की चूलें हिला दीं। वे कितने प्रतिभाशाली रहे होंगे और उनके कार्य का स्तर क्या रहा होगा, इसका अंदाज इस बात से लगता है कि जिस क्वांटम यांत्रिकी को उन्होंने मात्र 23 की उम्र में गढ़ा, उसके लिये उन्हें मात्र 31 वर्ष की उम्र में ही नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

    अपने मौलिक चिंतन से हाइजेनबर्ग ने ने अनिश्चितता का सिद्धांत(Uncertainty principle) प्र्स्तुत किया।इस सिद्धांत को उन्होंने इस प्रकार बताया:

    यह पता कैसे चलेगा कि कोई कण (पार्टिकल) कहाँ है? उसे देखने के लिए हमें उसपर प्रकाश फेंकना पड़ेगा अर्थात हमें उसपर फ़ोटॉन डालने होंगे। जब फ़ोटॉन उस पार्टिकल से टकरायेंगे तब उस टक्कर के परिणामस्वरूप कण(पार्टिकल) की स्थिति परिवर्तित हो जायेगी। इस तरह हम उसकी स्तिथि को नहीं जान पाएंगे क्योंकि स्थिति को जानने के क्रम में हमने स्तिथि में परिवर्तन कर दिया।

    पांसे

    ईश्वर पासे नहीं फेंकता !(God doesn’t play dice!)

    तकनीकी स्तर पर यह सिद्धांत कहता है कि हम कण(पार्टिकल) की स्तिथि और उसके संवेग(momentum) को एक साथ नहीं जान सकते। यह पूरा तो नहीं पर कुछ-कुछ उस ‘ऑब्ज़र्वर’ प्रभाव की भांति है जहाँ कुछ प्रयोग ऐसे होते हैं जिनमें परीक्षण का परिणाम प्रेक्षक (ऑब्ज़र्वर) की स्तिथि में बदलाव होने से बदल जाता है। इस प्रकार अणुओं और परमाणुओं की सौरमंडलीय व्यवस्था ध्वस्त हो गयी। अब इलेक्ट्रौन को पार्टिकल के रूप में नहीं बल्कि संभाव्यता प्रकार्य (प्रॉबेबिलिटी फंक्शन्स) के रूप में देखा जाता है। हम उनके कहीं होने की संभावना की गणना कर सकते हैं पर यह नहीं बता सकते कि वे कहाँ हैं। वे कहीं और भी हो सकते हैं।

    हाइजेनबर्ग ने जब इस सिद्धांत की घोषणा की तब बहुत विवाद भी हुए। आइन्स्टीन ने अपना प्रसिद्द उद्धरण भी कहा, “ईश्वर पासे नहीं फेंकता”। और इसके साथ ही भौतिकी भी दो भागों में बाँट गयी। एक में तो विस्तार और विहंगमता का अध्ययन किया जाने लगा और दूसरी में अतिसूक्ष्म पदार्थ का। इन दोनों का एकीकरण अभी तक नहीं हो पाया है।

    बचपन

    वर्नर हाइजेनबर्ग का जन्म 5 दिसम्बर 1901 को वुर्ज़बर्ग (Würzburg) में हुआ था। वारेन ने अपनी पढ़ाई की शुरुआत वुर्ज़बर्ग के स्कूल मेक्सीमिलियन जिम्नेशियम (Maximilians Gymnasium, Munich) से की। जब वे पैदा हुए थे तब उनके पिता आगस्ट हाइजेनबर्ग (August Heisenberg) क्लासिकल लेंग्वेज के शिक्षक थे, जो आगे चलकर सन् 1909 में वे म्युनिक विश्वविद्यालय में ग्रीक भाषा के प्रोफेसर बने। कुछ महिनों के बाद वर्नर भी परिवार के साथ वुर्ज़बर्ग से म्यूनिक आ गये।

    सन् 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ गया जो सन् 1919 तक चला। सन् 1918 में जर्मनी में क्रांति हुई। इस कारण म्यूनिक में भी बहुत आपदाएं आईं। वर्नर ने इस क्रांति में भाग लिया। रात को ड्यूटी रहती लेकिन जब सुबह-सुबह काम नहीं रहता तब उनका पुस्तकें पढ़ने का शौक पूरा होता। एक बार महान दार्शनिक प्लेटो की ग्रीक भाषा में लिखी प्रसिद्ध पुस्तक ‘थिमेअस’ (Timaeus) उनके हाथ लग गई। चूँकि ग्रीक भाषा का अध्ययन वर्नर के पाठ्यक्रम का हिस्सा था, अतः यह पुस्तक उनके लिये उपयोगी थी। इस पुस्तक में प्राचीन यूनान के परमाणु संबंधी सिद्धांत का वर्णन था। अतः इस पुस्तक को पढ़ते समय उनके मन में परमाणु के रहस्यों को गहराई से जानने की इच्छा पैदा हो गई। अब उनका मन गणित के साथ ही भौतिकी के अध्ययन की ओर भी होने लगा। आगे चलकर उन्होंने सन् 1932 में परमाणु के नाभिक के लिये ‘न्यूट्रॉन-प्रोटॉन मॉडल’ प्रस्तुत किया। उनका ग्रीक प्रेम आगे भी नजर आया जब युकावा ने सशक्त नाभिकीय बल के सिद्धांत को विकसित करने के लिये जिस कण को ‘मिसॉट्रॉन’ के नाम से प्रतिपादित किया था, उसे हाइजेनबर्ग के सुझाव पर ‘मिसॉन(Meson)’ के रूप में मान्य किया गया।

    जर्मनी में क्रांति के दिनों में, जब जर्मनी के हालत बिगड़ने लगे और उनके परिवार के पास खाने तक का संकट था, तब वर्नर को कुछ दिनों के लिये स्कूल छोड़कर कुछ महीनों के लिये म्यूनिक से करीब 50 मील दूर स्थित खेत पर मजदूरी के लिये जाना पड़ा। खेत पर उन्हें अक्सर साढ़े तीन बजे सुबह उठना पड़ता और फिर रात को करीब दस बजे तक काम करना होता था। कई बार उन्हें दिन में घास काटने जैसा थका देने वाला परिश्रम भी करना पड़ता। लेकिन वर्नर ने इस काम को मजबूरी में करने की बजाय ‘शिक्षा देने वाले काम’ के रूप में लिया। बाद में उन्होंने महसूस किया कि इस दौरान उन्हें वह शिक्षा मिली जो स्कूलों में रहकर कभी नहीं मिल सकती थी।

    धीरे-धीरे जर्मनी के हालात सुधरे और फिर वर्नर अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद सन् 1920 में सोमेरफेल्ड के मार्गदर्शन में भौतिकी पढ़ने के लिये म्यूनिक विश्वविद्यालय में आ गये। यहाँ वीन, प्रिंगशेम और रोजेंथल जैसे प्रतिष्ठित भौतिकविद् भी थे। म्यूनिक में उनकी मुलाकात सोमरफेल्ड के तीक्ष्ण बुद्धि वाले और बहुत सशक्त व्यक्तित्व के धनी छात्र वुल्फगैंग पॉली (जो आगे चलकर 1945 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए) से हुई। हाइजेनबर्ग उनसे बहुत गहराई तक प्रभावित हुए। पॉली शोध करने और इस दौरान प्रस्तुत किये जाने वाले सिद्धांतों में गलतियों को खोजने में माहिर थे।

    सोमरफेल्ड अपने विद्यार्थियों से बहुत प्यार करते थे। उन्हें पता चल चुका था कि वर्नर हाइजेनबर्ग को ‘परमाणु के चितेरे’ नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नील्स बोहर के परमाणु भौतिकी के काम में बहुत रूचि है। इसीलिये एक बार जब गोटिंजन में ‘बोहर फेस्टिवल’ का आयोजन हुआ तो वे हाइजेनबर्ग को भी अपने साथ ले गये। इस फेस्टिवल में बोहर के व्याख्यानों की एक शृंखला आयोजित थी। यहीं वे पहली बार बोहर से मिले और उनके गहरे प्रभाव में आ गये।

    शोधकार्य

    सन् 1922-23 के शीतकालीन अवकाश के दौरान हाइजेनबर्ग मैक्स बॉर्न, जेम्स फ्रेंक और डेविड हिलबर्ट के पास अपनी पीएचड़ी के लिये एक परियोजना पर कार्य करने के लिये गॉटिंगन गये। पी.एचडी. प्राप्त करने के बाद उन्हें गॉटिंगन विश्वविद्यालय में मैक्स बॉर्न के सहायक के रूप में कार्य करने का अवसर मिल गया। उन दिनों गॉटिंगन विश्वविद्यालय मैक्स बॉर्न के नैतृत्व में भौतिकी के बहुत बड़े केंद्र के रूप में विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखता था। मैक्स बॉर्न को उनके क्वांटम यांत्रिकी की सांख्यिकीय व्याख्या के लिये 1954 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला।

    इसके पश्चात 17 सितम्बर 1924 से 1 मई 1925 के बीच वे ‘रॉकफेलर ग्रांट’ प्राप्त कर कोपनहेगन विश्वविद्यालय में नील्स बोहर के साथ काम करने के लिये गये। उस समय क्वांटम दुनिया से उठ रही समस्याएं वैज्ञानिकों के सम्मुख चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रही थीं। बोहर इस क्षेत्र के अग्रणी वैज्ञानिक थे। उन्हें परमाणविक संरचना की खोज के लिये सन् 1922 का नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। कोपनहेगन के चैतन्य और प्रेरक वातावरण से निकल कर जब वे लौटे तो क्वांटम जगत से उठ रही समस्याओं से निपटने के लिये उनके मस्तिष्क में सर्वथा नये विचार घुमड़ने लगे और उन्होंने सर्वथा नये तरीके से सोचना आरंभ किया।

    वे बोहर मॉडल को लेकर सोचने लगे कि हम नहीं जानते कि इलेक्ट्रॉन परमाणु में कब, कहाँ हैं। हम अवशोषण या उत्सर्जन से इतना जान सकते हैं कि इलेक्ट्रॉन ने अवस्था परिवर्तन(State change) किया है। लेकिन इसने किस कक्षा से किस कक्षा में जाने के लिये किस रास्ते को तय किया है, यह कभी नहीं जाना जा सकता है। कक्षाओं के अस्तित्व को किसी भी तरीके से सत्यापित नहीं किया जा सकता है। अतः हम कैसे मान सकते हैं कि बोहर के ये आर्बिट वास्तविक आर्बिट हैं। अगर ये वास्तविक नहीं हैं तो फिर क्यों नहीं इनको छोड़कर आगे बढ़ने के लिये कोई अन्य वैकल्पिक रास्ता निकाला जाना चाहिये। वे सोचने लगे कि किसी भी सिद्धांत को ‘यथार्थ’ पर आधारित होना चाहिये न कि कल्पनाओं पर आधारित मॉडल्स पर। चूँकि हम संक्रमण (transition) के माध्यम से परमाणु को एक अवस्था से दूसरी में जाते हुए देखते हैं, अतः ‘संक्रमण’ को आधार बनाकर आगे बढ़ना उन्हें श्रेयस्कर लगा।

    क्वांटम जगत में प्रवेश के लिये हाइजेनबर्ग के ये विचार बीज एक नई दिशा की ओर संकेत कर रहे थे। वे इस बात के पक्षधर थे कि वैज्ञानिक पड़तालों को सिर्फ निरिक्षणो (observables) पर ही निर्भर होना चाहिए, और जहां तक परमाणु की बात है, हम सिर्फ स्प्रेक्ट्रल रेखाओं को ही देखते हैं, अतः इसी के इर्द-गिर्द हमारे सिद्धांत खड़े होना चाहिए। स्पेक्ट्रल रेखाओं के माध्यम से हम परमाणु द्वारा अवशोषित या उत्सर्जित विद्युतचुम्बकीय ऊर्जा से संबद्ध तरंगदैर्ध्य, आवृति और तीव्रता को संज्ञान में लेते हैं। यानि, ये ही वे राशियां होनी चाहिए जिनको आधार बनाकर हमें आगे बढ़ना चाहिए। अब उनकी प्रतिभा और अधिक रंग दिखाने लगी। कोई भी स्पेक्ट्रल रेखा तभी उदित होती है जब इलेक्ट्रॉन एक अवस्था से दूसरी में जाता है। चूंकि परमाणु में इलेक्ट्रॉन की अवस्था की पहचान उसकी स्थिति से नहीं बल्कि उससे संबद्ध क्वांटम संख्या से होती है, अतः स्पेट्रल रेखा का संबंध क्वांटम संख्याओं के विभिन्न जोड़ों से होना चाहिए।

    विचारों के बीजारोपण के इस दौर में उन्हें हे-फीवर हो गया। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘फिजिक्स एण्ड बीयांड’ में लिखा कि हे-फीवर के कारण जब वे हवा परिवर्तन के लिये हेलीगोलैण्ड गये तब उनकी घंटी बजी।’ बुखार के कारण शारीरिक कमजोरी के बावजूद उनका मस्तिष्क इन विचारों को दिशा देने के लिये बहुत उत्तेजित और सक्रिय था। अपनी तार्किक यात्रा के इसी दौर में उन्हें लगा कि वे परमाणविक घटनाओं के नीचे एक अनोखे खूबसूरत संसार को देख रहे हैं। वे हतप्रभ रह गये इस विचार से कि अब उन्हें प्रकृति द्वारा बड़ी ही उदारता से बिखेरी इस गणितीय संरचना को उजागर करना है।

    अब हाइजेनबर्ग के सामने सब कुछ साफ हो गया। परमाणविक घटनाओं के नीचे छिपी इस गणितीय संरचना में परमाणु में इलेक्ट्रॉन की स्थिति, वेग, संवेग आदि साधारण संख्याओं के रूप में उपस्थित नहीं रहते। इसके लिये उनके अनुसार पंक्ति (row) और कॉलम (column) में जमे संख्याओं के टेबिल की जरूरत होगी। इसमें प्रमुख अंतर इस बात को लेकर है कि जहाँ संख्याओं के गुणा में क्रम बदलने से गुणनफल नहीं बदलता वहीं टेबिलों के गुणा में ऐसा जरूरी नहीं होता। जब हाइजेनबर्ग ने अपने काम के बारे में बॉर्न को बताया तो उन्हें याद आया कि ऐसा ‘मेट्रिक्स’ के गुणनफल के दौरान होता है। अपने विद्यार्थी जीवन में बॉर्न का इससे परिचय हुआ था। अतः यह टेबिल तथा उससे जुड़ी विशिष्टता वाली बात गणितीय दुनिया में पहले से ही ज्ञात होने के कारण अब हाइजेनबर्ग के गणित के लिये कार्यकारी नियमों को खोजने की आवश्यकता नहीं थी।

    हाइजेनबर्ग ने गॉटिंगन लौटने के बाद मैक्स बॉर्न, पॉस्कल जॉर्डन के साथ मात्र 6 महिनों में ही क्वांटम मेकेनिक्स का पहला संस्करण मैट्रिक्स मेकेनिक्स के रूप में गढ़कर दुनिया के सामने रख दिया। हाइजेनबर्ग ने जिस क्वांटम मेकेनिक्स का विकास किया था उसमें बाहर से क्वांटम संख्याओं को ठूंसने की जरूरत नहीं थी। वे तो अपने आप समस्या के अनुसार से प्रकट होते थे। उनके इस कार्य ने सबको हैरत में डाल दिया। और, उन वैज्ञानिकों को तो मुश्किल में ही डाल दिया जिनकी जड़ें चिर-सम्मत भौतिकी में थी और वे अपने चिर-परिचित अंदाज में क्वांटम सिद्धांत को विकसित करने में लगे थे। इस तरह बड़े ही मौलिक अंदाज में उन्होंने क्वांटम समस्याओं को हल करने के लिये एक सर्वथा नई यांत्रिकी का विकास कर दिया।

    हालांकि हाइजेनबर्ग की क्वांटम मेकेनिक्स को किसी साधारण आदमी तो ठीक, वैज्ञानिकों के लिये भी समझना आसान नहीं है। लोगों की नजर में यह आईंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत से भी कठिन प्रतीत होता है क्योंकि उनकी यांत्रिकी का आधार और विकास की किसी तरह से भी चित्रात्मक अभिव्यक्ति में नहीं हो सकती। उनकी यांत्रिकी में मात्र शब्द और चिन्ह हैं तथा उनकी भाषा विशुद्ध गणितीय है। और यह बात सर्वविदित है कि सामान्य आदमी के लिये बिना चित्र की सहायता के किसी सिद्धांत को समझना आसान नहीं होता। हाइजेनबर्ग का विश्व-भौतिकी के क्षितीज पर उदय हो चुका था और वे रातों रात एक सैलिब्रेटी कर चुके थे। इस समय वे मात्र 24 वर्ष के थे।

    बुलंद होंसलों से उड़ने वालों को भला कौन रोक सका है? अपनी इस सफलता के बाद मई 1926 में उन्हें कोपेनहेगन विश्वविद्यालय में सैद्वांतिक भौतिकी में व्याख्याता के पद पर नियुक्ति मिली। इस कारण अब उन्हें नील्स बोहर का सतत सानिध्य मिलने लगा। यहाँ के बोहर द्वारा सृजित अकादमिक वातावरण में उनके मस्तिष्क में बहुत कुछ नया और नया ही आ रहा था। प्रकृति को देखने और समझने के लिये उनका अपना एक विशिष्ट नजरिया था। वे अपने तरीके से क्वांटम दुनिया को जानने और समझने को बेताब थे।

    हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत

    हाइजेनबर्ग अनिश्चितता सिद्धांत : इलेक्ट्रान की स्तिथि को देखने के प्रयास मे हम उसकी स्तिथि बदल देते है।

    हाइजेनबर्ग अनिश्चितता सिद्धांत : इलेक्ट्रान की स्तिथि को देखने के प्रयास मे हम उसकी स्तिथि बदल देते है।

    कोपनहेगन में एक दिन हाइजेनबर्ग को स्पष्ट महसूस हुआ कि भौतिक ज्ञान को जानने की हमारी अपनी सीमा है। इलेक्ट्रॉन की स्थिति को जानने के लिये हम अत्यधिक आवृत्ति के फोटॉन का इस्तेमाल करना पड़ता है जो देखे जाने वाले इलेक्ट्रॉन को प्रभावित करता है। इससे भले ही हमें उसकी स्थिति का पता चल जाये लेकिन उसका संवेग को सही-सही नहीं जाना जा सकेगा। प्रभाव को कम करने के लिये कम ऊर्जा वाले फोटॉन से संवेग को सही-सही भले ही जाना जा सके लेकिन अब स्थिति के बारे में निश्चिततापूर्वक जान पाना संभव नहीं होता है। इस तरह एक विचित्र स्थिति का निर्माण हो जाता है। हाइजेनबर्ग ने सोचा कि भले ही यह हमारी दुनिया में न हो लेकिन कम से कम परमाणविक दुनिया के बारे में तो निश्चित ही यह सही है। एक हद से नीचे हम वास्तविकता को जान ही नहीं सकते क्योंकि अवलोकन की प्रक्रिया देखी जाने वाली वास्तविकता को बदल देती है। अवलोकन के पूर्व हम नहीं कर सकते कि वास्तविकता क्या है। वास्तविकता का संबंध देखने की प्रक्रिया से है। इस अनुभूति ने हाइजेनबर्ग को परेशान कर दिया। आखिर उनके इस विचार से ब्रह्माण्ड के घड़ी की तरह चलने और वास्तविकता के बारे ने प्रचलित चिर-सम्मविचार बाहर होने जा रहा था।

    चिर-सम्मत भौतिकी(classical physics) भौतिक राशियों के एक साथ त्रुटिहीन मापन की कोई सीमा नहीं मानती। लेकिन हाइजेनबर्ग के अनुसार यह सिर्फ एक राशि के लिये ही हो सकता है। उनके अनुसार एक गतिमान कण की स्थिति और संवेग को एक साथ ठीक-ठीक कभी नहीं जाना जा सकता है। अगर दोनों को एक साथ मापना है तो उनके मापन में अनिश्चितता का गुणनफल किसी भी हालत में एक निश्चित मान से कम नहीं हो सकता जिसका संबंध प्लांक के नियतांक से है। यह नियतांक प्लांक को तब मिला था जब वे कृष्णिका वस्तुओं के स्पेक्ट्रम की समस्या को हल करने के लिये एक सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे थे। अतः हाइजेनबर्ग के अनुसार इस दुनिया के बारे में जानने का गणित और संभाव्यता ही एक मात्र सहारा है।

    अनिश्चितता सिद्धान्त (Uncertainty principle) की व्युत्पत्ति हाइजनबर्ग ने क्वाण्टम यान्त्रिकी के व्यापक नियमों से सन् 1927 ई। में दी थी। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी गतिमान कण की स्थिति और संवेग को एक साथ एकदम ठीक-ठीक नहीं मापा जा सकता। यदि एक राशि अधिक शुद्धता से मापी जाएगी तो दूसरी के मापन में उतनी ही अशुद्धता बढ़ जाएगी, चाहे इसे मापने में कितनी ही कुशलता क्यों न बरती जाए। इन राशियों की अशुद्धियों का गुणनफल प्लांक नियतांक (h) से कम नहीं हो सकता।

    यदि किसी गतिमान कण के स्थिति निर्दशांक x के मापन में {\displaystyle \Delta x}, की त्रुटि (या अनिश्चितता) और x-अक्ष की दिशा में उसके संवेग p के मापने में {\displaystyle \Delta p}, की त्रुटि हो तो इस सिद्धांत के अनुसार –

    {\displaystyle \Delta x\Delta p\geqslant {\frac {\hbar }{2}}},

    जहाँ, {\displaystyle \hbar =h/2\pi }h प्लांक नियतांक है।

    इससे प्रकट होता है कि किसी कण का कोई निर्दशांक और उसके संवेग का तत्संगन संघटक दोनों एक साथ यथार्थतापूर्वक नहीं जाने जा सकते और यदि इन दोनों संयुग्मी राशियों में से एक की अनिश्चितता बहुत कम हो तो दूसरी की बहुत अधिक होती है।

    हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत विज्ञान और गणित की उन समस्याओं में से एक है जो अज्ञेय हैं। क्वांटम भौतिकी का यह सिद्धांत कहता है कि हम किसी पार्टिकल की स्थिति और उसकी गति/दिशा को एक साथ नहीं जान सकते।

    इसके बारे में सोचने पर बहुत मानसिक उथलपुथल होती है। इसने ब्रह्माण्ड को देखने और समझने के हमारे नज़रिए में बड़ा फेरबदल कर दिया। अभी भी हमारे स्कूलों में परमाणु की संरचना को सौरमंडल जैसी व्यवस्था के रूप में दिखाया जाता है जिसमें केंद्र में नाभिक में प्रोटोन और न्यूट्रौन रहते हैं और बाहर इलेक्ट्रौन उपग्रहों की भांति उनकी परिक्रमा करते हैं। लेकिन परमाणु का ऐसा चित्रण भ्रामक है। नील्स बोर के ज़माने तक सभी लोग परमाणु के ऐसे ही भ्रामक चित्रण को सही मानते थे लेकिन वर्नर हाइजेनबर्ग ने अपने अनिश्चितता के सिद्धांत से इसमें भारी उलटफेर कर दिया।

     

    क्वांटम मेकेनिक्स

    अनिश्चितता के सिद्धांत को पचाने में वैज्ञानिकों को आरंभ में दिक्कत आ रही थी। अतः बड़े ही संघर्ष के बाद बोहर ने पूरकता का सिद्धांत प्रतिपादित किया। और, कहा कि क्वांटम दुनिया में दोहरी प्रकृति काम करती है। लेकिन एक समय में हमें इसकी एक ही प्रकृति के बारे में सही सही जानकारी मिल सकती है।

    दोनों सिद्धांत को एक साथ रखने पर क्वांटम मेकेनिक्स की जो व्याख्या उभर कर आती है, उसे कोपेनहेगन व्याख्या के नाम से जाना जाता है। और इसे ही क्वांटम सिद्धांत के आधार के रूप में मान्य किया गया है। इसके निहितार्थ बड़े ही चौंकाने वाले रहे। इस गणित में इलेक्ट्रॉन और परमाणु वास्तविक वस्तु नहीं हैं जिन्हें हम अपनी इंद्रियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीकों से खोज सकते हैं। नये गणित में घटना प्रमुख है, न कि वस्तु। ऊर्जा ज्यादा महत्वपूर्ण है न कि पदार्थ। अब तक के हमारे सारे परमाणु के मॉडल और चित्र हमें भ्रम में डालने लगे। क्रिकेट की बॉल की तरह इलेक्ट्रॉन के बारे में सोचा नहीं जा सकता। बावजूद इस गणितीय चित्रण के हम भरोसे के साथ कहते हैं कि दुनिया इन्हीं परमाणुओं से बनी है। इसने निर्वात की नई परिभाषा दी कि निर्वात वास्तव में आकाश वास्तव में कभी खाली नहीं रहता। निर्वात वास्तव में निर्वात नहीं होता वहाँ क्वांटम प्रक्रियाएं निरंतर चलती रहने के का वर्चुअल पार्टिकल-एण्टी-पार्टिकल भरे रहते हैं लेकिन वे प्रकट और लुप्त होते रहते हैं।

    क्या प्रकृति सच में इतनी बेतुकी (absurd) हो सकती है?

    क्या प्रकृति सच में इतनी बेतुकी (absurd) हो सकती है?

    इस तरह हाइजेनबर्ग के ऊर्वरक मस्तिष्क में ऐसा कुछ चला जिसने प्रकृति के जिस गूढ़ रहस्य को उजागर किया उसने भौतिकी की नींव को ही हिला दिया। हालांकि इस यथार्थ को जानने के बाद भी वे अचंभित थे और सोचते थे कि क्या प्रकृति सच में इतनी बेतुकी (absurd) हो सकती है?

     

    हाइजेनबर्ग का यह कार्य आईंस्टीन के कार्यों के बाद भौतिकी में एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया। नई भौतिकी ने न सिर्फ चिर-सम्मत भौतिकी(classical physics) को बदलने के लिये मजबूर किया वरन् इसने विज्ञान की कई अन्य शाखाओं समेत आर्ट और दर्शन को भी अपने प्रभाव में लिया।

    बोहर के साथ कोपनहेगन अत्यंत सृजनात्मक समय में बिताने के पश्चात् सन् 1927 में वे लिपझीग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गये। उस समय उनकी उम्र मात्र 26 वर्ष थी। उनके समय में लिपझीग में फेलिक्स ब्लॉच, फ्रेड्रिक हुण्ड, जॉन सी. स्लेटर एडवर्ड टेलर आदि जैसे कई प्रतिभाशाली शोध छात्र थे, जिन्होंने आगे चलकर भौतिकी के विकास में अपना अतुलनीय योगदान दिया। यहां रहते हुए सबसे पहले हाइजेनबर्ग ने अपने मित्र पॉली द्वारा प्रतिपादित अपवर्जन नियम(Pauli Exclusion Principle ) (इसके अनुसार किसी भी एक क्वांटम कक्षा में एक से अधिक इलेक्ट्रॉन नहीं रह सकता) का अनुप्रयोग करते हुए पदार्थों में फैरोमेग्नेटिक गुणों के उदय होने की गुत्थी सुलझाई। इसके बाद यहां बीतने वाला प्रत्येक क्षण उनके लिये बहुत उर्वरक साबित हो रहा था।

    प्रतिपदार्थ(Anti Matter)

    निल्स बोह्र(Niels Bohr), वर्नेर हाइजेनबर(Werner Heisenberg),तथा ओल्फ़्गांग पाली(Wolfgang Pauli)

    निल्स बोह्र(Niels Bohr), वर्नेर हाइजेनबर(Werner Heisenberg),तथा ओल्फ़्गांग पाली(Wolfgang Pauli)

    1925 में पी.ए.एम. डिरॉक को कैम्ब्रिज में हाइजेनबर्ग को सुनने का अवसर मिला। वे इंजीनियरिंग से आये थे। अतः हाइजेनबर्ग के व्याख्यान के लिये भौतिकी के लिये सर्वथा नये, अनुभवहीन और अनजाने थे। लेकिन अप्लाइड गणित में रुचि के कारण उनके ध्यान में हाइजेनबर्ग की एक बात जहाँ संख्याओं के गुणा में क्रम बदलने से गुणनफल नहीं बदलता वहीं टेबिलों के गुणा में ऐसा जरूरी नहीं होता’ आई। अब उनकी रुचि भौतिकी में जागी और वे क्वांटम दुनिया में प्रवेश के लिये नये तरीकों से सोचने लगेे। इसके पूर्व सन् 1925 में श्रोडिंगर ने डिब्रॉगली के पदार्थ तरंग को ध्यान में रखकर एक समीकरण प्रस्तुत किया था जिसे वेव-मेकेनिक्स के नाम से जाना गया, जो हाइजेनबर्ग की मैट्रिक्स मेकेनिक्स के तुल्य ही निकली। सन् 1928 में डिरॉक ने चिर-सम्मत भौतिकी की तर्ज पर ‘ऑपरेटर एलजेब्रा’ विकसित कर क्वांटम मेकेनिक्स की आधारशिला रखी। इसके बाद इलेक्ट्रॉन के अध्ययन के लिये उन्होंने सापेक्षीय तरंग-समीकरण प्रस्तुत किया जिससे इलेक्ट्रॉन के चक्रण संबंधी गुण के सापेक्षीय प्रभाव के रूप में प्रकट होने की जानकारी मिली। इसी सिद्धांत में से धनात्मक इलेक्ट्रॉन के अस्तित्त्व में होने की बात भी सामने आई, जिससे प्रकृति में प्रति पदार्थ की अवधारणा आई। इसे धनात्मक इलेक्ट्रॉन को पॉजीट्रॉन कहा गया।

    सन् 1932 में ‘पॉजीट्रॉन’ नामक उपर्युक्त कण को ‘कॉस्मिक किरणों’ के अध्ययन के दौरान ‘क्लाउड चैम्बर’ में खोजा गया। 1933 में हाइजेनबर्ग ने पॉजीट्रॉन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत में तथा 1934 तथा 1936 के अपने आगे के शोध पत्रों में उन्होंने डिरॉक के समीकरण की क्वांटाइजेशन की शर्तों का पालन करने वाली इलेक्ट्रॉन के समान व्यवहार करने वाले ‘स्पिन-हाफ’ कणों के लिये चिर-सम्मत फिल्ड इक्वेशन के रूप में पुनः व्याख्या की। इससे यह ‘क्वांटम फील्ड इक्वेशन’ बन गई, जो इलेक्ट्रॉन को एकदम सही तरीके से अभिव्यक्त करती है। ऐसा करके हाइजेनबर्ग ने पदार्थ को विद्युतचुम्बकत्व के साथ खड़ाकर दिया। अब, पदार्थ और विद्युतचुम्बकत्व, दोनों ही रिलेटिविस्टिक क्वांटम फील्ड समीकरण से अभिव्यक्त किये जा सकते हैं। इससे आईंस्टीन के ऊर्जा-द्रव्यमान समीकरण का निहितार्थ स्पष्ट होकर क्वांटम यांत्रिकी का हिस्सा बन गया। अब पार्टिकल के सृजन और विनाश यानि कणों के विद्युतचुम्बकीय ऊर्जा बनने और विद्युतचुम्बकीय ऊर्जा के कणों में रूपांतरित होने की संभावना को जानने के लिये यांत्रिकी सामने आ गई।

    1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। सन् 1938 में ऑटो हान और स्ट्रॉसमन (Otto Hahn and Fritz Strassmann ) के द्वारा नाभिकीय विखंडन की खोज के बाद जर्मनी ने परमाणु बम बनाने के लिये यूरेनियम क्लब गठित किया इसमें हाइजेनबर्ग नैतृत्व करने वाले वैज्ञानिकों में प्रमुख थे। 1942 में जब उन्होंने 1945 के पहले बम बन सकने की संभावना से इंकार किया, तब वे इससे अलग कर दिये गये।

    सन् 1941 में वे लिपझीग से बर्लिन विश्वविश्वविद्यालय चले गये और वहीं ‘कैसर विल्हेम इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स’ के निदेशक बन गये।

    अब उन्होंने अपना ध्यान पुनः भौतिकी की ओर लगाया तथा मूल कणों के व्यवहार और प्रक्रियाओं को समझने के लिये 1925 की ही तर्ज पर एस मैट्रिक्स सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसमें भी टक्कर की प्रक्रिया में प्रेक्षितों के रूप में आपतित और निर्गम कणों पर विचार किया गया। इसमें बीच की प्रक्रिया का कोई जिक्र नहीं है।

    वर्नर हाइजेनबर्ग (Werner Heisenberg) ने अपने बारे में लिखा कि उन्होंने सोमरफेल्ड से सकारात्मकता और भौतिकी बोहर से सीखी। जहाँ तक गणित की बात है, वह उन्होंने गोटिंजन में रहते हुए सीखा।

    सम्मान और पुरस्कार

    • आर्डर आफ़ मेरीअ ओफ़ बेवेरिआ(Order of Merit of Bavaria)
    • रोमानो गार्डीनी पुरस्कार(Romano Guardini Prize)
    • ग्रेंड क्रास फ़ार फ़ेडरल सर्वीस विथ स्टार(Grand Cross for Federal Service with Star)
    • नाईट आफ़ आर्डर आफ़ मेरीट (नागरी श्रेणी) Knight of the Order of Merit (Civil Class)
    • चयनीत रायल सोसायटी के सदस्य(Elected a Foreign Member of the Royal Society (ForMemRS) in 1955)
    • 1932– भौतिकी नोबेल पुरस्कार
    • 1933–मैक्स प्लैंक मेडल

    1 फरवरी 1976 को हाइजेनबर्ग ने दुनिया को अलविदा कहा।

     

    स्रोत :

    1. मूल लेख : http://mpinfo.org/mpinfostatic/rojgar/2013/1811/other04.asp
    2. विकिपीडीया

     



  • ओमुअमुआ(Oumuamua) : सौर मंडल के बाहर से आया एक मेहमान
  • ओमुअमुआ: Oumuamua

    ओमुअमुआ: Oumuamua

    पहली बार खगोलविज्ञानियों ने एक क्षुद्रग्रह को खोज निकाला है जो बाहरी अंतरिक्ष से हमारे सौरमंडल में प्रवेश कर चुका है।

    चिली स्थित ESO(European Southern Observatory) के वेरी लार्ज टेलिस्कोप(Very Large Telescope: VLT) और विश्व के अन्य वेधशालाओं के निरीक्षण हमे बताते है कि यह अनोखा क्षुद्रग्रह हमारे सौरमंडल में प्रवेश करने से पहले लाखों वर्षो तक अंतरिक्ष मे यात्रा कर रहा था। यह क्षुद्रग्रह रंग में काला, थोड़ी लालिमा लिए लंबी चट्टान जैसी दिखाई पड़ता है। इस क्षुद्रग्रह से जुड़े सर्वेक्षण परिमाण को 20 नवंबर के नेचर साइंस पत्रिका में प्रकाशित किया जा चुका है।

    19 अक्टूबर 2017 को हवाई स्थित पैन-स्टारर्स1 दूरबीन(Panoramic Survey Telescope and Rapid Response System: Pan-STARRS) ने अपने अंतरिक्ष अवलोकन के दौरान इस क्षुद्रग्रह को खोजा था। शुरुआती जांच में इसकी कक्षा को सही तरीके से नही समझा जा सका था इसलिए खोज के बाद इसका वर्गीकरण एक धूमकेतु के रूप में किया गया था। लेकिन बाद में आंकड़ो और गणनाओं के आधार पर इसकी कक्षा को अच्छी तरह से समझा जा सका तब पता चला कि यह क्षुद्रग्रह सौरमंडल से उत्पन्न नही हुआ है ओर बाहरी अंतरिक्ष से सौरमंडल में दाखिल हो गया है।

    ओमुअमुआ का पथ

    ESO और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्पेस एजेंसियों द्वारा इसकी गणना और सूर्य के सबसे निकट आने पर ही इसे एक इंटरस्टेलर क्षुद्रग्रह(Interstellar asteroid) के रूप में वर्गीकृत किया जा सका। वर्गीकरण के बाद ही इस क्षुद्रग्रह का नाम 1I/2017 U1(ओमुअमुआ: Oumuamua) दिया गया। क्षुद्रग्रह की खोज करने वाले टीम ने बताया की ‘ओमुअमुआ’ एक हवाई शब्द है जिसका अर्थ होता है यह पिंड एक संदेशवाहक है जिसे हम तक पहुंचने के लिए बहुत साल पहले भेजा गया था।

    ओमुअमुआ वेगा तारे की दिशा से आया है, अब यह सूर्य के निकट से होते हुये वापिस सौर मंडल के बाहर की दिशा मे भागा जा रहा है।

    ओमुअमुआ वेगा तारे की दिशा से आया है, अब यह सूर्य के निकट से होते हुये वापिस सौर मंडल के बाहर की दिशा मे भागा जा रहा है।

    ESO के खगोलविज्ञानी ओलिवर हैनाउट(Olivier Hainaut) बताते है

    “ताजा सर्वेक्षण से हमे पता चला है कि यह क्षुद्रग्रह सूर्य के निकटतम बिंदु को पार कर चुका है अब यह इंटरस्टेलर अंतरिक्ष मे वापस जा रहा है। ESO के VLT दूरबीन को तुरंत ही इस क्षुद्रग्रह की कक्षा, उसकी चमक और रंग को सटीक मापन के लिए लगाया गया था क्योंकि छोटे दूरबीन से ज्यादा आंकड़े नही प्राप्त किये जा सकते। यह तेजी से हमसे लुप्त होता चला जा रहा है इसलिए लगातार अवलोकन से और आंकड़े एकत्रित किये जा रहे है।”

    अन्य दूरबीनों के साथ वेरी लार्ज दूरबीन द्वारा अलग अलग फिल्टरों से लिये गए चित्रों के आधार पर खगोलविज्ञानियों ने पाया है कि यह क्षुद्रग्रह नाटकीय ढंग से अपनी चमक में भिन्नता प्रदर्शित कर रहा है। पृथ्वी समययानुसार यह 7.3 घण्टे मे अपनी धुरी पर एक चक्कर काट लेता है।

    खगोलविज्ञानी कारेन मीच(Karen Meech) इस क्षुद्रग्रह के चमक के बारे में कहते है

    “चमक में यह असामान्य भिन्नता का अर्थ है यह एक सिर्फ लंबी वस्तु है इसका आकार भी अन्य क्षुद्रग्रहों से जटिल है। बाहरी अंतरिक्षीय वस्तुओं के समान यह क्षुद्रग्रह भी काला लालिमा लिए रंग प्रदर्शित कर रहा है जबकि इसके चारों ओर धूल के बादल होने के कोई संकेत नही है। यह क्षुद्रग्रह अधिक घना, चट्टानी और उच्च धातुओं से मिलकर बना है यहाँ बर्फ या पानी की मात्रा होने के कोई संकेत नही है। लाखों वर्षो के अंतरिक्षीय यात्रा के दौरान ब्रह्माण्डीय विकिरणों का प्रभाव इसकी सतह पर देखा जा सकता है इसी प्रभाव के कारण काला लालिमा लिये रंग का दिखाई देता है। चौड़ाई के रूप में यह 400 मीटर ही चौड़ा है जबकि इसकी लम्बाई इससे 10 गुणा ज्यादा है। ”

    इस क्षुद्रग्रह के कक्षीय गणनाओं के अध्ययन से पता चला है कि यह  उज्ज्वल तारा वेगा(Vega) की दिशा से ही आया है वेगा जो कि लयरा के उत्तरी नक्षत्र(Northern Constellation of Lyra) में स्थित है। यहाँ तक कि यात्रा इस क्षुद्रग्रह ने लगभग 95000km/घंटे की गति से की है। हमारे सौरमंडल से गुजरते समय पृथ्वी की कक्षा से इसकी दूरी लगभग 24 करोड़ किलोमीटर की थी। हमारे सौरमंडल में प्रवेश करते समय इसकी गति लगभग 25.5 किलोमीटर प्रति सेकंड दर्ज की गयी थी लेकिन सूर्य के निकटतम स्थिति में इसकी गति बढ़कर लगभग 44 किलोमीटर प्रति सेकंड की हो गयी थी। आज से 3 लाख साल पहले यह क्षुद्रग्रह वेगा के काफ़ी करीब रहा होगा आप समझ सकते है इस क्षुद्रग्रह ने कितनी बढ़ी अंतरिक्षीय यात्रा की है सौरमंडल में आने से पहले यह मिल्की वे आकाशगंगा में भी काफी भटकता रहा होगा और आगे भी भटकता रहेगा।

    खगोलविदों का अनुमान है कि 1I/2017 U1 जैसा इंटरस्टेलर क्षुद्रग्रह प्रति वर्ष सौरमंडल से गुजरता ही रहता है लेकिन हम आसानी से उसे ट्रैक नही कर सकते। हमे ऐसे क्षुद्रग्रहों पर नजर रखने के लिए पैन-स्टारर्स जैसे सर्वेक्षण दूरबीनों की ज्यादा जरूरत होती है क्योंकि ये सर्वेक्षण के लिए पर्याप्त शक्तिशाली और बड़े दूरबीनों के मुकाबले कम जटिल होते है।
    ओलिवर हैनाउट ने अपने अंतिम निष्कर्ष में कहा

    “हम लगातार ऐसे अनूठे वस्तुओं की खोज में प्रयासरत रहते है। हमारा मानना है कि ऐसे क्षुद्रग्रह अपनी अंतरिक्षीय यात्रा से जुड़े जानकारियां, अपने अनुभव को हमसे साझा करने के लिए ही आते है और हमे उनके अनुभवों की बहुत जरूरत है क्योंकि भविष्य में हमे भी लंबी अंतरिक्षीय यात्रा करनी है।”

    Journal reference: Nature Astronomy.
    स्रोत: ESO & Panoramic Survey Telescope and Rapid Response System (Pan-STARRS).

    प्रस्तुति : पल्लवी कुमारी

    लेखिका परिचय

    पलल्वी  कुमारी, बी एस सी प्रथम वर्ष की छात्रा है। वर्तमान  मे राम रतन सिंह कालेज मोकामा पटना मे अध्यनरत है।

    पल्लवी कुमारी

    पल्लवी कुमारी



  • आधुनिक खगोलशास्त्र के पितामह : एडवीन हबल
  • एडवीन हबल( Edwin Hubble)

    एडवीन हबल( Edwin Hubble)

    एडविन हबल ब्रह्मांड के विस्तार सिद्धांत के प्रवर्तक और आधुनिक खगोल विज्ञान के पितामह थे । हबल बीसवीं सदी के अग्रणी खगोलविदों में से एक थे । उन पर ही हबल अंतरिक्ष टेलीस्कोप का नामकरण हुआ था । 1920 के दशक में हमारी अपनी मंदाकिनी(milky way) आकाशगंगा के परे अनगिनत आकाशगंगाओं की उनकी खोज ने ब्रह्मांड की और उसके भीतर हमारे वजूद की समझ में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया था ।

    एडविन हबल (1889-1953) का जन्म मार्सफिल्ड, मिसौरी में हुआ । अपने पहले जन्मदिन से पहले उन्हें व्हीटॉन, इलिनोइस ले जाया गया । उन्होंने शिकागो के विश्वविद्यालय में गणित और खगोल विज्ञान का अध्ययन किया और 1910 में विज्ञान की स्नातक डिग्री अर्जित की । वें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पहले रोड्स विद्वानों में से एक थे, जहां उन्होंने कानून का अध्ययन किया । प्रथम विश्व युद्ध में संक्षेप सेवा के बाद, वह शिकागो विश्वविद्यालय लौट आए और 1917 में अपनी डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित की । माउंट विल्सन वेधशाला में एक पूरे लंबे कैरियर के बाद 28 सितंबर,1953 को सैन मैरिनो, कैलिफोर्निया में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई ।

    हबल ट्यूनिंग फोर्क डायग्राम (Hubble, Tuning Fork)

    हबल ट्यूनिंग फोर्क डायग्राम (Hubble, Tuning Fork)

    हबल के समय के ज्यादातर खगोलविदों की सोच थी कि ग्रहों, अनगिनत सितारों और नीहारिकाओं से भरापूरा समूचा ब्रह्मांड मंदाकिनी(मिल्की वे) आकाशगंगा के भीतर समाहित है । हमारी आकाशगंगा ही समस्त ब्रह्मांड का पर्याय बन गई थी । 1923 में हबल ने एंड्रोमेडा(देव्यानी) निहारिका नामक आकाश के एक धुंधले पट्टे पर हूकर दूरबीन का प्रशिक्षण किया । उन्होंने पाया कि एंड्रोमेडा भी हमारी आकाशगंगा की ही तरह सितारों से भरी हुई है, लेकिन केवल मंद तारों से । उन्होंने वहां एक सितारा देखा जो सेफिड चर(cepheid variable) का था जो कि परिवर्ती चमक के तारों का एक प्रकार है, जिसका इस्तेमाल दूरी को मापने के लिए किया जा सकता है । इसकी सहायता से हबल ने निष्कर्ष निकाला कि एंड्रोमेडा निहारिका कोई नजदीकी तारा समूह नहीं बल्कि एक अन्य समूची आकाशगंगा है जिसे अब एंड्रोमेडा आकाशगंगा कहा जाता है । बाद के वर्षों में उन्होंने अन्य नीहारिकाओं के साथ इसी तरह की खोजें की । 1920 के दशक के अंत तक, अधिकाँश खगोलविद आश्वस्त थे कि हमारी मंदाकिनी आकाशगंगा( मिल्की वे) अकेली नहीं वरन ब्रह्मांड की लाखों आकाशगंगाओं में एक थी । यह खोज ब्रम्हांड की समझ की हमारी सोच में बदलाव का एक अहम् मोड़ साबित हुई ।

    हबल तो एक कदम आगे चले गए । उस दशक के अंत तक उन्होंने परस्पर तुलना करने लायक पर्याप्त आकाशगंगाओं की खोज कर ली। उन्होंने आकाशगंगाओं को अण्डाकार, सर्पिल और पट्टीदार सर्पिल में वर्गीकृत करने के लिए एक प्रणाली बनाई । इस प्रणाली को हबल ट्यूनिंग फोर्क डायग्राम कहा जाता है जिसके एक विकसित रूप का आज प्रयोग किया जाता है ।

    लेकिन सबसे आश्चर्यजनक खोज 46 आकाशगंगाओं के स्पेक्ट्रा के हबल के अपने अध्ययन के परिणामस्वरूप हुई और विशेष रूप से उन आकाशगंगाओं की हमारी अपनी मिल्की वे आकाशगंगा के सापेक्ष डॉप्लर वेग से । हबल ने पाया कि एक दूसरे से अलग आकाशगंगाएं जितनी ज्यादा दूर है वह उतनी ही तेजी से एक दूसरे से दूर जा रही है । इस अवलोकन के आधार पर हबल ने निष्कर्ष निकाला कि ब्रह्मांड समान रूप से फैल रहा है । कई वैज्ञानिकों ने भी आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता के आधार पर इस सिद्धांत को पेश किया था । लेकिन 1929 में प्रकाशित हबल डेटा ने वैज्ञानिक समुदाय को आश्वत करने में मदद की ।

    हबल और माउंट विल्सन पर उनके सहयोगी मिल्टन हमसन ने ब्रह्मांड के विस्तार की दर 500 किलोमीटर प्रति सेकंड प्रति मेगापारसेक होने का अनुमान लगाया ( एक मेगापारसेक, या दस लाख पारसेक की एक दूरी लगभग 32.6 लाख प्रकाश वर्ष के बराबर है, तो एक मेगापारसेक दूर की आकाशगंगा की तुलना में दो मेगापारसेक दूर की आकाशगंगा की हमसे दूर होने की गति दोगुनी होगी )। यह अनुमान हबल नियतांक कहलाता है ।

    बिग बैंग थ्योरी और एडविन हबल

    1929 मे एडवीन हबल ने एक आश्चर्यजनक खोज की, उन्होंने पाया की अंतरिक्ष में आप किसी भी दिशा मे देखें आकाशगंगाएं और अन्य आकाशीय पिंड तेजी से एक दूसरे से दूर हो रहे हैं। दूसरे शब्दो मे ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। इसका मतलब यह है कि इतिहास मे ब्रह्मांड के सभी पदार्थ आज की तुलना में एक दूसरे से और भी पास रहे होंगे। और एक समय ऐसा रहा होगा जब सभी आकाशीय पिंड एक ही स्थान पर रहे होंगे। खगोलशास्त्रियों ने उन परिस्थितियों का विश्लेषण करने का प्रयास किया है कि कैसे ब्रह्मांडिय पदार्थ एक दूसरे से एकदम पास होने की स्थिती से एकदम दूर होते जा रहे हैं। इतिहास में किसी समय , शायद 10 से 20 खरब साल पूर्व, ब्रम्हांड के सभी कण एक दूसरे से एकदम पास-पास थे। वे इतने पास-पास थे कि वे सभी एक ही जगह थे, एक ही बिन्दु पर। सारा ब्रह्मांड एक ही बिन्दु की शक्ल में था। यह बिन्दु अत्याधिक घनत्व का, अत्यंत छोटा बिन्दु था। ब्रम्हांड का यह बिन्दु रूप अपने अत्यधिक घनत्व के कारण अत्यंत गर्म रहा होगा। इस स्थिती में भौतिकी, गणित या विज्ञान का कोई भी नियम काम नहीं करता है। यह वह स्थिती है जब मनुष्य किसी प्रकार अनुमान या विश्लेषण करने मे असमर्थ है। काल या समय भी इस स्थिती मे रुक जाता है, दूसरे शब्दों में काल और समय के कोई मायने नहीं रखते हैं। इस स्थिती मे किसी अज्ञात कारण से अचानक ब्रम्हांड का विस्तार होना शुरू हुआ। एक महाविस्फोट के साथ ब्रह्मांड का जन्म हुआ और ब्रह्मांड में पदार्थ ने एक दूसरे से दूर जाना शुरू कर दिया। इस सिद्धांत को बिग बैंग थ्योरी का नाम दिया गया, जोकि ब्रह्माण्ड के जन्म संबधित सबसे अधिक मान्य सिद्धांत है।

    यह चित्र ब्रह्मांड की समय रेखा दर्शाता है, जिसमे बायें वर्तमान दर्शाया गया है जबकी दायें अब से 13.8 अरब वर्ष पुराने बिग बैंग की स्थिति है।

    यह चित्र ब्रह्मांड की समय रेखा दर्शाता है, जिसमे बायें वर्तमान दर्शाया गया है जबकी दायें अब से 13.8 अरब वर्ष पुराने बिग बैंग की स्थिति है।

    हबल अंतरिक्ष दूरबीन

    HST, Hubble

    हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला

    हबल अंतरिक्ष टेलीस्कोप को 1990 में शुरू किया गया था, उसके प्रमुख लक्ष्यो में एक हबल नियतांक की सही व्याख्या करनी है । 2001 में, एक टीम ने भूमि आधारित ऑप्टिकल दूरबीनों के साथ साथ, हबल के साथ सुपरनोवा का अध्ययन कर 72 ± 8 किमी / सेकण्ड/ मेगापारसेक की एक दर स्थापित की । 2006 में, नासा के WMAP उपग्रह के साथ ब्रह्मांडीय सुक्ष्मतरंग पृष्ठभूमि का अध्ययन कर रही एक टीम ने इस माप को सुधार कर 70 किमी / सेकण्ड/ मेगापारसेक किया । हबल दूरबीन की सहायता से यह भी पता चला कि न केवल ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है, विस्तार में तेजी भी है । इस त्वरण के लिए उत्तरदायी रहस्यमय बल को अदृश्य ऊर्जा करार दिया है ।

    हबल दूरबीन ने खगोल विज्ञान में क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हुए ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को बदल डाला है। सृष्टि के आरंभ और उम्र के बारे में हबल ने अनेक नए तथ्यों से हमें अवगत कराया है। इसकी नवीनतम उपलब्धि ब्रह्मांड की उम्र के बारे में सबूत जुटाने की है।

    हबल के सहारे खगोलविदों की एक टोली ने 7000 प्रकाश वर्ष दूर ऊर्जाहीन अवस्था की ओर बढ़ते प्राचीनतम माने जाने वाले तारों के एक समूह को खोज निकाला है। इन तारों के बुझते जाने की रफ़्तार के आधार पर ब्रह्मांड की उम्र 13 से 14 अरब वर्ष के बीच आँकी गई है। इसके अतिरिक्त पिछले 12 वर्षों के दौरान इस दूरबीन ने सुदूरवर्ती अंतरिक्षीय पिंडों के हज़ारों आकर्षक चित्र भी उपलब्ध कराए हैं।

    क़रीब सौ साल पहले अमरीका में खगोलविदों ने परावर्तक(रिफ़्लेक्टरों) पर आधारित विशाल दूरबीनों का निर्माण आरंभ किया। उन दूरबीनों में से एक का माउंट विल्सन रिफ़्लेक्टर 100 ईंच आकार का था, जिसे उस समय की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों में से माना जा रहा था। उस विशाल दूरबीन को एडविन हबल नामक खगोलविद ने स्थापित किया था, जिनके सम्मान में पहली अंतरिक्ष दूरबीन को हबल दूरबीन कहा गया। अपनी दूरबीन के सहारे एडविन हबल ने साबित किया कि ब्रह्मांड का लगातार फैलाव हो रहा है। उनकी इस खोज को खगोल विज्ञान में हबल के नियम के नाम से जाना जाता है।

    बाद में ब्रह्मांड की उम्र जानने की जिज्ञासा ने खगोलविदों को और बड़ी दूरबीनों के निर्माण के लिए प्रेरित किया और 200 ईंच आकार की रिफ़्लेक्टर युक्त दूरबीनें भी बनीं। लेकिन उन्हें एक ऐसी दूरबीन चाहिए थी जो धरती के वायुमंडल के व्यवधानों से अप्रभावित रहा और इस तरह अंतरिक्ष दूरबीन की बात सामने आई। लेकिन खगोलविदों का यह सपना 1990 में साकार हो सका, जब डिस्कवरी शटल ने हबल दूरबीन को अंतरिक्ष में पहुँचाया गया।

    हालांकि खगोलविद एडविन हबल के सपनों को साकार करने वाली इस दूरबीन पर अमरीका में 1970 के दशक में ही काम शुरू हो चुका था। बाल्टिमोर, अमरीका के स्पेस टेलीस्कोप साइंस इंस्टीट्यूट में हबल दूरबीन का विकास किया गया। अमरीकी अंतरिक्ष शटल चैलेंजर की दुर्घटना के बाद कुछ वर्षों के लिए थमे अंतरिक्ष ट्रैफ़िक ने हबल परियोजना को बाधित किया। हबल अंतरिक्ष दूरबीन के कहीं विशाल आकार की परिकल्पना की गई थी, लेकिन अंतत: यह मात्र 96 ईंच आकार की परावर्तक सतह वाली दूरबीन साबित हुई। लेकिन वायुमंडल से दूर अंतरिक्ष में होने के कारण हबल दूरबीन धरती पर उपलब्ध कहीं बड़ी दूरबीनों ज़्यादा प्रभावी साबित हो रही है।

    इसकी नियमित रूप से सर्विसिंग की जाती रही है। इसके लिए अमरीकी अंतरिक्ष संस्था नासा के अंतरिक्ष यानों के सहारे अंतरिक्षयात्रियों को हबल तक पहुँचाया जाता है।

    तकनीकी तथ्य

    • नासा ने हबल दूरबीन को अंतरिक्ष में स्थापित करने में क़रीब ढाई अरब डॉलर ख़र्च किए हैं। इसकी एक सर्विसिंग पर लगभग 50 करोड़ डॉलर की लागत आती है।
    • धरती की सतह से 600 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगा रही हबल 11 टन वज़न की है। धरती का एक चक्कर लगाने में इस क़रीब 100 मिनट लगते हैं।
    • इसकी लंबाई 13.2 मीटर और अधिकतम व्यास 4.2 मीटर है।
    • हबल दूरबीन प्रतिदिन 10 से 15 गिगाबाइट आँकड़े जुटाती है।
    • वर्ष 2009 में संपन्न पिछले सर्विसिंग मिशन के बाद उम्मीद है कि यह वर्ष 2030-40 तक काम करता रहेगा|

    अंत में, एडविन हबल ने एक दूरबीन के साथ अपने नाम को सार्थक किया और ब्रह्मांड के विषय में हमारी समझ को बदल कर रख दिया । हबल अंतरिक्ष टेलीस्कोप के रूप में खोज की उनकी भावना आज भी जीवित है ।

    कुछ हबल चित्रों को स्वयं देखने के लिए, हबल चित्र गैलरी पर जाएं ।

    हबल दूरदर्शी पर कुछ लेख

    1. भाग 1 :हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला चित्र कैसे लेती है?
    2. भाग 2 : हब्बल दूरबीन द्वारा प्रकाश और फिल्टरो का प्रयोग
    3. भाग 3 : प्राकृतिक, प्रतिनिधि तथा उन्नत रंग
    4. 25 अप्रैल को हबल अंतरिक्ष वेधशाला के 25 वर्ष पूरे होने पर विशेष
    5. हबल दूरबीन के शानदार 25 वर्ष पूरे
    6. हबल अंतरिक्ष दूरबीन : जब 1.6 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट को बर्बाद होने से बचाया गया!


  • हम तारों की धूल है : बिग बैंग से लेकर अब तक की सृजन गाथा
  • मान लीजिये आपको एक कार बनानी है तो आपको क्या क्या सामग्री चाहिये होगी ? एक इंजन , कार का फ्रेम , पहिये , कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स , सीट्स, ट्रांसमिशन सिस्टम , स्क्रूज , ईंधन और भी बहुत सारा सामान। और अब अगर मैं कहु की आपको एक इंजन बनाना है तब आपको चहियेगा बहुत सी धातुएँ जिनसे आप इंजन बनाएंगे पर अगर आपको धातु ही बनानी हो तब?

    या सोचिये की धरती पर इतने सारे तत्व है ये सब कहाँ बनते है या बने होंगे? जब कभी बिग बैंग की घटना घटी होगी तब ब्रह्माण्ड में केवल इलेक्ट्रान , प्रोटोन और न्यूट्रॉन रहे होंगे अगर स्ट्रिंग थ्योरी को माने तो शायद इनसे पहले भी कुछ रहा होगा पर फिलहाल के लिए इलेक्ट्रान , प्रोटोन और न्यूट्रॉन की मौज़ूदगी ही मान लेते है और ये तीनो भी अलग अलग रहे होंगे। इसके अलावा बहुत ज्यादा तापमान और बेहिसाब ऊर्जा। तब और कुछ नहीं था न ही पृथ्वी न ही सूरज , न ही कोई मन्दाकिनी न ही सितारे कुछ नहीं बस केवल ये तीनो कण इलेक्ट्रान , प्रोटोन और न्यूट्रॉन बहुत तेजी से इधर उधर घूमते हुए। इनके अलावा कोई और कण रहे होंगे तो फिलहाल उन्हें नजरअंदाज करते है।

    प्रश्न ये आता है कि उस स्थिति से ये सब कैसे बना जो आज है ?

    कैसे बने चाँद , सूरज और सितारे और ये पृथ्वी ?

    परमाणु केण्द्रक

    परमाणु केण्द्रक

    इसे समझने के लिए सबसे पहले इस बात को समझ लीजिये कि सभी तत्वों में इलेक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रॉन एक से ही है केवल परमाणु केंद्रक मे इनकी अलग अलग संख्याओं के अनुसार अलग अलग तत्व बनते है। किसी तत्व के गुणधर्म इस बात से तय होते है कि उसका परमाणु कैसा है और परमाणु के दो आधारभूत गुणधर्म परमाणु संख्या और परमाणु भार इस बात पर निर्भर करते है कि उसमे इलेक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रॉन की संख्या कितनी है। इसका मतलब ये है की आप के अंदर भी वही इलेक्ट्रान. प्रोटोन और न्यूट्रॉन है जो मेरे अंदर है या जो दूर किसी सितारे के अंदर है या वह किसी ग्रह पर रहने वाले एलियन के अंदर।

    कहने का त्तात्पर्य यह है की हम सबका सृजन एक है स्रोत से हुआ है। सभी तत्व एक ही स्रोत से बने है।

    हायड्रोजन संलयन से हिलियम तथा ऊर्जा का निर्माण

    हायड्रोजन संलयन से हिलियम तथा ऊर्जा का निर्माण

    हाइड्रोजन ब्रह्माण्ड का सबसे साधारण तत्व है। जो एक इलेक्ट्रान और एक प्रोटोन से बना है। हाइड्रोजन का बनना भी ब्रह्माण्ड के काफी ठंडा होने के बाद ही संभव हो पाया होगा। लेकिन फिर भी ये भारी तत्वों के बनने की विधि से अपेक्षाकृत आसान रहा होगा। हीलियम का निर्माण भी उसी दौर में शुरू हुआ था।

    बिग बैंग के करीब चालीस करोड़ साल बाद पहले सितारे बने होंगे ये सितारे हाइड्रोजन के बड़े बड़े गोले रहे होंगे और इनमे लगभग हाइड्रोजन और हीलियम रही होगी। इसके बाद के तत्व लिथियम, बेरेलियम, बाॅरान, कार्बन, आक्सीजन, नाइट्रोजन आदि का निर्माण इन सितारों के केन्द्र में शुरू हुआ था। आपके मोबाइल की लिथियम आयन बैटरी का लिथियम क्या पता कब बना होगा। सितारों के केन्द्र में उत्पन्न अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा और दाब ही इन हल्के परमाणुओं को मिलाकर भारी परमाणुओं में बदलते हैं और इससे उत्पन्न ऊर्जा प्रकाश, ऊष्मा आदि के रूप में बाहर निकलती हैं। इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहा जाता है।

    किसी तारें में नाभिकीय संलयन शुरू होने के लिए उसका द्रव्यमान इतना होना चाहिए कि केन्द्र में इतना दाब उत्पन्न हो सके जो दो हाइड्रोजन के परमाणुओं को संलयित करा कर हीलियम में बदल सके और इसके बाद और भारी तत्वों के परमाणु बनाये जा सके ।

    अगर मैं आपको दो हाइड्रोजन के परमाणु देकर कहु की इन्हे मिलकर हीलियम बना दीजिये तो ये आसान काम नहीं रहेगा। चलिए कुछ और आसान काम देता हूँ। आप ऐसा करिये अपने पास रखी किसी चीज को छू कर दिखाइए। ये आसान काम था? – नहीं। बल्कि ये हाइड्रोजन के दो परमाणुओं को मिला कर हीलियम में बदल देने से भी मुश्किल काम है। असलियत में आपने उस चीज को छुआ ही नहीं और आप किसी चीज को छू भी नहीं सकते। जब दो वस्तुए परस्पर संपर्क में रखी जाती है तो सबसे पहले उनका इलेक्ट्रान क्लाउड संपर्क में आते है अब क्योंकि इलेक्ट्रान क्लाउड ऋणात्मक आवेशित होते है तो एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है और बीच में कुछ कुछ न जगह बच ही जाती है। कोई परमाणु भी अपने आप में बहुत खाली जगह लिए होता है। अब अगर दो परमाणुओ को आपस में मिलाना चाहते है तो उन्हें परमाण्विक दूरी (10 -15 मीटर ) तक पास लाना पड़ता है और ऐसा करने के लिए बहुत अधिक दाब और ताप चाहिए होता है क्यूंकि इस दूरी पर नाभिकीय बल काम करना शुरू कर देते है और नाभिकीय बल कुदरत के सबसे शक्तिशाली बल है। जो लिए चाहिए ये ऊर्जा या तो किसी नाभिकीय भट्टी में बनाई जा सकती है या किसी सितारे के पेट में होती है। ( सितारे के पेट मतलब उसकी कोर से है। ) क्योंकि इतना दाब और ताप किसी तारे के केंद्र में ही संभव हो पाता है जहाँ तारे की समस्त गैसों का दाब गुरुत्वाकर्षण के कारण इतना ताप और दाब उत्पन्न कर देता है।

    परमाणु जितने भारी तत्व के होंगे उन्हें मिलाकर नया तत्व बनाना उतना ही मुश्किल होगा। इसीलिए हाइड्रोजन के दो परमाणुओं को मिलाना किसी वस्तु को छू सकने से अपेक्षाकृत आसान काम है।

    तारों मे नाभिकिय संलयन द्वारा हल्के तत्वों का निर्माण

    तारों मे नाभिकिय संलयन द्वारा हल्के तत्वों का निर्माण

    तारें अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं परन्तु फिर भी किसी तारे की भी एक सीमा होती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं। हाइड्रोजन का संलयन करने के लिए किसी तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का केवल 1/100 भाग होना चाहिए। इतना द्रव्यमान होने पर उस तारे के केन्द्र में हाइड्रोजन का संलयन शुरू हो जायेगा। वही नियॉन का संलयन शुरू करने के लिए उसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का कम से आठ गुना ज्यादा होना चाहिए। सूर्य का द्रव्यमान जितना है इसमें अधिक मात्रा में हाइड्रोजन ही हीलियम में बदल रही है। इसे प्रोटोन प्रोटोन साइकिल कहा जाता है। सूर्य से उत्पन्न ऊर्जा का 99 प्रतिशत इसी क्रिया से बनता है। इसके बाद की जो क्रिया है जिसमें हीलियम के तीन नाभिक संलयित होकर कार्बन में बदल जाते हैं उस प्रक्रिया का सूर्य में होना संभव नहीं है। परंतु फिर भी सूर्य की कुल ऊर्जा का करीब 0.8 प्रतिशत CNO साइकिल से आता है जिसमें कुछ भारी तत्व कार्बन, नाइट्रोजन और आक्सीजन का प्रोटोन के साथ संलयन होता है।

    परंतु जब कोई तारा अपने अंतिम समय में पहुंचता है तो इसकी कोर सिकुडना शुरू कर देती है और तापमान बढ़ने लगता है। जबकि इसकी सतह फैलती है। यह बात तारे के द्रव्यमान पर निर्भर करती है कि उसका अंत सुपरनोवा बनकर होगा या नहीं। सूर्य सुपरनोवा विस्फोट नहीं कर पायेगा। इसकी कोर हीलियम में बदल जायेगी और फिर कार्बन में तथा इसके अलावा नाइट्रोजन, आक्सीजन आदि तत्व भी इसकी कोर में बन पायेंगे।

    सुपरनोवा के अवशेष

    सुपरनोवा के अवशेष

    जो तारे सूर्य से कई गुना ज्यादा द्रव्यमान के हैं उनकी कोर अंत में लोहे में बदल जाती है। लोहे  के बाद के तत्व तारें के केन्द्र में नहीं बन पाते हैं इन्हें बनने के अधिक ऊर्जा चाहिए होती है। ये ऊर्जा किसी सुपरनोवा विस्फोट में उत्पन्न होती है। भारी तत्व किसी सुपरनोवा के दौरान ही बन पाता है और इसी विस्फोट से ये तत्व सुदूरवर्ती अंतरिक्ष में फेंक दिये जाते हैं। वही से ये तत्व पृथ्वी जैसे ग्रह पर पहुंच पाते हैं। इनके बनने की क्रिया काफी तीव्र गति से होती है और बहुत भारी तारे ही एक अच्छे खासे सुपरनोवा विस्फोट को कर पाते हैं।

    इसके अलावा भी एक और विधि रहती हैं भारी तत्व के बनने की, इस विधि में किसी न्यूट्रान पर दूसरा न्यूट्रान आकर जुड़ जाता है और तब तक और न्यूट्रान जुड़ते रहते जब यह जुड़ाव स्थायी बना रहता है जैसे ही यह जुड़ाव अस्थाई होता है तभी इससे बीटा क्षय होता है और एक न्यूट्रान बीटा कण का त्याग कर प्रोटोन में बदल जाता है। इससे नाभिक में फिर से ‌‌सि्थरता आ जाती है। परन्तु यह क्रिया बड़ी धीमी गति से होती है। इस विधि में भी अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा चाहिए होती है परन्तु धीमी दर से और इसीलिए साधारण से कुछ बड़े तारें भी कुछ मात्रा में भारी तत्वों का निर्माण कर पाते हैं लेकिन यह मात्रा बहुत कम होती है । इसीलिए ब्रह्मांड में इन तत्वों की बहुत कम मात्रा पायी जाती है। अधिकतर भारी तत्व इसी तरह से बने हैं। चांदी, आयोडीन, जेनाॅन , इरीडियम, प्लेटिनम, गोल्ड, बिस्मिथ आदि तत्व इसी तरह बने हुए हैं। यह क्रिया सूर्य पर तब और तेजी से होगी जब यह रक्तदानव की अवस्था में पहुंच जायेगा।

    “तो इस तरीके से हम सब सितारों की कोर में जन्मे थे। जैसा कि कार्ल सेगन ने कहा है।”

    लेखक : भारत मित्तल



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