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  • 2017-विज्ञान की शीर्ष 10 घटनायें : एक सिंहावलोकन
  • कुछ कड़वी और कुछ मीठी यादों के साथ साल 2017 विदा लेने ही वाला है। चाहें राजनीतिक घटनाक्रम हो या वैश्विक वैज्ञानिक घटनाक्रम हर मामले में यह साल कई मायनों में अलग रहा। इस साल कई अहम वैज्ञानिक घटनाक्रम, महत्वपूर्ण खोज, शोध अवलोकन और वैश्विक बदलाव भी प्रत्यक्ष रूप से सामने आए। प्रसिद्ध पत्रिका साइंस न्यूज़ मैगज़ीन(Science News Magazine) ने इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ विज्ञान घटनाओं को प्रस्तुत कर दिया है। पेश है 2017 की सर्वश्रेष्ठ दस वैज्ञानिक घटनाएं जिसने साइंस न्यूज़ मैगज़ीन में अपनी शीर्ष दस(टॉप टेन) में जगह बनाई है।

    1. न्यूट्रॉन तारो की टक्कर(Neutron star collision)
    2. मानव भ्रूण में जीन का संपादन(Gene editing in human embryos)
    3. लार्सन-C बर्फ शेल्फ का टूटना(Larsen C ice shelf break)
    4. मानव उत्पत्ति और आकार(Human origins take shape)
    5. ट्रैप्पिस्ट-1: सात नये ग्रह(TRAPPIST-1: Seven new planets)
    6. क्वांटम संचार(Quantum communication)
    7. पोषण और जलवायु परिवर्तन(Nutrition and climate change)
    8. सीएआर-टी कोशिका चिकित्सा(CAR-T cell therapy)
    9. फुटबॉल खिलाड़ियों का दिमाग(Football players’ brains)
    10. ज़िका वायरस(Zika virus subsides)

    1. न्यूट्रॉन तारो की टक्कर(Neutron star collision)

    न्युट्रान तारों की टक्कर

    न्युट्रान तारों की टक्कर

    एक दुर्लभ और लंबे समय से प्रतीक्षित खगोलीय घटना ने हजारों खगोलविदों को रोमांचित कर दिया। पृथ्वी से 130 मिलियन प्रकाशवर्ष दूर होनेवाली इस रोमांचक दुर्लभ टक्कर को देखने के लिए विश्व भर के हजारो खगोलविज्ञानी और 70 दूरबीन अपनी नजर लगातार बनाये हुए थे। खगोलविज्ञानियों का उत्साह और रोमांच के कारण ही इस घटना को टॉप टेन में प्रथम स्थान मिला है।

    2. मानव भ्रूण में जीन का संपादन(Gene editing in human embryos)

    मानव भ्रूण में जीन का संपादन(Gene editing in human embryos)

    मानव भ्रूण में जीन का संपादन(Gene editing in human embryos)

    अमेरिका में वैज्ञानिकों की टीम ने मानव भ्रूण से उस जीन म्यूटेशन को निकालने में सफलता पायी जो दिल की गंभीर बीमारी के लिए जिम्मेदार था। वैज्ञानिकों ने विवादित जीन एडिटिंग की मदद से बीमारी फैलाने वाले जीन को स्वस्थ जीन से बदल दिया। यह काम भ्रूण में किया गया। CRISPR-Cas9 के नाम से जानी जाने वाली तकनीक की मदद से यह किया गया। CRISPR-Cas9 तकनीक असल में कैंचियों के जोड़े की तरह काम करती है। यह बीमारी के लिए जिम्मेदार जीनोम के खास हिस्से को काट देती है। कटिंग से खाली हुई जगह को नए डीएनए से भर दिया जाता है।

    3. लार्सन-C बर्फ शेल्फ का टूटना(Larsen C ice shelf break)

    लार्सन-C बर्फ शेल्फ का टूटना(Larsen C ice shelf break)

    लार्सन-C बर्फ शेल्फ का टूटना(Larsen C ice shelf break)

    जैसा कि आप चित्र में भी देख पा रहे है कि विशाल हिमखंड लार्सन-C(Larsen-C) बर्फ शेल्फ से टूटकर दूर जा रहा है। लार्सन-C आइसबर्ग और बर्फ शेल्फ के बीच की दूरी लगभग 5 km की है जो चित्र में अंकित दिनांक की है। इसके अलावा 11 अन्य छोटे हिमखंड का एक क्लस्टर भी बन गया है जिसमे से एक हिमखंड 13 km लंबा है निकट भविष्य में ये हिमखंड भी टूटकर अलग हो सकते है ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है।

    ESA और पोलर ऑब्जरवेशन एंड मॉडलिंग(Centre for Polar Observation and Modelling: CPOM) और नेशनल पर्यावरण रिसर्च काउंसिल(National Environment Research Council) के शोधकर्ताओं की टीम ने कहा है कि हमें सेटेलाइट से मिली छवियों के आधार पर बहुत कुछ स्पष्ट रूप से पता चल रहा है। जैसे- विशाल आइसबर्ग कैसे टूट रहा है अन्य दरारें कैसे बढ़ती जा रही है। यदि कोई बड़ा हिमखंड, बर्फ वृद्धि के साथ अपना संपर्क खो देता है तो निरंतर हिमखंडों में एक अस्थिरता आ जाती है हमारा मानना है लार्सन-C की कहानी अभी खत्म नही हुई है। यह जलवायु परिवर्तन से होनेवाली नाटकीय प्राकृतिक घटना है या एक हिमखंड के रूप में प्राकृतिक जन्म-विकास-क्षय चक्र से जुड़ा है हम दोनों स्थितियों में इसकी जाँच कर रहे है। अंटार्टिक का यह बर्फ महासागर में जाने से निश्चित रूप से वैश्विक समुद्री स्तर में थोड़ी वृद्धि देखने को मिलेगी।

    4. मानव उत्पत्ति और आकार(Human origins take shape)

    मानव उत्पत्ति और आकार(Human origins take shape)

    मानव उत्पत्ति और आकार(Human origins take shape)

    2017 में जीवाश्म और आनुवंशिक अध्ययन ने एक सुझाव दिया। हमारे पूर्वजों या प्रजातियों के लिए कोई स्पष्ट प्रारंभिक समय या स्थान का पता हमारे पास कभी मौजूद नहीं है। मानव जाति की पहली जैविक गतिशीलता मानव जीन, होमो सेपियंस में उत्क्रांति के प्रयोग के समय में हुई थी। शोधकर्ताओं ने प्रस्तावित किया की होमो सेपियन्स की उत्पत्ति अफ्रीकी समुदायों में लगभग 300,000 साल पहले शुरू हुई है।
    इस परिदृश्य में हमे, मानव कंकाल उच्च, गोल मस्तियां, चिन, छोटे दाँत और चेहरे और मानव शरीर रचना के अन्य लक्षण अंततः 200,000 से 100,000 साल पहले एक एकीकृत पैकेज के रूप में दिखाई देते है।

    5. ट्रैप्पिस्ट-1: सात नये ग्रह(TRAPPIST-1: Seven new planets)

    ट्रैप्पिस्ट-1: सात नये ग्रह(TRAPPIST-1: Seven new planets)

    ट्रैप्पिस्ट-1: सात नये ग्रह(TRAPPIST-1: Seven new planets)

    खगोलविदों ने एक ही तारे की परिक्रमा करते धरती के आकार के कम-से-कम सात ग्रहों को खोज निकाला है। मशहूर विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन में इन ग्रहों की दूरी 40 प्रकाश वर्ष बताई गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इन सभी सात ग्रहों की सतह पर, इनकी दूसरी विशेषताओं के आधार पर, पानी मिलने की पूरी संभावना है। माना जा रहा है कि इनमें से तीन ग्रह पर जीवन की संभावना है और ये “बसने लायक” हैं।

    ये सातों ग्रह ट्रैप्पिस्ट-1 नाम के तारे के इर्द-गिर्द मौजूद हैं। यह तारा पृथ्वी से 40 प्रकाश वर्ष दूर है। यह आकार में छोटा और और ठंडा तारा है। ये सभी सात एक्सोप्लैनिट्स (सौर परिवार से बाहर किसी तारे का चक्कर लगाने वाले ग्रह) की संरचना बेहद सख्त है और ये TRAPPIST-1 नामक एक बेहद ठंडे छोटे से तारे के आसपास मिले। उनके द्रव्यमान के अनुमान से उनके ठोस चट्टानी सतह वाले ग्रह होने की संभावना जान पड़ती है न कि बृहस्पति की तरह गैस वाले ग्रह की। इनमें तीन ग्रहों की सतह पर समुद्र भी हो सकते हैं।

    6. क्वांटम संचार(Quantum communication)

    क्वांटम संचार(Quantum communication)

    क्वांटम संचार(Quantum communication)

    चीन के शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग कर यह बताया कि पृथ्वी और अंतरिक्ष के बीच क्वांटम संचार(Quantum Teleportation) संभव है, और अब उन्होंने क्वांटम टेलीपोर्टेशन का उपयोग करके अंतरिक्ष में एक फोटान भेजने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल किया है।

    क्वांटम टेलीपोर्टेशन की महत्वपूर्ण जरुरत एक खास प्रकार के क्वांटम इंटरनेट को बनाने के लिए बेहद जरुरी है, इससे सारे क्वांटम कंप्यूटर एक साथ जुड़ कर संपर्क बना सकते हैं। क्वांटम कंप्यूटर एक खास प्रकारे के कंप्यूटर होते हैं जो क्वांटम मैकेनिज़्म के नियमों का पालन करके सुपर कंप्यूटर से भी तेज गणना कर सकते हैं। यदि वैज्ञानिक इसमें कामयाब होते हैं तो यह कंप्यूटर भविष्य में एक क्रांति ला सकते हैं।

    7. पोषण और जलवायु परिवर्तन(Nutrition and climate change)

    पोषण और जलवायु परिवर्तन(Nutrition and climate change)

    पोषण और जलवायु परिवर्तन(Nutrition and climate change)

    वैज्ञानिक शोध अध्ययनों से पता चला है कि चावल, गेहूं और अन्य फलों ने प्रोटीन और खनिजों को काफी हद तक खो दिया है। लगातार बदल रही वातावरण परिस्थितियां मानव जाति के लिए नये संकट लेकर आ सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी के वातावरण में लगातार बढ़ रही प्रदूषण और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा खाद्यान्नों से प्रोटीन और मिनिरल को चुरा रही है। वैसे वनस्पतियों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड जरूरी होता है लेकिन वर्तमान समय मे कार्बन डाइऑक्साइड की अत्यधिक मात्रा वनस्पतियों के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है।

    8. सीएआर-टी कोशिका चिकित्सा(CAR-T cell therapy)

    सीएआर-टी कोशिका चिकित्सा(CAR-T cell therapy)

    सीएआर-टी कोशिका चिकित्सा(CAR-T cell therapy)

    इस वर्ष, जीन थेरेपी अंततः ​​वास्तविक रूप में अस्पतालों और नर्सिंग होम में उपयोग में लायी जा सकेगी। संयुक्त राज्य अमेरिका ने इसकी स्वीकृति दे दी है अब जीन थेरेपी के द्वारा कई प्रकार के ल्यूकेमिया और लिम्फोमा वाले रोगियों को उपचार किया जा सकता है।

    शोधकर्ताओं ने सीएआर-टी सेल चिकित्सा के लिए अलग-अलग संस्करण विकसित कर रहे हैं और किये भी गए है। लेकिन ज्यादातर संस्करणों का मूल आधार समान ही है: डॉक्टर एक रक्त के नमूने से रोगी के टी कोशिकाओं (प्रतिरक्षा प्रणाली कोशिकाएं जो आक्रमणकारियों पर हमला करते हैं) को हटाते हैं और उनके सतहों पर कृत्रिम प्रोटीन उत्पन्न करने के लिए उसे आनुवंशिक रूप से उन्हें संशोधित करते हैं । उन प्रोटीनों जिन्हें चिमेरिक प्रतिजन रिसेप्टर्स(chimeric antigen receptors) कहा जाता है, रोगी के शरीर में कैंसर की कोशिकाओं को पहचानते हैं। संशोधित टी कोशिकाओं का उपयोग कर प्रयोगशाला मे संशोधित टी कोशिकाओं की बहुत सारी प्रतियां बनाई गई है। वे कैंसर कोशिकाओं को खोजने और मारने के लिए सक्षम है उनको रोगी के खून में डाल दिया जाता हैं।

    9. फुटबॉल खिलाड़ियों का दिमाग(Football players’ brains)

    फुटबॉल खिलाड़ियों का दिमाग(Football players’ brains)

    फुटबॉल खिलाड़ियों का दिमाग(Football players’ brains)

    जब पूर्व एनएफएल खिलाड़ियों के दिमाग का विस्तृत अध्ययन किया गया तब पता चला ज्यादातर खिलाड़ियों के मस्तिष्क के 99% नमूनों में दर्दनाक एंसेफैलापैथी के लक्षणों में काफी बढ़ोतरी देखी गयी। सरल शब्दों में कहे तो फुटबॉल के खिलाड़ियों के दिमाग में भारी क्षति का विवरण शोध अध्ययन में दिया गया है इसका एक कारण खिलाड़ियों द्वारा सर से बॉल को हिट करना भी माना गया है। लगभग हर नमूने में क्रोनिक आघातक एन्सेफैलोपैथी(chronic traumatic encephalopathy:CTE) या सीटीई के लक्षण दिखाई देते हैं जो स्मृति हानि, भावनात्मक अलगाव, अवसाद और मनोभ्रंश के लिए जिम्मेदार होते है।

    बोस्टन विश्वविद्यालय के न्यूरोसाइंटिस्ट जेसी मेज़ का कहना है कि यह एक चौंकाने वाला शोध अध्ययन है। यह अध्ययन फुटबॉल से प्यार करनेवाले लोग और फुटबॉल खिलाड़ियों के बीच नये नजरिये से सोचने पर विवश कर सकता है।

    10. ज़िका वायरस(Zika virus subsides)

    ज़िका वायरस(Zika virus subsides)

    ज़िका वायरस(Zika virus subsides)

    पश्चिमी गोलार्ध में ज़िका के मामलों की संख्या इस साल कम हो गई है लेकिन वायरस पर बुनियादी वैज्ञानिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य शोध की जरुरत बनी हुई है। 2016 की शीर्ष कहानियों में से एक 2017 में चुपचाप टॉप टेन में शामिल हो गई है। वैज्ञानिकों और सामान्य लोगो के बीच अच्छे कारणों के लिए यह अभी भी एक गर्म विषय बना हुआ है। पश्चिमी गोलार्ध में ज़िका वायरस उभरने जाने के बाद यह अमेरिका को भी दहशत में ला दिया था। जैसा कि आप जानते है ब्राजील और कोलंबिया के माध्यम से यह वायरस संयुक्त राज्य अमेरिका तक पहुंच गया था।

    ज़िका वायरस पर अध्ययन कर रहे शोधकर्ताओं का मानना है कि फिलहाल ज़िका वायरस के मामलों की संख्या में कमी आ गयी है लेकिन ज़िका वायरस का अंत अभी नही हुआ है संभव है ज़िका वायरस फिर से लौटने की तैयारी कर रहा है। यदि ज़िका वायरस फिर से उभरता है तो उससे निपटने के लिए शोधकर्ताओं का कार्य और भी चुनौतीपूर्ण होनेवाला है। ज़िका वायरस का वाहक केवल मच्छरों को मानना सही नही है इस वर्ष शोधकर्ताओं ने इस बारे में काफी अध्ययन कर लिया है अब शोधकर्ताओं द्वारा कहा गया है कि यह वायरस ग्रषित मनुष्यों द्वारा संभोग के माध्यम से भी फैल रहा है।

    स्रोत: TOP 10 Science stories of 2017(ScienceNews Magazine).

    संकलन और संपादन : पल्लवी कुमारी

    पलल्वी  कुमारी, बी एस सी प्रथम वर्ष की छात्रा है। वर्तमान  मे राम रतन सिंह कालेज मोकामा पटना मे अध्यनरत है।

    पल्लवी कुमारी

    पल्लवी कुमारी


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  • लुई पाश्चर (Louis Pasteur) : मानवता के महान निष्काम सेवक
  • 19वी शताब्दी के जिन महान वैज्ञानिकों ने निष्काम भाव से मानवता की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया ,उनमे से एक थे लुई पाश्चर (Louis Pasteur)। लुई पाश्चर (Louis Pasteur) ने अपनी महान वैज्ञानिकों खोजो के द्वारा बीमारी के दौरान घाव उत्पन्न होने की स्थिति में जो असहनीय पीड़ा होती है उससे मुक्ति दिलाकर एक बड़ी मानव सेवा ही की थी।

    कर्म-क्षेत्र: रसायन शास्त्र, सूक्ष्म जीव शास्त्र

    शिक्षा: École Normale Supérieure

    विशेष खोज: रैबीज वैक्सिन

    कार्य : स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय, लील्ले विज्ञान तथा तकनिकी विश्वविद्यालय ,École Normale Supérieure ,पास्चर इंस्टीट्युट

    पुरस्कार-उपाधि: लीवेनहोएक मेडल, मान्ट्यान पुरस्कार ,कापली मेडल ,रमफ़र्ड मेडल, अलबर्ट मेडल

    सम्मान: लुई पास्चर के सम्मान मे ही दूध को 60 डीग्री सेल्सीयस तक गर्म कर कीटाणु रहित करने की प्रक्रिया को पास्चराइजेशन कहते है।,

    बचपन तथा शिक्षा

    लुई पास्चर(Louis Pasteur)

    लुई पास्चर(Louis Pasteur)

    लुई पाश्चर (Louis Pasteur) का जन्म 27 दिसम्बर 1822 को फ्रांस के डोल नामक स्थान नैपोलियन बोनापार्ट के एक व्यवसायी सैनिक के यहां हुआ था। उनके पिता की इच्छा थी कि उनका पुत्र पढ़ लिखकर कोई महान आदमी बने। वे उसकी पढाई के लिए कर्ज का बोझ भी उठाना चाहते थे। पिता के साथ काम में हाथ बंटाते हुए लुई पाश्चर ने अपने पिता की इच्छा पुरी करने के लिए अरबोय की एक पाठशाला में प्रवेश लिया किन्तु वहा के अध्यापको द्वारा पढाई गयी विद्या उनकी समझ के बाहर थी। उन्हें मंदबुद्धि और बुद्धू कहकर चिढाया जाता था।

    अध्यापको की उपेक्षा से दुखी होकर लुई पाश्चर विद्यालयीन पढाई तो छोड़ दी किन्तु उन्होंने कुछ ऐसा करने की सोची जिससे सारा संसार उन्हें बुद्धू नही कुशाग्र बुद्धि मानकर सम्मानित करे। पिता द्वारा जोर जबरदस्ती करने पर वे उच्च शिक्षा हेतु पेरिस गये और वही पर वेसाको के एक कॉलेज में अध्ययन करने लगे। उनकी विशेष रूचि रसायनशास्त्र में थी। वे रसायन शास्त्र के विद्वान डा.ड्यूमा से विशेष प्रभावित थे। इकोलनारमेल कॉलेज से उपाधि ग्रहण कर लुई पाश्चर ने 26 वर्ष की उम्र में रसायन की बजाय भौतिक विज्ञान पढाना आरम्भ किया।

    बाधाओं को पार करते हुए वे विज्ञान विभाग के अध्यक्ष बन गये। इस पद को स्वीकारने के बाद उन्होंने अनुसन्धान कार्य आरम्भ कर दिया। सबसे पहले अनुसन्धान करते हुए उन्होंने इमली के अम्ल से अंगूर अम्ल बनाया किन्तु उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण खोज “विषैले जन्तुओ द्वारा काटे जाने पर उनके विष से मानव के जीवन की रक्षा करनी थी। ” चाहे कुत्ते के काटने के बाद रेबीज का टीका बनाना हो या फिर किसी जख्म के सड़ने और उसमे कीड़े पड़ने पर अपने उपचार की विधि द्वारा उसकी सफल चिकित्सा करने का कार्य हो लुई पाश्चर (Louis Pasteur) ने उन्ही कार्यो में अपने प्रयोगों द्वारा सफलता पायी।

    लुई बचपन से ही दयालु प्रकृति के थे। अपने शैशवकाल में आपने गांव के आठ व्यक्तियों को पागल भेड़िए के काटने से मरते हुए देखा था। वे उनकी दर्दभरी चीखों को आप भूल नहीं सके थे। युवावस्था में भी जब यह अतीत की घटना स्मृति पटल पर छा जाती, तो लुई बेचैन हो उठते थे। पर वे पढ़ने-लिखने में विशेष तेज नहीं थे। इस पर भी आप में दो गुण मौजूद थे, जो विज्ञान में सफलता के लिए आवश्यक होते हैं – उत्सुकता एवं धीरज। युवावस्था में आपने लिखा था कि शब्दकोश में तीन शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं: इच्छाशक्ति, काम तथा सफलता।

    कॉलेज की पढ़ाई समाप्त कर, अपनी लक्ष्य प्राप्ति के लिए एक रसायन शाला में कार्य करना आरम्भ कर दिया। यहाँ पर उन्होने क्रिस्टलों का अध्ययन किया तथा कुछ महत्त्वपूर्ण अनुसंधान भी किए। इनसे रसायन के रूप में उन्हे को अच्छा यश मिलने लग गया।

    विवाह

    सन् 1849 ई. में फ्रांस के शिक्षा मंत्री ने आपको दिजोन के विद्यालय में भौतिकी पढ़ाने के लिए नियुक्त कर दिया। एक वर्ष बाद वे स्ट्रॉसबर्ग विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान का स्थानापन्न प्राध्यापक बना दिए गए। इस उन्नति का रहस्य यह था कि विश्वविद्यालय अध्यक्ष की एक कन्या थी जिसका नाम मेरी था। मेरी श्यामल केशों वाली सुन्दर किशोरी थी। आपकी उससे भेंट हुई। मेरी का अछूता लावण्य आपके ह्रदय में घर कर गया। भेंट के एक सप्ताह बाद ही आपने मेरी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रख दिया। मेरी ने आपके प्रस्ताव को ठुकरा दिया। पर लुई पास्चर एक अच्छे वैज्ञानिक थे। धीरजता आप में थी। मेरी के इंकार करने पर भी आप प्रयत्नशील रहे। एक वर्ष के बाद आपको अपनी इच्छा पूर्ति में सफलता मिली। मेरी ने आपकी पत्नी बनना स्वीकार कर लिया।

    विवाह के उपरान्त आपकी रुची रसायन विज्ञान से हट कर जीवविज्ञान की ओर अग्रसर होने लग गई। यह जीवधारियों का विज्ञान है। यह विश्वविद्यालय फ्रांस के अंगूर उत्पादक क्षेत्र के मध्य में है। वहाँ के मदिरा तैयार करने वालों का एक दल, एक दिन लुई पास्चर से मिलने आया। उन्होने आप से पूछा कि हर वर्ष हमारी शराब खट्टी हो जाती है। इसका क्या कारण है?

    पास्चराइजेशन

    लुई पास्चर ने अपने सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा मदिरा की परीक्षा करने में घण्टों बिता दिए। अंत में आपने पाया कि जीवाणु नामक अत्यन्त नन्हें जीव मदिरा को खट्टी कर देते हैं। अब आपने पता लगाया कि यदि मदिरा को 20-30 मिनट तक 60 सेंटीग्रेड पर गरम किया जाता है तो ये जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। ताप उबलने के ताप से नीचा है। इससे मदिरा के स्वाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। बाद में आपने दूध को मीठा एवं शुद्ध बनाए रखने के लिए भी इसी सिद्धान्त का उपयोग किया। यही दूध ‘पास्चरित दूध’ कहलाता है।

    एक दिन लुई पास्चर को सूझा कि यदि ये नन्हें जीवाणु खाद्यों एवं द्रव्यों में होते हैं तो ये जीवित जंतुओं तथा लोगों के रक्त में भी हो सकते हैं। वे बीमारी पैदा कर सकते हैं। उन्हीं दिनों फ्रांस की मुर्गियों में ‘चूजों का हैजा’ नामक एक भयंकर महामारी फैली थी। लाखों चूजे मर रहे थे। मुर्गी पालने वालों ने आपसे प्रार्थना की कि हमारी सहायता कीजिए। आपने उस जीवाणु की खोज शुरू कर दी जो चूजों में हैजा फैला रहा था। आपको वे जीवाणु मरे हुए चूजों के शरीर में रक्त में इधर-उधर तैरते दिखाई दिए। आपने इस जीवाणु को दुर्बल बनाया और इंजेक्शन के माध्यम से स्वस्थ चूजों की देह में पहुँचाया। इससे वैक्सीन लगे हुए चूजों को हैजा नहीं हुआ। आपने टीका लगाने की विधि का आविष्कार नहीं किया पर चूजों के हैजे के जीवाणुओं का पता लगा लिया।

    इसके बाद लुई पाश्चर ने गायों और भेड़ों के ऐन्थ्रैक्स नामक रोग के लिए बैक्सीन बनायी: पर उनमें रोग हो जाने के बाद आप उन्हें अच्छा नहीं कर सके: किन्तु रोग को होने से रोकने में आपको सफलता मिल गई। आपने भेड़ों के दुर्बल किए हुए ऐन्थ्रैक्स जीवाणुओं की सुई लगाई। इससे होता यह था कि भेड़ को बहुत हल्का ऐन्थ्रैक्स हो जाता था; पर वह इतना हल्का होता था कि वे कभी बीमार नहीं पड़ती थीं और उसके बाद कभी वह घातक रोग उन्हें नही होता था। आप और आपके सहयोगियों ने मासों फ्रांस में घूमकर सहस्रों भेड़ों को यह सुई लगाई। इससे फ्रांस के गौ एवं भेड़ उद्योग की रक्षा हुई।

    रैबीज टीका

    लुई पाश्चर(Louis Pasteur) फ़्रेंच फ़्रेंक्स

    लुई पाश्चर(Louis Pasteur) फ़्रेंच फ़्रेंक्स

    आपने तरह-तरह के सहस्रों प्रयोग कर डाले। इनमें बहुत से खतरनाक भी थे। आप विषैले वाइरस वाले भयानक कुत्तों पर काम कर रहे थे। अत में आपने इस समस्या का हल निकाल लिया। आपने थोड़े से विषैले वाइरस को दुर्बल बनाया। फिर उससे इस वाइरस का टीका तैयार किया। इस टीके को आपने एक स्वस्थ कुत्ते की देह में पहुँचाया। टीके की चौदह सुइयाँ लगाने के बाद रैबीज के प्रति रक्षित हो गया। आपकी यह खोज बड़ी महत्त्वपूर्ण थी; पर आपने अभी मानव पर इसका प्रयोग नहीं किया था। सन् १८८५ ई। की बात है। लुई पाश्चर अपनी प्रयोगशाला में बैठे हुए थे। एक फ्रांसीसी महिला अपने नौ वर्षीय पुत्र जोजेफ को लेकर उनके पास पहुँची। उस बच्चे को दो दिन पहले एक पागल कुत्ते ने काटा था। पागल कुत्ते की लार में नन्हे जीवाणु होते हैं जो रैबीज वाइरस कहलाते हैं। यदि कुछ नहीं किया जाता, तो नौ वर्षीय जोजेफ धीरे-धीरे जलसंत्रास(hydrofobia) से तड़प कर जान दे देगा।

    आपने बालक जोजेफ की परीक्षा की। कदाचित् उसे बचाने का कोई उपाय किया जा सकता है। बहुत वर्षों से आप इस बात का पता लगाने का प्रयास कर रहे थे कि जलसंत्रास को कैसे रोका जाए? आप इस रोग से विशेष रूप से घृणा करते थे। अब प्रश्न था कि बालक जोजेफ के रैबीज वैक्सिन की सुईयाँ लगाने की हिम्मत करें अथवा नहीं। बालक की मृत्यु की सम्भावना थी। पर सुइयां न लगने पर भी उसकी मृत्यु निश्चित् है। इस दुविधा में आपने तत्काल निर्णय लिया और बालक जोजेफ का उपचार करना शुरू कर दिया। आप दस दिन तक बालक जोजेफ के वैक्सीन की बढ़ती मात्रा की सुइयाँ लगाते रहे और तब महान आश्चर्य की बात हुई। बालक जोजेफ को जलसंत्रास नही हुआ। इसके विपरीत वह अच्छा होने लग गया। इतिहास में प्रथम बार मानव को जलसंत्रास से बचाने के लिए सुई लगाई गई। आपने वास्तव में मानव जाति को यह अनोखा उपहार दिया। आपके देशवासियों ने आपको सब सम्मान एवं सब पदक प्रदान किए। उन्होंने आपको सम्मान में पास्चर इंस्टीट्यूट का निर्माण किया: किन्तु कीर्ति एव ऐश्वर्य से आप मे कोई परिवर्तन नहीं आया। आप जीवनपर्यन्त तक सदैव रोगों को रोक कर पीड़ा हरण के उपायों की खोज में लगे रहे।

    रेशम के कीड़ो के रोग की रोकथाम के लिए उन्होंने 6 वर्षो तक इतने प्रयास किये कि वे अस्वस्थ हो गये। पागल कुत्तो के काटे जाने पर मनुष्य के इलाज का टीका ,हैजा ,प्लेग आदि संक्रामक रोगों के रोकथाम के लिए उन्होंने विशेषत: कार्य किया। यह सचमुच एक महान कार्य था। इस तरह लुई पाश्चर (Louis Pasteur) एक सामान्य मानव से महामानव बने। चिकित्सा विज्ञान में उनके इस महायोगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।

    सन् 1895 ई। में आपकी निद्रावस्था में ही मृत्यु हो गई।

    लुई पाश्चर(Louis Pasteur)

    लुई पाश्चर(Louis Pasteur)


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  • योहानस केप्लर :आकाश मे ग्रहो की गति के नियम के प्रतिपादक
  • जोहानस केपलर (योहानेस केप्लर) जर्मनी के महान वैज्ञानिक और गणितज्ञ थे। केपलर के अनुसार सूर्य की कक्षा मे परिक्रमा करते ग्रहों का मार्ग(कक्षा) गोलाकार नही अपितु दिर्घवृत्ताकार(अंडाकार) होता है। अपनी-अपनी परिधि में परिक्रमा करते हुए हर ग्रह की गति में निरंतर परिवर्तन आता रहता है, इन्होने घड़ी-पल सबकुछ गिन कर दिखा दिया की प्रत्येक नक्षत्र की वास्तविक स्थिति और गतिविधि कब क्या होनी चाहिए।

    बचपन और शिक्षा

    योहानस केप्लर

    योहानस केप्लर

    जोहानस केपलर का जन्म 21 दिसम्बर 1571 को जर्मनी के स्टट्गार्ट नामक नगर के निकट बाइल-डेर-स्टाड्स स्थान पर हुआ था। वह अभी 4 साल के ही थे कि चेचक की बड़ी बुरी तरह से शिकार हो गए। इससे उनकी आंखें बहुत कमजोर हो गए। उनके पिता एक सिपाही थे और उनकी मां एक सराय-मालिक की बेटी थी। पिता अक्सर नशे में होते, मां का दिमाग भी अक्सर कोई बहुत ठिकाने न होता। उनकी अपनी आंखें जवाब दे चुकी थी हाथ लुले और बाकी जिस्म भी कमजोर और बेकार था। इन सब बाधाओं के बावजूद केप्लर बचपन से ही एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे।

    चर्चों की व्यवस्थापिका संस्था ने उनका भविष्य निर्धारित कर दिया और वह धर्म-विज्ञान का अध्ययन करने के लिए इसाई के ‘गुरुकुल’ में दाखिल हो गए। टिबिंगैन विश्व विद्यालय की छात्रवृति पर स्नातक की उपाधि प्राप्त की। यहां पहुंचकर वह कोपरनिकस के विचारों के संपर्क में आए कि किस प्रकार ग्रह सूर्य के गिर्द परिक्रमा करते हैं। विज्ञान और गणित के प्रति उनका ये आकर्षण शीघ्र ही एक आंतरिक मोह में परिवर्तन हो गया। उन्होंने पादरी बनने के अपने सभी विचार छोड़ दिए। 23 वर्ष की आयु में ग्रथस विश्वविद्यालय ने उन्हें निमंत्रित किया और उन्होंने नक्षत्र विज्ञान के प्रधान अध्यापक के रूप में नियुक्ति स्वीकार कर ली।

    बड़ा आश्चर्य होता है यह जानकर कि वे विज्ञान के एक पुजारी होते हुए भी, ज्योतिष-शास्त्र में कुछ आस्था रखते थे। तारों और ग्रहों की स्थिति अंकित करते हुए वे अपने जीवन की दैवी घटनाओं का भी यथावत रिकॉर्ड रखा करते थे, हालाँकि उनका अपना कहना यही था कि मुझे ज्योतिष में रत्ती-भर भी विश्वास नहीं है किंतु अतीत के अंधविश्वास का प्रभाव उनके विचार पर कुछ न कुछ निसंदेह पड़ा था।

    कार्य

    केपलर को ग्रत्स छोड़ना पड़ा। इसके बाद जर्मन सम्राट् रूडॉल्फ द्वितीय, के राजगणितज्ञ टाइको ब्राहे के सहायक के रूप में 1601 ई ओ में नियुक्त हुए। यही दोनों वैज्ञानिक का सम्मिलन हुआ। किंतु ब्राहे कोपनिरकस का विरोधी था। उसकी आस्था भी  ईश्वरीय नियमो में थी जिसके अनुसार ब्रह्मांड के केंद्र मे सूर्य को मानलेना से धर्म संगत नही है। इसी आस्था के अनुसार उसने पुराने जमाने से चली आ रही इस धारणा को ही वैज्ञानिक रूप में प्रमाणित करने का प्रत्यन किया समस्त ब्रह्मांड का  केंद्र पृथ्वी है। ब्राहे के आकाशीय पिंड-संबंधित प्रत्यक्ष तथा सूक्ष्म निरीक्षणो की संख्या कितनी ही हजार तक पहुंच चुकी थी, और विज्ञान जगत आज भी 1592 में प्रकाशित तारों की आकाश में अपेक्षित स्थिति के उसके प्रतिपादन के लिए कृतज्ञ है। संभव हैं उसने स्वंय अनुभव भी किया हो की वह अबतक गलत थे था– क्योंकि केपलर को उसने अपने सहायक और उत्तराधिकारी के रुप में नियुक्त कर दिया, जबकि केप्लर की स्पष्ट धारणा यही थी कि ब्रह्मांड का केंद्र सूर्य हैं, पृथ्वी नहीं।

    टायको ब्राहे की मृत्यु हो गई। उसके बाद भी केपलर की ग्रह-गणनाएँ चलती रही। उनकी अध्यक्षता में 228 अन्य तारों का सूक्ष्म अध्ययन किया गया। ब्राहे के संग्रहीत अध्ययनों का विश्लेषण करते हुए ही केपलर ग्रहों की गतिविधि के संबंध में कुछ नियम निर्धारित कर सकें, जिनकी व्याख्या न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के मूल सिद्धांत के आधार पर आगे चलकर की। विज्ञान में आज भी केप्लर और न्यूटन के नियमों का सामायिक हैं। यही नियम है जो मानव निर्मित उपग्रहो के भी नियामक है।

    केपलर की नई खोज यही नही थी कि सूर्य के गिर्द ग्रहों का परिक्रमा-मार्ग दीर्घवृत्ताकार( अंडकार) होता है, अपितु यह भी थी की अपनी-अपनी परिधि में परिक्रमा करते हुए हर ग्रह की गति में निरंतर परिवर्तन आता रहता है। ग्रह ज्यों-ज्यों सूर्य के निकट पहुंचते जाते हैं, उनकी यह गति बढ़ती जाती है। केप्लर ने गणना द्वारा यह भी जान लिया कि किस ग्रह को सूर्य की परिक्रमा करने में कितना समय लगता है। जो ग्रह  सूर्य के निकट होते हैं, उन्हे इस परिक्रमा में समय अपेक्षया कुछ कम ही लगता है।

    गणित के नियमों के अनुसार ग्रहों के संबंध में केप्लर ने घड़ी-पल सबकुछ गिन कर दिखा दिया कि प्रत्येक ग्रह की वास्तविक स्थिति और गतिविधि कब क्या होनी चाहिए। केप्लर ने विज्ञान के अन्य संबद्ध क्षेत्रों में भी खोज किए। मानव दृष्टि तथा दृष्टि विज्ञान के संबंध में जो स्थापनाए उन्होंने विकसित की उनका प्रकाश के ‘अपसरण’ के क्षेत्र में बहुत महत्व है। यहां तक कि ग्रहों के अध्ययन के लिए एक दूरबीन तैयार करने की आधारशिला भी, नियमों के रूप में, वे रखते गए। गणित के क्षेत्र में उनकी खोजे प्राय: कैलकुलस का अविष्कार करने के निकट आ पहुंची थी और, साथी ही, गुरुत्वाकर्षण का उल्लेख अपने प्रथम प्रबंध में किया और यह भी बताया कि पृथ्वी पर समुदों में ज्वारभाटा चंद्रमा के आकर्षण के कारण आता है।

    इन्होंने ज्योतिष गणित पर 1609 ई में ‘दा मोटिबुस स्टेलाए मार्टिस’ (De Motibus Stellae martis) और 1619 ई. में ‘दा हार्मोनिस मुंडी’ (De Harmonis mundi) में अपने प्रबंधों को प्रकाशित कराया। इनमें इन्होंने ग्रहगति के नियमों का प्रतिपादन किया था।

    केप्लर के ग्रहीय गति के नियम

    चित्र १: केप्लेर के तीनो नियमों का दो ग्रहीय कक्षाओं के माध्यम से प्रदर्शन (1) कक्षाएँ दीर्घवृत्ताकार हैं एवं उनकी नाभियाँ पहले ग्रह के लिये (focal points) ƒ1 and ƒ2 पर हैं तथा दूसरे ग्रह के लिये ƒ1 and ƒ3 पर हैं। सूर्य नाभिक बिन्दु ƒ1 पर स्थित है। (2) ग्रह (१) के लिये दोनो छायांकित (shaded) सेक्टर A1 and A2 का क्षेत्रफल समान है तथा ग्रह (१) के लिये सेगमेन्ट A1 को पार करने में लगा समय उतना ही है जितना सेगमेन्ट A2 को पार करने में लगता है। (3) ग्रह (१) एवं ग्रह (२) को अपनी-अपनी कक्षा की परिक्रमा करने में लगे कुल समय a13/2 : a23/2 के अनुपात में हैं।

    चित्र १: केप्लेर के तीनो नियमों का दो ग्रहीय कक्षाओं के माध्यम से प्रदर्शन (1) कक्षाएँ दीर्घवृत्ताकार हैं एवं उनकी नाभियाँ पहले ग्रह के लिये (focal points) ƒ1 and ƒ2 पर हैं तथा दूसरे ग्रह के लिये ƒ1 and ƒ3 पर हैं। सूर्य नाभिक बिन्दु ƒ1 पर स्थित है। (2) ग्रह (१) के लिये दोनो छायांकित (shaded) सेक्टर A1 and A2 का क्षेत्रफल समान है तथा ग्रह (१) के लिये सेगमेन्ट A1 को पार करने में लगा समय उतना ही है जितना सेगमेन्ट A2 को पार करने में लगता है। (3) ग्रह (१) एवं ग्रह (२) को अपनी-अपनी कक्षा की परिक्रमा करने में लगे कुल समय a13/2 : a23/2 के अनुपात में हैं।

    खगोल विज्ञान में केप्लर के ग्रहीय गति के तीन नियम इस प्रकार हैं –

    1. सभी ग्रहों की कक्षा की कक्षा दीर्घवृत्ताकार होती है तथा सूर्य इस कक्षा के नाभिक (focus) पर होता है।
    2. ग्रह को सूर्य से जोड़ने वाली रेखा समान समयान्तराल में समान क्षेत्रफल तय करती है।
    3. ग्रह द्वारा सूर्य की परिक्रमा के आवर्त काल का वर्ग, अर्ध-दीर्घ-अक्ष (semi-major axis) के घन के समानुपाती होता है।

    इन तीन नियमों की खोज जर्मनी के गणितज्ञ एवं खगोलविद जॉन केप्लर (Johannes Kepler 1571–1630) ने की थी। और सौर परिवार के ग्रहों की गति के लिये वह इनका उपयोग करते थे। वास्तव में ये नियम किन्ही भी दो आकाशीय पिण्डों की गति का वर्णन करते हैं जो एक-दूसरे का चक्कर काटते हैं।

    इस महान गणितज्ञ एवं ज्योतिषी का 59 वर्ष की आयु में प्राग में 15 नवंबर 1630 ई को देहावसान हो गया।

     

    केप्लर : संक्षिप्त जीवन वृत्त

    जोहानस केप्लर(Kepler)

    जोहानस केप्लर(Kepler)


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  • महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन
  • RamanujanSrinivasa-Color800pxश्रीनिवास रामानुजन् इयंगर (तमिल ஸ்ரீனிவாஸ ராமானுஜன் ஐயங்கார்) (22 दिसम्बर, 1887 – 26 अप्रैल, 1920) एक महान भारतीयगणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया।

    ये बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावान थे। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।

    महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को मद्रास से 400 किमी दूर इरोड नामक एक छोटे से गांव में हुआ था। रामानुजन जब एक वर्ष के थे तभी उनका परिवार पवित्र तीर्थस्थल कुंभकोणम में आकर बस गया था। इनके पिता यहाँ एक कपड़ा व्यापारी की दुकान में मुनीम का कार्य करते थे। पाँच वर्ष की आयु में रामानुजन का दाखिला कुंभकोणम के प्राथमिक विद्यालय में करा दिया गया।

    इनकी प्रारंभिक शिक्षा की एक रोचक घटना है। गणित के अध्यापक कक्षा में भाग की क्रिया समझा रहे थे। उन्होंने प्रश्न किया कि अगर तीन केले तीन विद्यार्थियों में बांटे जाये तो हरेक विद्यार्थी के हिस्से में कितने केले आयेंगे? विद्यार्थियों ने तत्काल उत्तर दिया कि हरेक विद्यार्थी को एक-एक केला मिलेगा। इस प्रकार अध्यापक ने समझाया कि अगर किसी संख्या को उसी संख्या से भाग दिया जाये तो उसका उत्तर एक होगा। लेकिन तभी कोने में बैठे रामानुजन ने प्रश्न किया कि, यदि कोई भी केला किसी को न बाँटा जाए, तो क्या तब भी प्रत्येक विद्यार्थी को एक केला मिल सकेगा? सभी विद्यार्थी इस प्रश्न को सुनकर हँस पड़े, क्योंकि उनकी दृष्टि में यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण था। लेकिन बालक रामानुजन द्वारा पूछे गए इस गूढ़ प्रश्न पर गणितज्ञ सदियों से विचार कर रहे थे। प्रश्न था कि अगर शून्य को शून्य से विभाजित किया जाए तो परिणाम क्या होगा? भारतीय गणितज्ञ भास्कराचार्य ने कहा था कि अगर किसी संख्या को शून्य से विभाजित किया जाये तो परिणाम `अनन्त’ होगा। रामानुजन ने इसका विस्तार करते हुए कहा कि शून्य का शून्य से विभाजन करने पर परिणाम कुछ भी हो सकता है अर्थात् वह परिभाषित नहीं है। रामानुजन की प्रतिभा से अध्यापक बहुत प्रभावित हुए।

    प्रारंभिक शिक्षा के बाद इन्होंने हाई स्कूल में प्रवेश लिया। यहाँ पर तेरह वर्ष की अल्पावस्था में इन्होने ‘लोनी’ कृत विश्व प्रसिद्ध ‘त्रिकोणमिति’ को हल किया और पंद्रह वर्ष की अवस्था में जार्ज शूब्रिज कार कृत `सिनोप्सिस ऑफ़ एलिमेंट्री रिजल्टस इन प्योर एण्ड एप्लाइड मैथेमैटिक्स’ का अध्ययन किया। इस पुस्तक में दी गयी लगभग पांच हज़ार प्रमेयों को रामानुजन ने सिद्ध किया और उनके आधार पर नए प्रमेय विकसित किये। इसी समय से रामानुजन ने अपनी प्रमेयों को नोटबुक में लिखना शुरू कर दिया था। हाई स्कूल में अध्ययन के लिए रामानुजन को छात्रवृत्ति मिलती थी परंतु रामानुजन के द्वारा गणित के अलावा दूसरे सभी विषयों की उपेक्षा करने पर उनकी छात्रवृत्ति बंद कर दी गई। उच्च शिक्षा के लिए रामानुजन मद्रास विश्वविद्यालय गए परंतु गणित को छोड़कर शेष सभी विषयों में वे अनुत्तीर्ण हो गए। इस तरह रामानुजन की औपचारिक शिक्षा को एक पूर्ण विराम लग गया। लेकिन रामानुजन ने गणित में शोध करना जारी रखा।

    कुछ समय उपरांत इनका विवाह हो गया गया और वे आजीविका के लिए नौकरी खोजने लगे। इस समय उन्हें आर्थिक तंगी से गुजरना पड़ा। लेकिन नौकरी खोजने के दौरान रामानुजन कई प्रभावशाली व्यक्तियों के सम्पर्क में आए। ‘इंडियन मेथमेटिकल सोसायटी’ के संस्थापकों में से एक रामचंद्र राव भी उन्हीं प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक थे। रामानुजन ने रामचंद्र राव के साथ एक वर्ष तक कार्य किया। इसके लिये इन्हें 25 रू. महीना मिलता था। इन्होंने ‘इंडियन मेथमेटिकल सोसायटी’ की पत्रिका (जर्नल) के लिए प्रश्न एवं उनके हल तैयार करने का कार्य प्रारंभ कर दिया। सन् 1911 में बर्नोली संख्याओं पर प्रस्तुत शोधपत्र से इन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली और मद्रास में गणित के विद्वान के रूप में पहचाने जाने लगे। सन् 1912 में रामचंद्र राव की सहायता से मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के लेखा विभाग में लिपिक की नौकरी करने लगे। सन् 1913 में इन्होंने जी. एम. हार्डी को पत्र लिखा और उसके साथ में स्वयं के द्वारा खोजी प्रमेयों की एक लम्बी सूची भी भेजी।

    यह पत्र हार्डी को सुबह नाश्ते के टेबल पर मिले। इस पत्र में किसी अनजान भारतीय द्वारा बहुत सारे प्रमेय बिना उपपत्ति के लिखे थे, जिनमें से कई प्रमेय हार्डी पहले ही देख चुके थे। पहली बार देखने पर हार्डी को ये सब बकवास लगा। उन्होंने इस पत्र को एक तरफ रख दिया और अपने कार्यों में लग गए परंतु इस पत्र की वजह से उनका मन अशांत था। इस पत्र में बहुत सारे ऐसे प्रमेय थे जो उन्होंने न कभी देखे और न सोचे थे। उन्हें बार-बार यह लग रहा था कि यह व्यक्ति या तो धोखेबाज है या फिर गणित का बहुत बड़ा विद्वान। रात को हार्डी ने अपने एक शिष्य के साथ एक बार फिर इन प्रमेयों को देखा और आधी रात तक वे लोग समझ गये कि रामानुजन कोई धोखेबाज नहीं बल्कि गणित के बहुत बड़े विद्वान हैं, जिनकी प्रतिभा को दुनिया के सामने लाना आवश्यक है। इसके बाद हार्डी और रामानुजन में पत्रव्यवहार शुरू हो गया। हार्डी ने रामानुजन को कैम्ब्रिज आकर शोध कार्य करने का निमंत्रण दिया। रामानुजन का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। वह धर्म-कर्म को मानते थे और कड़ाई से उनका पालन करते थे। वह सात्विक भोजन करते थे। उस समय मान्यता थी कि समुद्र पार करने से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। इसलिए रामानुजन ने कैम्ब्रिज जाने से इंकार कर दिया। लेकिन हार्डी ने प्रयास जारी रखा और मद्रास जा रहे एक युवा प्राध्यापक नेविल को रामानुजन को मनाकर कैम्ब्रिज लाने के लिए कहा। नेविल और अन्य लोगों के प्रयासों से रामानुजन कैम्ब्रिज जाने के लिए तैयार हो गए। हार्डी ने रामानुजन के लिए केम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में व्यवस्था की।

    जब रामानुजन ट्रिनिटी कॉलेज गए तो उस समय पी.सी. महलानोबिस [प्रसिद्ध भारतीय सांख्यिकी विद] भी वहां पढ़ रहे थे। महलानोबिस रामानुजन से मिलने के लिए उनके कमरे में पहुंचे। उस समय बहुत ठंड थी। रामानुजन अंगीठी के पास बैठे थे। महलानोबिस ने उन्हें पूछा कि रात को ठंड तो नहीं लगी। रामानुजन ने बताया कि रात को कोट पहनकर सोने के बाद भी उन्हें ठंड लगी। उन्होंने पूरी रात चादर ओढ़ कर काटी थी क्योंकि उन्हें कम्बल दिखाई नहीं दिया। महलानोबिस उनके शयन कक्ष में गए और पाया कि वहां पर कई कम्बल हैं। अंग्रेजी शैली के अनुसार कम्बलों को बिछाकर उनके ऊपर चादर ढकी हुई थी। जब महलानोबिस ने इस अंग्रेजी शैली के बारे में बताया तो रामानुजन को अफ़सोस हुआ। वे अज्ञानतावश रात भर चादर ओढ़कर ठंड से ठिठुरते रहे। रामानुजन को भोजन के लिए भी कठिन परेशानी से गुजरना पड़ा। शुरू में वे भारत से दक्षिण भारतीय खाद्य सामग्री मंगाते थे लेकिन बाद में वह बंद हो गयी। उस समय प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था। रामानुजन सिर्फ चावल, नमक और नीबू-पानी से अपना जीवन निर्वाह करने लगे। शाकाहारी होने के कारण वे अपना भोजन खुद पकाते थे। उनका स्वभाव शांत और जीवनचर्या शुद्ध सात्विक थी।

    रामानुजन ने गणित में सब कुछ अपने बलबूते पर ही किया। इन्हें गणित की कुछ शाखाओं का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था पर कुछ क्षेत्रों में उनका कोई सानी नहीं था। इसलिए हार्डी ने रामानुजन को पढ़ाने का जिम्मा स्वयं लिया। स्वयं हार्डी ने इस बात को स्वीकार किया कि जितना उन्होंने रामानुजन को सिखाया उससे कहीं ज्यादा रामानुजन ने उन्हें सिखाया। सन् 1916 में रामानुजन ने केम्ब्रिज से बी. एस-सी. की उपाधि प्राप्त की।

    रामानुजन और हार्डी के कार्यों ने शुरू से ही महत्वपूर्ण परिणाम दिये। सन् 1917 से ही रामानुजन बीमार रहने लगे थे और अधिकांश समय बिस्तर पर ही रहते थे। इंग्लैण्ड की कड़ी सर्दी और कड़ा परिश्रम उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हुई। इनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा और उनमें तपेदिक के लक्षण दिखाई देने लगे। इधर उनके लेख उच्चकोटि की पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे थे। सन् 1918 में, एक ही वर्ष में रामानुजन को कैम्ब्रिज फिलोसॉफिकल सोसायटी, रॉयल सोसायटी तथा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज तीनों का फेलो चुन गया। इससे रामानुजन का उत्साह और भी अधिक बढ़ा और वह शोध कार्य में जोर-शोर से जुट गए। सन् 1919 में स्वास्थ बहुत खराब होने की वजह से उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा।

    रामानुजन की स्मरण शक्ति गजब की थी। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी और एक महान गणितज्ञ थे। एक बहुत ही प्रसिद्ध घटना है। जब रामानुजन अस्पताल में भर्ती थे तो डॉ. हार्डी उन्हें देखने आए। डॉ. हार्डी जिस टैक्सी में आए थे उसका नम्बर था 1729 । यह संख्या डॉ. हार्डी को अशुभ लगी क्योंकि 1729 = 7 x 13 x 19 और इंग्लैण्ड के लोग 13 को एक अशुभ संख्या मानते हैं। परंतु रामानुजन ने कहा कि यह तो एक अद्भुत संख्या है। यह वह सबसे छोटी संख्या है, जिसे हम दो घन संख्याओं के जोड़ से दो तरीके में व्यक्त कर सकते हैं। (1729 = 12x12x12 + 1x1x1,और 1729 = 10x10x10 + 9x9x9)।

    सन् 1903 से 1914 के बीच, कैम्ब्रिज जाने से पहले रामानुजन अपनी `नोट बुक्स’ में तीन हज़ार से ज्यादा प्रमेय लिख चुके थे। उन्होंने ज्यादातर अपने निष्कर्ष ही दिए थे और उनकी उपपत्ति नहीं दी। सन् 1967 में प्रोफेसर ब्रूस सी. बर्नाड्ट को जब ‘रामानुजन नोट बुक्स’ दिखाई गयी तो उस समय उन्होंने इस पुस्तक में कोई रुचि नहीं ली। बाद में उन्हें लगा कि वह रामानुजन के प्रमेयों की उत्पत्तियाँ दे सकते हैं। प्रोफेसर बर्नाड्ट ने अपना पूरा ध्यान रामानुजन की पुस्तकों के शोध में लगा दिया। उन्होंने रामानुजन की तीन पुस्तकों पर 20 वर्षों तक शोध किया।

    सन् 1919 में इंग्लैण्ड से वापस आने के पश्चात् रामानुजन 3 महीने मद्रास, 2 महीने कोदमंडी और 4 महीने कुंभकोणम में रहे। उनकी पत्नी ने उनकी बहुत सेवा की। पति-पत्नी का साथ बहुत कम समय तक रहा। रामानुजन के इंग्लैंड जाने से पूर्व वे एक वर्ष तक उनके साथ रही और वहां से आने के एक वर्ष के अन्दर ही परमात्मा ने पति को सदा के लिए उनसे छीन लिया। उन्हें माँ होने का सुख भी प्राप्त नहीं हुआ। कहते हैं कि रामानुजन को ज्योतिष ज्ञान था जिसके आधार पर इन्होंने अपनी पत्नी को बताया था क़ि वे 34 साल से ज्यादा जीवित नहीं रहेंगे। लेकिन इससे पहले ही 26 अप्रैल 1920 को 32 वर्ष 4 महीने और 4 दिन की अल्पायु में रामानुजन का शरीर परब्रह्म में विलीन हो गया।

    गणितीय कार्य एवं उपलब्धियाँ

    रामानुजन ने इंग्लैण्ड में पाँच वर्षों तक मुख्यतः संख्या सिद्धान्त के क्षेत्र में काम किया।

    सूत्र

    रामानुजन् ने निम्नलिखित सूत्र प्रतिपादित किया-

     1+\frac{1}{1\cdot 3} + \frac{1}{1\cdot 3\cdot 5} + \frac{1}{1\cdot 3\cdot 5\cdot 7} + \frac{1}{1\cdot 3\cdot 5\cdot 7\cdot 9} + \cdots + {{1\over 1 + {1\over 1 + {2\over 1 + {3\over 1 + {4\over 1 + {5\over 1 + \cdots }}}}}}} = \sqrt{\frac{e\cdot\pi}{2}}

    इस सूत्र की विशेषता यह है कि यह गणित के दो सबसे प्रसिद्ध नियतांकों ( ‘पाई’ तथा ‘ई’ ) का सम्बन्ध एक अनन्त सतत भिन्न के माध्यम से व्यक्त करता है।

    पाई के लिये उन्होने एक दूसरा सूत्र भी (सन् १९१० में) दिया था-

     \pi = \frac{9801}{2\sqrt{2} \displaystyle\sum^\infty_{n=0} \frac{(4n)!}{(n!)^4} \times \frac{[1103 + 26390n]}{(4 \times 99)^{4n}}}

    रामानुजन संख्याएँ

    ‘रामानुजन संख्या’ उस प्राकृतिक संख्या को कहते हैं जिसे दो अलग-अलग प्रकार से दो संख्याओं के घनों के योग द्वारा निरूपित किया जा सकता है।

    उदाहरण – 9^3 + 10^3 = 1^3 + 12^3 = 1729.

    इसी प्रकार,

    • 2^3 + 16^3 = 9^3 + 15^3 = 4 104
    • 10^3 + 27^3 = 19^3 + 24^3 = 20 683
    • 2^3+ 34^3 = 15^3 + 33^3 = 39 312
    • 9^3 + 34^3 = 16^3 + 33^3 = 40 033

    अतः 1729, 4104, 20683, 39312, 40033 आदि रामानुजन संख्याएं हैं।

    सम्मान

    राष्ट्रीय गणित दिवस

    भारत में प्रत्येक वर्ष 22 दिसम्बर को महान गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन की स्मृति में ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है ।

    जीवन पर बनी फ़िल्म : द मैन हू न्यू इनफिनिटी

    द मैन हू न्यू इनफिनिटी फ़िल्म का पोस्टर

    द मैन हू न्यू इनफिनिटी फ़िल्म का पोस्टर

    यह फिल्म एक बॉयोपिक है और रामानुजन की जिंदगी पर आधारित है।

    पहले विश्वयुद्ध के समय पर बनी, फिल्म रॉबर्ट कनिगेल की किताब पर आधारित है। फिल्म की कहानी ऐसी दोस्ती पर आधारित है जिसने हमेशा के लिए गणित की दुनिया को बदलकर रख दिया। रामानुजन एक गरीब स्वयं पढ़ने वाले भारतीय गणितज्ञ थे। फिल्म की कहानी उनके ट्रिनिटी कॉलेज मद्रास से कैंब्रिज जाने की है।

    कैंब्रिज पहुंचने के बाद, रामानुजन और उनके प्रोफेसर जीएच हार्डी के साथ उनका बांड बन जाता है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे वह विश्वप्रसिद्ध गणितज्ञ बने। देविका भिसे, रामानुजन की पत्नी का किरदार निभा रही हैं। देविका एक शास्त्रीय नृत्यांगना हैं। देविका ने अपनी भूमिका के लिए बहुत अध्ययन किया। उन्होंने किताब के लेखर रॉबर्ट कनिगेल से भी बातचीत की, जो असली जानकी (रामानुजन की पत्नी) से मिल चुके हैं।

    एडवर्ड आर प्रेसमैन/एनीमस फिल्मस प्रोडक्शन और कैयेने पेपर प्रोडक्शन द्वारा निर्मित, द मैन हू न्यू इनफीनिटी में देव पटेल, जेरेमी आयरंस, देविका भिसे, स्टेफन फ्राय, टॉबी जॉंस और अरूंधती नाग की मुख्य भूमिकाएं हैं। फिल्म की कहानी लेखन और निर्देशन मैथ्यू ब्राउन ने किया है। फिल्म तमिल और अंग्रेजी में उपलब्ध है।

     


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  • क्रोयोनिक्स : मृत्यु पर विजय पाने का प्रयास
  • वर्तमान मे ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़ते जा रही है जो अपने शरीर को क्रायोजेनिकली संरक्षित रखने के लिये कंपनीयों को बड़ी राशि प्रदान कर रहे है। उन्हे मृत्यु के पश्चात भी भविष्य मे पुनर्जीवन की आशा है।

    क्रोनिक्स के तीन प्रमुख संस्थानो मे संरक्षित शरीरों की संख्या

    क्रोनिक्स के तीन प्रमुख संस्थानो मे संरक्षित शरीरों की संख्या

    क्रायोजेनिक तकनीक को ‘निम्नतापकी’ कहा जाता है, जिसका ताप -0 डिग्री से -150 डिग्री सेल्सियस होता है।

    • ‘क्रायो’ यूनानी शब्द ‘क्रायोस’ से बना है, जिसका अर्थ ‘बर्फ जैसा ठण्डा’ है।

    यह तकनीक विज्ञान फ़तांशी कहानीयो से उपजी है जिसमे शरीर को भविष्य मे पुनर्जीवन की आश मे संरक्षित रखा जाता है। वर्तमान विज्ञान अभी इतना विकसीत नही है कि वह इन हिमीकृत शरीरो को पुनर्जीवित कर सके। इसके बावजूद अबतक 350 व्यक्तियों को हिमीकृत किया जा चूका है और 3000 व्यक्तियों ने अपने शरीर को हिमीकृत करवाने के लिये आरक्षण करवाया हुआ है। हिमीकरण कर शरीर के संरक्षण का समूर्ण व्यवसाय संपूर्ण विश्व मे इन तीन कंपनीयों के द्वारा नियंत्रित है। कुछ अन्य और भी कंपनीयाँ है जो शरीर का हीमीकरण कर इन कंपनीयों के शरीर संरक्षण केंद्र मे पहुचाने का व्यवसाय करती है।

    1. क्रायोनिक्स इंस्टीट्युट
    2. अल्कार फ़ाउंडेशन
    3. क्रायोरस

    क्रायोजेनिक्स संकल्पना

    1964 मे वैज्ञानिक और लेखक राबर्ट एटीन्गर(Robert Ettinger) ने एक 62 पृष्ठ का एक घोषणा पत्र प्रकाशित किया जिसका नाम था “द प्रास्पेक्ट आफ़ इम्मोर्टलीटी(अमरता की संभावना)”, अब यह घोषणा पत्र बढ़कर 200 पन्नो का हो चुका है और वह अब इस तकनीक से जुड़े वैज्ञानिक, नैतिक और आर्थिक पहलुओं का भी समावेश करता है। इस का आरंभ ऐसे होता है।

    सच्चाई(The Fact)

    अत्यंत कम तापमान पर वर्तमान मे मृत व्यक्तियों के शरीर को क्षति पहुंचाये बगैर अनंत काल तक संरक्षित किया जा सकता है।

    मान्यता(The Assumption)

    यदि सभ्यता पनपती रही तो भविष्य मे चिकित्सा विज्ञान शरीर मे हुई किसी भी क्षति का उपचार करने मे सक्षम होगा जिसमे हिमीकरण से उत्पन्न क्षति के साथ मृत्यु के कारण का भी समावेश है। 2011 मे राबर्ट एटींगर का शरीर भी उसके पहले संरक्षित उनकी माता और दो पत्नियों के शरीर के साथ भविष्य मे पुनर्जीवन की आशा मे संरक्षित कर दिया गया।

    विधि

    1. मृत्यु के तुरंत पश्चात शरीर को बाह्य बर्फ़ के पैकेटो की सहायता से शीतल कर संरक्षण केंद्र तक पहुंचाया जाता है। मृत्यु के बाद जितनी जल्दी हो सके, लाश को ठंडा कर जमा दिया जाता है ताकि उसकी कोशिकाएं, ख़ास कर मस्तिष्क की कोशिकाएं, ऑक्सीजन की कमी से टूट कर नष्ट न हो जाएं। इसके लिए पहले शरीर को बर्फ़ से ठंडा कर दिया जाता है।
    2. संरक्षण केंद्र मे पहुंचने के पश्चात शरीर से रक्त निकाल लिया जाता है और शरीर के अंगों के हिमीकरण से बचाव के लिये धमनीयों मे हिमीकरण रोधी द्रव डाला जाता है तथा खोपड़ी मे छोटे छिद्र बनाये जाते है।  इसके बाद ज़्यादा महत्वपूर्ण काम शुरू होता है. शरीर से ख़ून निकाल कर उसकी जगह रसायन डाला जाता है, जिन्हें ‘क्रायो-प्रोटेक्टेंट’ तरल कहते हैं। ऐसा करने से अंगों में बर्फ नही बनते। यह ज़रूरी इसलिए है कि यदि बर्फ़ जम गया तो वह अधिक जगह लेगा और कोशिका की दीवार टूट जाएगी।
    3. इसके बाद शरीर के एक शयन बैग मे डाल कर द्रव नाइट्रोजन मे -196 °C तापमान पर रख दीया जाता है।

      अमरीका में 150 से अधिक लोगों ने अपने शरीर तरल नाइट्रोजन से ठंडा कर रखवाए हैं। इसके अलावा 80 लोगों ने सिर्फ़ अपना मस्तिष्क सुरक्षित रखवाया है। पूरे शरीर को जमा कर सुरक्षित रखने में 1,60,000 डॉलर ख़र्च हो सकता है। मस्तिष्क को सुरक्षित रखने में 64,000 डॉलर का ख़र्च आता है।

    आशा

    रोगी इस आशा मे अपने शरीर का हिमीकरण कराते है कि भविष्य का चिकित्सा विज्ञान उनकी मृत्यु को वापिस कर उन्हे जीने का एक और अवसर देगा। इस तकनीक के समर्थक कहते है कि कुछ ऐसे जीव है जो हिमीकरण के पश्चात स्व्यं ही पुनर्जीवित हो उठते है। इन जीवो मे शामिल है :

    1. आर्कटिक क्षेत्र की जमीनी गिलहरी
    2. कछुये की कुछ प्रजाति
    3. आर्काटीक उनी कंबल किड़ा
    4. टार्डीग्रेड्स

    इस तकनीक के समर्थक मानते है कि भविष्य मे चिकित्सा विज्ञान इतना विकसित हो जायेगा कि इन व्यक्तियों को पुनर्जीवन दे देगा। यह 100 वर्ष पश्चात हो सकता है या इसमे अगले 1000 वर्ष भी लग सकते है।

    जोखिम

    • पुनर्जीवन की आस मे शरीर संरक्षण की किमत कम नही है। एक शरीर के संरक्षण की किमत कंपनी के अनुसार 30,000$ से 200,00 $ के मध्य होती है।
    • इस बात की कोई गारंटी नही है कि भविष्य का चिकित्सा शास्त्र मृत्यु को हरा कर पुनर्जीवन दे पायेगा। वर्तमान मे ही इस बात की कोई गारंटी नही है कि हिमीकरण से सामान्य स्तिथि मे शरीर को वापिस लाने की प्रक्रिया मे शरीर को कोई नुकसान नही पहुंचेगा। वर्तामान मे हिमीकरण से वापिस लाने पर शरीर की पेशीया पहले जैसी स्तिथि मे नही लाई जा सकी है।
    • यदि किसी तरह से शरीर को हानि पहुंचने से बचाया भी जा सके तो इस बात की कोई गारंटी नही है कि मानव को अन्य जीवो के जैसे पुनर्जीवित किया जा सकेगा।

    यदि आपको निश्चय मृत्यु और पुनर्जीवन की संभावना मे से कोई एक चुनना हो तो क्या आप अपने शरीर को हिमीकृत कराना पसंद करेंगे ? लेख को पोस्टर के रूप मे डाउनलोड करने निचे चित्र पर क्लिक करें


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  • नासा ने सौर मंडल के जैसे एक और सौर मंडल खोजा : केप्लर 90
  • नासा ने हमारे सौर मंडल के तुल्य एक तारा-ग्रह प्रणाली खोजी है जिसके पास आठ ग्रह है। इस तारे का नाम केप्लर 90 है।

    केप्लर 90 और सौर मंडल के ग्रहों के आकार की तुलना

    केप्लर 90 और सौर मंडल के ग्रहों के आकार की तुलना

    अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा को एक बड़ी सफलता मिली है। NASA के केपलर अंतरिक्ष दूरबीम ने हमारे जितना बड़ा ही एक और तारा-ग्रह प्रणाली खोजी है। दरअसल, यह तारा और उसके ग्रह पहले ही खोजे गये था, अब वहीं पर आठवें ग्रह की भी पहचान कर ली गई है। ऐसे में सूर्य या उस जैसे किसी तारे की परिक्रमा करने के मामले में केपलर-90 प्रणाली की तुलना हमारे सौरमंडल से की जा सकती है।

    इसका अर्थ यह है कि केप्लर 90 के पास हमारे सूर्य के जैसे आठ ग्रह है। इसके पहले केप्लर 90 मे ट्रेपिस्ट -1 के जैसे सात ग्रह ज्ञात थे।

    खास बात यह है कि इस खोज में गूगल की ओर से कृत्रिम बुद्धि( आर्टिफिशल इंटेलिजेंस) की मदद ली गई, जो मानवों के रहने योग्य ग्रहों की तलाश करने में काफी मदद करेगा। केपलर-90 ग्रह प्रणाली के इस आठवें ग्रह का नाम केपलर 90i है। गूगल और नासा के इस प्रॉजेक्ट द्वारा हमारे जैसे ही सौर मंडल की खोज से इस बात की उम्मीद बढ़ी है कि ब्रह्मांड में किसी ग्रह पर परग्रही( ऐलियन) मौजूद हो सकते हैं।

    दिलचस्प है कि केपलर-90 के ग्रहों की व्यवस्था हमारे सौर मंडल जैसी ही है। इसमें भी छोटे ग्रह अपने तारे से नजदीक हैं और बड़े ग्रह उससे काफी दूर मौजूद हैं। NASA के अनुसार, इस खोज से पहली बार स्पष्ट होता है कि दूर कहीं तारा प्रणाली में हमारे जैसे ही सौर परिवार मौजूद हो सकते हैं। यह सौर मंडल हमसे करीब 2,545 प्रकाश वर्ष दूर है।

    नासा ने बताया कि इस ग्रह का तापमान करीब 800 डिग्री फारेनहाइट (426 डिग्री सेल्सियस) है।  नया खोजा ग्रह केपलर 90i इन ग्रहों में सबसे छोटा ग्रह है। यह ग्रह पृथ्वी की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत बड़ा होने का अनुमान है। केपलर 90i पृथ्वी की तरह एक पथरीला ग्रह है। केपलर 90i पर पृथ्वी की तरह एक वर्ष का समय दो हफ्तों का होगा। क्योंकि ये अपनी तारे की परिक्रमा में 14.4 दिन में कर लेता है। एंड्रयू वंडरबर्ग ने कहा कि केप्लर-90 का धरातल बुध ग्रह की तरह ही बहुत ज्यादा गर्म है।

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    टेक्सस यूनिवर्सिटी के नासा सगन पोस्टडॉक्टरल फेलो एवं खगोल विज्ञानी एंड्रयू वांडबर्ग ने कहा,

    ‘नया ग्रह पृथ्वी से करीब 30 प्रतिशत बड़ा माना जा रहा है। हालांकि यह ऐसी जगह नहीं है, जहां आप जाना चाहेंगे।’ उन्होंने बताया कि यहां काफी चट्टानें हैं और वातावरण भी घना नहीं है। सतह का तापमान काफी ज्यादा है और इससे लोग झुलस सकते हैं। वांडबर्ग के मुताबिक सतह का औसत तापमान करीब 800 डिग्री फ़ारनहाइट हो सकता है।

    केप्लर अंतरिक्ष वेधशाला को 2009 में प्रक्षेपित किया गया था, और इसने करीब 1,50,000 तारों को को छाना है। खगोल वैज्ञानिको ने केप्लर डाटा के जरिए अब तक 2,500 ग्रहों की खोज की है।

    नासा ने 14 दिसंबर 2017 को एक प्रेस कांफ़्रेंस मे घोषणा की है।

    नोट : बहुत सी बेहुदा वेबसाईट/समाचार पत्रों ने इस प्रेस कांफ़्रेंस को एलियन की घोषणा से जोड़ा था।


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  • भौतिक विज्ञान को अनिश्चित कर देने वाले वर्नेर हाइजेनबर्ग
  • वर्नेर हाइजेनबर्ग(Werner Heisenberg)

    वर्नेर हाइजेनबर्ग(Werner Heisenberg)

    गणित में बेहद रूचि रखने वाले वर्नर हाइजेनबर्ग (Werner Heisenberg) भौतिकी की ओर अपने स्कूल के अंतिम दिनों में आकृष्ट हुए और फिर ऐसा कर गये जिसने प्रचलित भौतिकी की चूलें हिला दीं। वे कितने प्रतिभाशाली रहे होंगे और उनके कार्य का स्तर क्या रहा होगा, इसका अंदाज इस बात से लगता है कि जिस क्वांटम यांत्रिकी को उन्होंने मात्र 23 की उम्र में गढ़ा, उसके लिये उन्हें मात्र 31 वर्ष की उम्र में ही नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

    अपने मौलिक चिंतन से हाइजेनबर्ग ने ने अनिश्चितता का सिद्धांत(Uncertainty principle) प्र्स्तुत किया।इस सिद्धांत को उन्होंने इस प्रकार बताया:

    यह पता कैसे चलेगा कि कोई कण (पार्टिकल) कहाँ है? उसे देखने के लिए हमें उसपर प्रकाश फेंकना पड़ेगा अर्थात हमें उसपर फ़ोटॉन डालने होंगे। जब फ़ोटॉन उस पार्टिकल से टकरायेंगे तब उस टक्कर के परिणामस्वरूप कण(पार्टिकल) की स्थिति परिवर्तित हो जायेगी। इस तरह हम उसकी स्तिथि को नहीं जान पाएंगे क्योंकि स्थिति को जानने के क्रम में हमने स्तिथि में परिवर्तन कर दिया।

    पांसे

    ईश्वर पासे नहीं फेंकता !(God doesn’t play dice!)

    तकनीकी स्तर पर यह सिद्धांत कहता है कि हम कण(पार्टिकल) की स्तिथि और उसके संवेग(momentum) को एक साथ नहीं जान सकते। यह पूरा तो नहीं पर कुछ-कुछ उस ‘ऑब्ज़र्वर’ प्रभाव की भांति है जहाँ कुछ प्रयोग ऐसे होते हैं जिनमें परीक्षण का परिणाम प्रेक्षक (ऑब्ज़र्वर) की स्तिथि में बदलाव होने से बदल जाता है। इस प्रकार अणुओं और परमाणुओं की सौरमंडलीय व्यवस्था ध्वस्त हो गयी। अब इलेक्ट्रौन को पार्टिकल के रूप में नहीं बल्कि संभाव्यता प्रकार्य (प्रॉबेबिलिटी फंक्शन्स) के रूप में देखा जाता है। हम उनके कहीं होने की संभावना की गणना कर सकते हैं पर यह नहीं बता सकते कि वे कहाँ हैं। वे कहीं और भी हो सकते हैं।

    हाइजेनबर्ग ने जब इस सिद्धांत की घोषणा की तब बहुत विवाद भी हुए। आइन्स्टीन ने अपना प्रसिद्द उद्धरण भी कहा, “ईश्वर पासे नहीं फेंकता”। और इसके साथ ही भौतिकी भी दो भागों में बाँट गयी। एक में तो विस्तार और विहंगमता का अध्ययन किया जाने लगा और दूसरी में अतिसूक्ष्म पदार्थ का। इन दोनों का एकीकरण अभी तक नहीं हो पाया है।

    बचपन

    वर्नर हाइजेनबर्ग का जन्म 5 दिसम्बर 1901 को वुर्ज़बर्ग (Würzburg) में हुआ था। वारेन ने अपनी पढ़ाई की शुरुआत वुर्ज़बर्ग के स्कूल मेक्सीमिलियन जिम्नेशियम (Maximilians Gymnasium, Munich) से की। जब वे पैदा हुए थे तब उनके पिता आगस्ट हाइजेनबर्ग (August Heisenberg) क्लासिकल लेंग्वेज के शिक्षक थे, जो आगे चलकर सन् 1909 में वे म्युनिक विश्वविद्यालय में ग्रीक भाषा के प्रोफेसर बने। कुछ महिनों के बाद वर्नर भी परिवार के साथ वुर्ज़बर्ग से म्यूनिक आ गये।

    सन् 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ गया जो सन् 1919 तक चला। सन् 1918 में जर्मनी में क्रांति हुई। इस कारण म्यूनिक में भी बहुत आपदाएं आईं। वर्नर ने इस क्रांति में भाग लिया। रात को ड्यूटी रहती लेकिन जब सुबह-सुबह काम नहीं रहता तब उनका पुस्तकें पढ़ने का शौक पूरा होता। एक बार महान दार्शनिक प्लेटो की ग्रीक भाषा में लिखी प्रसिद्ध पुस्तक ‘थिमेअस’ (Timaeus) उनके हाथ लग गई। चूँकि ग्रीक भाषा का अध्ययन वर्नर के पाठ्यक्रम का हिस्सा था, अतः यह पुस्तक उनके लिये उपयोगी थी। इस पुस्तक में प्राचीन यूनान के परमाणु संबंधी सिद्धांत का वर्णन था। अतः इस पुस्तक को पढ़ते समय उनके मन में परमाणु के रहस्यों को गहराई से जानने की इच्छा पैदा हो गई। अब उनका मन गणित के साथ ही भौतिकी के अध्ययन की ओर भी होने लगा। आगे चलकर उन्होंने सन् 1932 में परमाणु के नाभिक के लिये ‘न्यूट्रॉन-प्रोटॉन मॉडल’ प्रस्तुत किया। उनका ग्रीक प्रेम आगे भी नजर आया जब युकावा ने सशक्त नाभिकीय बल के सिद्धांत को विकसित करने के लिये जिस कण को ‘मिसॉट्रॉन’ के नाम से प्रतिपादित किया था, उसे हाइजेनबर्ग के सुझाव पर ‘मिसॉन(Meson)’ के रूप में मान्य किया गया।

    जर्मनी में क्रांति के दिनों में, जब जर्मनी के हालत बिगड़ने लगे और उनके परिवार के पास खाने तक का संकट था, तब वर्नर को कुछ दिनों के लिये स्कूल छोड़कर कुछ महीनों के लिये म्यूनिक से करीब 50 मील दूर स्थित खेत पर मजदूरी के लिये जाना पड़ा। खेत पर उन्हें अक्सर साढ़े तीन बजे सुबह उठना पड़ता और फिर रात को करीब दस बजे तक काम करना होता था। कई बार उन्हें दिन में घास काटने जैसा थका देने वाला परिश्रम भी करना पड़ता। लेकिन वर्नर ने इस काम को मजबूरी में करने की बजाय ‘शिक्षा देने वाले काम’ के रूप में लिया। बाद में उन्होंने महसूस किया कि इस दौरान उन्हें वह शिक्षा मिली जो स्कूलों में रहकर कभी नहीं मिल सकती थी।

    धीरे-धीरे जर्मनी के हालात सुधरे और फिर वर्नर अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद सन् 1920 में सोमेरफेल्ड के मार्गदर्शन में भौतिकी पढ़ने के लिये म्यूनिक विश्वविद्यालय में आ गये। यहाँ वीन, प्रिंगशेम और रोजेंथल जैसे प्रतिष्ठित भौतिकविद् भी थे। म्यूनिक में उनकी मुलाकात सोमरफेल्ड के तीक्ष्ण बुद्धि वाले और बहुत सशक्त व्यक्तित्व के धनी छात्र वुल्फगैंग पॉली (जो आगे चलकर 1945 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए) से हुई। हाइजेनबर्ग उनसे बहुत गहराई तक प्रभावित हुए। पॉली शोध करने और इस दौरान प्रस्तुत किये जाने वाले सिद्धांतों में गलतियों को खोजने में माहिर थे।

    सोमरफेल्ड अपने विद्यार्थियों से बहुत प्यार करते थे। उन्हें पता चल चुका था कि वर्नर हाइजेनबर्ग को ‘परमाणु के चितेरे’ नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नील्स बोहर के परमाणु भौतिकी के काम में बहुत रूचि है। इसीलिये एक बार जब गोटिंजन में ‘बोहर फेस्टिवल’ का आयोजन हुआ तो वे हाइजेनबर्ग को भी अपने साथ ले गये। इस फेस्टिवल में बोहर के व्याख्यानों की एक शृंखला आयोजित थी। यहीं वे पहली बार बोहर से मिले और उनके गहरे प्रभाव में आ गये।

    शोधकार्य

    सन् 1922-23 के शीतकालीन अवकाश के दौरान हाइजेनबर्ग मैक्स बॉर्न, जेम्स फ्रेंक और डेविड हिलबर्ट के पास अपनी पीएचड़ी के लिये एक परियोजना पर कार्य करने के लिये गॉटिंगन गये। पी.एचडी. प्राप्त करने के बाद उन्हें गॉटिंगन विश्वविद्यालय में मैक्स बॉर्न के सहायक के रूप में कार्य करने का अवसर मिल गया। उन दिनों गॉटिंगन विश्वविद्यालय मैक्स बॉर्न के नैतृत्व में भौतिकी के बहुत बड़े केंद्र के रूप में विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखता था। मैक्स बॉर्न को उनके क्वांटम यांत्रिकी की सांख्यिकीय व्याख्या के लिये 1954 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला।

    इसके पश्चात 17 सितम्बर 1924 से 1 मई 1925 के बीच वे ‘रॉकफेलर ग्रांट’ प्राप्त कर कोपनहेगन विश्वविद्यालय में नील्स बोहर के साथ काम करने के लिये गये। उस समय क्वांटम दुनिया से उठ रही समस्याएं वैज्ञानिकों के सम्मुख चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रही थीं। बोहर इस क्षेत्र के अग्रणी वैज्ञानिक थे। उन्हें परमाणविक संरचना की खोज के लिये सन् 1922 का नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। कोपनहेगन के चैतन्य और प्रेरक वातावरण से निकल कर जब वे लौटे तो क्वांटम जगत से उठ रही समस्याओं से निपटने के लिये उनके मस्तिष्क में सर्वथा नये विचार घुमड़ने लगे और उन्होंने सर्वथा नये तरीके से सोचना आरंभ किया।

    वे बोहर मॉडल को लेकर सोचने लगे कि हम नहीं जानते कि इलेक्ट्रॉन परमाणु में कब, कहाँ हैं। हम अवशोषण या उत्सर्जन से इतना जान सकते हैं कि इलेक्ट्रॉन ने अवस्था परिवर्तन(State change) किया है। लेकिन इसने किस कक्षा से किस कक्षा में जाने के लिये किस रास्ते को तय किया है, यह कभी नहीं जाना जा सकता है। कक्षाओं के अस्तित्व को किसी भी तरीके से सत्यापित नहीं किया जा सकता है। अतः हम कैसे मान सकते हैं कि बोहर के ये आर्बिट वास्तविक आर्बिट हैं। अगर ये वास्तविक नहीं हैं तो फिर क्यों नहीं इनको छोड़कर आगे बढ़ने के लिये कोई अन्य वैकल्पिक रास्ता निकाला जाना चाहिये। वे सोचने लगे कि किसी भी सिद्धांत को ‘यथार्थ’ पर आधारित होना चाहिये न कि कल्पनाओं पर आधारित मॉडल्स पर। चूँकि हम संक्रमण (transition) के माध्यम से परमाणु को एक अवस्था से दूसरी में जाते हुए देखते हैं, अतः ‘संक्रमण’ को आधार बनाकर आगे बढ़ना उन्हें श्रेयस्कर लगा।

    क्वांटम जगत में प्रवेश के लिये हाइजेनबर्ग के ये विचार बीज एक नई दिशा की ओर संकेत कर रहे थे। वे इस बात के पक्षधर थे कि वैज्ञानिक पड़तालों को सिर्फ निरिक्षणो (observables) पर ही निर्भर होना चाहिए, और जहां तक परमाणु की बात है, हम सिर्फ स्प्रेक्ट्रल रेखाओं को ही देखते हैं, अतः इसी के इर्द-गिर्द हमारे सिद्धांत खड़े होना चाहिए। स्पेक्ट्रल रेखाओं के माध्यम से हम परमाणु द्वारा अवशोषित या उत्सर्जित विद्युतचुम्बकीय ऊर्जा से संबद्ध तरंगदैर्ध्य, आवृति और तीव्रता को संज्ञान में लेते हैं। यानि, ये ही वे राशियां होनी चाहिए जिनको आधार बनाकर हमें आगे बढ़ना चाहिए। अब उनकी प्रतिभा और अधिक रंग दिखाने लगी। कोई भी स्पेक्ट्रल रेखा तभी उदित होती है जब इलेक्ट्रॉन एक अवस्था से दूसरी में जाता है। चूंकि परमाणु में इलेक्ट्रॉन की अवस्था की पहचान उसकी स्थिति से नहीं बल्कि उससे संबद्ध क्वांटम संख्या से होती है, अतः स्पेट्रल रेखा का संबंध क्वांटम संख्याओं के विभिन्न जोड़ों से होना चाहिए।

    विचारों के बीजारोपण के इस दौर में उन्हें हे-फीवर हो गया। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘फिजिक्स एण्ड बीयांड’ में लिखा कि हे-फीवर के कारण जब वे हवा परिवर्तन के लिये हेलीगोलैण्ड गये तब उनकी घंटी बजी।’ बुखार के कारण शारीरिक कमजोरी के बावजूद उनका मस्तिष्क इन विचारों को दिशा देने के लिये बहुत उत्तेजित और सक्रिय था। अपनी तार्किक यात्रा के इसी दौर में उन्हें लगा कि वे परमाणविक घटनाओं के नीचे एक अनोखे खूबसूरत संसार को देख रहे हैं। वे हतप्रभ रह गये इस विचार से कि अब उन्हें प्रकृति द्वारा बड़ी ही उदारता से बिखेरी इस गणितीय संरचना को उजागर करना है।

    अब हाइजेनबर्ग के सामने सब कुछ साफ हो गया। परमाणविक घटनाओं के नीचे छिपी इस गणितीय संरचना में परमाणु में इलेक्ट्रॉन की स्थिति, वेग, संवेग आदि साधारण संख्याओं के रूप में उपस्थित नहीं रहते। इसके लिये उनके अनुसार पंक्ति (row) और कॉलम (column) में जमे संख्याओं के टेबिल की जरूरत होगी। इसमें प्रमुख अंतर इस बात को लेकर है कि जहाँ संख्याओं के गुणा में क्रम बदलने से गुणनफल नहीं बदलता वहीं टेबिलों के गुणा में ऐसा जरूरी नहीं होता। जब हाइजेनबर्ग ने अपने काम के बारे में बॉर्न को बताया तो उन्हें याद आया कि ऐसा ‘मेट्रिक्स’ के गुणनफल के दौरान होता है। अपने विद्यार्थी जीवन में बॉर्न का इससे परिचय हुआ था। अतः यह टेबिल तथा उससे जुड़ी विशिष्टता वाली बात गणितीय दुनिया में पहले से ही ज्ञात होने के कारण अब हाइजेनबर्ग के गणित के लिये कार्यकारी नियमों को खोजने की आवश्यकता नहीं थी।

    हाइजेनबर्ग ने गॉटिंगन लौटने के बाद मैक्स बॉर्न, पॉस्कल जॉर्डन के साथ मात्र 6 महिनों में ही क्वांटम मेकेनिक्स का पहला संस्करण मैट्रिक्स मेकेनिक्स के रूप में गढ़कर दुनिया के सामने रख दिया। हाइजेनबर्ग ने जिस क्वांटम मेकेनिक्स का विकास किया था उसमें बाहर से क्वांटम संख्याओं को ठूंसने की जरूरत नहीं थी। वे तो अपने आप समस्या के अनुसार से प्रकट होते थे। उनके इस कार्य ने सबको हैरत में डाल दिया। और, उन वैज्ञानिकों को तो मुश्किल में ही डाल दिया जिनकी जड़ें चिर-सम्मत भौतिकी में थी और वे अपने चिर-परिचित अंदाज में क्वांटम सिद्धांत को विकसित करने में लगे थे। इस तरह बड़े ही मौलिक अंदाज में उन्होंने क्वांटम समस्याओं को हल करने के लिये एक सर्वथा नई यांत्रिकी का विकास कर दिया।

    हालांकि हाइजेनबर्ग की क्वांटम मेकेनिक्स को किसी साधारण आदमी तो ठीक, वैज्ञानिकों के लिये भी समझना आसान नहीं है। लोगों की नजर में यह आईंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत से भी कठिन प्रतीत होता है क्योंकि उनकी यांत्रिकी का आधार और विकास की किसी तरह से भी चित्रात्मक अभिव्यक्ति में नहीं हो सकती। उनकी यांत्रिकी में मात्र शब्द और चिन्ह हैं तथा उनकी भाषा विशुद्ध गणितीय है। और यह बात सर्वविदित है कि सामान्य आदमी के लिये बिना चित्र की सहायता के किसी सिद्धांत को समझना आसान नहीं होता। हाइजेनबर्ग का विश्व-भौतिकी के क्षितीज पर उदय हो चुका था और वे रातों रात एक सैलिब्रेटी कर चुके थे। इस समय वे मात्र 24 वर्ष के थे।

    बुलंद होंसलों से उड़ने वालों को भला कौन रोक सका है? अपनी इस सफलता के बाद मई 1926 में उन्हें कोपेनहेगन विश्वविद्यालय में सैद्वांतिक भौतिकी में व्याख्याता के पद पर नियुक्ति मिली। इस कारण अब उन्हें नील्स बोहर का सतत सानिध्य मिलने लगा। यहाँ के बोहर द्वारा सृजित अकादमिक वातावरण में उनके मस्तिष्क में बहुत कुछ नया और नया ही आ रहा था। प्रकृति को देखने और समझने के लिये उनका अपना एक विशिष्ट नजरिया था। वे अपने तरीके से क्वांटम दुनिया को जानने और समझने को बेताब थे।

    हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत

    हाइजेनबर्ग अनिश्चितता सिद्धांत : इलेक्ट्रान की स्तिथि को देखने के प्रयास मे हम उसकी स्तिथि बदल देते है।

    हाइजेनबर्ग अनिश्चितता सिद्धांत : इलेक्ट्रान की स्तिथि को देखने के प्रयास मे हम उसकी स्तिथि बदल देते है।

    कोपनहेगन में एक दिन हाइजेनबर्ग को स्पष्ट महसूस हुआ कि भौतिक ज्ञान को जानने की हमारी अपनी सीमा है। इलेक्ट्रॉन की स्थिति को जानने के लिये हम अत्यधिक आवृत्ति के फोटॉन का इस्तेमाल करना पड़ता है जो देखे जाने वाले इलेक्ट्रॉन को प्रभावित करता है। इससे भले ही हमें उसकी स्थिति का पता चल जाये लेकिन उसका संवेग को सही-सही नहीं जाना जा सकेगा। प्रभाव को कम करने के लिये कम ऊर्जा वाले फोटॉन से संवेग को सही-सही भले ही जाना जा सके लेकिन अब स्थिति के बारे में निश्चिततापूर्वक जान पाना संभव नहीं होता है। इस तरह एक विचित्र स्थिति का निर्माण हो जाता है। हाइजेनबर्ग ने सोचा कि भले ही यह हमारी दुनिया में न हो लेकिन कम से कम परमाणविक दुनिया के बारे में तो निश्चित ही यह सही है। एक हद से नीचे हम वास्तविकता को जान ही नहीं सकते क्योंकि अवलोकन की प्रक्रिया देखी जाने वाली वास्तविकता को बदल देती है। अवलोकन के पूर्व हम नहीं कर सकते कि वास्तविकता क्या है। वास्तविकता का संबंध देखने की प्रक्रिया से है। इस अनुभूति ने हाइजेनबर्ग को परेशान कर दिया। आखिर उनके इस विचार से ब्रह्माण्ड के घड़ी की तरह चलने और वास्तविकता के बारे ने प्रचलित चिर-सम्मविचार बाहर होने जा रहा था।

    चिर-सम्मत भौतिकी(classical physics) भौतिक राशियों के एक साथ त्रुटिहीन मापन की कोई सीमा नहीं मानती। लेकिन हाइजेनबर्ग के अनुसार यह सिर्फ एक राशि के लिये ही हो सकता है। उनके अनुसार एक गतिमान कण की स्थिति और संवेग को एक साथ ठीक-ठीक कभी नहीं जाना जा सकता है। अगर दोनों को एक साथ मापना है तो उनके मापन में अनिश्चितता का गुणनफल किसी भी हालत में एक निश्चित मान से कम नहीं हो सकता जिसका संबंध प्लांक के नियतांक से है। यह नियतांक प्लांक को तब मिला था जब वे कृष्णिका वस्तुओं के स्पेक्ट्रम की समस्या को हल करने के लिये एक सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे थे। अतः हाइजेनबर्ग के अनुसार इस दुनिया के बारे में जानने का गणित और संभाव्यता ही एक मात्र सहारा है।

    अनिश्चितता सिद्धान्त (Uncertainty principle) की व्युत्पत्ति हाइजनबर्ग ने क्वाण्टम यान्त्रिकी के व्यापक नियमों से सन् 1927 ई। में दी थी। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी गतिमान कण की स्थिति और संवेग को एक साथ एकदम ठीक-ठीक नहीं मापा जा सकता। यदि एक राशि अधिक शुद्धता से मापी जाएगी तो दूसरी के मापन में उतनी ही अशुद्धता बढ़ जाएगी, चाहे इसे मापने में कितनी ही कुशलता क्यों न बरती जाए। इन राशियों की अशुद्धियों का गुणनफल प्लांक नियतांक (h) से कम नहीं हो सकता।

    यदि किसी गतिमान कण के स्थिति निर्दशांक x के मापन में {\displaystyle \Delta x}, की त्रुटि (या अनिश्चितता) और x-अक्ष की दिशा में उसके संवेग p के मापने में {\displaystyle \Delta p}, की त्रुटि हो तो इस सिद्धांत के अनुसार –

    {\displaystyle \Delta x\Delta p\geqslant {\frac {\hbar }{2}}},

    जहाँ, {\displaystyle \hbar =h/2\pi }h प्लांक नियतांक है।

    इससे प्रकट होता है कि किसी कण का कोई निर्दशांक और उसके संवेग का तत्संगन संघटक दोनों एक साथ यथार्थतापूर्वक नहीं जाने जा सकते और यदि इन दोनों संयुग्मी राशियों में से एक की अनिश्चितता बहुत कम हो तो दूसरी की बहुत अधिक होती है।

    हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत विज्ञान और गणित की उन समस्याओं में से एक है जो अज्ञेय हैं। क्वांटम भौतिकी का यह सिद्धांत कहता है कि हम किसी पार्टिकल की स्थिति और उसकी गति/दिशा को एक साथ नहीं जान सकते।

    इसके बारे में सोचने पर बहुत मानसिक उथलपुथल होती है। इसने ब्रह्माण्ड को देखने और समझने के हमारे नज़रिए में बड़ा फेरबदल कर दिया। अभी भी हमारे स्कूलों में परमाणु की संरचना को सौरमंडल जैसी व्यवस्था के रूप में दिखाया जाता है जिसमें केंद्र में नाभिक में प्रोटोन और न्यूट्रौन रहते हैं और बाहर इलेक्ट्रौन उपग्रहों की भांति उनकी परिक्रमा करते हैं। लेकिन परमाणु का ऐसा चित्रण भ्रामक है। नील्स बोर के ज़माने तक सभी लोग परमाणु के ऐसे ही भ्रामक चित्रण को सही मानते थे लेकिन वर्नर हाइजेनबर्ग ने अपने अनिश्चितता के सिद्धांत से इसमें भारी उलटफेर कर दिया।

     

    क्वांटम मेकेनिक्स

    अनिश्चितता के सिद्धांत को पचाने में वैज्ञानिकों को आरंभ में दिक्कत आ रही थी। अतः बड़े ही संघर्ष के बाद बोहर ने पूरकता का सिद्धांत प्रतिपादित किया। और, कहा कि क्वांटम दुनिया में दोहरी प्रकृति काम करती है। लेकिन एक समय में हमें इसकी एक ही प्रकृति के बारे में सही सही जानकारी मिल सकती है।

    दोनों सिद्धांत को एक साथ रखने पर क्वांटम मेकेनिक्स की जो व्याख्या उभर कर आती है, उसे कोपेनहेगन व्याख्या के नाम से जाना जाता है। और इसे ही क्वांटम सिद्धांत के आधार के रूप में मान्य किया गया है। इसके निहितार्थ बड़े ही चौंकाने वाले रहे। इस गणित में इलेक्ट्रॉन और परमाणु वास्तविक वस्तु नहीं हैं जिन्हें हम अपनी इंद्रियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीकों से खोज सकते हैं। नये गणित में घटना प्रमुख है, न कि वस्तु। ऊर्जा ज्यादा महत्वपूर्ण है न कि पदार्थ। अब तक के हमारे सारे परमाणु के मॉडल और चित्र हमें भ्रम में डालने लगे। क्रिकेट की बॉल की तरह इलेक्ट्रॉन के बारे में सोचा नहीं जा सकता। बावजूद इस गणितीय चित्रण के हम भरोसे के साथ कहते हैं कि दुनिया इन्हीं परमाणुओं से बनी है। इसने निर्वात की नई परिभाषा दी कि निर्वात वास्तव में आकाश वास्तव में कभी खाली नहीं रहता। निर्वात वास्तव में निर्वात नहीं होता वहाँ क्वांटम प्रक्रियाएं निरंतर चलती रहने के का वर्चुअल पार्टिकल-एण्टी-पार्टिकल भरे रहते हैं लेकिन वे प्रकट और लुप्त होते रहते हैं।

    क्या प्रकृति सच में इतनी बेतुकी (absurd) हो सकती है?

    क्या प्रकृति सच में इतनी बेतुकी (absurd) हो सकती है?

    इस तरह हाइजेनबर्ग के ऊर्वरक मस्तिष्क में ऐसा कुछ चला जिसने प्रकृति के जिस गूढ़ रहस्य को उजागर किया उसने भौतिकी की नींव को ही हिला दिया। हालांकि इस यथार्थ को जानने के बाद भी वे अचंभित थे और सोचते थे कि क्या प्रकृति सच में इतनी बेतुकी (absurd) हो सकती है?

     

    हाइजेनबर्ग का यह कार्य आईंस्टीन के कार्यों के बाद भौतिकी में एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया। नई भौतिकी ने न सिर्फ चिर-सम्मत भौतिकी(classical physics) को बदलने के लिये मजबूर किया वरन् इसने विज्ञान की कई अन्य शाखाओं समेत आर्ट और दर्शन को भी अपने प्रभाव में लिया।

    बोहर के साथ कोपनहेगन अत्यंत सृजनात्मक समय में बिताने के पश्चात् सन् 1927 में वे लिपझीग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गये। उस समय उनकी उम्र मात्र 26 वर्ष थी। उनके समय में लिपझीग में फेलिक्स ब्लॉच, फ्रेड्रिक हुण्ड, जॉन सी. स्लेटर एडवर्ड टेलर आदि जैसे कई प्रतिभाशाली शोध छात्र थे, जिन्होंने आगे चलकर भौतिकी के विकास में अपना अतुलनीय योगदान दिया। यहां रहते हुए सबसे पहले हाइजेनबर्ग ने अपने मित्र पॉली द्वारा प्रतिपादित अपवर्जन नियम(Pauli Exclusion Principle ) (इसके अनुसार किसी भी एक क्वांटम कक्षा में एक से अधिक इलेक्ट्रॉन नहीं रह सकता) का अनुप्रयोग करते हुए पदार्थों में फैरोमेग्नेटिक गुणों के उदय होने की गुत्थी सुलझाई। इसके बाद यहां बीतने वाला प्रत्येक क्षण उनके लिये बहुत उर्वरक साबित हो रहा था।

    प्रतिपदार्थ(Anti Matter)

    निल्स बोह्र(Niels Bohr), वर्नेर हाइजेनबर(Werner Heisenberg),तथा ओल्फ़्गांग पाली(Wolfgang Pauli)

    निल्स बोह्र(Niels Bohr), वर्नेर हाइजेनबर(Werner Heisenberg),तथा ओल्फ़्गांग पाली(Wolfgang Pauli)

    1925 में पी.ए.एम. डिरॉक को कैम्ब्रिज में हाइजेनबर्ग को सुनने का अवसर मिला। वे इंजीनियरिंग से आये थे। अतः हाइजेनबर्ग के व्याख्यान के लिये भौतिकी के लिये सर्वथा नये, अनुभवहीन और अनजाने थे। लेकिन अप्लाइड गणित में रुचि के कारण उनके ध्यान में हाइजेनबर्ग की एक बात जहाँ संख्याओं के गुणा में क्रम बदलने से गुणनफल नहीं बदलता वहीं टेबिलों के गुणा में ऐसा जरूरी नहीं होता’ आई। अब उनकी रुचि भौतिकी में जागी और वे क्वांटम दुनिया में प्रवेश के लिये नये तरीकों से सोचने लगेे। इसके पूर्व सन् 1925 में श्रोडिंगर ने डिब्रॉगली के पदार्थ तरंग को ध्यान में रखकर एक समीकरण प्रस्तुत किया था जिसे वेव-मेकेनिक्स के नाम से जाना गया, जो हाइजेनबर्ग की मैट्रिक्स मेकेनिक्स के तुल्य ही निकली। सन् 1928 में डिरॉक ने चिर-सम्मत भौतिकी की तर्ज पर ‘ऑपरेटर एलजेब्रा’ विकसित कर क्वांटम मेकेनिक्स की आधारशिला रखी। इसके बाद इलेक्ट्रॉन के अध्ययन के लिये उन्होंने सापेक्षीय तरंग-समीकरण प्रस्तुत किया जिससे इलेक्ट्रॉन के चक्रण संबंधी गुण के सापेक्षीय प्रभाव के रूप में प्रकट होने की जानकारी मिली। इसी सिद्धांत में से धनात्मक इलेक्ट्रॉन के अस्तित्त्व में होने की बात भी सामने आई, जिससे प्रकृति में प्रति पदार्थ की अवधारणा आई। इसे धनात्मक इलेक्ट्रॉन को पॉजीट्रॉन कहा गया।

    सन् 1932 में ‘पॉजीट्रॉन’ नामक उपर्युक्त कण को ‘कॉस्मिक किरणों’ के अध्ययन के दौरान ‘क्लाउड चैम्बर’ में खोजा गया। 1933 में हाइजेनबर्ग ने पॉजीट्रॉन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत में तथा 1934 तथा 1936 के अपने आगे के शोध पत्रों में उन्होंने डिरॉक के समीकरण की क्वांटाइजेशन की शर्तों का पालन करने वाली इलेक्ट्रॉन के समान व्यवहार करने वाले ‘स्पिन-हाफ’ कणों के लिये चिर-सम्मत फिल्ड इक्वेशन के रूप में पुनः व्याख्या की। इससे यह ‘क्वांटम फील्ड इक्वेशन’ बन गई, जो इलेक्ट्रॉन को एकदम सही तरीके से अभिव्यक्त करती है। ऐसा करके हाइजेनबर्ग ने पदार्थ को विद्युतचुम्बकत्व के साथ खड़ाकर दिया। अब, पदार्थ और विद्युतचुम्बकत्व, दोनों ही रिलेटिविस्टिक क्वांटम फील्ड समीकरण से अभिव्यक्त किये जा सकते हैं। इससे आईंस्टीन के ऊर्जा-द्रव्यमान समीकरण का निहितार्थ स्पष्ट होकर क्वांटम यांत्रिकी का हिस्सा बन गया। अब पार्टिकल के सृजन और विनाश यानि कणों के विद्युतचुम्बकीय ऊर्जा बनने और विद्युतचुम्बकीय ऊर्जा के कणों में रूपांतरित होने की संभावना को जानने के लिये यांत्रिकी सामने आ गई।

    1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हुआ। सन् 1938 में ऑटो हान और स्ट्रॉसमन (Otto Hahn and Fritz Strassmann ) के द्वारा नाभिकीय विखंडन की खोज के बाद जर्मनी ने परमाणु बम बनाने के लिये यूरेनियम क्लब गठित किया इसमें हाइजेनबर्ग नैतृत्व करने वाले वैज्ञानिकों में प्रमुख थे। 1942 में जब उन्होंने 1945 के पहले बम बन सकने की संभावना से इंकार किया, तब वे इससे अलग कर दिये गये।

    सन् 1941 में वे लिपझीग से बर्लिन विश्वविश्वविद्यालय चले गये और वहीं ‘कैसर विल्हेम इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स’ के निदेशक बन गये।

    अब उन्होंने अपना ध्यान पुनः भौतिकी की ओर लगाया तथा मूल कणों के व्यवहार और प्रक्रियाओं को समझने के लिये 1925 की ही तर्ज पर एस मैट्रिक्स सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसमें भी टक्कर की प्रक्रिया में प्रेक्षितों के रूप में आपतित और निर्गम कणों पर विचार किया गया। इसमें बीच की प्रक्रिया का कोई जिक्र नहीं है।

    वर्नर हाइजेनबर्ग (Werner Heisenberg) ने अपने बारे में लिखा कि उन्होंने सोमरफेल्ड से सकारात्मकता और भौतिकी बोहर से सीखी। जहाँ तक गणित की बात है, वह उन्होंने गोटिंजन में रहते हुए सीखा।

    सम्मान और पुरस्कार

    • आर्डर आफ़ मेरीअ ओफ़ बेवेरिआ(Order of Merit of Bavaria)
    • रोमानो गार्डीनी पुरस्कार(Romano Guardini Prize)
    • ग्रेंड क्रास फ़ार फ़ेडरल सर्वीस विथ स्टार(Grand Cross for Federal Service with Star)
    • नाईट आफ़ आर्डर आफ़ मेरीट (नागरी श्रेणी) Knight of the Order of Merit (Civil Class)
    • चयनीत रायल सोसायटी के सदस्य(Elected a Foreign Member of the Royal Society (ForMemRS) in 1955)
    • 1932– भौतिकी नोबेल पुरस्कार
    • 1933–मैक्स प्लैंक मेडल

    1 फरवरी 1976 को हाइजेनबर्ग ने दुनिया को अलविदा कहा।

     

    स्रोत :

    1. मूल लेख : http://mpinfo.org/mpinfostatic/rojgar/2013/1811/other04.asp
    2. विकिपीडीया

     


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  • ओमुअमुआ(Oumuamua) : सौर मंडल के बाहर से आया एक मेहमान
  • ओमुअमुआ: Oumuamua

    ओमुअमुआ: Oumuamua

    पहली बार खगोलविज्ञानियों ने एक क्षुद्रग्रह को खोज निकाला है जो बाहरी अंतरिक्ष से हमारे सौरमंडल में प्रवेश कर चुका है।

    चिली स्थित ESO(European Southern Observatory) के वेरी लार्ज टेलिस्कोप(Very Large Telescope: VLT) और विश्व के अन्य वेधशालाओं के निरीक्षण हमे बताते है कि यह अनोखा क्षुद्रग्रह हमारे सौरमंडल में प्रवेश करने से पहले लाखों वर्षो तक अंतरिक्ष मे यात्रा कर रहा था। यह क्षुद्रग्रह रंग में काला, थोड़ी लालिमा लिए लंबी चट्टान जैसी दिखाई पड़ता है। इस क्षुद्रग्रह से जुड़े सर्वेक्षण परिमाण को 20 नवंबर के नेचर साइंस पत्रिका में प्रकाशित किया जा चुका है।

    19 अक्टूबर 2017 को हवाई स्थित पैन-स्टारर्स1 दूरबीन(Panoramic Survey Telescope and Rapid Response System: Pan-STARRS) ने अपने अंतरिक्ष अवलोकन के दौरान इस क्षुद्रग्रह को खोजा था। शुरुआती जांच में इसकी कक्षा को सही तरीके से नही समझा जा सका था इसलिए खोज के बाद इसका वर्गीकरण एक धूमकेतु के रूप में किया गया था। लेकिन बाद में आंकड़ो और गणनाओं के आधार पर इसकी कक्षा को अच्छी तरह से समझा जा सका तब पता चला कि यह क्षुद्रग्रह सौरमंडल से उत्पन्न नही हुआ है ओर बाहरी अंतरिक्ष से सौरमंडल में दाखिल हो गया है।

    ओमुअमुआ का पथ

    ESO और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्पेस एजेंसियों द्वारा इसकी गणना और सूर्य के सबसे निकट आने पर ही इसे एक इंटरस्टेलर क्षुद्रग्रह(Interstellar asteroid) के रूप में वर्गीकृत किया जा सका। वर्गीकरण के बाद ही इस क्षुद्रग्रह का नाम 1I/2017 U1(ओमुअमुआ: Oumuamua) दिया गया। क्षुद्रग्रह की खोज करने वाले टीम ने बताया की ‘ओमुअमुआ’ एक हवाई शब्द है जिसका अर्थ होता है यह पिंड एक संदेशवाहक है जिसे हम तक पहुंचने के लिए बहुत साल पहले भेजा गया था।

    ओमुअमुआ वेगा तारे की दिशा से आया है, अब यह सूर्य के निकट से होते हुये वापिस सौर मंडल के बाहर की दिशा मे भागा जा रहा है।

    ओमुअमुआ वेगा तारे की दिशा से आया है, अब यह सूर्य के निकट से होते हुये वापिस सौर मंडल के बाहर की दिशा मे भागा जा रहा है।

    ESO के खगोलविज्ञानी ओलिवर हैनाउट(Olivier Hainaut) बताते है

    “ताजा सर्वेक्षण से हमे पता चला है कि यह क्षुद्रग्रह सूर्य के निकटतम बिंदु को पार कर चुका है अब यह इंटरस्टेलर अंतरिक्ष मे वापस जा रहा है। ESO के VLT दूरबीन को तुरंत ही इस क्षुद्रग्रह की कक्षा, उसकी चमक और रंग को सटीक मापन के लिए लगाया गया था क्योंकि छोटे दूरबीन से ज्यादा आंकड़े नही प्राप्त किये जा सकते। यह तेजी से हमसे लुप्त होता चला जा रहा है इसलिए लगातार अवलोकन से और आंकड़े एकत्रित किये जा रहे है।”

    अन्य दूरबीनों के साथ वेरी लार्ज दूरबीन द्वारा अलग अलग फिल्टरों से लिये गए चित्रों के आधार पर खगोलविज्ञानियों ने पाया है कि यह क्षुद्रग्रह नाटकीय ढंग से अपनी चमक में भिन्नता प्रदर्शित कर रहा है। पृथ्वी समययानुसार यह 7.3 घण्टे मे अपनी धुरी पर एक चक्कर काट लेता है।

    खगोलविज्ञानी कारेन मीच(Karen Meech) इस क्षुद्रग्रह के चमक के बारे में कहते है

    “चमक में यह असामान्य भिन्नता का अर्थ है यह एक सिर्फ लंबी वस्तु है इसका आकार भी अन्य क्षुद्रग्रहों से जटिल है। बाहरी अंतरिक्षीय वस्तुओं के समान यह क्षुद्रग्रह भी काला लालिमा लिए रंग प्रदर्शित कर रहा है जबकि इसके चारों ओर धूल के बादल होने के कोई संकेत नही है। यह क्षुद्रग्रह अधिक घना, चट्टानी और उच्च धातुओं से मिलकर बना है यहाँ बर्फ या पानी की मात्रा होने के कोई संकेत नही है। लाखों वर्षो के अंतरिक्षीय यात्रा के दौरान ब्रह्माण्डीय विकिरणों का प्रभाव इसकी सतह पर देखा जा सकता है इसी प्रभाव के कारण काला लालिमा लिये रंग का दिखाई देता है। चौड़ाई के रूप में यह 400 मीटर ही चौड़ा है जबकि इसकी लम्बाई इससे 10 गुणा ज्यादा है। ”

    इस क्षुद्रग्रह के कक्षीय गणनाओं के अध्ययन से पता चला है कि यह  उज्ज्वल तारा वेगा(Vega) की दिशा से ही आया है वेगा जो कि लयरा के उत्तरी नक्षत्र(Northern Constellation of Lyra) में स्थित है। यहाँ तक कि यात्रा इस क्षुद्रग्रह ने लगभग 95000km/घंटे की गति से की है। हमारे सौरमंडल से गुजरते समय पृथ्वी की कक्षा से इसकी दूरी लगभग 24 करोड़ किलोमीटर की थी। हमारे सौरमंडल में प्रवेश करते समय इसकी गति लगभग 25.5 किलोमीटर प्रति सेकंड दर्ज की गयी थी लेकिन सूर्य के निकटतम स्थिति में इसकी गति बढ़कर लगभग 44 किलोमीटर प्रति सेकंड की हो गयी थी। आज से 3 लाख साल पहले यह क्षुद्रग्रह वेगा के काफ़ी करीब रहा होगा आप समझ सकते है इस क्षुद्रग्रह ने कितनी बढ़ी अंतरिक्षीय यात्रा की है सौरमंडल में आने से पहले यह मिल्की वे आकाशगंगा में भी काफी भटकता रहा होगा और आगे भी भटकता रहेगा।

    खगोलविदों का अनुमान है कि 1I/2017 U1 जैसा इंटरस्टेलर क्षुद्रग्रह प्रति वर्ष सौरमंडल से गुजरता ही रहता है लेकिन हम आसानी से उसे ट्रैक नही कर सकते। हमे ऐसे क्षुद्रग्रहों पर नजर रखने के लिए पैन-स्टारर्स जैसे सर्वेक्षण दूरबीनों की ज्यादा जरूरत होती है क्योंकि ये सर्वेक्षण के लिए पर्याप्त शक्तिशाली और बड़े दूरबीनों के मुकाबले कम जटिल होते है।
    ओलिवर हैनाउट ने अपने अंतिम निष्कर्ष में कहा

    “हम लगातार ऐसे अनूठे वस्तुओं की खोज में प्रयासरत रहते है। हमारा मानना है कि ऐसे क्षुद्रग्रह अपनी अंतरिक्षीय यात्रा से जुड़े जानकारियां, अपने अनुभव को हमसे साझा करने के लिए ही आते है और हमे उनके अनुभवों की बहुत जरूरत है क्योंकि भविष्य में हमे भी लंबी अंतरिक्षीय यात्रा करनी है।”

    Journal reference: Nature Astronomy.
    स्रोत: ESO & Panoramic Survey Telescope and Rapid Response System (Pan-STARRS).

    प्रस्तुति : पल्लवी कुमारी

    लेखिका परिचय

    पलल्वी  कुमारी, बी एस सी प्रथम वर्ष की छात्रा है। वर्तमान  मे राम रतन सिंह कालेज मोकामा पटना मे अध्यनरत है।

    पल्लवी कुमारी

    पल्लवी कुमारी


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  • आधुनिक खगोलशास्त्र के पितामह : एडवीन हबल
  • एडवीन हबल( Edwin Hubble)

    एडवीन हबल( Edwin Hubble)

    एडविन हबल ब्रह्मांड के विस्तार सिद्धांत के प्रवर्तक और आधुनिक खगोल विज्ञान के पितामह थे । हबल बीसवीं सदी के अग्रणी खगोलविदों में से एक थे । उन पर ही हबल अंतरिक्ष टेलीस्कोप का नामकरण हुआ था । 1920 के दशक में हमारी अपनी मंदाकिनी(milky way) आकाशगंगा के परे अनगिनत आकाशगंगाओं की उनकी खोज ने ब्रह्मांड की और उसके भीतर हमारे वजूद की समझ में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया था ।

    एडविन हबल (1889-1953) का जन्म मार्सफिल्ड, मिसौरी में हुआ । अपने पहले जन्मदिन से पहले उन्हें व्हीटॉन, इलिनोइस ले जाया गया । उन्होंने शिकागो के विश्वविद्यालय में गणित और खगोल विज्ञान का अध्ययन किया और 1910 में विज्ञान की स्नातक डिग्री अर्जित की । वें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पहले रोड्स विद्वानों में से एक थे, जहां उन्होंने कानून का अध्ययन किया । प्रथम विश्व युद्ध में संक्षेप सेवा के बाद, वह शिकागो विश्वविद्यालय लौट आए और 1917 में अपनी डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित की । माउंट विल्सन वेधशाला में एक पूरे लंबे कैरियर के बाद 28 सितंबर,1953 को सैन मैरिनो, कैलिफोर्निया में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई ।

    हबल ट्यूनिंग फोर्क डायग्राम (Hubble, Tuning Fork)

    हबल ट्यूनिंग फोर्क डायग्राम (Hubble, Tuning Fork)

    हबल के समय के ज्यादातर खगोलविदों की सोच थी कि ग्रहों, अनगिनत सितारों और नीहारिकाओं से भरापूरा समूचा ब्रह्मांड मंदाकिनी(मिल्की वे) आकाशगंगा के भीतर समाहित है । हमारी आकाशगंगा ही समस्त ब्रह्मांड का पर्याय बन गई थी । 1923 में हबल ने एंड्रोमेडा(देव्यानी) निहारिका नामक आकाश के एक धुंधले पट्टे पर हूकर दूरबीन का प्रशिक्षण किया । उन्होंने पाया कि एंड्रोमेडा भी हमारी आकाशगंगा की ही तरह सितारों से भरी हुई है, लेकिन केवल मंद तारों से । उन्होंने वहां एक सितारा देखा जो सेफिड चर(cepheid variable) का था जो कि परिवर्ती चमक के तारों का एक प्रकार है, जिसका इस्तेमाल दूरी को मापने के लिए किया जा सकता है । इसकी सहायता से हबल ने निष्कर्ष निकाला कि एंड्रोमेडा निहारिका कोई नजदीकी तारा समूह नहीं बल्कि एक अन्य समूची आकाशगंगा है जिसे अब एंड्रोमेडा आकाशगंगा कहा जाता है । बाद के वर्षों में उन्होंने अन्य नीहारिकाओं के साथ इसी तरह की खोजें की । 1920 के दशक के अंत तक, अधिकाँश खगोलविद आश्वस्त थे कि हमारी मंदाकिनी आकाशगंगा( मिल्की वे) अकेली नहीं वरन ब्रह्मांड की लाखों आकाशगंगाओं में एक थी । यह खोज ब्रम्हांड की समझ की हमारी सोच में बदलाव का एक अहम् मोड़ साबित हुई ।

    हबल तो एक कदम आगे चले गए । उस दशक के अंत तक उन्होंने परस्पर तुलना करने लायक पर्याप्त आकाशगंगाओं की खोज कर ली। उन्होंने आकाशगंगाओं को अण्डाकार, सर्पिल और पट्टीदार सर्पिल में वर्गीकृत करने के लिए एक प्रणाली बनाई । इस प्रणाली को हबल ट्यूनिंग फोर्क डायग्राम कहा जाता है जिसके एक विकसित रूप का आज प्रयोग किया जाता है ।

    लेकिन सबसे आश्चर्यजनक खोज 46 आकाशगंगाओं के स्पेक्ट्रा के हबल के अपने अध्ययन के परिणामस्वरूप हुई और विशेष रूप से उन आकाशगंगाओं की हमारी अपनी मिल्की वे आकाशगंगा के सापेक्ष डॉप्लर वेग से । हबल ने पाया कि एक दूसरे से अलग आकाशगंगाएं जितनी ज्यादा दूर है वह उतनी ही तेजी से एक दूसरे से दूर जा रही है । इस अवलोकन के आधार पर हबल ने निष्कर्ष निकाला कि ब्रह्मांड समान रूप से फैल रहा है । कई वैज्ञानिकों ने भी आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता के आधार पर इस सिद्धांत को पेश किया था । लेकिन 1929 में प्रकाशित हबल डेटा ने वैज्ञानिक समुदाय को आश्वत करने में मदद की ।

    हबल और माउंट विल्सन पर उनके सहयोगी मिल्टन हमसन ने ब्रह्मांड के विस्तार की दर 500 किलोमीटर प्रति सेकंड प्रति मेगापारसेक होने का अनुमान लगाया ( एक मेगापारसेक, या दस लाख पारसेक की एक दूरी लगभग 32.6 लाख प्रकाश वर्ष के बराबर है, तो एक मेगापारसेक दूर की आकाशगंगा की तुलना में दो मेगापारसेक दूर की आकाशगंगा की हमसे दूर होने की गति दोगुनी होगी )। यह अनुमान हबल नियतांक कहलाता है ।

    बिग बैंग थ्योरी और एडविन हबल

    1929 मे एडवीन हबल ने एक आश्चर्यजनक खोज की, उन्होंने पाया की अंतरिक्ष में आप किसी भी दिशा मे देखें आकाशगंगाएं और अन्य आकाशीय पिंड तेजी से एक दूसरे से दूर हो रहे हैं। दूसरे शब्दो मे ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। इसका मतलब यह है कि इतिहास मे ब्रह्मांड के सभी पदार्थ आज की तुलना में एक दूसरे से और भी पास रहे होंगे। और एक समय ऐसा रहा होगा जब सभी आकाशीय पिंड एक ही स्थान पर रहे होंगे। खगोलशास्त्रियों ने उन परिस्थितियों का विश्लेषण करने का प्रयास किया है कि कैसे ब्रह्मांडिय पदार्थ एक दूसरे से एकदम पास होने की स्थिती से एकदम दूर होते जा रहे हैं। इतिहास में किसी समय , शायद 10 से 20 खरब साल पूर्व, ब्रम्हांड के सभी कण एक दूसरे से एकदम पास-पास थे। वे इतने पास-पास थे कि वे सभी एक ही जगह थे, एक ही बिन्दु पर। सारा ब्रह्मांड एक ही बिन्दु की शक्ल में था। यह बिन्दु अत्याधिक घनत्व का, अत्यंत छोटा बिन्दु था। ब्रम्हांड का यह बिन्दु रूप अपने अत्यधिक घनत्व के कारण अत्यंत गर्म रहा होगा। इस स्थिती में भौतिकी, गणित या विज्ञान का कोई भी नियम काम नहीं करता है। यह वह स्थिती है जब मनुष्य किसी प्रकार अनुमान या विश्लेषण करने मे असमर्थ है। काल या समय भी इस स्थिती मे रुक जाता है, दूसरे शब्दों में काल और समय के कोई मायने नहीं रखते हैं। इस स्थिती मे किसी अज्ञात कारण से अचानक ब्रम्हांड का विस्तार होना शुरू हुआ। एक महाविस्फोट के साथ ब्रह्मांड का जन्म हुआ और ब्रह्मांड में पदार्थ ने एक दूसरे से दूर जाना शुरू कर दिया। इस सिद्धांत को बिग बैंग थ्योरी का नाम दिया गया, जोकि ब्रह्माण्ड के जन्म संबधित सबसे अधिक मान्य सिद्धांत है।

    यह चित्र ब्रह्मांड की समय रेखा दर्शाता है, जिसमे बायें वर्तमान दर्शाया गया है जबकी दायें अब से 13.8 अरब वर्ष पुराने बिग बैंग की स्थिति है।

    यह चित्र ब्रह्मांड की समय रेखा दर्शाता है, जिसमे बायें वर्तमान दर्शाया गया है जबकी दायें अब से 13.8 अरब वर्ष पुराने बिग बैंग की स्थिति है।

    हबल अंतरिक्ष दूरबीन

    HST, Hubble

    हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला

    हबल अंतरिक्ष टेलीस्कोप को 1990 में शुरू किया गया था, उसके प्रमुख लक्ष्यो में एक हबल नियतांक की सही व्याख्या करनी है । 2001 में, एक टीम ने भूमि आधारित ऑप्टिकल दूरबीनों के साथ साथ, हबल के साथ सुपरनोवा का अध्ययन कर 72 ± 8 किमी / सेकण्ड/ मेगापारसेक की एक दर स्थापित की । 2006 में, नासा के WMAP उपग्रह के साथ ब्रह्मांडीय सुक्ष्मतरंग पृष्ठभूमि का अध्ययन कर रही एक टीम ने इस माप को सुधार कर 70 किमी / सेकण्ड/ मेगापारसेक किया । हबल दूरबीन की सहायता से यह भी पता चला कि न केवल ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है, विस्तार में तेजी भी है । इस त्वरण के लिए उत्तरदायी रहस्यमय बल को अदृश्य ऊर्जा करार दिया है ।

    हबल दूरबीन ने खगोल विज्ञान में क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हुए ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को बदल डाला है। सृष्टि के आरंभ और उम्र के बारे में हबल ने अनेक नए तथ्यों से हमें अवगत कराया है। इसकी नवीनतम उपलब्धि ब्रह्मांड की उम्र के बारे में सबूत जुटाने की है।

    हबल के सहारे खगोलविदों की एक टोली ने 7000 प्रकाश वर्ष दूर ऊर्जाहीन अवस्था की ओर बढ़ते प्राचीनतम माने जाने वाले तारों के एक समूह को खोज निकाला है। इन तारों के बुझते जाने की रफ़्तार के आधार पर ब्रह्मांड की उम्र 13 से 14 अरब वर्ष के बीच आँकी गई है। इसके अतिरिक्त पिछले 12 वर्षों के दौरान इस दूरबीन ने सुदूरवर्ती अंतरिक्षीय पिंडों के हज़ारों आकर्षक चित्र भी उपलब्ध कराए हैं।

    क़रीब सौ साल पहले अमरीका में खगोलविदों ने परावर्तक(रिफ़्लेक्टरों) पर आधारित विशाल दूरबीनों का निर्माण आरंभ किया। उन दूरबीनों में से एक का माउंट विल्सन रिफ़्लेक्टर 100 ईंच आकार का था, जिसे उस समय की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों में से माना जा रहा था। उस विशाल दूरबीन को एडविन हबल नामक खगोलविद ने स्थापित किया था, जिनके सम्मान में पहली अंतरिक्ष दूरबीन को हबल दूरबीन कहा गया। अपनी दूरबीन के सहारे एडविन हबल ने साबित किया कि ब्रह्मांड का लगातार फैलाव हो रहा है। उनकी इस खोज को खगोल विज्ञान में हबल के नियम के नाम से जाना जाता है।

    बाद में ब्रह्मांड की उम्र जानने की जिज्ञासा ने खगोलविदों को और बड़ी दूरबीनों के निर्माण के लिए प्रेरित किया और 200 ईंच आकार की रिफ़्लेक्टर युक्त दूरबीनें भी बनीं। लेकिन उन्हें एक ऐसी दूरबीन चाहिए थी जो धरती के वायुमंडल के व्यवधानों से अप्रभावित रहा और इस तरह अंतरिक्ष दूरबीन की बात सामने आई। लेकिन खगोलविदों का यह सपना 1990 में साकार हो सका, जब डिस्कवरी शटल ने हबल दूरबीन को अंतरिक्ष में पहुँचाया गया।

    हालांकि खगोलविद एडविन हबल के सपनों को साकार करने वाली इस दूरबीन पर अमरीका में 1970 के दशक में ही काम शुरू हो चुका था। बाल्टिमोर, अमरीका के स्पेस टेलीस्कोप साइंस इंस्टीट्यूट में हबल दूरबीन का विकास किया गया। अमरीकी अंतरिक्ष शटल चैलेंजर की दुर्घटना के बाद कुछ वर्षों के लिए थमे अंतरिक्ष ट्रैफ़िक ने हबल परियोजना को बाधित किया। हबल अंतरिक्ष दूरबीन के कहीं विशाल आकार की परिकल्पना की गई थी, लेकिन अंतत: यह मात्र 96 ईंच आकार की परावर्तक सतह वाली दूरबीन साबित हुई। लेकिन वायुमंडल से दूर अंतरिक्ष में होने के कारण हबल दूरबीन धरती पर उपलब्ध कहीं बड़ी दूरबीनों ज़्यादा प्रभावी साबित हो रही है।

    इसकी नियमित रूप से सर्विसिंग की जाती रही है। इसके लिए अमरीकी अंतरिक्ष संस्था नासा के अंतरिक्ष यानों के सहारे अंतरिक्षयात्रियों को हबल तक पहुँचाया जाता है।

    तकनीकी तथ्य

    • नासा ने हबल दूरबीन को अंतरिक्ष में स्थापित करने में क़रीब ढाई अरब डॉलर ख़र्च किए हैं। इसकी एक सर्विसिंग पर लगभग 50 करोड़ डॉलर की लागत आती है।
    • धरती की सतह से 600 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगा रही हबल 11 टन वज़न की है। धरती का एक चक्कर लगाने में इस क़रीब 100 मिनट लगते हैं।
    • इसकी लंबाई 13.2 मीटर और अधिकतम व्यास 4.2 मीटर है।
    • हबल दूरबीन प्रतिदिन 10 से 15 गिगाबाइट आँकड़े जुटाती है।
    • वर्ष 2009 में संपन्न पिछले सर्विसिंग मिशन के बाद उम्मीद है कि यह वर्ष 2030-40 तक काम करता रहेगा|

    अंत में, एडविन हबल ने एक दूरबीन के साथ अपने नाम को सार्थक किया और ब्रह्मांड के विषय में हमारी समझ को बदल कर रख दिया । हबल अंतरिक्ष टेलीस्कोप के रूप में खोज की उनकी भावना आज भी जीवित है ।

    कुछ हबल चित्रों को स्वयं देखने के लिए, हबल चित्र गैलरी पर जाएं ।

    हबल दूरदर्शी पर कुछ लेख

    1. भाग 1 :हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला चित्र कैसे लेती है?
    2. भाग 2 : हब्बल दूरबीन द्वारा प्रकाश और फिल्टरो का प्रयोग
    3. भाग 3 : प्राकृतिक, प्रतिनिधि तथा उन्नत रंग
    4. 25 अप्रैल को हबल अंतरिक्ष वेधशाला के 25 वर्ष पूरे होने पर विशेष
    5. हबल दूरबीन के शानदार 25 वर्ष पूरे
    6. हबल अंतरिक्ष दूरबीन : जब 1.6 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट को बर्बाद होने से बचाया गया!

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  • हम तारों की धूल है : बिग बैंग से लेकर अब तक की सृजन गाथा
  • मान लीजिये आपको एक कार बनानी है तो आपको क्या क्या सामग्री चाहिये होगी ? एक इंजन , कार का फ्रेम , पहिये , कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स , सीट्स, ट्रांसमिशन सिस्टम , स्क्रूज , ईंधन और भी बहुत सारा सामान। और अब अगर मैं कहु की आपको एक इंजन बनाना है तब आपको चहियेगा बहुत सी धातुएँ जिनसे आप इंजन बनाएंगे पर अगर आपको धातु ही बनानी हो तब?

    या सोचिये की धरती पर इतने सारे तत्व है ये सब कहाँ बनते है या बने होंगे? जब कभी बिग बैंग की घटना घटी होगी तब ब्रह्माण्ड में केवल इलेक्ट्रान , प्रोटोन और न्यूट्रॉन रहे होंगे अगर स्ट्रिंग थ्योरी को माने तो शायद इनसे पहले भी कुछ रहा होगा पर फिलहाल के लिए इलेक्ट्रान , प्रोटोन और न्यूट्रॉन की मौज़ूदगी ही मान लेते है और ये तीनो भी अलग अलग रहे होंगे। इसके अलावा बहुत ज्यादा तापमान और बेहिसाब ऊर्जा। तब और कुछ नहीं था न ही पृथ्वी न ही सूरज , न ही कोई मन्दाकिनी न ही सितारे कुछ नहीं बस केवल ये तीनो कण इलेक्ट्रान , प्रोटोन और न्यूट्रॉन बहुत तेजी से इधर उधर घूमते हुए। इनके अलावा कोई और कण रहे होंगे तो फिलहाल उन्हें नजरअंदाज करते है।

    प्रश्न ये आता है कि उस स्थिति से ये सब कैसे बना जो आज है ?

    कैसे बने चाँद , सूरज और सितारे और ये पृथ्वी ?

    परमाणु केण्द्रक

    परमाणु केण्द्रक

    इसे समझने के लिए सबसे पहले इस बात को समझ लीजिये कि सभी तत्वों में इलेक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रॉन एक से ही है केवल परमाणु केंद्रक मे इनकी अलग अलग संख्याओं के अनुसार अलग अलग तत्व बनते है। किसी तत्व के गुणधर्म इस बात से तय होते है कि उसका परमाणु कैसा है और परमाणु के दो आधारभूत गुणधर्म परमाणु संख्या और परमाणु भार इस बात पर निर्भर करते है कि उसमे इलेक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रॉन की संख्या कितनी है। इसका मतलब ये है की आप के अंदर भी वही इलेक्ट्रान. प्रोटोन और न्यूट्रॉन है जो मेरे अंदर है या जो दूर किसी सितारे के अंदर है या वह किसी ग्रह पर रहने वाले एलियन के अंदर।

    कहने का त्तात्पर्य यह है की हम सबका सृजन एक है स्रोत से हुआ है। सभी तत्व एक ही स्रोत से बने है।

    हायड्रोजन संलयन से हिलियम तथा ऊर्जा का निर्माण

    हायड्रोजन संलयन से हिलियम तथा ऊर्जा का निर्माण

    हाइड्रोजन ब्रह्माण्ड का सबसे साधारण तत्व है। जो एक इलेक्ट्रान और एक प्रोटोन से बना है। हाइड्रोजन का बनना भी ब्रह्माण्ड के काफी ठंडा होने के बाद ही संभव हो पाया होगा। लेकिन फिर भी ये भारी तत्वों के बनने की विधि से अपेक्षाकृत आसान रहा होगा। हीलियम का निर्माण भी उसी दौर में शुरू हुआ था।

    बिग बैंग के करीब चालीस करोड़ साल बाद पहले सितारे बने होंगे ये सितारे हाइड्रोजन के बड़े बड़े गोले रहे होंगे और इनमे लगभग हाइड्रोजन और हीलियम रही होगी। इसके बाद के तत्व लिथियम, बेरेलियम, बाॅरान, कार्बन, आक्सीजन, नाइट्रोजन आदि का निर्माण इन सितारों के केन्द्र में शुरू हुआ था। आपके मोबाइल की लिथियम आयन बैटरी का लिथियम क्या पता कब बना होगा। सितारों के केन्द्र में उत्पन्न अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा और दाब ही इन हल्के परमाणुओं को मिलाकर भारी परमाणुओं में बदलते हैं और इससे उत्पन्न ऊर्जा प्रकाश, ऊष्मा आदि के रूप में बाहर निकलती हैं। इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहा जाता है।

    किसी तारें में नाभिकीय संलयन शुरू होने के लिए उसका द्रव्यमान इतना होना चाहिए कि केन्द्र में इतना दाब उत्पन्न हो सके जो दो हाइड्रोजन के परमाणुओं को संलयित करा कर हीलियम में बदल सके और इसके बाद और भारी तत्वों के परमाणु बनाये जा सके ।

    अगर मैं आपको दो हाइड्रोजन के परमाणु देकर कहु की इन्हे मिलकर हीलियम बना दीजिये तो ये आसान काम नहीं रहेगा। चलिए कुछ और आसान काम देता हूँ। आप ऐसा करिये अपने पास रखी किसी चीज को छू कर दिखाइए। ये आसान काम था? – नहीं। बल्कि ये हाइड्रोजन के दो परमाणुओं को मिला कर हीलियम में बदल देने से भी मुश्किल काम है। असलियत में आपने उस चीज को छुआ ही नहीं और आप किसी चीज को छू भी नहीं सकते। जब दो वस्तुए परस्पर संपर्क में रखी जाती है तो सबसे पहले उनका इलेक्ट्रान क्लाउड संपर्क में आते है अब क्योंकि इलेक्ट्रान क्लाउड ऋणात्मक आवेशित होते है तो एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है और बीच में कुछ कुछ न जगह बच ही जाती है। कोई परमाणु भी अपने आप में बहुत खाली जगह लिए होता है। अब अगर दो परमाणुओ को आपस में मिलाना चाहते है तो उन्हें परमाण्विक दूरी (10 -15 मीटर ) तक पास लाना पड़ता है और ऐसा करने के लिए बहुत अधिक दाब और ताप चाहिए होता है क्यूंकि इस दूरी पर नाभिकीय बल काम करना शुरू कर देते है और नाभिकीय बल कुदरत के सबसे शक्तिशाली बल है। जो लिए चाहिए ये ऊर्जा या तो किसी नाभिकीय भट्टी में बनाई जा सकती है या किसी सितारे के पेट में होती है। ( सितारे के पेट मतलब उसकी कोर से है। ) क्योंकि इतना दाब और ताप किसी तारे के केंद्र में ही संभव हो पाता है जहाँ तारे की समस्त गैसों का दाब गुरुत्वाकर्षण के कारण इतना ताप और दाब उत्पन्न कर देता है।

    परमाणु जितने भारी तत्व के होंगे उन्हें मिलाकर नया तत्व बनाना उतना ही मुश्किल होगा। इसीलिए हाइड्रोजन के दो परमाणुओं को मिलाना किसी वस्तु को छू सकने से अपेक्षाकृत आसान काम है।

    तारों मे नाभिकिय संलयन द्वारा हल्के तत्वों का निर्माण

    तारों मे नाभिकिय संलयन द्वारा हल्के तत्वों का निर्माण

    तारें अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं परन्तु फिर भी किसी तारे की भी एक सीमा होती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं। हाइड्रोजन का संलयन करने के लिए किसी तारे का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का केवल 1/100 भाग होना चाहिए। इतना द्रव्यमान होने पर उस तारे के केन्द्र में हाइड्रोजन का संलयन शुरू हो जायेगा। वही नियॉन का संलयन शुरू करने के लिए उसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का कम से आठ गुना ज्यादा होना चाहिए। सूर्य का द्रव्यमान जितना है इसमें अधिक मात्रा में हाइड्रोजन ही हीलियम में बदल रही है। इसे प्रोटोन प्रोटोन साइकिल कहा जाता है। सूर्य से उत्पन्न ऊर्जा का 99 प्रतिशत इसी क्रिया से बनता है। इसके बाद की जो क्रिया है जिसमें हीलियम के तीन नाभिक संलयित होकर कार्बन में बदल जाते हैं उस प्रक्रिया का सूर्य में होना संभव नहीं है। परंतु फिर भी सूर्य की कुल ऊर्जा का करीब 0.8 प्रतिशत CNO साइकिल से आता है जिसमें कुछ भारी तत्व कार्बन, नाइट्रोजन और आक्सीजन का प्रोटोन के साथ संलयन होता है।

    परंतु जब कोई तारा अपने अंतिम समय में पहुंचता है तो इसकी कोर सिकुडना शुरू कर देती है और तापमान बढ़ने लगता है। जबकि इसकी सतह फैलती है। यह बात तारे के द्रव्यमान पर निर्भर करती है कि उसका अंत सुपरनोवा बनकर होगा या नहीं। सूर्य सुपरनोवा विस्फोट नहीं कर पायेगा। इसकी कोर हीलियम में बदल जायेगी और फिर कार्बन में तथा इसके अलावा नाइट्रोजन, आक्सीजन आदि तत्व भी इसकी कोर में बन पायेंगे।

    सुपरनोवा के अवशेष

    सुपरनोवा के अवशेष

    जो तारे सूर्य से कई गुना ज्यादा द्रव्यमान के हैं उनकी कोर अंत में लोहे में बदल जाती है। लोहे  के बाद के तत्व तारें के केन्द्र में नहीं बन पाते हैं इन्हें बनने के अधिक ऊर्जा चाहिए होती है। ये ऊर्जा किसी सुपरनोवा विस्फोट में उत्पन्न होती है। भारी तत्व किसी सुपरनोवा के दौरान ही बन पाता है और इसी विस्फोट से ये तत्व सुदूरवर्ती अंतरिक्ष में फेंक दिये जाते हैं। वही से ये तत्व पृथ्वी जैसे ग्रह पर पहुंच पाते हैं। इनके बनने की क्रिया काफी तीव्र गति से होती है और बहुत भारी तारे ही एक अच्छे खासे सुपरनोवा विस्फोट को कर पाते हैं।

    इसके अलावा भी एक और विधि रहती हैं भारी तत्व के बनने की, इस विधि में किसी न्यूट्रान पर दूसरा न्यूट्रान आकर जुड़ जाता है और तब तक और न्यूट्रान जुड़ते रहते जब यह जुड़ाव स्थायी बना रहता है जैसे ही यह जुड़ाव अस्थाई होता है तभी इससे बीटा क्षय होता है और एक न्यूट्रान बीटा कण का त्याग कर प्रोटोन में बदल जाता है। इससे नाभिक में फिर से ‌‌सि्थरता आ जाती है। परन्तु यह क्रिया बड़ी धीमी गति से होती है। इस विधि में भी अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा चाहिए होती है परन्तु धीमी दर से और इसीलिए साधारण से कुछ बड़े तारें भी कुछ मात्रा में भारी तत्वों का निर्माण कर पाते हैं लेकिन यह मात्रा बहुत कम होती है । इसीलिए ब्रह्मांड में इन तत्वों की बहुत कम मात्रा पायी जाती है। अधिकतर भारी तत्व इसी तरह से बने हैं। चांदी, आयोडीन, जेनाॅन , इरीडियम, प्लेटिनम, गोल्ड, बिस्मिथ आदि तत्व इसी तरह बने हुए हैं। यह क्रिया सूर्य पर तब और तेजी से होगी जब यह रक्तदानव की अवस्था में पहुंच जायेगा।

    “तो इस तरीके से हम सब सितारों की कोर में जन्मे थे। जैसा कि कार्ल सेगन ने कहा है।”

    लेखक : भारत मित्तल


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  • एक ब्रह्माण्ड या अनेक ब्रह्माण्ड(Universe or Multiverse)
  • अनेक ब्रह्माण्ड(Multiverse)

    अनेक ब्रह्माण्ड(Multiverse)

    आज हम उस स्थिति में हैं कि अपने ब्रह्मांड की विशालता का मोटे तौर पर आकलन कर सकते हैं। हमारी विराट पृथ्वी सौरमंडल का एक साधारण आकार का ग्रह है, जो सूर्य नामक तारे के इर्दगिर्द परिक्रमा कर रही है। सौरमंडल का स्वामी होने के बावजूद सूर्य भी विशाल आकाशगंगा-दुग्धमेखला नाम की मंदाकिनी का एक साधारण और औसत आकार व आयु का तारा है। इस विराट ब्रह्मांड में हमारी आकाशगंगा की तरह लाखों अन्य आकाशगंगाएं भी हैं। अत: हमारा ब्रह्मांड आकाशगंगाओं का एक विशाल समूह है। आजकल के वैज्ञानिक यहाँ तक मानते हैं कि ब्रह्मांड एक नहीं बल्कि अनेक हैं। इसके पीछे उनका यह तर्क है कि दिक् (अंतरिक्ष) का कोई भी ओर-छोर नहीं है, इसलिए एक से अधिक ब्रह्मांड होने की सम्भावना है।

    आख़िर हम यह कैसे कह सकते हैं कि हमारा ब्रह्मांड अनेक ब्रह्मांडों में से एक है?

    निकोलस कोपरनिकस

    निकोलस कोपरनिकस

    अनेक ब्रह्मांड होने की संकल्पना में हमारी सदियों से दिलचस्पी रही है। निकोलस कोपरनिकस ने सर्वप्रथम यह बताया कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है तथा पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में नहीं है। आगे ज्योदार्न ब्रूनो ने यह बताया कि सूर्य एक तारा है और ब्रह्मांड में अनगिनत तारे हैं। उन्होंने यहाँ तक कहा कि आकाश अनंत है, तथा हमारे सौरमंडल की तरह अनेक और भी सौरमंडल इस ब्रह्मांड में अस्तित्वमान हैं। 18वी सदी आते-आते दूसरे सौरमंडलों के होने की ब्रूनों की कल्पना को सामान्य रूप से अपना लिया गया। इसलिए सूर्य की ब्रह्माण्ड में विशिष्ट स्थिति पर खतरा मंडराने लगा, यह तब और भी स्पष्ट हो गया जब यह पता चला कि सूर्य भी हमारी आकाशगंगा के अरबों तारों में से एक है और यह वहां भी केंद्र में नहीं है। जब आधुनिक काल में ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बिग बैंग सिद्धांत की खोज हुई तब लोगों को यह लगा कि हो न हो हमारी आकाशगंगा ही ब्रह्मांड के केंद्र में है, जो एक महा-विस्फोट का केंद्र बनी। परन्तु ऐसा भी नहीं था, अगर हम सोचें कि किसी अन्य आकाशगंगा से हमारा ब्रह्मांड कैसा दिखाई देगा? उत्तर है कि हमारे इस नए प्रेक्षण स्थल से भी सभी आकाशगंगाएं दूर भागती दिखाई देंगी। अत: आज पूर्व-कोपरनिकस निष्कर्षों का कोई औचित्य नहीं रह गया है। वास्तव में कोपरनिकस के सूर्यकेंद्री सिद्धांत ने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी मांग उठाई, जैसी कभी उठाने की कल्पना भी नहीं की गयी थी! इसलिए वैज्ञानिकों को लगने लगा कि अनंत अंतरिक्ष में यह आवश्यक नहीं है कि एक ही ब्रह्मांड हो। इस सामान्य तर्क से एक से अधिक ब्रह्मांड होने की संकल्पना को बल मिला।

    एक से अधिक ब्रह्मांड होने की अवधारणा के बारे में अक्सर यह दावा किया जाता है कि इसकी संकल्पना तो हमारे वेदों में भी है। मगर वेदों में वर्णित इस संकल्पना का कोई गणितीय आधार नहीं है, इसलिए ये तथ्यात्मक भी नहीं हैं। वहीं वर्तमान में जो वैज्ञानिक अनेक ब्रह्मांड होने का दावा करते हैं, प्रमाणस्वरूप उनके पास गणितीय आधार अवश्य होता है। इसलिए अनेक ब्रह्मांड होने की आधुनिक संकल्पना से प्राचीन भारतीय साहित्य की विशेषकर वेदों से समानता सतही मात्र है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एक से अधिक ब्रह्मांड होने की बात सबसे पहले अमेरिकी दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स ने वर्ष 1895 में कही उन्होंने बहु-ब्रह्मांड के लिए सर्वप्रथम मल्टीवर्स शब्द का उपयोग भी किया, मगर आज की अनेक ब्रह्मांड की संकल्पना विलियम जेम्स के कल्पना से कहीं अधिक तथ्यगत है।
    बिग बैंग समय रेखा

    बिग बैंग समय रेखा

    अनेक ब्रह्मांड होने की सम्भावनाओं पर बीसवी सदी में और इधर शुरू के वर्षों में काफी कार्य हुआ है। हमारे ब्रह्मांड के बारे में ऐसा कहा जाता है कि इसकी उत्पत्ति आज से तेरह अरब सत्तर करोड़ वर्ष पहले बिग बैंग नाम के महाविस्फोट से हुआ था। कहा जाता है कि हमारा संपूर्ण ब्रह्मांड एक अति-सूक्ष्म बिंदु में समाहित था। किसी अज्ञात कारण से इसी सूक्ष्म बिंदु से एक तीव्र विस्फोट हुआ तथा समस्त द्रव्य इधर-उधर छिटक गया। इस स्थिति में किसी अज्ञात कारण से अचानक ब्रह्मांड का विस्तार शुरू हुआ और यह भौतिक विज्ञानी ऐलन गुथ के अनुसार महास्फीति (महाविस्तार) की स्थिति से भी गुजरा। महास्फीति से अभिप्राय यह है कि ब्रह्मांड का यह विस्तार वर्तमान विस्तार दर की तुलना में अकल्पनीय तौर पर बहुत ही तीव्र गति से हुआ था। इस महाविस्तार को अभी तक ब्रह्मांड विज्ञान समझाने में पूर्णतया समर्थ नहीं है, परंतु वैज्ञानिकों का यह मानना है कि शुरुवाती ब्रह्मांड में अलग-अलग क्षेत्रों की विस्तारण दरें भी भिन्न-भिन्न रही होंगी और वे अपने अलग-अलग ब्रह्मांड भी बनाएं होंगे, जिनमें भौतिकी के नियम भी अलग-अलग रहे होंगे। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि इन क्षेत्रीय ब्रह्मांडों के बीच का अंतरिक्ष इतनी तीव्र गति से विस्तृत हो रहा है कि इन ब्रह्मांडों में से किन्हीं दो ब्रह्मांडों का सम्पर्क संभव नहीं है, यहाँ तक कि संदेश प्रकाश की गति से भी भेजा जाए तो भी नहीं! वैज्ञानिक कहते हैं कि भले ही ब्रह्मांड अलग-अलग हों, किंतु वे सदैव ऐसा नहीं रहेंगे। भविष्य में एक समय ऐसा भी आएगा कि जब वो एक-दूसरे के नजदीक आएंगे, और एक-दूसरे में विलीन हो जाएंगे। स्ट्रिंग सिद्धांत, जो दस आयामों की बात करता है को जब महाविस्तार सिद्धांत से मिलाया जाता है, तो वह यह भी बताता प्रतीत होता है कि एक महाब्रह्मांड में अनेकानेक शिशु ब्रह्मांड भी उपस्थित हो सकते हैं।

    वैसे अनेक ब्रह्मांड होने की संकल्पना आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान के दो अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर भी देती प्रतीत होती है-
    • पहला यह कि बिग बैंग से पहले क्या था? तथा
    • दूसरा यह कि भौतिकी के नियम ऐसे ही क्यों हैं, जैसाकि हम जानते हैं?
    पहले का उत्तर है कि इसके अनुसार असीमित बार बिग बैंग हुआ होगा, जिससे नया ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ होगा। तथा इसलिए (दूसरे का उत्तर) भौतिकी के नियमों की असीमित सम्भावनाएं बनी होंगी, और हमारे ब्रह्मांड के भौतिकी के ये नियम असीमित नियमों में से एक हैं। यदि हम मान लें कि वास्तव में ऐसे ब्रह्मांडों का अस्तित्व है तो हो सकता है कि वहां पर जीवन भी हो। यह दिलकश ख्याल ही हमे अपने जैसों को ढूढ़ने के लिए विचलित कर देता है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने अनेक ब्रह्माण्ड होने की संभावना को लेकर कई प्रकार के सिद्धांत विकसित किये हैं, जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांतों का वर्णन हम आगे करेंगे।

    समांतर ब्रह्मांड सिद्धांत

    जब भी ट्रिगर दबाया जाता है, दोनो संभव परिणामो को समाविष्ट करने ब्रह्माण्ड का विभाजन हो जाता है और दो समांतर ब्रह्माण्ड बन जाते है।

    जब भी ट्रिगर दबाया जाता है, दोनो संभव परिणामो को समाविष्ट करने ब्रह्माण्ड का विभाजन हो जाता है और दो समांतर ब्रह्माण्ड बन जाते है।

    समांतर ब्रह्मांड की अवधारणा का विचार सर्वप्रथम वर्ष 1954 में प्रिंसटन विश्वविद्यालय के शोध छात्र हुग एवेरेट ने दिया था। उन्होंने कहा था कि हमारे अपने ब्रह्माण्ड की ही तरह दूसरे कई समांतर ब्रह्माण्ड मौजूद हो सकते हैं और वे सभी ब्रह्माण्ड हमारे ब्रह्माण्ड से संबंधित हो सकते हैं। एवेरेट की इस अवधारणा का वर्षों तक मजाक उड़ाया जाता रहा, लेकिन जब सैद्धांतिक वैज्ञानिक मैक्स टैगमार्क ने क्वांटम आत्महत्या नामक वैचारिक प्रयोग को प्रस्तावित किया, तभी से इसको गम्भीरता से लिया जाने लगा है। सामान्य भाषा में इस वैचारिक प्रयोग के अनुसार एक व्यक्ति अपने सिर पर बंदूक ताने बैठा रहता है। वह व्यक्ति घबराहट में बंदूक का ट्रिगर दबाता है। ट्रिगर दबाते ही ब्रह्मांड का विभाजन दो परिणामों के अनुसार हो जाता है। एक ब्रह्मांड में गोली चल जाती है और वह व्यक्ति मर जाता है, तो दूसरे ब्रह्मांड में गोली नहीं चलेगी और व्यक्ति जीवित रहेगा।

    समांतर ब्रह्मांड सिद्धांत के अनुसार किसी भी क्रिया के सभी संभव परिणामों के अनुसार ब्रह्मांड का उतने ही भागों में विभाजन हो जाता है। प्रत्येक ब्रह्मांड मूल ब्रह्मांड का ही प्रतिरूप होता है, लेकिन किसी भी क्रिया का परिणाम हरेक ब्रह्मांड में अलग-अलग होता है। इसका अर्थ यह है कि जब आप कोई लाटरी निकालते हैं और यदि हम अपने इस ब्रह्मांड में हार जायेंगे तो किसी अन्य ब्रह्मांड में हम जीत भी जायेंगे। इसी प्रकार से किसी अन्य ब्रह्मांड में महात्मा गाँधी और अल्बर्ट आइन्स्टाइन जीवित होंगे, हिरोशिमा और नागासाकी को परमाणु बम की त्रासदी नहीं झेलनी पड़ी होगी, चाँद पर सर्वप्रथम जाने की रेस में सोवियत संघ विजयी हो गया होगा वगैरह-वैगरह। यह सब दिमाग को चकरा देने वाला है, क्योंकि इस हिसाब से हमारे ब्रह्मांड के भौतिकी के नियम उसके समांतर दूसरे ब्रह्मांड के नियमों से पूर्णतया अलग होंगे! दरअसल इस परीकल्पना के अनुसार किसी क्रिया के परिणाम केवल दो ब्रह्मांडीय भागों में ही नहीं विभाजित होते हैं, बल्कि अनंत ब्रह्मांडों में विभाजित होते हैं। जैसे अभी आप इस ब्रह्मांड में यह लेख पढ़ रहें हैं, हो सकता है कि किसी ब्रह्मांड में आपने यह लेख न पढ़ रहें हो, यह भी हो सकता है कि किसी ब्रह्मांड में आप यह लेख पढ़ चुके हों और किसी अन्य क्रियाकलाप में व्यस्त हों। इस प्रकार से अनंत सम्भावनाएं सृजित होती है इसलिए इस ब्रह्मांड में (जिसमे हम इस लेख को पढ़ रहे हैं) एक सम्भावना सच होती है, तो किसी अन्य ब्रह्मांड में इससे पूर्णतया भिन्न घटित घटनाएँ उस ब्रह्मांड की सच्चाई बन जाती हैं।
    वर्तमान में समांतर ब्रह्मांड की अवधारणा के पक्ष में ब्रायन ग्रीन, मिचिओं काकू, स्टीफेन हाकिंग आदि जाने-माने भौतिक विज्ञानी खड़े हैं। इनमे से भी सबसे बड़े पक्षधर ब्रायन ग्रीन माने जाते हैं। हमें ब्रायन ग्रीन के अनेक ब्रह्मांड के सिद्धांत पर उनके कार्यों के बारे जानकारी उनकी पुस्तक ‘हिडन रियालिटी, पैरलल यूनिवर्सिज ऐंड द डीप लॉ ऑफ द कॉस्मोस’ से प्राप्त होती है। ग्रीन के अनुसार परंपरा से हमारा ब्रह्मांड हमारे लिए उस सब कुछ का जोड़ रहा है, जो कुछ उपस्थित है, लेकिन पिछले दशकों के शोध और अनुसंधान से पता चलता है कि सभी तारों, आकाशगंगाओं और सभी कुछ का यह जोड़, कहीं अधिक बड़े, ऐसे अस्तित्व का एक भाग है, जिसमे अनेक ब्रह्मांड सम्मिलित हो सकते हैं। इससे एक महा-ब्रह्मांड की संकल्पना का उदय होता है, जिसके अनुसार सभी ब्रह्मांड इस महा-ब्रह्मांड के अंदर समाहित हैं!
    हुग एवेरेट को यह नहीं पता था कि समांतर ब्रह्मांड कहाँ हैं? और न ही आज के वैज्ञानिक इस विषय में ज्यादा जानते हैं। वैज्ञानिक डेलस एडम्स ने व्यंग्य करते हुए यह कहा था कि जब आप समांतर ब्रह्मांड की अवधारणा पर काम कर रहे होतें हैं तो दो बातें याद रखें- पहला यह कि ये ब्रह्मांड समांतर नहीं है और दूसरा यह कि ये वस्तुतः ब्रह्मांड हैं ही नहीं!

    शिशु ब्रह्मांड सिद्धांत

    शिशु ब्रह्माण्ड(baby universe)

    शिशु ब्रह्माण्ड(baby universe)

    क्वांटम भौतिकी के सिद्धांत, जो व्यष्टि ब्रह्मांड के अध्ययन से संबंधित है, निश्चित परिणामों की बजाय सम्भावनाओं के सन्दर्भ में ब्रह्मांड का वर्णन करते है। और इस सिद्धांत का गणित यह सुझाव देता प्रतीत होता है कि किसी भी स्थिति के सभी सम्भव परिणाम होते हैं – अपने अलग-अलग ब्रह्मांड में। उदाहरण के लिए आप एक चौराहे पर पहुंचतें हैं, जहाँ पर आप सही या बाएं रास्ते पर जा सकते हैं। तो वर्तमान ब्रह्मांड दो शिशु ब्रह्मांडों की वृद्धि करता है : एक वह जिसमे आप सही रास्ते पर जाते हैं, तो दूसरा वह जिसमे आप गलत रास्ते पर जाते हैं। यह अवधारणा मूलतः समांतर ब्रह्मांड की अवधारणा से संबंधित है। इस सिद्धांत के अनुसार शिशु ब्रह्मांडों की उत्पत्ति उसके अभिवावक महा-ब्रह्मांड से हुई है।

    बुलबुला ब्रह्मांड सिद्धांत

    बुलबुला ब्रह्मांड

    बुलबुला ब्रह्मांड

    ब्रह्मांड विज्ञान में महास्फिति नामक एक अवधारणा है, जिसके अनुसार बिग बैंग से ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बाद यह तेजी से विस्तारित हुआ। प्रभाव में यह एक गुब्बारे की तरह बढ़ रहा है, अर्थात् जब हम हम गुब्बारे को फुलाते हैं तो उसके बिंदियो के बीच दूरियों को बढ़ते हुए देखते हैं। टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक अलेक्ज़ेंडर विलनेकिन द्वारा प्रस्तावित आदिम महास्फिति से पता चलता है कि अन्तरिक्ष असंतुलित अर्थव्यवस्था की भांति अराजकता की स्थिति में तीव्र गति से विस्तृत हो रही है, और बुलबुलों की उत्पत्ति हो रही है। यह विस्तार ही बुलबुलों को जन्म दे रहा है, जोकि नए ब्रह्मांडों की उत्पत्ति का कारण है। इस प्रकार हमारे स्वयं के ब्रह्मांड में जहाँ महास्फिति समाप्त हो गयी है, जिसके फलस्वरूप तारों और आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ और हो रहा है। ब्रह्मांड के विस्तार ने ब्रह्मांड को एक बुलबुला बना दिया और इस बुलबुले से नये ब्रह्मांडों की उत्पत्ति हुई, जिनमें न कोई आपसी जुड़ाव था और न ही उनके भौतिकी के नियम-कानून एक हैं। आसान शब्दों में कहें तो प्रत्येक बिग बैंग से एक फैलते बुलबुले का जन्म हुआ होगा और हमारा ब्रह्मांड उनमें से एक विस्फोट की उपज है।

    अनेक ब्रह्मांड के बारे में वर्तमान में प्रचलित कुछ प्रमुख सिद्धांतों की ऊपर हमने चर्चा की है। मुश्किल यह है कि इसमें से किसी भी सिद्धांत को सत्य की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता है, क्योंकि यदि दूसरे ब्रह्मांड अस्तित्व में हों भी तो वर्तमान विज्ञान उनसे सम्पर्क करने में असमर्थ है। बहरहाल, हम वर्तमान बहु-ब्रह्मांडीय सिद्धांतों को बौद्धिक विलसिता या कोरी कल्पना नहीं कह सकते हैं क्योंकि गणितीय समीकरण हमें यह अजीबोगरीब संकेत देते नज़र आ रहें हैं कि एकाधिक ब्रह्मांड हो सकते हैं! हालाँकि इन सिद्धांतों को हम तब तक नहीं स्वीकार करेंगे, जब तक कि वैज्ञानिक विधि के अनुसार प्रयोगों द्वारा इसके पक्ष में प्रभावी साक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाते हैं। फिलहाल अनेक ब्रह्मांड होने की संकल्पना पर वैज्ञानिक गम्भीरतापूर्वक काम कर रहे हैं। और वे उस बुनियादी सिद्धांत (थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग) को ढूढने का प्रयास कर रहें हैं, जो प्रत्येक स्थान पर, प्रत्येक स्थिति में लागू हों। तबतक के लिए आप ब्रायन ग्रीन की तरह दैनिक जीवन की सामान्यता से बाहर निकलर ब्रह्मांड को उसके विशालतम रूप (महाब्रह्मांड रूप) को गणितीय समीकरणों के अधीन देखकर आनन्दित महसूस कीजिये।

    लेखक के बारे मे

    प्रदीप

    प्रदीप

    श्री प्रदीप कुमार यूं तो अभी  विद्यार्थी हैं, किन्तु विज्ञान संचार को लेकर उनके भीतर अपार उत्साह है। आपकी ब्रह्मांड विज्ञान में गहरी रूचि है और भविष्य में विज्ञान की इसी शाखा में कार्य करना चाहते हैं। वे इस छोटी सी उम्र में न सिर्फ ‘विज्ञान के अद्भुत चमत्कार‘ नामक ब्लॉग का संचालन कर रहे हैं, वरन फेसबुक पर भी इसी नाम का सक्रिय समूह संचालित कर रहे हैं।


    Filed under: अंतरिक्ष, अनसुलझे रहस्य, ब्रह्माण्ड, भौतिकी Tagged: अलबर्ट आइन्स्टाइन, एरवीन श्रोडीन्गर, कोपेनहेगन व्याख्या, क्वांटम आत्महत्या, क्वांटम भौतिकी, क्वांटम यांत्रिकी, निकोलस कोपरनिकस, निल्स बोह्र, बिग बैंग, बिग बैंग थ्योरी, बुलबुला ब्रह्माण्ड, ब्रायन ग्रीन, मिचिओ काकू, मैक्स टेगमार्क, श्रोडीन्गर की बिल्ली, समांतर ब्रह्मांड, सुसंगत समाविष्टीकरण, स्टीफ़न हाकिंग, स्ट्रींग सिद्धांत, हग एवेरेट III, हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत, baby universe, bubble universe, coherent superposition, Copenhagen interpretation, Cosmic Bubble, Cosmic Inflation, Erwin Schrödinger, Heisenberg's Uncertainty Principle, Hugh Everett III, infinite parallel universes, Max Tegmark, Niels Bohr, parallel universe, quantum mechanics, Quantum Physics, quantum suicide, Schrödinger's cat, String Theory


  • नोबेल पुरस्कार 2017: रसायन का नोबेल पुरस्कार क्रायो माइक्रोस्कोपी के आविष्कारकों को
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    जाक डुबोशे(Jacques Dubochet), योआखिम फ्रैंक(Joachim Frank) और रिचर्ड हेंडरसन(Richard Henderson)

    जाक डुबोशे(Jacques Dubochet), योआखिम फ्रैंक(Joachim Frank) और रिचर्ड हेंडरसन(Richard Henderson)

    2017 का रसायन का नोबेल पुरस्कार जाक डुबोशे(Jacques Dubochet), योआखिम फ्रैंक(Joachim Frank) और रिचर्ड हेंडरसन(Richard Henderson) को संयुक्त रूप से दिया गया है। इन तीनों को क्रायो इल्केट्रॉन माइक्रोस्कोपी के विकास के लिए यह पुरस्कार दिया गया है।

    यह माइक्रोस्कोप किसी तरल में बायोमॉलिक्यूल की हाई रिजॉल्यूशन संरचना दिखा सकती है। नोबेल पुरस्कार विजेता जाक डुबोशे स्विट्जरलैंड की लूसान यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं जबकि योआखिम फ्रैंक न्यूयॉर्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से। रिचर्ड हेंडरसन का नाता कैंब्रिज के एमआरसी लैबोरेट्री ऑफ मॉलिक्यूलर बायोलॉजी से है।

    नोबेल कमेटी का कहना है कि इन वैज्ञानिकों की खोज के बलबूते जीवन की जटिल रचनाओं की ज्यादा विस्तृत तस्वीरें इंसान हासिल कर पायेगा। क्रायो इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी बायोमॉलिक्यूल की ज्यादा बेहतर तस्वीरें हासिल कर सकता है। इस तरीके ने बायोकेमेस्ट्री को एक नये युग में पहुंचा दिया है।

    नोबेल कमेटी ने अपने बयान में कहा है कि

    इन वैज्ञानिकों की खोज की बदौलत, “रिसर्चर अब बायोमॉलिक्यूल की त्रिआयामी तस्वीरें हासिल कर सकते हैं।

    घोषणा करते हुए स्वीडिश समिति ने कहा कि

    इस खोज ने बायोकेमेस्ट्री को नए स्तर पर पहुंचाया है। यह खोज वैज्ञानिकों को इस बात की अनुमति देती है कि वो बीच में ही बायोमॉलीक्यूल्स को फ्रीज कर दें और उनका ठीक से अध्ययन कर सकें।


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  • दक्षिणी ध्रुव में एक भारतीय वैज्ञानिक
  • जैव घड़ी और भारतीय वैज्ञानिक:  अमेरिका के तीन वैज्ञानिकों को जैव घड़ी के रहस्यों का पता लगाने के लिए इस साल का चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया है। उन महान वैज्ञानिकों को हार्दिक बधाई।  इस अवसर पर हमें अपने देश के उस महान वैज्ञानिक को भी याद करना चाहिए जिसने आज से 57 वर्ष पूर्व सन् 1960-61 में दक्षिणी ध्रुव पर जाकर 100 दिनों तक जैव घड़ी पर अपने प्रयोग किए थे। उस वैज्ञानिक का नाम है  डा. गिरिराज सिंह सिरोही। वे दक्षिणी ध्रुव में कदम रखने वाले प्रथम भारतीय नागरिक भी हैं। अमेरिका ने जैव घड़ी पर किए गए उनके महत्वपूर्ण शोधकार्य के सम्मान में दक्षिणी ध्रुव के मानचित्र पर एक स्थान का नाम सिरोही प्वाइंट रख दिया था। मैंने 1967 में प्रसिद्ध पत्रिका धर्मयुग के लिए उनका इंटरव्यू लिया था जो धर्मयुग के दो अंकों में सचित्र प्रकाशित हुआ था। डा. गिरिराज सिंह सिरोही पर मीडिया में वह पहली एक्सक्लूसिव स्टोरी थी।

    वैज्ञानिक डा. गिरिराज सिंह सिरोही एंटार्कटिका में कदम रखने वाले प्रथम भारतीय थे। वे 1961-62 में लगभग चार माह दक्षिणी ध्रुव में रहे और उन कठिन परिस्थितियों में उन्होंने वहां जैविक घड़ियों पर अपने प्रयोग पूरे किए। पादप शरीर क्रिया विज्ञान के क्षेत्र में उनकी इस महत्वपूर्ण खोज के लिए एंटार्कटिका में एक स्थान का नाम ‘सिरोही पाइंट’ रख कर उन्हें सम्मानित किया गया। उनसे की गई मेरी(देवेंद्र मेवाड़ी) यह भेंटवार्ता ‘धर्मयुग’ के 18 जून 1967 में प्रकाशित हुई और उस समय की ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनी। मीडिया में उनकी खोज का यह पहला खुलासा था…

    डा. गिरिराज सिंह सिरोही

    डा. गिरिराज सिंह सिरोही

    28 फरवरी 1967….। डा. गिरिराज सिंह सिरोही के पास नेशनल साइंस फाउंडेशन, वाशिंगटन से वह पत्र पहुंचा, जिसमें उन्हें दक्षिणी ध्रुव में बीयर्ड मूर ग्लेशियर के पश्चिम में 83.57 अक्षांश दक्षिण तथा 170.06 देशांतर पूर्व क्षेत्र को उनके सम्मान में ‘सिरोही पाइंट’ नाम दिए जाने की सूचना दी गई थी।

    आगरा विश्वविद्यालय से बी. एस-सी. तथा वनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम. एस-सीं की डिग्रियां कृषि विज्ञान में प्राप्त करने के बाद डा. सिरोही ने अपने गांव के छोटे से फार्म में एक साल तक खेती की। वे दिल्ली विश्वविद्यालय से फसलों में पीएच.डी. तथा कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, अमेरिका से साइंसेज में एम. ए. व वनस्पति शास्त्र में पीएच. डी. हैं। सन् 1958 से उन्होंने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में अध्यापन तथा शोध कार्य प्रारंभ किया और पौधों की विशिष्ट गतियों पर अपने शोध प्रयोगों की पुष्टि हेतु वे नवंबर, 1961 से फरवरी 1962 तक दक्षिणी ध्रुव में रहे। दक्षिणी ध्रुव जाने वाले वे प्रथम भारतीय थे। आजकल वे भारतीय कृषि अनुसंधानशाला दिल्ली में हैं।

    बचपन से ही साधारण घड़ियों की टिक्-टिक् की आवाजें सुनते हुए कब उनका मस्तिष्क जैविक घड़ियों का रहस्य जानने के लिए छटपटा उठा, कौन जाने! और, यही छटपटाहट उन्हें भारत के छोटे से गांव खेड़ी, उत्तर प्रदेश से लास ऐंजिल्स, अमेरिका और फिर वहां से दक्षिणी ध्रुव तक खींच ले गई। ऐंटार्कटिका के बर्फ ढके सुनसान और जीव-वनस्पतियों से विहीन विश्व के सबसे ठंडे स्थान में उन्होंने जैविक घड़ियों (बायोलाजिकल क्लाक) पर चार महीने तक कार्य किया।

    प्रकृति की ये रहस्यमय घड़ियां

    आप पूछ सकते हैं कि ये जैविक घड़ियां क्या है? जीवों तथा वनस्पतियों में तमाम जीवन-क्रियाएं एक निश्चित समयानुसार होती है। मनुष्य का दिन में जागना तथा रात को सोना, चूहों का दिन के प्रकाश में सोना एवं रात्रि के अंधेरे में क्रियाशील हो उठना, वनस्पतियों में फूलों का दिन में खिलना व रात में मुंदना तथा पत्तियों में रात और दिन के अंतर पर गिरने तथा उठने और मक्खियों में अंडों से लेकर शिशुओं के निकलने तक की संपूर्ण क्रियाएं एक निश्चित समयानुसार ही होती हैं।

    वैज्ञानिकों के अनुसार जीवों में यही विशिष्ट समय-बोध किसी अदृश्य घड़ी के माध्यम से होता है और समयबोध का यही माध्यम जैविक घड़ी है। डा. सिरोही के अनुसार यह स्वयं संचालित अर्थात् जीवन-क्रियाओं के निश्चित समय पर होने की आतंरिक प्रक्रिया है। परंतु कई वैज्ञानिक इसे पृथ्वी के घूमने तथा दिन और रात से प्रभावित होने वाली प्रक्रिया मानते थे। इसीलिए पृथ्वी के ध्रुव में जाकर पूर्ण अंधकार में, पृथ्वी के घूमने की विपरीत दिशा में घूमने वाली मेजों पर जीवों तथा वनस्पतियों का अध्ययन करने पर उन्होंने यह सिद्ध किया कि जीवों में समय-बोध की एक स्वतंत्र प्रक्रिया होती है।

    हजारों मील का देशांटन करने वाले पक्षियों में तथा नियत समय पर फूलने-खिलने वाली वनस्पतियों में इसका बहुत महत्व है। फसलों के संदर्भ में जैविक घड़ी पर आश्चर्यजनक प्रयोग किए गए हैं तथा प्रकाश के माध्यम से जैविक घड़ी की नियमितता में बाधा डाल कर, या उसे नियमित बनाकर उत्पादन में वृद्धि प्राप्त हुई है। फसल की किसी अच्छी किस्म को देश के हर भाग में उगाए जाने योग्य उसकी जैविक घड़ी की मदद से ही बनाया गया है। धान की ‘ताइचुंग-नेटिव’ किस्म इसका उदाहरण है।

    जैविक घड़ियों पर अनुसंधान के लिए अपने दक्षिणी ध्रुव के प्रवास के अनुभव सुनाते हुए वे बता रहे हैं- ‘….वह अपनी झोपड़ी से थोड़ी दूरी पर था, तभी ‘ह्वाइट आउट’ हो गया। बर्फ और बर्फ। चारों और सिर्फ सफेदी ही सफेदी और सफेदी की चकाचैंध में कुछ भी नजर नहीं आता। अतः ह्वाइट आउट होते ही उसने सोचा कि सिर्फ कि कुछ ही कदमों का फासला मैं तय कर झोपड़ी ढूंढ लूंगा। परंतु उसे क्या पता था कि वह ठीक उसकी उल्टी दिशा में बढ़ रहा है। बहुत दूर तक वह निकलता ही चला गया और अंत में एकाएक ही समुद्र में गिरकर उसकी मृत्यु हो गई। वह स्काट का एक साथी था और दक्षिणी ध्रुव में उसकी मृत्यु-स्थान पर उसका स्मारक बना हुआ है। मैंने एक फोटो भी लिया था उस जगह का…. ”

    उपरोक्त दृश्य उन्हें फिल्म के माध्यम से अमेरिका में तब दिखाया जा रहा था जब वे कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में अपने आचार्य प्राध्यापक कार्ल सी. हेमनर एवं एक जापानी वैज्ञानिक टी. होसीजाकी के साथ दक्षिणी ध्रुव में जाकर जैविक घड़ियों के सिलसिले में अपने प्रयोगों को सिद्ध करने का निश्चय कर रहे थे।

    “अपने प्रयोगों के सही परिणाम हम सिर्फ ध्रुवों में ही प्राप्त कर सकते थे। यह देखिए…“ मैं पानी से भरी हुई एक पेट्री डिश को उनकी मेज में देखता रहा, जिसमें कागज का एक टुकड़ा पड़ा हुआ था। “…..बचपन में किसी चौड़े बर्तन में पानी भर कर मैं यह प्रयोग करता था। अंगुलियों से यदि बर्तन को गोलाई में धीरे-धीरे घुमाया जाए तो कागज अपनी जगह पर ही स्थिर रहता है। अतः टुकड़े के सामने यदि कोई निशान लगा दिया जाए तो पृथ्वी के घूमने से बारह घंटे में निशान उसकी दूसरी दिशा में मिलना चाहिए। इसके लिए मैं दूसरी सुबह का इंतजार करता था। परंतु ऐसा कभी नहीं हो सका। और, इसका उत्तर मुझे बहुत आगे जाकर मिला कि ऐसा तो सिर्फ ध्रुवों पर हो सकता है। और, अपने प्रयोगों में भी जैविक घड़ियों का स्वतंत्र या पृथ्वी की घूमने की गति से नियंत्रित साबित करने के लिए हमें ध्रुवों पर ही प्रयोग करना जरूरी था। उपरोक्त प्रयोग ही वहां घूमने वाली मेजों व सोयाबीन के पौधों वगैरह के रूप में था। उत्तरी ध्रुव में तो समुद्र है और तमाम आइसबर्ग हैं, जो प्रति पल सरकते रहते हैं। इससे प्रयोगों के गलत हो जाने की संभावना थी। परंतु दक्षिणी ध्रुव का क्षेत्र ठोस होने के साथ-साथ वहां एक रिसर्च स्टेशन भी था। इसीलिए हम लोगों ने दक्षिणी ध्रुव में जाने का निश्चय किया था।”

    “…..फिल्मों की सहायता से ही हमें वहां के बारे में पूरी जानकारी दी गई। सभी परेशानियों और खतरनाक दृश्यों से हमें अवगत कराया गया। एकबारगी तो हम बुरी तरह घबरा भी गए परंतु प्रयोगों के परिणाम तो वहां जाकर ही प्राप्त किए जा सकते थे। इसलिए हमें जाना था ही। हमने दृढ़ निश्चय कर लिया कि जाएंगे ही। अपने प्रयोगों की समस्या के संदर्भ में हम ‘नेशनल सांइस फाउंडेशन’ को लिख चुके थे। और, दो महीने के भीतर-भीतर ही हम तीनों को न केवल दक्षिणी ध्रुव जाने की ही आज्ञा मिली, वरन् वहां जाने और रहने के लिए सभी तरह की सुविधाएं भी प्राप्त हो गईं। वाशिंगटन बुला कर हमें पूर्णतः तैयार कर दिया गया और मैं, प्रोफेसर हेमनर और टी. होसीजाकी जाने के लिए तैयार हो गए। आज्ञा मिल जाने के बाद भी कई समस्याएं सम्मुख थीं। बड़ी सख्त डाक्टरी की गई। परंतु अंततः हमें वहां जाने की पूरी तरह से आज्ञा मिल गई। पहनने, ओढ़ने के लिए विशेष पोशाकें, पौष्टिक भोजन वगैरह का प्रबंध हुआ और हम तीनों नवंबर, 1961 में हवाई जहाज से दक्षिणी ध्रुव के लिए रवाना हुए।”

    दक्षिणी ध्रुव का बर्फीला विस्तार और वह अनुसंधान यात्रा  

    डा. सिरोही की आंखों के सम्मुख जैसे दक्षिणी ध्रुव का वह बर्फीला विस्तार और वहां बिताए हुए चार महीने एक बार फिर सजीव हो उठेः “वहां तो बर्फ ही बर्फ है और एक चरम खामोशी। यह देखिए….” कह कर वे स्वयं द्वारा खींचा गया एक फोटोग्राफ दिखाने लगे।

    “प्रयोगों हेतु आपको क्या-क्या साथ ले जाना पड़ा?” पूछा, तो वे हंस पड़े “वहां के लिए तो हमें मिट्टी भी साथ ले जानी पड़ी, सोयाबीन के पौधे उगाने के लिए, क्योंकि वहां तो मिट्टी भी नहीं है। अपने प्रयोगों हेतु हमने चार चीजें साथ ली थीं- हेम्स्टर्स (विशेष चूहे), ड्रोसोफिला मक्खियां, न्यूरोस्पोरा फफूंद तथा सोयाबीन। पौधों में कुछ खास तरह की गतियां (मूवमेंट्स) होती हैं, जैसे दिन में पत्तियों का उठना और रात को गिरना। ऐसी जैविक गतियों के बारे में दो मत हैं। एक यह कि ऐसा पृथ्वी के घूमने से होता है और दूसरा स्वनियंत्रित रूप से। जैविक घड़ियों की गति पृथ्वी के घूमने से होती है अथवा नहीं- यही हमें वहां सिद्ध करना था। हेम्स्टर चूहे दिन में आराम करते हैं और रात को दौड़ते भागते हैं, न्यूरोस्पोरा फफूंद में हर रात के हिसाब से वृत्तों का निर्माण (जोनेशन) होता है, ड्रोसोफिला में अंडों से बच्चे बनने की अवस्था में होने वाली गति और सोयाबीन की पत्तियों में रात और दिन को पत्तियों के गिरने-उठने की गतियां क्या पृथ्वी के घूमने से होती हैं?….घूमने वाली तमाम मेजें भी हम लोग साथ ले गए थे।”

    ”हां तो ये सारा साज-सामान लेकर हम रवाना हुए। टी. होशीजाकी को हमने मकमर्डो पाइंट पर छोड़ दिया। मैंने तथा प्रोफेसर हेमनर ने वहां से 1300 मील आगे एमंडसन-स्काट बेस की ओर फिर हवाई यात्रा प्रारंभ की। जहाज वहां कुछ मिनटों के लिए ही रूक पाता है और वह भी इंजन को चलता हुआ रखकर ही, अन्यथा फिर तो स्टार्ट भी नहीं हो सकता। जहाज पर भी पहिए नहीं लगे होते। उनके स्थान पर ‘स्की’ होते हैं, जो बर्फ की किसी लंबी पट्टी पर स्कीइंग करते हुए से फिसल कर रुकते हैं। मकमर्डो बेस पर तो बर्फ जमे रौस सागर का ही हवाई अड्डे के रूप में उपयोग करते हैं।“

    “….वहां पहुंचने पर देखा बस बर्फ ही बर्फ का विस्तार। प्रयोगशाला की आवश्यकता थी। इसकी भी मजेदार बात है। अमेरिकी नौसेना के लोगों ने प्रयोगशाला के लिए हमें अपना मोटर गैराज दे दिया। सारा काम तो वहां खुद ही करना पड़ता था। वह मोटर गैराज हमने साफ किया। तख्ते-परदे लगा कर प्रयोगशाला का निर्माण किया। बड़ी इल्लतबाजी और फिर उतनी ठंड।…और हां, काम वहां ज्यादा नहीं किया जा सकता। यह पहले भी बता दिया गया था। बड़ी ऊब हुई क्योंकि एक मिनट काम फिर चाय। यह अतिशयोक्ति नहीं है। मैं तो तंग आ गया था और अक्सर झल्ला पड़ता था कि ‘सिर्फ एक मिनट काम और फिर चाय!’ परंतु यह कितना जरूरी था जल्दी समझ में आ गया।”

    “हिदायत के प्रतिकूल और आदतन प्रो. हेमनर जल्दी-जल्दी काम करने लगे और थोड़ी ही देर में हांफते हुए गिर पड़े। हालत यह थी कि हम उन्हें खड़ा करते और वह फिर गिर पड़ते। आराम के बाद ही खड़े रह सके। इसलिए वहां काम धीरे करना बहुत ही जरूरी था। उस स्थान की ऊंचाई थी लगभग 10,000 फीट। हवा की परत पतली होने से आक्सीजन की भी कमी थी। इससे सांस लेने में तकलीफ होती है और शरीर में ऊर्जा जल्दी समाप्त हो जाती है। शरीर में ‘एनर्जी’ जमा रखने के लिए धीरे-धीरे काम करना पड़ता है। बर्फ के भीतर अपनी कोठरियों में बैठे रहने के अतिरिक्त और कोई काम नहीं। इसलिए प्रयोगों के काम से छूटने पर बड़ी मुश्किल होती थी। दुनिया भी वहां उतनी ही बड़ी थी- विभिन्न गतियों में घूमती मेजों पर सोयाबीन के पौधे, ड्रोसोफिला मक्खियां, चूहे और फफूंद, बाहर बर्फ, और हम।”

    “आदमी वहां बंदी की तरह महसूस करता है। महीनों लंबे दिन और वैसी ही रातें। तब तो वहां दिन चल रहा था। परदे खोल लेने पर हम दिन मान लेते थे और बंद करने पर रात। न्यूजीलैंड की घड़ियों के समयानुसार हमने अपने दिन और रातें निश्चित कर रखीं थीं। ..घर की याद भी खूब आती थी। पढ़ना-लिखना ही मुख्य काम। कई बार आदमी वहां पागल हो जाता है। एकदम खामोशी, बंद कोठरियां, बाहर निर्जन बर्फ का विस्तार और कहीं कोई नई बात नहीं। इसी एक रसता से बुरी तरह घबरा कर आदमी मानसिक संतुलन खो बैठता है।…दिनों तक चिट्ठी-पत्री भी नहीं। मौसम खराब रहने पर तो हवाई सेवा भी कई दिनों तक बंद रह जाती है।”

    “…परंतु हम तो अपने प्रयोगों के लिए गए थे। हर किस्म की सुविधाएं हमें दी गई थीं। ऊबने पर फिल्में देखते थे। एक कोठरी ही हमने फिल्में देखने के लिए बना रखी थी। मैंने अमेरिका में सात-आठ साल रहकर भी उतनी फिल्में नहीं देखी होंगी जितनी  सिर्फ दक्षिणी ध्रुव में देखीं। एक दिन तो दिन भर में (बारह घंटे) छह फिल्में देख डालीं।…बर्फ पिघला-पिघला कर खाने-नहाने के लिए पानी बनाते थे। हफ्ते में एक बार नहाना। तीन-तीन, चार-चार बार दिन में खाना पड़ता था। बहुत भूख लगती थी। प्यास बुझाने के लिए बहुत बीयर पीनी पड़ती थी। खाना पकाने वगैरह में रसोइए की मदद करते। बर्तनों को धोने वगैरह की तो बारी लगती थी।“…डा. सिरोही के चेहरे पर एक आकर्षक मुस्कान आ गई जैसे उतनी परेशानियों में भी काम करने में एक अलग किस्म का आनंद पाया हो।

    “…वहां के बारे में तो कितनी ही बातें हैं। अपनी विशेष पोशाक पहन कर हम घूमने बाहर निकलते थे। ठंड से नाक का अगला भाग बिल्कुल जम जाता था। और, वहां दाढ़ी के सिवा तो कुछ उगता नहीं! कोई भी चीज आप बर्फ में फेंकना चाहें, वह वैसे ही सुरक्षित रह जाएगी। मुझे एक फोटोग्राफिक पेपर का पांच वर्ष पुराना टुकड़ा मिला था और उपयोग में आ गया। स्काट के सुरक्षित कैंप में तो करीब पचास साल पुराने अधखाए बिस्किटों के टुकड़े तक वैसे ही पड़े थे।”

    “….एमंडसन-स्काट बेस पर मैं दो महीने रहा। वहीं सारे प्रयोग किए और अंत में सिद्ध किया कि जैविक घड़ियों पर पृथ्वी के घूमने का कोई असर नहीं पड़ता है। बाद में डा. हेमनर भी चले गए और वहां अपने ग्रुप में मैं अकेला रह गया।”

    “…..लौटती बार हवाई जहाज से जाने से मना कर दिया। मैंने कहा कि इस बार समुद्री यात्रा करूंगा। जल यात्रा भी शरीर थरथरा देने वाली रही। ठंड से नहीं, डर से। आइस ब्रेकर जहाज से लौटना पड़ता है। इसके भीतर पानी का टैंक होता है। पानी पंप करने से जहाज एक बार एक ओर और फिर दूसरी ओर लुढ़कता है और बर्फ काटता है। इससे बड़े झटके लगते हैं…सिडनी पहुंचने तक करीब 15 दिन की यात्रा भी बड़ी मजेदार रही, पर सिहरा देने वाली। सिडनी पहुंच कर तो खूब आस्ट्रेलिया घूमा। और, फिर भारत आ गया। मार्च 1963 से इस कृषि अनुसंधान संस्थान में हूं।….” डा. सिरोही ने मुलाकात को अंतिम स्पर्श देते हुए कहा।

     

    (धर्मयुग 18 जून, 1967 से )

    लेखक

    देवेंद्र मेवाड़ी

    देवेंद्र मेवाड़ी

    (देवेंद्र मेवाड़ी)

    देवेन्द्र मेवाड़ी जाने-माने विज्ञान लेखक हैं। भारतीय परिवेश में बच्‍चों की चेतना और मनोरंजन दोनों को साधते और शिक्षित करने का उनका अपना अनोखा अंदाज है।

    वरिष्ठ लेखक और विज्ञान कथाकार देवेंद्र मेवाड़ी विगत 50 वर्षों से विज्ञान कथाओं, मार्मिक संस्मरणों से साहित्यिक रचनाधर्मिता से आम जनता के लिए विज्ञान लिख रहे हैं। विज्ञान पर 20 से अधिक पुस्तकें लिख चुके मेवाड़ी सभी पाठकों को किस्सागोई अंदाज में विज्ञान समझा रहे हैं।

    नैनीताल जिले के ओखलकांडा क्षेत्र में जन्मे 73 वर्षीय मेवाड़ी वनस्पति विज्ञान में एमएससी, हिंदी में एमए, पत्रकारिता में स्नातकोत्तर हैं। ‘मेरी यादों का पहाड़’ उनका आत्मकथात्मक संस्मरण है। उनके दीर्घकालीन सक्रिय विज्ञान लेखन ने समाज में विज्ञान की जागरूकता फैलाई है।

    मेवाड़ी के ही शब्दों में ‘वे साहित्य की कलम से विज्ञान लिखते हैं,’ इससे उनका लिखा विज्ञान सरस होता है। आमजन को किस्से-कहानी की तरह रोचक लगता है। लेखन के इन प्रयोगों को इनकी प्रमुख कृतियों में बखूबी देखा जा सकता है। इनमें ‘विज्ञान और हम’, ‘विज्ञाननामा’, ‘मेरी विज्ञान डायरी’ ‘मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं’, ‘फसलें कहें कहानी’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘विज्ञान जिनका ऋणी है’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘सौरमंडल की सैर’ आदि शामिल हैं। मेवाड़ी ने कई विज्ञान पत्रिकाओं, वैज्ञानिक पुस्तकों का संपादन, अनुवाद भी किया है।

    इनके स्तरीय विज्ञान लेखन के लिए इन्हें अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है, जिनमें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा का प्रतिष्ठित आत्माराम पुरस्कार, हिंदी अकादमी दिल्ली का ‘ज्ञान-प्रौद्योगिकी सम्मान’, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार का राष्ट्रीय विज्ञान लोकप्रियकरण पुरस्कार, भारतेंदु राष्ट्रीय बाल साहित्य पुरस्कार आदि शामिल हैं। वह 15,000 से अधिक बच्चों को अपनी किस्सागोई शैली से विज्ञान की दुनिया समझा चुके हैं।

    वे दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। इसी तर्ज पर रचनात्मक शिक्षक मंडल उत्तराखंड में स्कूली बच्चों में वैज्ञानिक चेतना जगाने, नए सांस्कृतिक मूूल्यों से रूबरू कराने में लगा है।

    पताः सी-22, शिव भोले अपार्टमेंट्स, प्लाट नं. 20, सैक्टर-7 द्वारका फेज-1 नई दिल्ली- 110075

    E-mail: dmewari@yahoo.com


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  • नोबेल पुरस्कार 2017: अमेरिका के तीन वैज्ञानिकों को मिला भौतिकी का नोबेल पुरस्कार
  • बैरी बैरिश(Barry C. Barish), किप थोर्ने (Kip S. Thorne) और रेनर वेस (Rainer Weiss)

    बैरी बैरिश(Barry C. Barish), किप थोर्ने (Kip S. Thorne) और रेनर वेस (Rainer Weiss)

    अमेरिकी खगोलविज्ञानियों बैरी बैरिश(Barry C. Barish), किप थोर्ने (Kip S. Thorne) और रेनर वेस (Rainer Weiss),   को गुरत्व तरंगों की खोज के लिए इस साल का भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है। उनकी यह खोज गहन ब्रह्मांड के दरवाजे खोलती है। अलबर्ट आइंस्टीन ने करीब एक सदी पहले अपनी सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत के तहत गुरत्व तरंगों का अनुमान लगाया था लेकिन 2015 में ही इस बात का पता लगा कि ये तरंगे अंतरिक्ष-समय में विद्यमान हैं।

    तीनों वैज्ञानिकों ने लेजर इंर्टफेरोमीटर ग्रैविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी (लिगो) डिटेक्‍टर और गुरुत्‍वाकर्षण तरंगों के अध्‍ययन के लिए संयुक्त रूप से यह सम्‍मान दिया जाएगा। पुरस्कार की घोषणा के वक्त नोबेल कमेटी के प्रतिनिधि ने बताया कि इस साल यह पुरस्कार उस खोज के लिए दिया गया है, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया।

    ब्लैक होल के टकराने या तारों के केंद्र के विखंडन से यह प्रक्रिया होती है। नोबेल पुरस्कार विजेताओं का चयन करने वाली स्वीडिश रॉयल अकेडमी ऑफ साइंसेज के प्रमुख जी के हनसॉन ने कहा, उनकी खोज ने दुनिया को हिला दिया। उन्होंने सितंबर 2015 में यह खोज की थी और फरवरी 2016 में इसकी घोषणा की थी।

    दशकों के वैज्ञानिक अनुसंधान के बाद यह ऐतिहासिक खोज हुई है। तभी से तीनों वैज्ञानिक खगोलशास्त्र के क्षेत्र में मिलने वाले सभी बड़े पुरस्कार अपने नाम करते आ रहे हैं। थोर्ने और वेस ने प्रतिष्ठित कैलिफॉर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में संयुक्त रूप से लेजर इंटरफियरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेब ऑब्जर्वेटरी (लीगो) बनाया था। इसके बाद बैरिश ने परियोजना को अंतिम रूप प्रदान किया। इस संस्थान को 1901 में नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत के बाद से 18 बार ये प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुका है। करीब 1.3 अरब प्रकाशवर्ष दूर हुए घटनाक्रम के परिणामस्वरुप पहली बार गुरत्व तरंगों का प्रत्यक्ष प्रमाण मिला था।

    अकादमी ने कहा, पृथ्वी पर जब सिग्नल पहुंचा तो बहुत कमजोर था लेकिन खगोलविज्ञान में यह बहुत महत्वपूर्ण क्रांति है। गुरत्व तरंगें अंतरिक्ष में सबसे प्रचंड घटनाक्रमों पर नजर रखने और हमारे ज्ञान की सीमाओं को परखने का पूरी तरह नया तरीका हैं। ब्लैक होल से कोई प्रकाश नहीं निकलता इसलिए उनका पता केवल गुरत्व तरंगों से चल सकता है। पुरस्कार में 90 लाख स्वीडिश क्रोनर यानी करीब 11 लाख डॉलर (करीब 7.20 करोड़ रुपये) की राशि प्रदान की जाएगी।

    लगभग सौ वर्ष पहले 1915 मे अलबर्ट आइंस्टाइन (Albert Einstein)ने साधारण सापेक्षतावाद का सिद्धांत(Theory of General Relativity) प्रस्तुत किया था। इस सिद्धांत के अनेक पुर्वानुमानो मे से अनुमान एक काल-अंतराल(space-time) को भी विकृत(मोड़) कर सकने वाली गुरुत्वाकर्षण तरंगो की उपस्थिति भी था। गुरुत्वाकर्षण तरंगो की उपस्थिति को प्रमाणित करने मे एक सदी लग गयी और 11 फ़रवरी 2016 को लीगो ऑब्ज़र्वेटरी के शोधकर्ताओं ने कहा है कि उन्होंने दो श्याम विवरों (Black Holes)की टक्कर से निकलने वाली गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाया है।

    लिगो (LIGO / Laser Interferometer Gravitational-Wave Observatory) भौतिकी का एक विशाल प्रयोग है जिसका उद्देश्य गुरुत्वीय तरंगों का सीधे पता लगाना है। यह एमआईटी(MIT), काल्टेक(Caltech) तथा बहुत से अन्य संस्थानों का सम्मिलित परियोजना है। यह अमेरिका के नेशनल साइंस फाउण्डेशन (NSF) द्वारा प्रायोजित है।

    मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फ़ॉर ग्रेविटेशनल फ़िज़िक्स और लेबनीज़ यूनिवर्सिटी के प्रॉफ़ेसर कार्स्टन डान्ज़मैन ने इस शोध को डीएनए के ढांचे की समझ विकसित करने और हिग्स पार्टिकल की खोज जितना ही महत्वपूर्ण मानते है। वे कहते है कि इस खोज मे नोबेल पुरस्कार छिपा है। इस खोज के महत्व का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इन्हें शताब्दि की सबसे बड़ी खोज माना जा रहा है। दशकों से वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि क्या गुरुत्वाकर्षण तरंगें वाकई दिखती हैं। इसकी खोज करने के लिए यूरोपियन स्पेस एजेंसी(ESA) ने “लीज पाथफाइंडर” नाम का अंतरिक्ष यान भी अंतरिक्ष में भेजा था।

    आज से करीब सवा अरब साल पहले ब्रह्मांड में 2 श्याम विवरों (ब्लैक होल) में टक्कर हुई थी और यह टक्कर इतनी भयंकर थी कि अंतरिक्ष में उनके आसपास मौजूद जगह(अंतरिक्ष) और समय, दोनों विकृत हो गए। आइंस्टाइन ने 100 साल पहले कहा था कि इस टक्कर के बाद अंतरिक्ष में हुआ बदलाव सिर्फ टकराव वाली जगह पर सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने कहा था कि इस टकराव के बाद अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण तरंगें उत्पन्न हुईं और ये तरंगें किसी तालाब में पैदा हुई तरंगों की तरह आगे बढ़ती हैं।

    अब विश्व भर के वैज्ञानिकों को आइंस्टाइन की सापेक्षता के सिद्धांत (थिअरी ऑफ रिलेटिविटी) के प्रमाण मिल गए हैं। इसे अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में बहुत बड़ी सफलता माना जा रहा है। गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज से खगोल विज्ञान और भौतिक विज्ञान में खोज के नए दरवाजे खुलेंगे।

    ध्यान रहे कि इसके पहले युग्म श्याम विवरों(Binary Black Holes) की उपस्थिति के प्रमाण थे, लेकिन इस खोज से उनकी उपस्थिति पुख्ता रूप से प्रमाणित हो गयी है और यह भी प्रमाणित हो गया है कि अतंत: वे टकराकर एक दूसरे मे विलिन हो जाते है।

    इन दोनो श्याम विवरो का विलय से पहले द्रव्यमान 36 तथा 29 सौर द्रव्यमान के बराबर था। उनके विलय के पश्चात बने श्याम विवर का द्रव्यमान 62 सौर द्रव्यमान है। आप ध्यान दे तो पता चलेगा कि नये श्याम विवर का द्रव्यमान दोनो श्याम विवर के द्रव्यमान से कम है और 3 सौर द्रव्यमान के तुल्य द्रव्यमान कम है। ये द्रव्यमान गायब नही हुआ है, यह द्रव्यमान ऊर्जा के रूप मे परिवर्तित हो गया है और इसी ऊर्जा से गुरुत्वाकर्षण तरंगे उत्पन्न हुयी है। इस ऊर्जा की मात्रा अत्याधिक अधिक है, इतनी अधिक की सूर्य को इतनी ऊर्जा उत्सर्जित करने मे 150 खरब वर्ष लगेंगे। (नोट : 1 सौर द्रव्यमान – सूर्य का द्रव्यमान)।

    लिगो (LIGO) ने गुरुत्वाकर्षण तरंगो को कैसे खोजा?

    गुरुत्वाकर्षण तरंग बहुत से आकार और प्रकार मे आती है। लेकिन वे सभी की सभी अंतरिक्ष के आकार को न्युनाधिक मात्रा मे विकृत करती है। इसके कारण दो पिंडो के मध्य अंतरिक्ष मे आयी विकृति से दूरी कम ज्यादा होती है। इस दूरी के परिवर्तन को मापा कैसे जाये ? यह दो पिंडो के मध्य किसी पैमाने से उनकी दूरी मे आने वाले परिवर्तनो को मापने जैसा आसान नही है।

    जिस जगह पर ये दोनो सुरंगे जुड़ी हुयी है उसके उपर एक शक्तिशाली लेजर उपकरण लगा हुआ है। यह लेजर उपकरण लेजर किरण को एक विशेष दर्पण पर डालता है और यह दर्पण इस लेजर किरण को विभाजित कर सूरंग के दोनो ओर भेजता है। सूरंग के दोनो सीरो के दर्पण से परावर्तित किरणो का अंत मे एक जांच उपकरण वापिस जोड़कर मापता है।

     

    अधिक जानकारी के लिये निम्नलिखित लेख पढें

    1. गुरुत्वाकर्षण तरंग की खोज : LIGO की सफ़लता
    2. LIGO ने दूसरी बार गुरुत्वाकर्षण तरंग देखने मे सफ़लता पायी

     


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  • नोबेल पुरस्कार 2017: अमेरिका के तीन वैज्ञानिकों को मिला चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार
  • जेफरी हॉल, माइक रोशबैश और माइकल यंग

    जैफ्री सी हाल, माइकल रोसबाश तथा माइकल डब्ल्यू यंग

    अमेरिका के तीन वैज्ञानिकों जैफ्री सी हाल, माइकल रोसबाश तथा माइकल डब्ल्यू यंग को इस साल के चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है।

    अमेरिका के तीन वैज्ञानिकों जैफ्री सी हाल, माइकल रोसबाश तथा माइकल डब्ल्यू यंग को मानव शरीर की ‘‘आंतरिक जैविक घड़ी’’ विषय पर किए गए उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए इस साल के चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। ‘आंतरिक जैविक घड़ी’ को सर्केडियन रिदम के नाम से जाना जाता है। नोबेल असेम्बली ने कहा है,

    “उनकी खोजों में इस बात की व्याख्या की गई है कि पौधे, जानवर और इंसान किस प्रकार अपनी आंतरिक जैविक घड़ी के अनुरूप खुद को ढालते हैं ताकि वे धरती की परिक्रमा के अनुसार अपने को ढाल सकें।”

    असेंबली ने कहा कि हाल (72), रोसबाश (73) और यंग (68)

    ‘आंतरिक जैविक घड़ी का पता लगाने और इसके आंतरिक कामकाज को स्पष्ट करने में सफल रहे हैं।’ यह आंतरिक जैविक घड़ी हारमोन के स्तर, नींद, शरीर के तापमान और उपापचय जैसे जैविक कार्यों को प्रभावित करती है। तीनों वैज्ञानिकों ने उस जीन को अलग करने का काम किया जो रोजमर्रा की जैविक स्थिति को नियंत्रित करते हैं।

    नोबेल टीम ने कहा,

    ‘‘इन्होंने दिखाया कि ये जीन उस प्रोटीन को परर्वितत करने का काम करते हैं जो रात के समय कोशिका में जम जाती हैं और फिर दिन के समय बहुत ही छोटा आकार ले लेती हैं।’’

    ये तीनों वैज्ञानिक करीब 11 लाख डॉलर की पुरस्कार राशि साझा करेंगे।

     

    ‘आंतरिक जैविक घड़ी’ या सर्केडियन रिदम

    सबसे पहले सर्काडियन क्लॉक के मानव कामकाज का ब्यौरा देखें, ताकि अपने जीवन में भी आप इसका अध्ययन कर सकें। इसके मुताबिक सुबह 6 बजे, या ज्यादा ठोस तौर पर कहें तो सूर्योदय के आसपास शरीर में “कॉर्टिसोल हॉरमोन” का स्राव होता है, जिसका सबसे बड़ा काम शरीर में अधिक से अधिक ग्लूकोज छोड़ने का होता है, ताकि आप बिस्तर छोड़कर अपना कार्य आरंभ कर सकें। फिर 6 बजे से 9 बजे तक आपका रक्तचाप पूरे दिन में सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ता है। इसका कार्य शरीर को बाहरी दबाव के अनुरूप ढालने का होता है।

    सुबह 9 बजे से लेकर दोपहर 12 बजे तक का समय शरीर की सबसे ज्यादा सतर्कता (एलर्टनेस) का होता है। तमाम चीजों के कोऑर्डिनेशन (तालमेल) के लिए सबसे अच्छा वक्त दिन में 12 से 3 का। सबसे तेज प्रतिक्रिया आप दिन 3 बजे से शाम 6 बजे के बीज जताते हैं। शाम को छह बजे, या ज्यादा सटीक तौर पर कहें तो सूरज ढलते वक्त हमारे शरीर का तापमान सबसे ज्यादा होता है। फिर शाम छह बजे से लेकर 9 बजे रात तक रक्तचाप सबसे अधिक दर्ज किया जाता है। यही वह समय है, जब हमें आराम करने आवश्यकता सबसे ज्यादा महसूस होती है। रात में नौ बजे के आसपास हमारे शरीर में मेलाटोनिन नाम का हॉरमोन स्रावित होता है, जिसका कार्य हमें सोने के लिए तैयार करने का होता है।

    रात 12 से 3 का समय हमारी सबसे गहरी नींद के लिए सुरक्षित होता है, लिहाजा इस समय को हमें अपने जीवन की सबसे कीमती चीज मानना चाहिए। इस समय में शरीर के साथ की जाने वाली कोई भी छेड़छाड़ अगले दिन तो उस पर भारी पड़ती ही है, इसका लगातार जारी रहना आने वाले समय में शरीर के लिए बहुत बड़ी विपत्तियों का कारण भी बनता है। बहरहाल, रात में तीन बजे से लेकर सुबह छह बजे तक के समय में हमारे शरीर का तापमान सबसे कम होता है। यानी नींद पूरी कर लेने के बाद शरीर इस समय ‘सुखनिदिया’ में होता है। इस अवधि में आप जाग भी सकते हैं। इसमें कोई जबर्दस्ती न की जाए तो शरीर को इसका कुछ खास नुकसान नहीं होता। लेकिन निश्चित रूप से यह समय शरीर और मन पर कोई तनावपूर्ण जिम्मेदारी डालने का नहीं होता।

    शोध की दोनों टीमों के विशिष्ट योगदान पर बात करें तो 1984 के बाद मैसाचुसेट्स की हॉल और रोसबाश वाली टीम सर्काडियन क्लॉक के लिए जिम्मेदार जीन द्वारा बनाए जाने वाले प्रोटीनों के अध्ययन की ओर बढ़ी और इनके व्यावहारिक पहलुओं पर काम किया, जबकि न्यूयॉर्क में यंग ने खोजबीन करके एक और ‘टाइमलेस’ जीन का पता लगाया, जिससे मिलकर ही यह घड़ी वाली जीन अपनी रासायनिक भूमिका का निर्वाह कर पाती है। सूरज के प्रकाश के जरिए बनने वाला सुबह, दोपहर, शाम और रात का चक्र ही इस घड़ी को चाभी भरता है। इस खोज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि थोड़ा और इत्मीनान हो लेने के बाद आने वाले दिनों में शल्य चिकित्सक यह तय कर सकते हैं कि कौन सा ऑपरेशन किस समय करना ठीक रहेगा, और जो दवाएं आप लेते हैं, उनका सबसे अच्छा असर ठीक-ठीक किस वक्त लेने पर दिखाई पड़ेगा।

    जैविक घड़ी की वजह से ही हम रात को सोना चाहते हैं। जैविक घड़ी मानव शरीर के क्रियाकलापों और व्यवहार में भी बहुत अधिक बदलाव लाती है।

    मानव शरीर, पौधे, जीव जंतुओं और फफ़ूद की कोशिकाएं एक घड़ी के अनुरूप चलती हैं। हमारे मन, हॉर्मोन के स्तर, शरीर के तापमान और उपापचय (मेटाबॉलिज़्म) में रोज़ उतार चढ़ाव होता रहता है। यहां तक कि हर सुबह दिल का दौरा पड़ने का ख़तरा भी बढ़ जाता है क्योंकि हमारा शरीर हर नए दिन की शुरुआत के लिए काम कर रहा होता है।

    जैविक घड़ी हमारे शरीर को नियंत्रित करती है। इसमें किसी भी तरह का बदलाव आने पर हमारे शरीर पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। जेट लैग से होने वाली समस्या इसका उदाहरण है, जिसमें हमारा शरीर संसार के मुताबिक नहीं चल पाता और हमें कुछ वक्त के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

    जैविक घड़ी में बदलाव की वजह से शुरुआत में तो याददाश्त संबंधी समस्या पैदा होती है लेकिन इसका बड़ा प्रभाव कई तरह की बीमारियों के रूप में सामने आता है जिसमें टाइप 2 मधुमेह, कैंसर और दिल के रोग शामिल हैं।ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर रसेल फ़ोस्टर ने बीबीसी को बताया, “अगर हम जैविक घड़ी से छेड़छाड़ करते हैं तो उपापचय (मटैबलिज़म) पर इसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है।”

    तीनों अमरीकी वैज्ञानिकों को ये पुरस्कार दिए जाने पर वो बहुत खुश हैं। उन्होंने कहा कि शरीर का सिस्टम कैसे काम करता है पहली बार इसकी जानकारी देकर वो इस पुरस्कार के हक़दार बने हैं।

    शोध

    जेफरी हॉल और माइकल रोजबाश ने डीएनए के एक खंड को अलग कर जैविक घड़ी में लगाया। इसे पीरियड जीन कहते हैं। पीरियड जीन के पास एक तरह के प्रोटीन के निर्माण करने का निर्देश होता है। इस प्रोटीन को पीइआर कहते हैं। जब पीइआर का स्तर बढ़ जाता है तो वह खुद ही अपने निर्माण संबंधी निर्देशों को बंद कर देता है। इस तरह पीइआर का स्तर 24 घंटे के दौरान घटता-बढ़ता रहता है। ये रात के वक्त बढ़ता है जबकि दिन के वक्त कम हो जाता है। माइकल यंग ने दो जीन खोजे हैं, एक को टाइमलेस तो दूसरे को डबल टाइम कहते हैं। दोनों पीइआर की स्थिरता को प्रभावित करते हैं। अगर पीइआर अधिक स्थिर है तो जैविक घड़ी धीमी गति से चलती है, अगर यह कम स्थिर है तो यह तेज़ काम करती है। पीइआर की स्थिरता की वजह से ही कुछ लोग सुबह उठना पसंद करते हैं तो कुछ देर रात तक जागना।

     

     


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